संभावित एवं वास्तविक के बीच: एक वैचारिक भ्रमण-पथ पर

चंद्र मोहन भण्डारी

समाज का दर्पण

कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। इसमें संदेह नहीं कि किसी देश या समाज का साहित्य वहाँ के जीवन, रहन-सहन आदि के बारे में बहुत-कुछ जानकारी दे सकता है। साथ ही यह कथन जिस विशेष संदर्भ में कहा गया है अपनी जगह पूरी तरह सार्थक और सटीक है। सवाल यह है कि क्या इसके इतर भी कथन की कुछ वैधता है या हो सकती है? दर्पण की ही बात करें; हम सभी अक्सर तीन तरह के दर्पणों के विषय में जानते आये हैं: समतल (plain), अवतल (concave) और उत्तल (convex)। उपरोक्त कथन इनमे से किसी एक की ओर इशारा करता है या तीनों की ओर? क्या इनके अलावा भी अन्य प्रकार के दर्पणों का प्रयोग संभव है? वैसे जिस संदर्भ में बात कही गई है उसकी मूल भावना समझने के लिये इस सवाल का जवाब जरूरी नहीं। पर मूल भावना के इतर भी कुछ खोजबीन करनी हो तब यह सवाल पूछने का औचित्य हो सकता है, लेकिन उत्तर मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं। चलिये कोशिश करते हैं तीनों दर्पणों को शामिल करने की इस पड़ताल में।

समतल दर्पण से हम रोज ही रूबरू होते हैं दिन भर में कई बार। यह दर्पण शायद इसीलिये अक्सर उपयोग में लेते हैं क्योंकि इसमें बनने वाला प्रतिबिम्ब वैसा ही होता है जैसा कि देखने वाला है, एकदम वैसा ही या यों कहें कि लगभग वैसा ही। बायें और दायें की आपसी अदला-बदली के अलावा समतल दर्पण का प्रतिबिम्ब लगभग सही जानकारी देता है। साहित्य में दर्पण शब्द अनेक प्रकार से प्रयुक्त होता रहा है। एक गीत की पंक्ति[1] याद आती है मुझे: ‘आईना मुझसे मेरी पहले की सूरत मांगे।‘ कैसी अजीब सी बात है? म‍ांग करने का हक तो मुझे है दर्पण से कि मेरा बिम्ब दिखाओ। खैर जो भी हो सवाल मेरे मन में उठा कि क्या पहले की सूरत देख पाना संभव है? तीनों दर्पणों में कोई एक या तीनों मिलकर भी यह नहीं कर सकते, वे आज की सूरत के प्रतिबिम्ब दिखा सकते हैं। बात कविता के संदर्भ में भले अर्थपूर्ण हो सामान्य समझ के परे है। फिर भी हम खुद से सवाल कर सकते हैं कि क्या ऐसा आईना संभव है जो हमें पहले की सूरत दिखा सके? इसका जवाब हाँ में है पर आईना खास तरह का लेना होगा जिसकी चर्चा समय आने पर करेंगे। अक्सर मन-दर्पण की भी चर्चा होती रही है और उसकी भी अपनी उपयोगिता है। लेकिन पहले तीन प्रकार के दर्पण समझ लें फिर सोचेंगे क्या इनके अलावा भी कुछ अन्य प्रकार हो सकते हैं। 

समतल दर्पण की बात पहले कर चुके हैं जो हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। दाढ़ी बनानी हो या बाल, इसके बिना गुजारा नहीं। अब दूसरे प्रकार के दर्पण यानि अवतल की बात करते हैं जिसका प्रयोग दंत-चिकित्सक अक्सर करते हैं क्योंकि यह मुंह के अंदर के हिस्सों का बड़ा प्रतिबिम्ब दिखा सकता है। जाहिर है अगर वस्तु छोटी हो और देखने में दिक्कत होती हो तब बड़े बिम्ब का लाभ मिल सकता है। तीसरा यानि उत्तल दर्पण छोटा प्रतिबिम्ब दिखाता है और इसका प्रयोग गाड़ियों में पीछे का दृश्य देखने के लिये किया जाता है। छोटे बिम्ब से लाभ यह है कि छोटी जगह में बहुत बड़े क्षेत्र का बिम्ब एक साथ देखा जा सकता है और गाड़ी चलाते समय पीछे का दृश्य आवश्यक सावधानी बरतने में सहायक होता है। मैं समझता हूँ कि साहित्य की दर्पण से तुलना में तीनों प्रकार के दर्पण लिये जा सकते हैं और लिये गये हैं[2]। 

