हृदय परिवर्तन और अहिंसा का संबंध

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


हिंसा को समझने के लिए मनुष्य ही नहीं अपितु सम्पूर्ण पारिस्थितिकी और जैवविविधता को समझना होगा। हिंसा के बहुत से कारण आपको जैविक परिस्थितियों पर अध्ययन करने पर आपको मिल जाएँगे। पेड़-पौधों और जानवरों के स्वभाव को समझने के लिए संसार भर में गंभीर अध्ययन हुए हैं। हमारे वैज्ञानिकों को इस ज्ञान को प्राप्त करने में काफी वक्त लगा है और बहुत से जटिल प्रश्नों का समाधान भी मिला है। इसमें हिंसा के कारणों का अध्ययन भी शामिल रहा है। जैसा कि अहिंसा विमर्श में पहले ही हिंस्र धातु से हिंसा की व्युत्पत्ति बताया गया है जो सिंह जैसे ताकतवर पशुओं की समझ संदर्भ को रेखांकित करते हुए अभिव्यक्त किया गया है।

वस्तुतः इस प्रकृति के भीतर रह रहे मनुष्य के बारे में भी उतनी ही जटिलता है। आज भी मनुष्य में और मनुष्य सृजित समाज में अहिंसक स्वभाव की अपेक्षा हिंसा अधिक व्यापक है। हमें स्वभाव को समझने के लिए वर्षों लगे उसी प्रकार मनुष्य को समझने के लिए भी अनेकों अनुसन्धान किये जा रहे हैं और किये जाते रहेंगे। मनुष्य के मस्तिष्क में रासायनिक परिवर्तन उसके स्वभाव के मूल में होते हैं। ये परिवर्तन क्षणिक भी होते हैं और स्थाई भाव में भी पाये जाते हैं। सतत परिवर्तनों से उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया भी प्रायः प्रभावित होती हैं। अपराध की प्रवृत्तियों को मनोवैज्ञानिक तरीके से समझने का प्रयास तमाम ज्ञानानुशासन में हुआ है। प्रवृत्तियाँ तो मूलतः स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं। स्वभाव जन्म के साथ, चेतना के साथ, समाज के साथ, रुचियों के साथ, उत्प्रेरण शक्ति के साथ और शिक्षा के साथ समझ से उद्भूत होती हैं और जीवन का हिस्सा बनती हैं। लेकिन फिर भी हम दिमाग का सही सही निर्धारण नहीं कर पाते हैं। कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव व सिगनेचर नहीं बदलता। कुछ लोग हाथ की रेखाओं को लेकर मनुष्य की प्रवृतियों के संदर्भ में भी कहावतें कहते हैं परन्तु फिर भी दिमाग को समझने में वैज्ञानिक चूक कर देते हैं।

मनुष्य की प्रवृत्तियों को फ्रायड ने यूँ समझने का प्रयास किया है- इड, इगो, सुपर इगो। इसमें वह सहजता, वास्तविकता और नैतिकता की बात करता है। उसका यह मानना है कि प्रवृत्तियाँ इन्हीं से प्रभावित होती हैं। फ्रायड ने इड को व्यक्तित्व का आदिम और सहज घटक माना है। इड में वह जन्म के समय व्यक्तित्व के सभी विरासती यानी जैविक-घटक को रेखांकित करता है। अहंकार के सन्दर्भ में भी वह इसे सहज-भाव व्यक्तित्त्व में शामिल करता है जो व्यक्तित्त्व की बाहरी दुनिया में उसके अस्मिता के साथ जुड़ती है। किन्तु सुपर-इगो मनुष्य के द्वारा बुने गए परिवार या समाज से आती है। जिसमें उस मनुष्य के वैयक्तिकता को नैतिक व अनैतिक द्वंद्व में उलझा देती है।

