रंगकर्म के तप और ताप का नया पाठ: उषा गांगुली

डॉ. प्रोमिला

- प्रोमिला


 ‘ट्रेब्लिंका में जीन लुइस स्टीनर एक लड़की की कहानी बताते हैं जो बंदी शिविर में अपनी मृत्यु के इंतजार में लाइन में नग्न खड़ी है। गार्ड लड़की को पंक्ति से बाहर आकर नाचने के लिए कहता है। लड़की अपनी स्व-आधिकारिक चाल तथा वैयक्तिकता के साथ नाचती हुई गार्ड तक जाती है, उसकी बंदूक छीनती है और उसे गोली मार देती है।’1

यहाँ यह कहानी उषा गांगुली से कोई समानता नहीं रखती। ना ही उन्हें इस परिपेक्ष में देखे जाने की माँग करती है पर यह प्रख्यात रंगकर्मी, निर्देशक, अभिनेत्री, लेखिका एवं सक्रिय समाजसेवी गांगुली के उस कथन तक एक प्रतीकात्मक कड़ी अवश्य गढ़ती है, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘नृत्य ने मुझे बचपन से ही एक अनुशासन में बांध दिया था और इसी अनुशासन ने ही वास्तव में मुझे बचाया। बचपन में मैं बहुत चंचल थी, बहुत सवाल पूछती थी। हमारे गांव में एक दीवार थी। मेरी माँ हमेशा मुझे उस दीवार से दूर रहने के लिए कहती थी। मुझे हमेशा लगता था कि मैं उस दीवार को तोड़ रही दूँ।’2 जीवन के संघर्षमयी मर्म और बोध की इसी उष्मा से कान्यकुब्ज परिवार में जन्मी गांगुली (1945-23 अप्रैल 2020) के अनुभव और रंग-प्रभाव की सक्रियता निर्धारित हुई। बिना किसी औपचारिक रंग-शिक्षा के बावजूद नाट्य-क्षेत्र में वह एक असाधारण रचनाकार के रूप में उभरी क्योंकि नृत्य की तरंग एवं मानवीय अनुभूतियों से उन्होंने अपनी भूमिका अधिग्रहीत की।

प्रत्येक समर्थ रंगकर्मी के साथ रंगमंच भी स्वयं की पुनर्रचना करता है और बदले में सृजन की परंपराओं को नाट्य को लौटता है। ये परंपराएँ रंगभूमि को समृद्ध बनाती हैं। 1970-80 के दशक में उषा गांगुली ने कोलकाता में हिंदी रंगमंच को अपनी ईमानदारी और विलक्षणता से तराशा। समग्र भारतीय नाट्य को भाषिक अंदाज और नाट्य-प्रस्तुतीकरण का एक नया नजरिया दिया। शब्द के महत्व को स्वीकारते हुए भी उनके नाटक बोझिल नहीं बने क्योंकि गांगुली भावम्, रागम् और तालम् का सम्मिश्रण ‘भरतनाट्यम’ की पारंगत कलाकार रही। अर्थ, ध्वनि, लय, रस, भाव और जीवन की अनुभूतियों ने उनके नाटकों के शब्दों में बराबर आस्वाद भरा। उन्होंने साहित्य और रंगमंच दोनों को मानव जाति के सुखों और दुखों को दर्शाने वाला माना। लोगों की जीत और असफलताओं की कहानियाँ सुनाते हुए एक-दूसरे के साथ चलने वाला करार दिया। दोनों को एक-दूसरे के बिना अधूरे बताया। थिएटर की भाषा में गहरी पैठ ने उषा गांगुली की हर प्रस्तुति में नया सौंदर्य, नई ताजगी भरी। उनका जितना प्रेम नाटकों से रहा उतना ही आमजन से भी, स्वयं निर्देशक की अस्मिता से भी। गांगुली संगीत की जानकार और प्रेमी रही। ऐसी नाटककार जिसने मंच को कभी सिनेमा का रूप दिया तो कभी आकर्षक पेंटिंग में बदल दिया। आजीवन वामपंथी आन्दोलन से जुड़े रहकर, मार्क्सवाद के प्रति गहरी आस्था रखने वाली उषा ने अपनी हर प्रस्तुति को राजनीतिक विचारधारा की अभिव्यक्ति तथा सामाजिक प्रतिबद्धता का वसीयतनामा बनाया।

