भाभा का नेहरू को पत्र

(Letter Courtesy: Archives at NCBS)
1962 में होमी भाभा द्वारा तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू को डॉ ओबैद सिद्दीकी के बारे में लिखे एक पत्र में उन्होंने प्रोफेसर जी पोंटेकार्वो के द्वारा डॉ स्ज़ीलार्ड को लिखे गए एक पत्र का जिक्र किया। इस पत्र में भाभा को भारतीय विज्ञान के भविष्य के लिए सोच और विदेशों में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिकों की देश में भूमिका को देखा जा सकता हैं।

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अगस्त 2, 1962

मेरे प्रिय भाई,

इस वर्ष की शुरुआत में प्रसिद्ध वैज्ञानिक, डॉ लियो स्ज़ीलार्ड ने मेरा ध्यान उत्कृष्ट क्षमता के युवा भारतीय आणविक जीवविज्ञानी, डॉ ओबैद सिद्दीकी की ओर किया, जिसके सामने विदेश में नियुक्ति के कई प्रस्ताव हैं। हमने उन्हें एक नियुक्ति की पेशकश की है जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है, और वे इस महीने हमारे साथ जुड़ेंगे। उनके मामले को ग्लासगो विश्वविद्यालय के जेनेटिक्स विभाग के प्रोफेसर जी. पोंटेकार्वो सहित कई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्ञात जीवविज्ञानियों द्वारा जोरदार समर्थन किया गया था। प्रोफेसर जी. प्रोफेसर पोंटेकार्वो के द्वारा डॉ स्ज़ीलार्ड को लिखे गए पत्र में उनके बारे में निम्नलिखित वाक्य देखने को मिले हैं;

"मुझे लगता है कि भारत में जीव विज्ञान की प्रगति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होगा कि वह एक ऐसी नौकरी में वापस जाए, जिसमें उसकी क्षमता पूरी तरह अभिव्यक्त हो। वास्तव में, मैं चकित हूँ कि भारत औसत दर्जे के वैज्ञानिक-राजनेताओं को बढ़ावा देता है जबकि अपने अच्छे वैज्ञानिकों को बनाए रखने के लिए कुछ भी नहीं करता है"

मैंने सोचा कि मुझे यह अंतिम वाक्य आपके संज्ञान में लाने चाहिए क्योंकि ये उस धारणा की और संकेत करते हैं जो हमारी वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद विदेशों में भारतीय विज्ञान और सरकार के रवैये के बारे में उपस्थित है। मुझे डर है कि ये धारणा पूर्णतः निराधार नहीं है, और हम स्वतंत्रता-पूर्व दिनों की हमारी विरासत से दूर नहीं हुए हैं, जिसमें जिसने भी प्रशासन पर अपना समय बिताया वह किसी ऐसे व्यक्ति की तुलना में जो प्रयोगशाला में काम कर रहा था उससे अधिक महत्वपूर्ण स्थिति रखने के लिए माना जाता था, हालांकि दुनिया के दृष्टिकोण से बाद का अधिक महत्व हो सकता है।

होमी (हस्ताक्षर)


सेवा में:
श्री जवाहरलाल नेहरू,
प्रधानमंत्री,
नई दिल्ली।


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नेहरू को भाई कहकर सम्बोधित करने वाले भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर होमी जहाँगीर भाभा का विचारक्षेत्र विराट था। वो वर्तमान के साथ-साथ आने वाले भविष्य की ज़रूरतों को भी उतना ही महत्व देते थे। उन्होंने जेआरडी टाटा की मदद से मुंबई में ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ की स्थापना की। देश की आजादी के बाद, होमी जहाँगीर भाभा ने दुनिया भर में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों से निवेदन किया कि वे भारत लौट आएँ जिसके प्रभाव से कुछ वैज्ञानिक भारत लौटे भी।

डॉ ओबैद सिद्दीकी भी ऐसे ही एक विज्ञानिक थे जिनका जन्म 1932 में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्राप्त की। उन्होंने प्रोफेसर जी. पोन्टेकवो की देखरेख में ग्लासगो विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी डिग्री पूरी की। आणविक आनुवंशिकीविद् के रूप में, डॉ सिद्दीकी ने बैक्टीरिया से एस्परगिलस और ड्रोसोफिला तक कई अलग-अलग मॉडल जीवों पर काम किया। उन्हें 1962 में बॉम्बे में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (टीआईएफआर) में आणविक जीव विज्ञान इकाई स्थापित करने के लिए होमी भाभा द्वारा आमंत्रित किया गया था। टीआईएफआर में नौकरी की पेशकश के साथ, ओबैद भारत वापस आ गए। तीस साल बाद, वह बैंगलोर में टीआईएफआर, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज के संस्थापक निदेशक बने, जहाँ उन्होंने जीवन के अंतिम दिनों तक शोध कार्य जारी रखा। उन्हें कई पुस्कारों से सम्मानित किया गया था, जिनमें पद्म विभूषण, पद्म भूषण, बीसी रॉय अवार्ड और शांति स्वरूप भटनागर  विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पुरस्कार आदि पुरस्कार शामिल थे।


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