जागो हे भारत की संतानों: स्वामी विवेकानन्द

डॉ. आनन्द कुमार शर्मा

आनन्द कुमार शर्मा

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(11 सितम्बर विशेष)

भारतीय संस्कृति के महान प्रचारक स्वामी विवेकानन्द की संपूर्ण विश्व में भारतीय सांस्कृतिक तत्वों को स्थापित करने में आधारभूत भूमिका है। स्वामी विवेकानन्द की विचारधारा धर्म, संस्कृति, राष्ट्रीयता के एकाश्म और एकात्मवाद पर अवलंवित थी। स्वामी विवेकानन्द की विचारधारा में राष्ट्रीयता की आधारभूत पृष्ठभूमि के बीज सनातन हिन्दू धर्म और संस्कृति में निहित थे और इसी बीज से राष्ट्रीयता का वट वृक्ष, पुष्पित-पल्लवित होकर तन कर खड़ा हो सका। 11 सितम्बर, 1893 ई॰ की शिकागो की "विश्व धर्म संसद" में स्वामी विवेकानन्द ने सनातन हिन्दू धर्म-संस्कृति की श्रेष्ठता को दृढ़ता के साथ स्थापित कर दिया था। वस्तुतः आधुनिक सभ्य राष्ट्र हमारे धर्म के असली स्वरूप से नितांत अनभिज्ञ थे, स्वामी विवेकानन्द ने अपनी आध्यात्मिक शिक्षाओं से विश्व की आँखें खोल दी थी। संपूर्ण अमेरिका स्वामी विवेकानन्द की विद्वता से अत्यंत प्रभावित हुआ। मूलतः भारत के इस संदेशवाहक की अमेरिका पर गहरी छाप पड़ी थी। अमेरिका के प्रसिद्ध समाचार पत्र "द न्यूयाॅर्क हेराल्ड" ने "स्वामी विवेकानन्द को विश्व धर्म संसद का सबसे महान् व्यक्ति बताते हुए लिखा कि, ऐसे ज्ञानी देश में धर्म प्रचारक भेजने बेबकूफी है।" वस्तुतः भारत की महान् विभूति स्वामी विवेकानन्द भारतीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के एक ऐसे अध्यात्मवादी विद्वान थे, जिनके ज्ञान से सारा संसार स्तब्ध रह गया था। भारतीय धर्म एवं संस्कृति की पताका को उन्होंने पूरे विश्व में बड़ी दृढ़ता के साथ फहराया और यह प्रमाणित कर दिया कि, भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है।

स्वामी विवेकानन्द ने देश की स्वाधीनता के लिए भारत की जनता के समक्ष उत्तेजक, प्रचण्ड और फौलादी राष्ट्रवाद की अवधारणा प्रस्तुत की। तत्कालीन विपरीत परिस्थितियों में बड़ी ही दृढ़ता के साथ युवाओं को ललकारा और कहा कि, भारत माता स्वाधीनता के लिए आपका आव्हा्न करती है। ।।उत्तिष्ठत जागृत प्राप्य वरान्निबोधत।। अर्थात् उठो, जागो, जब तक इच्छित वस्तु प्राप्त न हो, तब तक उसके पाने के लिये प्रयत्न करते जाओ। उठो जागो तुम्हारी मातृभूमि इस महा बलिदान की इच्छा कर रही है। देश आज हमसे लोहे की माँस पेशियाँ और इस्पात के स्नायु माँग रहा है। अपने शरीर में अदम्य साहस, अदम्य उत्साह, अदम्य शक्ति और उच्च मनोबल का संचार करो। दुर्बलता पाप है। साहसी और निष्कपट बनो। हे युवकों को अपने फौलादी दृढ़ संकल्प से लक्ष्य को प्राप्त करो। वस्तुतः स्वामी विवेकानन्द जानते थे कि, भारत की अकूत ऊर्जा उसकी युवा शक्ति में निहित है। इसको जागृत करके ही स्वाधीनता प्राप्त की जा सकती है।

स्वामी विवेकानन्द की स्पष्ट धारणा थी कि, भारतीय राष्ट्रवाद का मूल तत्व धर्म में निहित है और धार्मिक सिद्धान्तों के आधार स्तम्भ पर नवीन भारत का निर्माण किया जा सकता है। मानव मस्तिष्क के लिए धर्म सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति होता है। आध्यात्मिक आदर्शों पर चलने से हममें अकूत शक्ति का संचार होगा। विवेकानन्द ने भारतीय राष्ट्रवाद की रीढ़ सनातन हिन्दू धर्म को ही माना है। उनका मानना था कि, स्वर्णियम् अतीत की नींव पर उज्जवल भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। वैदिक ऋचाओं के घनघोष से देश में प्राण संचार करना है। विवेकानन्द ने भारतीय राष्ट्रवाद की धुरी में सनातन हिन्दू धर्म और भारत माता को केन्द्र बिन्दु माना और कहा कि, ’अपने भारतीय होने पर गर्व करो’, ’गर्व से कहो कि, भारत भूमि मेरी माता है’, जन्मभूमि की सेवा को अपना परम कर्तव्य मानो। विवेकानन्द ने जोर देकर अपने शक्तिशाली शब्दों से कहा था कि, ’मेरे देशवासियों, मेरे भाई बन्धुओं भारत की भूमि को अपना स्वर्ग मानों, भारत के कल्याण को ही अपना कल्याण समझों।’ हे भारत की संतानों, मैं आज आपको भारत भूमि के पूर्व गौरव का स्मरण दिलाता हूँ...। आप का धर्म महान् था, आपका अतीत गौरवशाली था। जननी-जन्मभूमि रूपी विराट देवता की उपासना करो।