1970 में संगीत कला मंदिर (कोलकाता) के साथ शुद्रक के ‘मृच्छकटिकम्’ के हिंदी रूपांतर ‘मिट्टी की गाड़ी’ में वसंतसेना की भूमिका से अपनी रंग-यात्रा आरंभ की और मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’, मधु राय के ‘किसी एक फूल का नाम लो’, शंकर शेष के ‘एक और द्रोणाचार्य’ और शांता गांधी के 'जसमा ओढ़न' जैसे नाटकों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। किंतु थिएटर को एक सामाजिक और सामूहिक माध्यम मानने वाली उषा गांगुली को वहाँ का वातावरण रास नहीं आया। बिना गंभीर चिंतन, विचार-विमर्श के नाटकों का चुनाव, बिना निश्चित निर्देशक के नाटकों का प्रस्तुतीकरण और वहाँ फैली अनुशासनहीनता से उनका मन उचाट हो गया। उस समय कोलकाता में अनामिका (1955 में प्रतिभा अग्रवाल, श्यामानंद जालान द्वारा स्थापित), पदातिक (1972 में श्यामानंद जालान द्वारा बनाया गया) जैसे कई समूह बहुत से नाटक कर रहे थे। केया चक्रवर्ती, रुद्रप्रसाद सेनगुप्ता, शंभू मित्रा, तृप्ति मित्रा, उत्पल दत्त और अजितेश बंदोपाध्याय जैसे कई रंगकर्मी नए गवाक्ष खोल रहे थे। उत्पल दत्त का मानना था कि ‘क्रांतिकारी थिएटर अनिवार्य रूप से लोगों का थिएटर है, जिसका मतलब है कि इसे आम लोगों के सामने खेलना चाहिए। दर्शक हमारी प्राथमिक चिंता है, फॉर्म और सामग्री दूसरे स्थान पर आते हैं।’3 उषा को इनके जुनून से प्रेरणा मिली। वह बंगाल के हृदय क्षेत्र में हिंदी थिएटर समूह को जन्म देना चाहती थीं ताकि लोगों के बड़े वर्ग तक पहुँचा जा सके। क्रीडा, खेल, कौतुक कहे जाने वाले नाटक का नया रूप निर्मित किया जा सके। 1976 में उन्होंने बीस साथियों के साथ मिलकर ‘सामाजिक रूप से जागरूक और जिम्मेदार थिएटर आंदोलन को बढ़ावा देने के मूल उद्देश्यों के साथ एक समूह तैयार किया, जो उन नाटकों का निर्माण करे, जिनकी राजनीतिक विचारों के बावजूद समाज के लिए उपयोगिता हो, मेट्रोपोलिटन (स्थितियों) में आम लोगों के बीच सामाजिक रूप से जिम्मेदार ड्रामा को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाए ताकि हिंदी थिएटर जन-आधारित बन सके।’4 लंबे विचार-विमर्श के पश्चात ‘रंगकर्मी’ विषयों को दोहराएगा नहीं वाली सोच के साथ अस्तित्व में आया। शुरुआती चरणों में गांगुली ने रुद्रप्रसाद सेनगुप्ता, तृप्ति मित्रा, एम.के. रैना जैसे प्रतिष्ठित निर्देशकों को ‘परिचय’ (अर्नाल्ड विस्कर के ‘रूट्स’ का हिंदी रूपांतरण), ‘गुड़िया घर’ (इब्सन के ‘ए डॉलस हाउस’ का हिंदी रूपांतरण), ‘माँ’ (मैक्सिम गोर्की के ‘मां’ उपन्यास पर आधारित) आदि नाटकों के निर्देशन के लिए आमंत्रित किया। इस समय वह संगठक बनकर निर्देशकों का बारीकी से निरीक्षण करती रही और कलाकार के रूप में नाटकों से जुड़ी रही।