लेखन में कई बार चित्रण हूबहू वैसा ही होता है जैसे किसी व्यक्ति या स्थान या घटना का चित्रण। पत्रकारिता में या यात्रा-वृतांत में इस प्रकार का चित्रण सार्थक एवं उपयोगी होता है। यह समतल दर्पण वाली स्थिति है। दूसरी ओर कई बार छोटी सी घटना या विचार को आवर्धित करके देखना होता है जैसे इस आलेख में हो रहा है अवतल दर्पण की तरह, जहाँ दर्पणों के प्रकार और गुणों की चर्चा अपेक्षाकृत विस्तार से हो रही है। और कई बार जब हमें संक्षेप में बात कहनी हो पूरे देश या समाज के बारे में, तब अपनी बात कुछ वाक्यों में कह जाते हैं जो उत्तल दर्पण की याद दिला देता है।

हमारी बात यहीं पर समाप्त नहीं होती। अधिकतर साहित्य वही दिखाता है जो सामने है वैसा ही या कुछ बड़ा या छोटा जो स्वाभाविक है। पर साहित्य का मकसद केवल इतना ही नहीं, आगे भी है। आने वाले समय में सूरते हाल क्या होगा यह रोचक चर्चा का विषय हो सकता है। समाज जो है सो है पर जो उसे होना चाहिये उसकी बात किये बिना हमारी सांस्कृतिक-विकास-यात्रा प्रगति नहीं कर सकती। सारी प्रगति के बावजूद अभी बहुत कुछ होने और करने की जरूरत होगी, यानी एक ऐसा दर्पण जो उसे आगत की एक अस्पष्ट रूपरेखा दिखा सके। तब ‘पहले की सूरत’ की जगह ‘आने वाले समय की सूरत’ कहना बेहतर होगा। साहित्य एवं साहित्यिक चित्रण बदलता है समाज के परिवर्तनों के साथ पर ऐसा भी संभव है कि परिवर्तन की प्रक्रिया में साहित्य समाज से अग्रणी हो, दो कदम आगे। यानि समाज कैसा है उसे कैसा होना अपेक्षित है यह भी उसका दायित्व हो और वह एक प्रकाश-स्तम्भ की तरह काम करे। 

मेरी एक चुनौती के सौ अभिप्राय
मालूम मुझे क्या था कि खड़ा मेरे अंदर
फावड़ा टेक कर विश्व-युगांतर महाकाय।
- मुक्तिबोध

कोई भी युगांतरकारी कार्य पहले एक विचार के रूप मे किसी के मन में जन्म लेता है और धीरे-धीरे
एक विचारधारा आकार लेने लगती है। महात्मा गांधी के सत्याग्रह संबंधी विचार अमेरिकी विचारक थोरो[3] से प्रभावित थे जो स्वयं भगवद्गीता सहित भारतीय पौराणिक साहित्य के कुछ बिंदुवों के प्रशंसक थे; यही बात अमेरिकी ट्रान्सेन्डेन्टल आंदोलन के बारे में कही जा सकती है जिसमें मुख्य व आरंभिक भूमिका थी राल्फ वाडो एमर्सन की। डेल रीप ने अपनी पुस्तक में लिखा है [4] : ‘एमर्सन के आरंभिक वर्षों से ही अमेरिका में भारतीय चिन्तन के प्रति खास लगाव रहा है’। यह बात खास महत्व की है कि देश व काल में एकदम असम्पृक्त व अलग-थलग लोगों के बीच निजेतर संदर्भों[5] से जुड़े मसलों पर एक गहन समझ व स्वीकृति का भाव दिखायी देता है जो इतिहास में कम ही संभव हुआ है।

संभावना एवं वास्तविकता 

मानव जीवन संभावनाओं और वास्तविकताओं के बीच के संबंधों से संचालित होता आया है[6] और यह बात साहित्य पर भी लागू होती है। इस बात को विस्तार से समझना जरूरी है। हम एक सिक्का उछालते हैं और हमें दो संभावित स्थितियों में से एक प्राप्त होती है चित या पट (Head or tail)। अगर हम पांसे का खेल खेलें तब छ: संभावित स्थितियों में से एक प्राप्त होती है। यह सिक्का या पांसा वाला खेल या कोई भी खेल दरअसल संभावनाओं के वास्तविकता में बदलने का खेल है पहले छ: संभावनाऐं थीं लेकिन अंत में एक वास्तविकता प्राप्त होती है। पहली बार उछालने पर दुग्गी मिलती है लेकिन दूसरी बार क्या मिलेगा निश्चित रूप से नहीं बता सकते। संभावना और वास्तविकता के खेल प्रकृति में हर जगह, हर कहीं खेले जाते हैं और कई बार हमें आभास तक नहीं होता। हमारे जीवन पर भी यह बात लागू होती है। कोई कथा जब आगे बढ़ती है संभावित स्थितियों का वास्तविकता में रूपांतरण होता जाता है। जबतक कई संभावित स्थितियाँ रहती हैं अनिश्चितता भी बनी रहती है और पाठक को बांधे रहती है। संभावना एवं वास्तविकता के बीच यह खेल हमारे जीवन से अंतरंग रूप में जुड़ा है और प्रकृति में भी हर कहीं दिखाई देता है।