विवेकानन्द ने प्र्रगतिशील विचार देते हुए कहा था कि, भारतीय समाज के लोगों को प्रगति के लिए नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए हमेंशा तत्पर रहना चाहिए। ज्ञान ही शक्ति है और यह शक्ति प्राप्त करना हमारा उद्देश्य है। हमें अपनी कूपमण्डूपता का त्याग करते हुए अपने व्यक्तित्व को उज्जवल करने का प्रयास करना चाहिए। इससे मनुष्य प्रगति करता हुआ शिखरता की ओर अग्रसर होता है। स्वामी विवेकानन्द का कथन था कि, विश्वास, उत्साह और निर्भीकता से सब कुछ संभव है। विवेकानन्द ने तत्कालीन अंधकार में डूबे भारतीय समाज के लोगों में आत्म विश्वास की ज्वाला को प्रज्वलित करते हुए कहा था कि, भारतीयों को अपने आप में विश्वास करना सीखना होगा, अपने अंदर की शक्ति को पहचानकर दृढ़ बनना होगा, आत्मविश्वास शक्तिशाली बनाने की ओर ले जाता है। क्योंकि, भारत का पुनरूद्धार भारत को ही करना है। संजीवनी तो अपने अंदर से ही मिलनी है। विवेकानन्द ने भारतीयों में अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों के पालन की भावना को जागृत करने का प्रयास किया। विवेकानन्द की स्पष्ट धारणा थी कि, यदि व्यक्ति अपने कर्तव्यपथ पर निष्काम भाव से आगे बढ़ता जायेगा, तो उसे अधिकारों की प्राप्ति स्वतः हो जायेगी। स्वामी विवेकानन्द का कथन था कि, यदि भारतवासियों को अपने राष्ट्र का पुनरुत्थान वांछित है, तो उन्हें यह यत्न करना चाहिए कि, उनमें निःस्वार्थ सेवाभाव तथा आदर्श चारित्य आ जाएँ।

स्वामी विवेकानन्द ने तत्कालीन गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारत की मुक्ति का सपना देखा था, जो स्वावलम्बी हो, शिक्षित हो, भय, भूख एवं भष्ट्राचार से मुक्त हो। मैं स्वदेश भक्ति में विश्वास करता हूँ... अज्ञान के काले बादलों ने सारे भारत को आच्छन्न कर लिया है। इसीलिए ज्ञान प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाओ। विवेकानन्द ने अपने आध्यात्मिक चिंतन को व्यावहारिक रूप में प्रकट करते हुए भारत के मानव के लिए यथार्थवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था। उन्होंने भारतीय जन-जीवन को वास्तविकताओं से सामना कराने का प्रयास किया था। विवेकानन्द की स्पष्ट धारणा थी कि, भारत के लोगों को भारत की वास्तविक और धरातलीय हकीकतों को जानना होगा। हम भारत की जमीनी स्तर की वास्तविकताओं को जानकार ही एक सक्षम भारत का निर्माण कर सकंेगे। उन्होंने कहा कि, स्वाधीनता में चतुर्दिक उन्नति होती है और दासता में सभी प्रकार की अवनति निहित है। विवेकानन्द ने तत्कालीन पराधीन भारत के जन मानस की दशा को देखकर लोगों से अपेक्षा की थी कि, हमें भारत के समाज के गरीब और निरक्षर लोगों के प्रति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी के साथ निर्वहन करना होगा, तभी हम सभ्य मनुष्य होने के हकदार होगें। स्वामी विवेकानन्द का कथन था कि, समाज के सभी व्यक्तियों को धन, विद्या, ज्ञान उपार्जन करने के लिए एक समान अवसर मिलना चाहिए। स्मरण रहे - राष्ट्र झोपड़ियों में बसता है। स्वामी विवेकानन्द ने संपूर्ण भारत का भ्रमण करके अपनी बौद्धिकता से प्राचीन भारत के गौरव को भारतीयों जागृत कर दिया था। इससे राष्ट्र साँस्कृतिक नव जागरण की ओर बड़ा। वस्तुतः विवेकानन्द की प्रखर वाणी से ही साँस्कृतिक राष्ट्रीयता का जन्म हुआ। उन्होंने भारतीयों में भविष्य की उज्जवल आशा को संचारित करते हुए कहा कि, साहस का सूर्य उदित हो चुका है। भारत का उत्थान अवश्य होगा।


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