भाषाई बंधनों से परे एक दूसरे को करीब लाने और एक दूसरे को पहचानने के प्रयास की मानवीय धारणा को लेकर चलने वाली उषा गांगुली एक नया मुहावरा, नई नाटकीय भाषा रचने के लिए दृढ़ थी। ऐसी भाषा जिसमें प्राकृतिक भाषाई बाधाओं के समीकरण निरर्थक हों। उनका लक्ष्य जीवन के संवेदनशील रंगीय-बिंब को तलाशने का था। सभी को सुलभ एक रचनात्मक साझा माध्यम निर्मित करने का था। उन्होंने प्रत्येक स्तर पर सामुदायिकता और साझी सोच को महत्व दिया और राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक और आर्थिक शोषण, उत्पीड़न को संबोधित करने, रंगमंच को अधिकाधिक जनोन्मुख बनाने के लिए सन् 1984 में पचास अभिनेताओं के साथ अपना पहला विविध आयामी, उलझे हुए कथानक वाला नाटक ‘महाभोज’ निर्देशित किया। इसके विषय में मन्नू भंडारी ने लिखा है, ‘इस तरह के नाटक ही रंग-कर्मियों के लिए चुनौती भी होते हैं और नए-नए मंच-कौशल तकनीकी निर्माण के लिए प्रेरणा-स्रोत भी। आज देश के अनेक भागों में कई नाट्य-मंडल ऐसे भी हैं जिनके लिए नाटक मात्र एक कला अभ्यास ही नहीं बल्कि सामाजिक जागृति और संघर्ष का हथियार भी है।... बड़े-बड़े नगरों के सभ्य नागरिकों के लिए महाभोज की तकलीफ एवं संघर्ष सुपरिचित स्थिति से दिल दहला देने वाला, लेकिन मात्र एक कलात्मक साक्षात्कार-भर है जबकि देश की संघर्षरत जनता के लिए साहस और प्रतिरोध का हथियार भी।5 उषा गांगुली ने प्रतिरोध की इस आवाज को ‘महाभोज’ की सौ से भी अधिक प्रस्तुतियों में प्रतिध्वनित किया। 1987 में रत्नाकर मतकरी (जिनकी उषा गांगुली के जाने की 19 दिन बाद 17 मई 2020 को कोरोना से मृत्यु हो गई है) की मराठी कहानी पर आधारित ‘लोक कथा’ में ग्रामीण भारत में दलित उत्पीड़न का लेखा-जोखा उभारा। स्वदेश दीपक का सदियों से तथाकथित जाति के नाम पर किए जाने वाले बहुस्तरीय अन्याय, अत्याचार को दर्शाता संवाद प्रधान नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ सफलतापूर्वक मंचित किया। महेश एलकुंचवार की ‘होली’ में कॉलेज के युवाओं की मस्ती और उनकी महत्वाकांक्षाओं की प्रस्तुति की। आगे ‘यह 1990 का दौर था, गांगुली ने तीन तरह की प्रस्तुतियों -प्रसिद्ध भारतीय लेखकों विशेषकर बंगाली लेखिका महाश्वेता देवी द्वारा ‘रुदाली’ (1993) और ‘मुक्ति’ (1999) जैसे काल्पनिक कार्यों के महत्वाकांक्षी मंच संस्करण, समूह के लिए विशेष रूप से सामयिक सामाजिक मुद्दों पर तैयार किए गए सुधारवादी नाटक, जैसे, ‘बेटी आयी’ (1996) और ‘शोभा यात्रा’ (2001) और पश्चिमी क्लासिक्स के अत्यधिक राजनीतिक स्वदेशी संस्करण, जैसे कि ब्रेख्त की ‘मदर करेज’ (हिम्मत माई, 1998) के माध्यम से एक निर्देशक और अभिनेत्री के रूप में अपना स्थान पाया।... इन प्रस्तुतियों में लेखक, पाठ, निर्देशक और कलाकार के मध्य के संबंध पहले वर्णित की गई साहित्यिक साझेदारी की तुलना में कहीं अधिक उदार और अपरंपरागत बने पर फिर भी उन्होंने गांगुली के लिए दर्शकों को बिल्कुल नए पैमाने पर जुटाया।’6 भाषा और समुदाय की सारी सीमाएँ समाप्त हो गई। उनका रंगकार्य सामूहिक गतिविधि, संगीत-ध्वनि संरचना, प्रकाश व्यवस्था और दृश्य तक ही सीमित नहीं रहा। यह शिल्प, तकनीक, श्रम के प्रति भावावेग और काल्पनिक सूझ-बूझ से भी आगे की यात्रा बना। धुन की पक्की उषा गांगुली को सामग्री रहित मंच ने आकृष्ट किया। उन्होंने भारी-भरकम, खर्चीले थिएटर की प्रतिक्रिया में न्यूनतम मंच-सज्जा के भीतर से नई रंग-शब्दावली तलाशी। अभिनेता की देह-भाषा, संवाद-संप्रेषण और मंचीय प्रतीकात्मक बिम्बों को केंद्र में रखा। नृत्यांगना होने के नाते स्टेज के प्रत्येक कोने का प्रयोग किया। स्वयं को कभी दोहराया नहीं। बासी नहीं पड़ने दिया। हर नाटक के लिए भिन्न मंच-व्यवस्था तैयार की। निरंतर अपने को परिष्कृत, परिमार्जित किया। शाब्दिक रचना की लयात्मक पहचान की। जीवन से अर्थध्वनियों का ताना-बाना समझा। संगीत को ना तो कभी सजावटी बनने दिया ना ही किसी आख्यान का आधार भर बल्कि उसे आख्यान का विस्तार बनाया।