प्रकृति की बात करनी हो इस संदर्भ में तब पहले मौसम की बात करें। आज से दस दिन बाद हवा का रुख या बादलों की उपस्थिति कैसी होगी इसका अंदाजा लगा सकते हें पर सही नहीं बता सकते और सारे वैज्ञानिक उपकरण भी जुटा लें तब भी एकदम सही जानकारी नहीं मिल सकती। लेकिन हर मामले में ऐसा नहीं। यह बताना संभव है कि दो साल बाद सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी की स्थिति क्या होगी? सूर्य या चन्द्र ग्रहण कब लगेगा और कितनी देर चलेगा? यह जानकारी दस साल आगे की मिल सकती है लेकिन मौसम दस दिन बाद का भी निश्चित नहीं बता सकते। हो सकता है कभी-कभार तुक्का लगे और अनुमान सही लग जाय पर बात तब है जब निश्चित रूप से कहा जा सके।

पहले वैज्ञानिक सोचते थे कि जब सुपरकम्प्यूटर उपलब्ध हो जायेंगे तब मौसम की निश्चित जानकारी संभव हो सकेगी। लेकिन आज जब वह सब उपलब्ध है मौसम का हाल उतना ही अनिश्चित है। हाँ, एक फर्क जरूर आया है अब उपग्रहीय चित्रों के आधार पर कुछ अनुमान लगाना संभव है कि तूफान किस ओर का रुख कर रहा है और उसकी तीव्रता कितनी है, पर पक्के तौर पर यह नहीं बता सकते कि ऐसे तूफान कब और कहाँ आयेंगे? विज्ञान केवल थोड़ा-बहुत सहायता कर सकता है वह समर्थ विज्ञान जो हजारों प्रका‍श-वर्ष दूर तारों की जानकारी देता है हमें मंगलयान भेजने में मदद करता है, सारी दुनिया को इंटरनेट से जोड़ता है मौसम के मामले में मात्र थोड़ी सी जानकारी दे पाता है। सिक्के की तरह यह भी संभावनाओं-वास्तविकताओं का खेल है जो प्रकृति खेलती रहती है।

संभावना और वास्तविकता के बीच चल रहा यह खेल चलता रहा है और चलता रहेगा।

हम समाज की बात कर रहे थे और उसके यथार्थ चित्रण की भी। समाज या देश आने वाले समय में किस तरह बदलेगा कुछ अंदाजा लगा सकते हैं पर सही जानकारी दे सकना मुश्किल ही है। समाज ही क्या एक इंसान के बारे में निश्चित रूप से कहना मुश्किल है और उसकी वजह समझना मुश्किल नहीं। इंसानी दिमाग कुदरत का करिश्मा है भानुमती का पिटारा है यह एक महासागर है जिसमें सब कुछ है वैसे ही जैसे समुद्र-मंथन के समय मिला था अमृत भी, विष भी और भी बहुत कुछ। सागर में बहुत कुछ है: वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, तेल के भंडार, कीमती धातुऐं और साथ ही दुनिया भर का सारा कूड़ा-करकट। बात मन के महासागर की हो रही है जो उतना ही अनिश्चितता से भरा है जितना मौसम, शायद उस से भी बहुत ज्यादा। कब किस का मूड खराब हो और वह अवसाद अवस्था में आ जाय या फिर मन शांत और सहज हो जाय या कोई अन्य प्रकार के हालात में जा पहुंचे निश्चित नहीं। महाभारत के सब पात्र हर वक्त मौजूद हैं मन में और अनवरत चलता महाभारत का संग्राम इसकी पहचान है। मन-महासागर का मंथन भी चलता रहता है और बाहर निकल आता है सभी कुछ: अमृत, विष, तरह-तरह की चीजें और अधिकतर कचरा। पर मन को दर्पण भी कहा गया है यानि अंतरमन जो हमें हमारे बारे में सही जानकारी दे सकने में सक्षम है बशर्ते उसपर धूल न जमने दी जाय। 