प्रवृत्तियाँ उत्तेजना की वजह भी होती हैं। ग्रीक अध्ययन में भी मनुष्य के आत्मा और मन को समझने के साथ यह समझा गया कि मनुष्य आत्मा और मन को कभी एकाकार नहीं कर पाता जिसके कारण उसका अपनी इन्द्रियों पर बस नहीं हो पाता जिससे प्रवृत्तियाँ उत्तेजना का शिकार हो जाती हैं और उसके स्वभाव में हिंसा जन्म ले लेती है। सिगमंड फ्रायड ने इसीलिए व्यक्तित्व, मानव व्यव्हार और दूसरों के साथ व्यवहार की चेतना पर अपना ध्यान केन्द्रित किया जिसमें वह चेतना स्तर की बारीकियों को समझने की कोशिश किया है जिसमें एक मनुष्य के जन्म, जीवन निर्वाह, जैविक-क्रियाएँ, विश्वासघात, परित्याग और मृत्यु भी शामिल थीं। इसे समझने के साथ हि दरअसल, अपराध के कारणों को हम समझ सकते हैं।

प्रवृत्तियाँ तो हमारा अपना व्यवहार हैं। व्यवहार ही स्वभाव को अभिव्यक्त करते हैं। अपराध भी मनुष्य के स्वाभाव का हिस्सा बन जाता है आखिर क्यों? मनुष्य जन्म से तो अपराधी होता नहीं। इस अपराध विज्ञान पर अब दुनिया भर में अध्ययन हो रहे हैं। क्रिमिनोलॉजी में इस पर जो शोध हुए हैं वे चौंकाने वाले हैं। अमूमन तो  यह एक अमानवीय, हानिप्रद और कानूनन निषिद्ध व्यवहार है। अपराध की श्रेणी में रखे गए कृत्यों को किसी गलत व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अकल्याणकारी बर्ताव माना गया है जो पाप की श्रेणी में रखा गया है। किन्तु ऐसे स्वाभाव क्यों विकसित होते हैं और इनके दुष्परिणाम क्या हैं वह संसार भर की हिंसा को देखकर नहीं समझा जा सकता। इसे बारीकी से समझने के लिए एक-एक घटना की तह में जाना पड़ता है।

हिंसा की वैधता और अवैधता पर भी सवाल उठे हैं। अब आप विचार करें कि हिंसा तो हमेंशा अप्रीतिकर है तो वह जायज कैसे हो सकती है। कोई भी हिंसा एक अपराध की श्रेणी में आती है फिर भी हमारी सभ्यता और संस्कृति में हिंसा की वैधता और अवैधता पर विचार किया गया है। मान लीजिये युद्ध के दौरान सैनिक लड़ाई करने गया। वह हथियार चलाएगा तो रक्त बहाने और जान लेने-देने की ही संभावनाएँ बनती हैं तो क्या उसे अपराध माना जाए? इसी प्रकार कोई व्यक्ति अपने ऐसे पड़ाव पर है जिस समय उसकी मृत्यु ही उसके तड़पने से मुक्ति दे सकती है तो उसे तो अब इच्छामृत्यु चाहिए। ऐसे में वह क्या जायज है। आत्महत्या या इच्छा से प्राण-त्याग भी तो अपराध है। ड्रग्स के आदी को बिना ड्रग्स के बचाया नहीं जा सकता तो क्या उसे अपराध माना जाए? किसी राजा या राज्य द्वारा दी जा रही फाँसी भी तो किसी जीव की हत्या है तो उसे अपराध या हिंसा की श्रेणी में रखा जा सकता है क्या? यह अगर वैध है तो अवैध क्या है? अगर युद्ध के समय में सैनिक या राजा द्वारा ली जा रही जान वैध है तो इस प्रकार कोई भी आतंकवादी या उग्रवादी या आततायी भी अपनी समस्त कार्यवाहियों को उसके दिमाग से वैध ही मानेगा क्योंकि उसकी दृष्टि में उसका संघर्ष उसके किसी अहंकार, साम्राज्यवादी-बोध या अपनी अस्मिता के लिए किया जा रहा संघर्ष है। ऐसे में अनैतिक और अनैतिक का अंतर समझने के लिए कानून को नैतिक माना गया है लेकिन बहुत सी अदालतों में सबूत के अभाव में निरपराधों को दंड मिलता है और अपराधियों को सबूत के अभाव में मुक्त कर दिया जाता है तो वह किस प्रकार नैतिक हुआ?

