व्यंग्य: अंधों को आँख वाले अच्छे नहीं लगते

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

रजिस्टर्ड पत्र ले कर पोस्टमैन आया। छोटा-सा लिफ़ाफ़ा था, शासन सेवार्थ लग रहा था। मैंने लिफ़ाफ़ा लिया और खोला तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। कालेधन के सचिव का पत्र था कि महामहिम कालेधन से चर्चा के लिए मैं फलाँ तारीख़ को दिन के 11 बजे फलाँ फाइव स्टार होटल पर पहुँच जाऊँ। आनन्द के अतिरेक में लिफ़ाफ़े के बजाय मैंने कॉल-लेटर के चिन्दे कर दिए अन्यथा उसकी फोटो प्रति यहाँ छपा देता। मामले की गंभीरता समझ मैंने पत्नी को इत्तला कर दी कि मेरा अपहरण हो जाए तो खाउओं को निमंत्रण न दें और गप्पेबाज़ दोस्तों को यह ख़बर न सुनाएँ। मैं घर के बाहर सोने लगा ताकि कालेधन को मेरा अपहरण करवाना हो तो उन्हें कोई दिक्कत न हो। एक सप्ताह बीत गया पर अपहरण नहीं हुआ। खैर, मैं प्रफुल्लित था क्योंकि कालेधन का पता मुझे मिल चुका था, जिसे पकड़ने के लिए सरकार ने सैकड़ों वेतनख़ोर लोगों को जमाइयों की तरह पाल रखा था।
चर्चा तिथि समीप आई। मैं होटल के स्वागत-कक्ष में पहुँचा। कालेधन के सचिव मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। स्वागत-कक्ष में राजधानी की तमाम हस्तियाँ थीं। केबिनेट स्तर के मंत्री थे। विभागों के मुख्य सचिव और पुलिस के उच्चाधिकारी थे, उद्योगपति थे और तमाम लोग थे जो बाहर कालेधन को जड़ से मिटाने की क़समें खाते थे। मैं उन सबको जानता था क्योंकि उनके फोटो अख़बारों में लगातार छपते थे। मैं अपनी क़िस्मत को कोसने लगा कि आज के दिन ही कालेधन के यहाँ पर छापा पड़ना था। पूरा सरकारी लवाजमा जमा था। मैं सचिव की आँखों में संदिग्ध निगाहों से झाँकने लगा तो उसने भैंस-छाप मुस्कुरा दिया और कहा दो-चार मुख्यमंत्रियों को सड़क पर लाने की तैयारी चल रही है।
आखिर अपने ब्रीफकेस उठाए वे वीआईपी गण बाहर आए। मैं मुलाकतियों के प्रसन्न चेहरों को देखकर ताड़ गया और उन्हें घूरता रहा। उनकी आँखों में कहीं भी शर्म नहीं थी, घबराहट नहीं थी, भय नहीं था। उल्टे, उनका पौरुष देख कर मुझे शर्म आ रही थी। सचिव ने मुझे संकेत किया ‘चलो’। लाल कालीन पर चलते हुए मुझे लगा जैसे मैं कोई विदेशी पत्रकार होऊँ, सरकारी निमंत्रण पर आया हुआ।
भरे-पूरे हाल में कालेधन का सचिवालय था। हर विभाग में काम करवाने के लिए उसके विशेषज्ञ बैठे थे। उनकी चमचमाती टेबलों पर बेशुमार हीरे-जवाहिरात थे, सोना था, नक़द रुपया था, जो बेल्ट द्वारा इधर से उधर हो रहा था। ऐसा दृश्य था जैसे रिज़र्व बैंक हो। सचिव ने बताया अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का भ्रष्टाचार यहाँ होता है। यहाँ लेन-देन के फार्मूले तय होते हैं। राष्ट्र में भ्रष्टाचार बढ़ाने के लिए राज्यों की राजधानियों में प्रधान कार्यालय हैं और कार्यालय तो चप्पे-चप्पे में है। वे मुझे कालेधन के केबिन में ले गए। मैंने कालेधन को देखा तो देखता ही रह गया। वैवाहिक विज्ञापनों के वर जैसा सुन्दर, कामदेव को लज्जित करने वाला काया कल्प, बोले तो शब्द कोमल गांधार में निकलें।
कक्ष में नियंत्रण के लिए टेलीविजन कैमरे लगे थे। टेलीफ़ोन, रिकॉर्डर से जुड़े थे। इलेक्ट्रानिकी-व्यवस्था का जाल बिछा था। मैं कालेधन की सत्ता के समक्ष अभिवादन कर गया। उन्मुक्त हो उसके खुले साहस की प्रशंसा की और ख़ाकी वर्दी के बाजारूपने का रोना रोया। इच्छा हुई खादीधारी खरबूजों की मदद लेकर कालेधन को पकड़वा दूँ। मैंने कहा मैं आप पर लिखना चाहता हूँ। वह मुस्कुरा दिया और बोला “क्या लिखोगे तुम?” यह न कि मैं समानान्तर अर्थ व्यवस्था चलाता हूँ। महंगाई बढ़वाता हूँ और ग़रीबों का ख़ून चूसता हूँ। मैंने गंगा-यमुना के पवित्र देश में भ्रष्टाचार फैलाया है।” वह हँसा और ज़ोर से हँसा। बोला ‘लोगों को पैसा देखकर जीभ लपलपाने को मैंने नहीं कहा। उनके चरित्र को बाजारू मैंने नहीं बनवाया कि पैसों की खातिर वह बिक जाएँ। बाज़ार में तो हर चीज़ के ख़रीददार होते हैं दोस्त!’
मैंने कहा, “आप जो कहते हैं वह भी सच है। पर आपके कारण भ्रष्टाचार इतना व्यापक हो गया है कि वह आम भारतीय का चरित्र लगता है। जो भ्रष्टाचारी हैं वे सुखी हैं, सम्पन्न हैं और बेचारे ईमानदार...?” उसने ठहाका मारा और गुस्से में कहा, “गाली मत बको। सिरफिरों और मूर्खों की औलाद हैं ईमानदार। उल्लू मर गए और ईमानदार छोड़ गए। तुममें ईमानदारी बाकी हो तो उन पर लिखो ख़बर, जिन्हें तुमने मोल-भाव करते हुए देखा है। खोलो सत्तारूढ़ मंत्रियों की हाथी-पोलें, उद्योगपतियों की लूटपाट और बड़े अधिकारियों की गचागच जीमो नीति। इन बेईमानों को क्या तुम नहीं जानते? क्या सरकार नहीं जानती, क्या जनता नहीं जानती? कभी सोचा है क्यों चलती हैं फाइव स्टार होटलें, कहाँ से रेंगती हैं चींटियों की तरह इस देश में कारें? कैसे बना लेते हैं लोग अपने रजवाड़े? कहाँ से आती है इनके पास अथाह दौलत? यह सब ख़बर है जो तुम्हें नहीं दिखती। तुम भी उठाओ ब्रीफकेस और अंधे बन जाओ। मेरे जूते बन जाओ। हम अंधों को आँख वाले अच्छे नहीं लगते। इसलिए हम उनकी आँखें फोड़ देते हैं, उनके ज़मीर से अपने जूते बना लेते हैं।” मैं उठा और यह ख़बर पहुँचाने के लिए भागने लगा, उसके बंद कमरे में।
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