हृदय परिवर्तन और अहिंसा का संबंध

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


मनुष्य की सोचने समझने की शक्ति अद्भुत है। वह महसूस करता है- हँसना, गाना, नींद, जागृति और रोना भी। वह स्वयं के भीतर स्वयं को महसूस करता है और बाहरी दुनिया को भी। वह ईश्वर जैसी अदृश्य सत्ता को भी महसूस करता है। कहते हैं जो मनुष्य सबसे चेतस होकर सोचता और महसूस करता है। वह अपनी आत्म को भी समझने की और उसे एक दृष्टि के साथ संचालित करने की क्षमता रखता है। कदाचित दूसरे जीव इसे नहीं कर सकते जैसे मनुष्य करता है इसलिए मनुष्य को इस सृष्टि का सबसे श्रेयस्कर निधि के रूप में माना गया है। वह अपने साथ प्रकृति को भी जीवंत और समृद्ध बनाने में अपनी क्षमता रखता है। मनुष्य ही है जो रिश्ते नाते भी बना लेता है और उससे मुक्त होकर स्वच्छंद रहने की संवेदना रखता है। जब ऐसा है मनुष्य तो इतनी सारी समस्याएँ क्यों हैं? मनुष्यों का समाज इतना उलझा हुआ क्यों हैं? उसकी बनाई हुई व्यवस्था इतनी उलझी हुई क्यों है? और ऐसा भी इसी समाज में मिलता है कि वह बर्बर है। निरंकुश है। क्रूर है। अभद्र और सबसे ज्यादा हिंसक है। मनुष्यों द्वारा निर्मित बर्बर भाषाएँ सभ्यताओं के लिए संकट हैं। यह आज का द्वैध है।
हृदय की भी एक भाषा होती है, यह बात केवल मनुष्य जानता है। उसके पास कई तरीके की संवेदनाएँ हैं। उसके पास कई तरीके के निर्णय लेने की क्षमता है। उसके मन की भी एक भाषा मानी जाती है। मन और हृदय के बीच का अंतर मनुष्य ही तय कर सकता है। हम देखेंगे कि दुनिया के किसी भी छोर पर जो आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं उसके पीछे बहुत ही संवेदनशील इच्छाशक्ति काम की है और कहते हैं की वे परिवर्तनकारी अपने ह्रदय की भाषा से ज्यादा सफल हुए। प्रश्न यह है कि जिस तरीके से नवीन इतिहास की संकल्पना इन परिवर्तनकारियों के माध्यम से की जाती है, तो क्या उनके हृदय में ही कोई ऐसी रसायन है जोउन्हें मनुष्यता के खिलाफ भी करती रही है? क्या ये परिवर्तनकारी हिंसा को भी अपनी हृदय की भाषा मानते हैं? हमें जो शास्त्र बताते हैं उसमें से यह जरुर निकलकर आता है कि हृदय परिवर्तन की संकल्पना बुराई से अच्छाई की ओर उन्मुख होने को कहते हैं। अपने दम्भ और अहंकार से निकलकर बाहर निकलने को हृदय परिवर्तन बताया जाता रहा है। ऐसी अनेकों कथाएं भारत के उपनिषदों और पुराणों में मिलती हैं। रामायण और महाभारत में मिलती हैं। लेकिन गीता में कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश से यह सिद्ध होता है कि हृदय परिवर्तन हम केवल बुरे से अच्छे बनने को न समझें अपितु यदि कृष्ण की संकल्पना के अनुसार इसे समझें तो कृष्ण युद्ध से भाग रहे अर्जुन को तो उस ओर खींचते हैं जिसमें अर्जुन फंसकर युद्ध के लिए तैयार ही नहीं होते हैं। अर्जुन का यह हठ कि हम अपने ही कुल, बंधु-बांधवों को कैसे मार सकते हैं? उन्हें हम कैसे मार सकते हैं जिन्होंने हमें शिक्षा दी, जिनके गोंड में मैं खेला और जिनके प्रेम से मैं प्रायः प्रसन्न होता रहा। अर्जुन के विचलित होने और उनके हृदय में बैठे मोहजाल को कृष्ण द्वारा जिस प्रकार हटाया गया और अत्यंत मारक प्रश्नों को भी हल करके युद्ध के लिए तैयार किया गया उसे भी हृदय परिवर्तन कहा गया।
एक प्रसंग यह भी है कि राजा धृतराष्ट्र के दरबार में कृष्ण पाण्डव के लिए पाँच गाँव केवल मांगते हैं और समझाते हैं कि शांति के लिए पाण्डव इतने में ही मान जाएंगे लेकिन दुर्योधन का हठ है कि वह सुई की नोंक के बराबर भी भूमि नहीं देगा पांच गाँव तो बहुत बड़ी बात है। दुर्योधन के हृदय परिवर्तन की अपेक्षा वही कृष्ण इस प्रकार चाहते हैं कि वह पाण्डवों को पांच गाँव ही दे दे। धृतराष्ट्र को बार बार भीष्म द्वारा समझाया गया की युद्ध में सब कुछ बर्बाद हो जाएगा इसलिए हमें पाण्डवों को उनके अधिकार दे देने चाहिए। धृतराष्ट्र का हृदय परिवर्तन नहीं होता है। एक प्रसंग और महाभारत से लें तो कर्ण की इच्छाशक्ति ने उसे हृदयपरिवर्तन से रोककर युद्ध के लिए विवश कर देती है। वह अपनी माँ द्वारा यह बताये जाने के बावजूद कि वह उसी का पुत्र है कर्ण कुंती की एक नहीं सुनता है। वह दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करता है। 
यह हृदय परिवर्तन की संकल्पना इसलिए बहुत ही पेंचीदी है। इससे यही प्रतीत होता है कि हृदय परिवर्तन एक ऐसी अवस्था है जो किसी चरित्र की मूल्य से निर्धारित होती है। वह ऐसा नहीं है कि इसके लिए किसी ख़ास संरचना में देखी जा सकती है। हृदय परिवर्तन किसी के स्वयं के निर्णय पर ही आधारित है। वह परिवर्तन मनुष्य के विवेक से जुड़ी है किन्तु उसकी जड़ता से भी जुड़ी होती है तो कभी कभी उसकी डोर किसी कारण से उसके जुड़ाव को समाप्त कर नए दिशा में भी परिवर्तन कर सकती है। इससे कम से कम यह पता चलता है कि हृदय परिवर्तन भी मनुष्य के मनोदशा और उसके परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।