मन की ऐसी जटिल इकाइयों का बड़ा समूह समाज को परिभाषित करता है और इसकी जटिलता का आकलन आसानी से किया जा सकता है। इस निकाय की गतिशीलता ही सांस्कृतिक विकास यात्रा निर्धारित करती है। इंसान की साहित्यिक यात्रा इसी विकास यात्रा का एक हिस्सा है पर उसकी खासियत यह है कि वह तरह-तरह के दर्पणों से उसकी असलियत दिखा सकती है।

पहले की सूरत: विज्ञान का आईना
विज्ञान की विश्लेषणपरकता, तार्किकता और वस्तुपरकता एक ऐसा आईना प्रस्तुत करते हैं कि यकीन नहीं होता। हमने पहले की सूरत की बात की थी और वह इसी विज्ञान के जरिये मिलती है। साठ लाख साल पहले की सूरत दिखाने के लिये विज्ञान के आइने पर नजर डाली तो चिंपाजी नजर आया। यह कैसा मजाक है? अरे हमने हमारी पहले की सूरत के लिये बोला था चिंपाजी दिखाने के लिये नहीं। विज्ञान का आईना बोल उठा: ‘बंधुवर, बुरा न मानें, यह आप ही हैं। और आगे देखिये, दो करोड़ साल पहले की अपनी सूरत’। अरे यह तो बंदर है। ‘बस-बस बहुत हुआ भाई, अब नहीं देखना। आगे जाने क्या-क्या देखने को मिलेगा’?

 मानव विचारशील जरूर है पर यह भी उसकी अपनी उपलब्धि नहीं। कुदरत ने उस चिंपाजी नामक जीव का दिमाग इन साठ लाख सालों में विकसित कर दिया या यों कहें जैविक विकास प्रक्रियाओं के तहत यह संभव हो गया। इस दिमाग की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि इसमें भाषा के विकास के लिये विशेष प्रावधान था, अमूर्त चिंतन व धारणाओं के लिये और साहित्य में प्रयुक्त होने वाले अलंकारों के लिये भी। जब सब कुछ था तब भाषा का विकास होना लाजमी था जो हुआ। सांस्कृतिक विकास होगा ही जब भाषाजनित संचार उपलब्ध हो। सोचता हूँ कुदरत ने चिपांजी के बजाय घोड़े का दिमाग बड़ा कर दिया होता तो हम हम न होकर चिंपाजी ही बने रहते जंगल में विचरते और घोड़ा आकृति वाले पर्यटकों को रिझा रहे होते। तब बात मानव-सभ्यता की नहीं अपितु अश्व-सभ्यता की होती वह बाकी जीवों के साथ वही करता जो हम उसके साथ आज करते हैं। शायद हमें वह अपने किसी काम का भी न समझ चिड़ियाघर में ही रखता जहाँ किसी कोने में चिंपाजी की तख्ती लटकी होती और वहीं कहीं हम भी पड़े होते। अच्छा है ऐसा नहीं हुआ लेकिन ऐसा होना संभव था। मुझे लगता था कि यह सब जान लेने के बाद मानव में कुछ विनम्रता आयेगी और वह शेष जीव-जगत के लिये अधिक सहिष्णु दिखाई देगा। साथ ही उसका अहं भाव भी कुछ नियंत्रित हो सकेगा। लेकिन आज की तारीख में इसके आसार नजर नहीं आते। संभवत: अधिकतर लोगों को अभी ये बाते परी-कथाओं सी लगती हैं और इसकी सच्चाई पर उनका यकीन जरा भी नहीं। वैसे यकीन होने पर भी कुछ बदलेगा नहीं कह सकते।

मैं जानता हूँ यह सच है और हमें इसे सद्भाव से स्वीकार करना चाहिये कि यह कुदरत का करिश्मा है कि उसने दिमाग के विकास के लिये हमारे पूर्वज को ही चुना। और हमने क्या किया? जिस कुदरत ने हमें कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया हम उसे बरबाद करने पर तुले हैं।

यह उसके प्रति हमारी कृतज्ञता का नमूना है। जो हमारी तरह भाग्यशाली नहीं थे यानि शेष सभी जीव, हमारा उनके प्रति बर्ताव तारीफे काबिल तो नहीं कहा जा सकता। और तो और चिंपांजी को भी हम कौन सा महत्व देते हैं? हम उस यथार्थ को मन से स्वीकार भी नहीं कर पाते। हमने अपने बारे में कई गलतफहमियाँ पाल रखी हैं। असलियत यह है कि जैविक विकास की अनेक संभावनाओं में एक संभावना वास्तविकता में रूपातरित हो गई और हम मानव रूप में सामने आ गये। इसमें हमारा अपना योगदान रत्ती भर भी नहीं था। 