कबीर को गुरु स्वीकारने वाली उषा को ‘आयरन लेडी’ कहा गया। उनका विश्वास रहा कि राजनीतिक चेतना पूरे समाज के दाएँ से आती है। उसके अधिकार की बात करने से आती है’। स्त्री का दुख, उसकी यंत्रणा, उसका संघर्ष विशेषरूप गांगुली की चिंताओं में शामिल हुआ। उन्होंने ‘रूदाली’ की सनीचरी बन भारतीय समाज में चुनावहीनता और स्त्री-जीवन की विसंगति को उभारा। हिम्मत माई के रूप में हर चुनौती में अडिग स्त्री के हौसले का परिचय दिया। ‘अन्तर्यात्रा’ में अपनी लेखनी और एकल अभिनय का लोहा मनवा आत्मकथांश रूप में स्त्री के अस्तित्व और व्यक्तित्व, अधिकार और अभिव्यक्ति, समानता और सम्मान के संघर्ष का ताना-बाना बुना। इसके विषय में कृपाशंकर चौबे ने लिखा है, ‘उषा गांगुली निर्देशित ‘अंतर्यात्रा’ सिर्फ नाटक नहीं, बाहर भीतर के जंग से निरंतर जूझती स्त्री की संघर्ष गाथा है। नाटक स्त्री की बाहरी ही नहीं, नितांत आंतरिक परतों और उसी के साथ, स्त्री ग्रंथि की गांठों को खोलता है। स्वकीय पहचान-मानवीय गरिमा के संधान में स्त्री को मार प्रतिकूलताएँ और कठोर प्रतिक्रियाएँ झेलनी पड़ती हैं-भयावह यथार्थ का उसे सामना करना पड़ता है।’7 ‘रुदाली’ के साथ वर्गों की द्वंद्वात्मकता पर ‘खोज’ नाटक लिखा। अपने सम्मान के लिए लड़ने वाली पाकिस्तान के मीरवाला गाँव की शिक्षिका मुख्तारन माई की जीवनगाथा को 'हम मुख्तारा' में मंच दिया। ‘ना बनेगी हम मोम की बत्तियाँ/ हवा में बहकर बुझने वाली मोम की बत्तियाँ/ ना बनेगी हम मोम की बत्तियाँ’ कहकर स्त्री-साहस को अनुस्यूत किया। रविंद्रनाथ टैगोर की ‘चांडालिका’ में शूद्र समाज की महिला के जीवन को पूरे साहस के साथ प्रस्तुत किया। स्त्री-त्रासदी और जीवन-सत्य के चित्रण तथा अद्भुत नाट्य-संरचना का कौशल प्रस्तुत किया। किंतु इतना होने पर भी उषा गांगुली ने सदैव उन्हें ‘स्त्री निर्देशक’ या ‘स्त्रीवादी’ माने/ कहे जाने का प्रतिवाद किया। स्पष्ट बताया कि ‘एक जागरूक सृजनकारी इंसान होने के नाते मैं स्त्रियों के लिए काम करना चाहती हूं, लेकिन मैं अपने समाज, अपनी राजनीति, अपनी अर्थव्यवस्था पर भी सवाल उठाना चाहती हूं, क्योंकि मैं जानती हूं कि इसके बिना हम देश में क्रांति नहीं ला सकते।’8