हम अपराध और हिंसा की जैविक जड़ों को बदल सकते हैं। पर उसे हिंसा और अपराध से पूरी तरह मुक्त करके अहिंसक बनाने की इच्छाशक्ति जागृत करना आसान नहीं होता। राज्य के द्वारा निर्धारित कानून भी कभी हिंसक लगते हैं तो क्या ऐसे में राज्य ही अपराधी प्रवृत्तियों के साथ अपने नागरिकों के साथ पेश आने लगता है? यदि राज्य की किसी योजना या फैसले के कारण कोई कृत्य आपराधिक हो जाता है तो सबसे बड़ी बात यह है कि राज्य इस तथ्य को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होता। अपने कानून के माध्यम से किसी सहज मानवीय प्रवृत्ति को अपराध बताकर दोषी करार करने वाले राज्य बर्बर हो जाते हैं और अपने ही नागरिकों को सुधरने के अवसर नहीं देते।

सहज रूप से देखा जाये तो अपराध के दौरान अपराधी बहुत ही घातक मनःस्थिति से गुजर रहा होता है। सही समय पर अपराध रोकने के लिए इसीलिए मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग पर बल देते हैं। राज्य की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए प्रत्येक एक हज़ार की जनसंख्या पर एक काउंसलिंग सेंटर बनाये। अपराधी द्वारा की जा रही हिंसा, छोटे अपराध नहीं होते। हर हिंसा अपराध की ही श्रेणी में आते हैं। माना किसी महिला के साथ घरेलू हिंसा होती है तो वह भी अपराध ही है। अगर किसी भी बच्चे को स्कूल में अध्यापक बैठने से रोकता है तो कानूनन वह तो अपराध है। लेकिन इन अपराधों के भीतर संगीन अपराध को बहुत ही गंभीरता से लेना पड़ता है जैसे हत्या, बलात्कार, सामूहिक नरसंहार और बड़े आतंकी हमले, रेड-कारीडोर के संहार ये सब ज़ुर्म की बहुत ही बेरहम स्थितियाँ हैं। अपराध की इन सभी स्थितियों की अलग-अलग परिस्थितियाँ और प्रवृत्तियाँ भी हैं। इन अपराधों को हिंसा की क्रूरतम श्रेणी में रखकर इस पर समझ स्थापित की जाती है। सबसे अहम बात यह है कि ये अपराध जानवरों और पेड़-पौधों द्वारा नहीं किया जा रहा है बल्कि मनुष्यों द्वारा, मनुष्यों के बीच और मनुष्यों पर अपराध किया जा रहा है। कुछ सामान्य स्थितियों को अगर कोई सामान्य आमजन भी अपनी इस पर प्रतिक्रिया देगा तो वह समझ सकता है कि इन अपराधों को हम किस प्रकार वर्गीकृत करके देखें। मनोविज्ञान के विज्ञ लोग यह मानते हैं कि समाज के अंतर्संघर्ष में ऐसे अपराध समाज के जीवन के हिस्सा हैं लेकिन अपराध के स्वभाव में निरंतर अभिवृद्धि चिंता का कारण अवश्य हैं। यह अभिवृद्धि केवल भारत में हो रही है ऐसा नहीं है। दुनिया के तमाम मुल्क में अपराधियों की संख्या में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। हिंसा और अपराध के स्वभाव में यह बढ़ता ग्राफ किंचित ही करुणा और दया के लिए जगह दे। ऐसे में, अपराध के स्वभाव में मूलभूत कमी की वर्तमान आवश्यकता को यदि सरकारें यदि अपनी रणनीति के तहत लागू नहीं कर सकीं तो आने वाले भविष्य में नई पीढ़ी का मनोमस्तिष्क कैसा होगा इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।

