कविताएँ: गीता कौशिक 'रतन'

गीता कौशिक 'रतन'

1. भ्रमित घूमते रहे क्यूँ मधुकर

अनुपमेय कृति निसर्ग ने करके,
सृष्टि का सृजन कर दिखलाया।
सगंम से पंच महाभूतों के,
रचाई तत्व प्राण की काया॥
दिल धड़कन धुन गुंजित कर लेते,
भ्रमित घूमते रहे क्यूँ मधुकर॥
हवा ने आग पानी संग मिलकर,
धरती को अंबर से मिलाया।
परिधि में इन सबको रखकर,
मूल तत्व, समता में बँटवाया॥
मन उपवन में रंग रस भर लेते,
भ्रमित घूमते रहे क्यूँ मधुकर॥
बने शीत-लहर सुलगी ना तमस्,
नयन-ज्योति ने मन चमकाया।
पानी जैसे बनकर तुमने, 
ख़ुद ही को रस्ता दिखलाया॥
गम्भीर, मधुर कर्णप्रिय बन लेते,
भ्रमित घूमते रहे क्यूँ मधुकर॥
सहन-शीलता धारण करके,
धरती सा तन-मन धन पाया।
वेगवान, पर सहज सरल सा, 
मन वायु भाँति गतिमान बनाया॥
शृंगारित, अंतर्मन कर लेते,
भ्रमित घूमते रहे क्यूँ मधुकर॥
अंबर सी स्थिरता अपनाकर,
विशाल ह्रदय वाला कहलाया।
रचकर सबकी सृजनगाथा,
क़ुदरत ने सृष्टि को उपजाया॥
रहा क्षणिक बसेरा, चंद जी लेते,
भ्रमित घूमते रहे क्यूँ मधुकर॥
***


2. मोह-जाल

आज अचानक चली आई फिर, 
याद तुम्हारी द्वार प्रिये। 
बिखर पड़ी अश्रुजल धारा, 
गई क्यूँ हिम्मत हार प्रिये॥
सब भाव जोड़ मन चितवन के, 
करके सब संचित अनुराग। 
कभी चित्रकार कभी शिल्पकार बन, 
रही जोड़ती तार प्रिये॥
सुंदर सुरभित तरुशिखा से, 
सजी ये बंदनवार मनोहर।
अनुकम्पा सजीले फूलों ने कर, 
बनाए हैं मधुबन हार प्रिये॥
रही नयन सेज पर स्वप्न पिरोतीं,
ये आशाएँ सुंदर संसार। 
आई ह्रदय कुंज से बाहर झााँकने, 
सुन साँसों की झनकार प्रिये॥
इन मृग नयनों की प्यास देखकर, 
झूठे नीर बहाए सहरा।
चिर तृष्णा के दो नयन बेचारे, 
तुम बहा दो मधुमय धार प्रिये॥
***

कैरी, नार्थ करोलाइना

2 comments :

  1. बहुत खूबसूरत हैं दोनों ही कवितायें |
    सहन-शीलता धारण करके,
    धरती सा तन-मन धन पाया।
    वेगवान, पर सहज सरल सा,
    मन वायु भाँति गतिमान बनाया॥ वाह ! बहुत बढ़िया ....और दूसरी कविता ''आज अचानक चली आई फिर, याद तुम्हारी द्वार प्रिये। शानदार ...बधाई है गीता जी !

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  2. बहुत मोहक रचनाएँ

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