बाल कथा: मास्टर जी की धोती

गीता कौशिक “रतन”



माँ रोज़ सुबह सवेरे ही रतन को नहला-धुला कर तैयार करके बिठा देती।एक स्टील की डिबिया में चूरमा भरकर ओर साथ में घी में डूबी दो रोटी भी बाँधकर बस्ते में रख देती। साथ ही रतन के गले में बस्ता लटका कर स्कूल के लिए चलता कर देतीं। बार-त्योहार के अलावा कभी-कभार माँ जब ज़्यादा प्यार दिखातीं तो छींके पर लटके कटोरीदान में से इक्कनी निकाल कर रतन के हाथ में रख देती। कहती “ बेटा, भूखा मत रहना , बाग से अमरूद लेकर खा लेना”।

गाँव से ही, रतन के दो और साथी उसी की कक्षा में पढ़ते थे। तीनों मिलकर स्कूल भी साथ आया-ज़ाया करते।राह में धूलियाँ उड़ाते दो कोस का स्कूल का रास्ता झट से पार हो जाता। कभी-कभी रास्ते में ये तीनों साथी ज़ोर ज़ोर से पहाड़े गा-गाकर याद करते जाते।

इस बार छुट्टियों में मॉं के साथ जब रतन नाना-नानी के घर गया, तो नानाजी ने अंग्रेज़ी का क़ायदा हाथ में पकड़ा दिया। नानाजी स्कूल के हेडमास्टर थे। वे रतन को अपने पास बिठाते ओर थोड़ा अंग्रेज़ी पढ़ना ओर साथ में थोड़ा बहुत बोलना भी सिखा दिया।

छुट्टियाँ पूरी होने पर जब रतन वापिस स्कूल गया तो उसमें आए निखराव से सभी प्रभावित हुए। वैसे भी रतन पहले से ही स्कूल का सबसे होनहार विद्यार्थी माना जाता था। अब तो और भी, सारे स्कूल में रतन अंग्रेज़ी बोलने के लिये भी मशहूर होने लगा। उसके साथियों की अगर किसी से मार-कुटाई हो जाती तो फ़टाक से रतन को आगे सरका कर कहते “भाई अंग्रेज़ी में ज़रा ज़ोर से डाँट मार दे”। रतन भी झट से रटा-रटाया एक-दो वाक्य पेश करके वाहवाही बटोर लेता।

एक दिन कक्षा में मास्टर जी ने रतन को अपने पास बुलाकर कहा “ ये पकड़ साबुन की बट्टी , नहर पर जाकर जल्दी से मेरी धोती धोकर ले आ। सीधे जाना ओर सीधे आना”। यह कहकर मास्टर जी ने अपनी धोती उतारकर रतन के हाथ में पकड़ा दी, ओर अपने सर का गमछा (तोलिया ) उतारकर उसे लपेट कर बैठ गए। रतन ने भी अपने गाँव के दोनों साथियों को पकड़ा ओर धोती की फुटबॉल बनाकर खेलते कूदते नहर की ओर चल पड़े।

नहर पर पहुँच कर मास्टर जी की धोती किनारे पर रख, तीनों साबुन की बट्टी रगड़ रगड़ कर नहर में ख़ूब नहाए। कभी नहर में छलांग लगाते तो कभी तैरने लगते। तीनों ऐसे मग्न हुए, मास्टर जी की धोती भी तीनों के दिमाग़ से निकल गई ओर भूल गए कि किस काम के लिए आए थे। उधर मास्टर जी की धोती भी उनकी उछल-कूद के चक्कर में नदी में बह गई। कई घंटे बीत गए। अब सूरज देवता भी शांत होकर ढलने लगे।

ये तीनों साथी थक थकाकर जब चलने लगे तो एक को अचानक मास्टर जी की धोती याद आई। धोती को वहाँ ना देख तीनों घबरा गए ओर एक-दूसरे को दोषी ठहराने लगे। मास्टर जी की छड़ी याद करते करते अब तीनों चुपचाप नहर के किनारे किनारे बहाव की दिशा में धोती ढूँढते आगे बढ़ने लगे। जो भी नहर के रास्ते में दिख जाता, उसी से पूछते “कोई सफ़ेद धोती देखी हो”। आख़िरकार एक भले आदमी ने कीचड़ में लिपटे मैले-कुचले एक कपड़े की ओर इशारा करते हुए कहा, “बालकों इसे तो नहीं ढूँढ रहे।”

“ना जी, हमारी तो नई सफ़ेद धोती थी।” कहकर तीनों आगे बढ़ गए। उस भले मानस ने पीछे से फिर आवाज़ लगाई “कुछ देर पहले यह कपड़ा नदी के बहाव में बहता आ रहा था, एक बार झाड़ कर तो देख लो।”

डरते डरते रतन ने हिम्मत करके कीचड़ में सने हुए उस कपड़े को खोलकर देखा तो काँप कर रह गया कि यह तो धोती निकली। तीनों समझ नहीं पा रहे थे कि अब करे तो क्या करें। मास्टर जी की दी हुई साबुन की बट्टी तो पहले ही अपने ऊपर रगड़-रगड़ कर ख़त्म कर दी थी। वैसे भी तीनों को कोन सा कपड़े धोने आते थे। धोती उठाई ओर नहर में उसकी ख़ूब डुबकियाँ लगवाई परन्तु इसके बावजूद भी धोती का रंग मिट्टी जैसा ही बना रहा।

हार कर तीनों ने धोती के कोने पकड़े ओर हवा में उसका झंडा सा फहराते वापसी की राह पकड़ी। रास्ते की धूल से धोती की रंगत ओर भी बिगड़ गई। डरते डरते स्कूल के गेट के अंदर झाँक कर देखा। मास्टर जी गमछा(तौलिया) लपेटे हुए ग़ुस्से में अपने हाथ की छड़ी घुमा घुमाकर उसकी गति नाप रहे थे।

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