उषा गांगुली ने न किसी फॉर्म को गढ़ा, न कोई स्कूल खड़ा करने की सोची। उन्होंने अपनी रंगमंचीय प्रस्तुतियों में सामाजिक दृष्टि, सांस्कृतिक चिंतन, सामूहिकता, संगठन-शक्ति, जन-प्रश्न, लोक-जागरण, उद्बोधन-संबोधन को मुखर किया। काशीनाथ सिंह की रचना ‘काशी का अस्सी’ की एक कहानी "पांडे कौन कुमति तोहे लागी" पर आधारित ‘काशीनामा’ में पांडेय परिवार की विपन्नता, पुश्तैनी पेशों के चूक जाने, संस्कृत भाषा के समाप्त होने के मध्य से, कैसे लोगों के साथ उनके धर्म के आधार पर भेदभाव किया जा सकता है? का प्रश्न उभारा। उनका जुझारूपन और जिंदगी से लयबद्धता, विविध रंगी नाट्य-व्यापार लेकर आए। मंटो की कहानियों पर आधारित ‘नाम गोत्रहीन’ के तीन नाटकों में विभाजन, कला और जीवन के रंग अभिव्यक्त हुए। गांगुली के मानवीय पीड़ा-बोध ने समकालीन अनुभव और प्रसंगों को सचित्र तथा पूरे अंतर्मन से उजागर किया। नाटकों को सामाजिक सरोकारों से लैस आधारभूमि प्रदान की। ‘रंगकर्मी’ को कोलकाता से निकालकर गांवों, कस्बों, छोटे स्कूल, कॉलेजों, गली, चौराहों, चौपालों के सामान्य लोगों तक पहुँचाया। ‘मय्यत’, ‘मातादीन चांद पर’, ‘तमाशा दर तमाशा’, ‘बेटी आई है’ और ‘गिरगिट’ जैसे सरल नाटक खेले। ऐसा रंगमंच सजाया जो अपने मूल में तथा अपनी संप्रेषणीयता के मूल में अवस्थित रहा। दर्शकों के रूप में जुटे मजदूरों, मेहनतकशों, गरीब तबके के लोगों, राहगीरों से सीधे संवाद कर सका। मानवीय जीवन के विविध रंगों, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विषमताओं से दर्शकों का परिचय करवा सका। दमनकारी, अंधविश्वासों से भरी व्यवस्था के खिलाफ विरोध की चिंगारी बन सका। जिसने सत्ता के विरुद्ध आमजन, शासक वर्ग के विरुद्ध दमित की बात की पर यह नुक्कड़ नाटक नहीं था बल्कि उससे कुछ अलग था।

उषा गांगुली ने प्रयोगधर्मी शैली को अपनाया। उन्होंने पूंजी और बाजार के समीकरणों से अधिक मानवीय सत्य को निरूपित किया। रंगमंच के लिए सात महिला नाट्य निर्देशिकाओं और सात अभिनेत्रियों को लेकर ‘सप्तपर्णी’ कार्यक्रम तैयार किया। बहुत-सी कार्यशालाएँ की, नाटक को देश की सीमाओं से निकालकर विदेशी दर्शकों तक पहुँचाया। हालांकि सन् 1998 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया किंतु वे कभी प्रलोभनों की घुड़दौड़ में शामिल नहीं हुई। पांच दशकों तक फैला उनका रंग-बोध वस्तुतः उनके जीवन-मूल्यों की ही पुनर्रचना रहा। उन्होंने ताउम्र मीरा के कहे अनुसार जीवन को स्वीकारा कि ‘बाप छोड़े, माँ छोड़े, जहाँ कहीं जो भी हैं, सब छोड़ दे, लेकिन मीरा की लगन वही रहेगी… यह लगन ही तो जीवन है। मैं अभी जीवित रहुंगी। मैं बचूँगी... मैं बच गई।’

संदर्भ ग्रंथ- 
1. यी फू तुआन, डियर कुलीग: कॉमन एँड अनकॉमन ऑब्जर्वेशंस, पृ .137
2. डब्लू. डब्लू. डब्लू. मुंबई थिएटर गाइड डॉट कॉम
3. उत्पल दत्त, थिएटर एज वेपन, पृष्ठ 225
4. उषा गांगुली, रुदाली, पृष्ठ 13
5. मन्नू भंडारी, महाभोज नाटक, पृष्ठ 11
6. अपर्णा भार्गव धारवाड़कर, थियेटर्स ऑफ इंडिपेंडेंस: ड्रामा, थ्योरी एँड अर्बन परफॉर्मेंस इन इंडिया सिंस 1947, पृष्ठ 116
7. संपादक-प्रो. कमला प्रसाद, स्त्री: मुक्ति का सपना, पृष्ठ 206
8. अमितेश कुमार, उषा गांगुली: जीवन मंच से अंतिम प्रस्थान, प्रभात खबर (अखबार), 24अप्रैल 2020

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।