अब जैविक-हथियार के माध्यम से अपराध को बढ़ावा मिलने लगा है। यह मनुष्य के ही दिमाग की उपज है। इस प्रकार के अपराध मनुष्य स्वभाव को कितना प्रभावित कर देंगे इसकी परिकल्पना कोविड-19 जैसे खतरे से गुजरती दुनिया और उसके ऊपर हो रहे असर से समझा जा सकता है। इसी प्रकार विश्व वन्यजीव अपराध रिपोर्ट 2020 इस खतरे पर जोर देती है कि वन्यजीव तस्करी प्रकृति और ग्रह की जैव विविधता के लिए खतरा है।
हिंसक अपराध, संपत्ति से जुड़े अपराध, सफेदपोश अपराध, संगठित अपराध कौन करता है? उनके क्या उद्देश्य होते हैं? निःसंदेह यह लालच, ऐश्वर्य, साम्राज्य विस्तार या पेशेवर अपराधी ऐसे अपराधों से जुड़े होते हैं। अपराध करने के लिये ये जेंडर, आयु, सामाजिक वर्ग, शहरी या ग्रामीण का भेद, या जाति और नस्ल को नहीं देखते हैं। ये न बच्चे देखते हैं और न महिलाएँ, इनका कार्य अपराध करना होता है और यह उनकी प्रवृत्ति बन जाता है। अमेरिकी विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि मीडिया ने अपराध को बहुत अधिक कवर करके और विशेष रूप से हिंसक अपराध पर भारी ध्यान देकर अपराध को अधिक किया है। सबसे घातक यह है कि किशोरों में और बच्चों में अपराध की प्रवृत्तियाँ नींद उड़ा देने वाली हैं। कॉर्पोरेट अपराध और अन्य प्रकार के सफेदपोश अपराध निश्चितरूप से आर्थिक नुकसान पहुँचाते हैं जो कि किसी राज्य को भुगतना पद सकता है। अवैध नशीली दवाओं के प्रयोग और वेश्यावृत्ति से जुड़े अपराध सामाजिक रूप से हानि पहुँचाते हैं और यह किसी भी समाज या राष्ट्र के लिए अहितकर हैं। आपराधिक स्वभाव या व्यवहार के कई समाजशास्त्रीय सिद्धांत मौजूद हैं। लेकिन इन सिद्धांतों से ज्यादा ज़रूरी यह समझना आवश्यक है न्याय-प्रणाली से और सामाजिक स्तर से इसे कैसे काबू किया जाय? कैसे अपराधी के स्वभाव परिवर्तित हों?

हम जानते हैं कि आपराधिक स्थितियों से निपटने के लिए न्याय प्रणाली में प्रति वर्ष अरबों डॉलर खर्च होते हैं। भारी संख्या में पुलिसबल, न्यायालय और उसके आनुषंगिक जन और कैदियों-कारागारों पर खर्च होने वाले धन की सामाजिक निर्माण में कोई भूमिका नहीं है बल्कि यह व्यर्थ का खर्च है। अगर समाज सहिष्णु हो, दया, करुणा और प्रेम हो तो हिंसा या अपराध की प्रवृत्तियाँ हमारे समाज का हिस्सा बन ही नहीं पाएंगी। अपराध को कम करने के लिए कई समाजशास्त्रीय बदलाव आवश्यक हैं। प्रायः यह समझा जाता है कि अपराध एक अपरिहार्य स्थिति है जबकि यह अक्सर आर्थिक कारणों से होती है यदि गरीबी, भुखमरी और असमानता खत्म हो जाए तो थर्ल्ड वर्ल्ड कंट्रीज-यानी तीसरी दुनिया के देशों से अपराध कुछ कम किये जा सकते हैं। इसके साथ अगर मनुष्य-शरीर को भौतिकवादी सोच से निकालकर अध्यात्मिक स्तर पर उन्हें मजबूत किया जाय तो विकसित राष्ट्रों के रहवासियों में भी नैतिकता और सह-अस्तित्व की भावनाएँ जन्म लेंगी इससे भी अपराध कम होंगे लेकिन समस्या इस बात की ही है कि अपराध को रोकने के लिए कोई भी प्रामाणिक और कारगर उपाय नहीं किये जा सके हैं जिससे सभी देश परेशान हैं।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्टीफेंन हरिन्डर्फ़ मार्कु हैस्कानिन व स्टीवन माल्बी द्वारा सम्पादित इंटरनेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑन क्राइम एँड जस्टिस का अवलोकन करें तो पता चलता है कि दुनिया में अपराध की स्थितियाँ विभिन्न पैमाने पर बढ़ रहे हैं। अब अहिंसक स्वभाव की उम्मीद तभी की जा सकती है जब सभी राज्य शिक्षा के साथ अपने नागरिकों में नैतिक-साहस की उत्पत्ति भी सुनिश्चित करें। एक ऐसा नैतिक साहस जो समाज में सद्भाव और सहस्तित्व के लिए अपनी इच्छाशक्ति जागृत करें। बढ़ते अपराध से शांति, मानव सुरक्षा और मानव अधिकार की संभावनाएँ तो नहीं दिखाई देतीं।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश), 
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com  

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