कथाएं केवल महाभारत में हैं ऐसी बात नहीं ऐसी अनगिनत कहानियाँ और शिल्प हमारे साहित्य में हैं जो इस प्रकार के रूपक प्रस्तुत करते हैं। रामायण में भी कई दृष्टांत हैं। अब अगर बुद्ध के बारे में बात की जाय तो उन्हें राजमहल से मोहभंग इसलिए होता है क्योंकि उन्हें कुछ ऐसे दृश्य देखने को मिले जिन्होंने उन्हें विचलित कर दिया। मृतक, रोगी व्यक्ति और ऐसे अनेकों कष्टों को हर व्यक्ति प्रायः देखता है। लेकिन सिद्धार्थ के लिए यह दृश्य उनके हृदय परिवर्तन के लिए काफी थे। इसी प्रकार सम्राट अशोक ने युद्धों के रक्तपात को देखकर इतना शोक महसूस किया कि उसने जीवन में कभी भी युद्ध न करने का निर्णय ले लिया। अपने बच्चों को शांतिदूत बनाकर शांति के लिए पैरोकार बन गया। 
बचपन में एक कहानी आपने पढ़ी होगी-हार की जीत इसे सुदर्शन ने लिखी है। यह कहानी है बाबा भारती और खड्गसिंह के बारे में। 
माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे "सुल्तान" कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया, माल, असबाब, जमीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे - से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। "मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा," उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, "ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।" जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ - दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते - होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, "खडगसिंह, क्या हाल है?"
खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "आपकी दया है।"
"कहो, इधर कैसे आ गए?"
"सुलतान की चाह खींच लाई।"
"विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।"
"मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।"
"उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!"
"कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।"
"क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।"
"बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।"
बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीजों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की - सी अधीरता से बोला, "परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?"
दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु-वेग से उडने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, "बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।"
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज आई, "ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।"
आवाज में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, "क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?"
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, "बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।"
"वहाँ तुम्हारा कौन है?"
"दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।"
बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था। बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, "जरा ठहर जाओ।"
खड़गसिंह ने यह आवाज सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।"
"परंतु एक बात सुनते जाओ।" खड़गसिंह ठहर गया।
बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, "यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा"।
"बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा।"
"अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।"
खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गढ़ा दीं और पूछा, "बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?"

सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, "लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।" यह कहते-कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।
बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, "इसके बिना मैं रह न सकूँगा।" इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह खयाल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दें। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।
रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले, "अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।" 
यहाँ यह पूरी कहानी देने की आवश्यकता नहीं थी लेकिन हृदय परिवर्तन की एक अद्भुत कथा है हार की जीत। इसे समझकर और पहले के सूत्र रूप में आये उद्धरणों को जानकर आपको लगेगा कि हृदय परिवर्तन वस्तुतः हिंसा की समाप्ति और अहिंसा की स्थापना है। कृष्ण का युद्ध के लिए अर्जुन को तैयार करने की प्रक्रिया भी तो धर्म की स्थापना के लिए है। अन्यथा हठ और निष्ठा से जुड़े हृदय परिवर्तन का अंत तो विनाश की ओर ही जाता है। अहिंसा मनुष्यता का नाश नहीं करती अपितु जीवनदायिनी है इसलिए हिंसा, हृदय परिवर्तन और अहिंसा की गहरी समझ से एक सतत समाज विनिर्मित हो सकता है। हृदय परिवर्तन और अहिंसा का संबंध सर्वदा मानवीय है। 


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश), 
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com  

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