संभावना-वास्तविकता के खेलों में संभावना का वास्तविकता में रूपांतरण होता है और जीवन में भी यही अक्सर सामने आता है क्योंकि यह प्रक्रिया एक ही दिशा में होती है। एक उदाहरण लें क्रिकेट का खेल शुरू होता है दो लगभग समान स्तर की टीमों के बीच। शुरू होते वक्त कई संभावित स्थितियाँ हैं पर खेल जब आगे बढ़ता है कुछ निष्कर्ष व्यक्तिगत स्तर पर सामने आने लगते हैं जैसे बहुत अच्छा बल्लेबाज शून्य पर ही आउट हो दजाता है और एक गेंदबाज बहुत अच्छा स्कोर कर लेता है और जहाँ तक जीत-हार का सवाल है खेल के अंत तक इंतजार करना होता है। उम्र के साथ-साथ एक इंसान के जीवन में संभावनाओं का वास्तविकता में रूपांतरण होता चलता है अपने रुझान, नियति और परिस्थिति के आधार पर वह किसी विशेष केरियर की ओर अग्रसर हो सकता है।

वास्तविक से संभावित की ओर
साहित्य में यह प्रक्रिया दोनों दिशाओं में अग्रसर हो सकती है। कभी-कभी यह विपरीत दिशा में रचनाकार को प्रेरित करती है विशेषकर कथा-साहित्य में। किसी वास्तविक घटना को रचनाकार देखता है उसे आधार बनाकर रचनाकार की कल्पना उन संभावित स्थितियों को तलाशती रहती है जो उस विशेष मामले में नहीं हुईं पर हो सकती थीं। वास्तविक से संभावित की ओर का यह विकल्प साहित्यकार को उपलब्ध है जिसका संतुलित प्रयोग होता आया है और होता रहेगा। इसका एक सरल व सटीक उदाहरण खोजी पत्रकारिता में देखने को मिलता है। कल्पना करें एक घटना सामने आती है किसी बहुमंजिला भवन के सातवें तल पर आग लग जाती है और वहाँ स्थित कार्यालयों में बड़ा नुकसान होता है। यह महज एक संयोग हो सकता है जब विद्युत शार्ट-सरकिट की वजह से यह दुर्घटना हुई। यह वास्तविकता से संभावना की ओर जाने का प्रयास है क्योंकि शार्ट सरकिट होना एक संभावना को चित्रित करता है। पर संभावनाऐं और तरह की भी हो सकती हैं। यह दुर्घटना नहीं अपितु एक साजिश का निष्कर्ष हो सकता है। वास्तविकता से शुरू कर संभावित स्थितियों की खोज धीरे-धीरे उस मूल बात तक पहुंचने का प्रयास करती है जहाँ उस साजिश की नींव रखी गई थी। जासूसी कथा साहित्य में यह प्रक्रिया प्रयोग होती रही है। पुरातत्व संबंधी खोजों में भी इस तरह की बात देखी जा सकती है जहाँ खुदाई में प्राप्त अवशेष जिन संभावनाओं को दर्शाते हैं उनपर विचार किया जाता है। सामान्य कथा-साहित्य में भी इस प्रक्रिया की उपस्थिति देखी जा सकती है। एक रचनाकार कथानक के चयन में कई बार किसी वास्तविक घटना से शुरू करता है और उन संभावित परिस्थितियों की ओर अग्रसर होता है जो पहले रही होंगी। पर यह रचनाकार के मन में है लेकिन जहाँ तक कथा का सवाल है वह कई अधिकतर संभावनाओं से आरम्भ कर वास्तविकता की ओर ही बढ़ती है। 

संदर्भ
[1] हिंदी फिल्म डैडी का यह गीत सूरज सनीम द्वारा रचित।
[2] चन्द्रमोहन भंडारी, A Dive into the Ocean of Forms, Indian Ruminations, April 2012. 
[3] Henry David Thoreau, Walden, Castle Books, Edison, NJ, USA
[4] Dale Riepe, The Indian influence in American philosophy: Emerson to Moore, Philosophy East and West, 17: ¼ (1967) 125-137
[5] चन्द्रमोहन भंडारी, हिमालय और हडसन के बीच: एक अंदरूनी भ्रमण-पथ पर, सेतु, जून 2019
[6] चन्द्रमोहन भंडारी, ऊँट और उसकी अनोखी करवट, सेतु अक्टूबर 2019.
सेतु, अगस्त 2020

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