वरिष्ठ लेखिका संतोष श्रीवास्तव से सत्यवीर सिंह की बातचीत

युवा; पहली सीढ़ी से अंतिम सीढ़ी पर छलांग न लगाएँ- संतोष श्रीवास्तव
पत्रकारिता और लेखन को जुनून मानने वाली, सामाजिक विसंगतियों, पितृसत्ता की कठोरता तथा लड़का-लड़की में भेदभाव की घटनाओं से आहत हो लेखन का सहारा लेकर देश-दुनिया के दो दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर भारतीय भाषा, संस्कृति तथा महिलाओं के मुद्दों की पुरजोर पक्षधर लेखिका संतोष श्रीवास्तव का जीवन एक खुली किताब है। एक ऐसी पुस्तक जिसका जो भी पृष्ठ खोलेंगे वहीं से सृजन की गंध और संघर्ष की आवाजें आपको बरबस अपनी ओर खींचती चली जाएंगी। किसी लेखक की पहली कहानी देश की प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग में छपे, तो लेखक का उत्साह और उनकी सृजनात्मकता की गुणवत्ता समझ आती है। यह महज संयोग है कि संतोष जी की पहली कहानी मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग में छपी तथा पत्रकारिता की शुरुआत भी आपने इसी मायानगरी से की है। लेखिका मानती हैं कि "जीवन की वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियों की सृजना ही पाठकों को आकृष्ट करती हैं।" इसी सोच से सृजित "मालवगढ़ की मालविका" उपन्यास और "मुझे जन्म दो माँ" पुस्तक न केवल भारतीय बल्कि विदेशी पाठकों को मोहित करती हैं। आपकी कहानियों में जीवन के विभिन्न कोणों की पड़ताल एक साथ उपस्थित है। संतोष जी की रचनाओं में चुनौती है, संघर्ष है और संवेदनाओं का बारीक ताना-बाना भी है। कविता के भविष्य पर बातचीत में लेखिका कहती हैं कि "आज की कविता हाशिए पर है, उसका कारण है आलोचना से दूर होना। आज कवि को वाहवाही चाहिए। यही प्रवृत्ति कविता के लिए घातक है।"

डॉ. सत्यवीर सिंह
लेखन, पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों से इतर अंतरराष्ट्रीय सद्भाव व नवांकुरों के हसीन सपनों को वास्तविकता का धरातल देने को कृतसंकल्प लेखिका संतोष श्रीवास्तव का जीवन बहुआयामी है। आप अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की संस्थापिका हैं। इस संस्था के माध्यम से नवांकुरों को लेखन, चित्रकर्म आदि पर मंच प्रदान करती हैं। अर्थात टैलेंट हंटिंग का कार्य करती है। साथ ही युवाओं को संदेश भी देती हैं कि " पहली सीढ़ी से अंतिम सीढ़ी पर छलांग न लगाएँ। खुद को खंगाले। जितना खुद लिखें उससे दुगना पढ़ें। पढ़ने से ही लेखनी में निखार और प्रौढ़ता आती है। 
हिंदी भाषा तथा भारतीय संस्कृति पर सत्यवीर सिंह से बातचीत में लेखिका संतोष जी की  स्वीकारोक्ति है कि मैंने 26 देशों की यात्रा की है। इस यात्रा पर मुकम्मल नजरसानी के पश्चात बहुत प्रौढ़ता तथा प्रामाणिकता के साथ कहती हैं-" विदेशों में भारतीय पौराणिक पात्रों एवं ग्रंथों का बहुत अधिक महत्व है। विश्व में भारतीय संस्कृति की साख है।" धर्म आध्यात्म पर कहती हैं कि "भगवान कृष्ण ने तो सरहदें मिटाने में बड़ी भूमिका अदा की है।  कृष्ण भक्ति को नया रूप इस्कॉन मंदिर ने दिया है। जिसकी संपूर्ण विश्व में 450 शाखाएँ हैं। 
डॉ. सत्यवीर सिंह से लेखिका संतोष श्रीवास्तव की इस बातचीत में हैं- हिंदी भाषा, साहित्य, समाज, संस्कृति, पत्रकारिता, लेखन तथा महिलाओं के मुद्दों के साथ नवांकुर लेखकों से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर एक मुकम्मल प्रस्तुति- 



सत्यवीर सिंहः  जन्म स्थल पारिवारिक परिवेश तथा शिक्षा आदि का संक्षिप्त परिचय दें

संतोष श्रीवास्तवः 23 नवंबर को मंडला, मध्य प्रदेश में माँ को अपार पीड़ा देकर पैदा हुई। वह कसक आज भी मेरे वजूद से टकराती रहती है। तब मेरे पिता गणेश प्रसाद वर्मा जिला मजिस्ट्रेट थे। हम बहुत बड़े सरकारी बंगले में रहते थे। बाबूजी ने जबलपुर से प्रशिक्षित डॉ बुलवाए थे । मेरा जन्म होते ही तीस पुलिसकर्मियों ने बंदूक चला कर सलामी दी थी। घर में अम्मा (श्रीमती सूरतवंती वर्मा) बाबूजी, बड़े भाई विजय वर्मा और छोटी बहन प्रमिला वर्मा सभी लेखक। मंडला से रिटायर होकर बाबूजी जबलपुर में एडवोकेट यानी प्राइवेट प्रैक्टिस ताउम्र करते रहे। अम्मा समाज सेविका थीं। जबलपुर की मेयर भी रह चुकी हैं। विजय वर्मा नवभारत में जो जबलपुर का दैनिक समाचार है, के समाचार संपादक थे। साथ ही नाट्यकर्मी भी। कवि कथाकार तो थे ही। उनके द्वारा मंचित किया गया नाटक "मैन विदाउट शैडोज" जबलपुर में आज भी याद किया जाता है।
परिवार में मैं पहली लड़की थी जिसने एम. ए. किया था। शादी के बाद मैंने बी.एड.भी किया और पत्रकारिता का डिप्लोमा भी किया। पत्रकारिता और लेखन मेरे जुनून है। पत्रकारिता की ओर झुकाव विजय भाई के कारण भी हुआ। नाटक, चित्रकला, नृत्यकला में भी अम्मा-बाबूजी ने हमें माहिर कर दिया था। बाबूजी स्त्री शिक्षा और स्त्री स्वतन्त्रता के हिमायती थे। यही वजह है कि हम बहनों में आत्मविश्वास और जिंदगी का सामना करने का हौसला कूट- कूट कर भरा है। अम्मा बाबूजी स्वतंत्रता सेनानी भी रहे। यह सब हमारे जन्म से पहले की बातें हैं लेकिन उसका असर आज तक हमारे अंदर विद्यमान है।

सत्यवीर सिंहः आपके कृतित्व की संक्षिप्त रूपरेखा तथा उल्लेखनीय कार्य।

संतोष श्रीवास्तवः समाज की विसंगतियाँ, पितृसत्ता की कठोरता और लड़के-लड़की में भेदभाव की घटनाएँ मन को उद्वेलित करती थीं।  बाबूजी का दफ्तर  घर के बाजू में होने के कारण मैं ध्यान पूर्वक उनके मुकदमे सुनती। जिनमें स्त्रियों  पर हुए अत्याचार की पराकाष्ठा का बयान होता था। मैं स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ती थी लेकिन मेरे अंदर का उबाल घटनाओं से प्रेरित होकर बाहर आने लगा। बचपना जरूर था लेखन में....... उन दिनों की डायरी के पीले पड़ चुके पन्ने आज भी मेरे लेखन में घुसपैठ कर खुद को लिखवा लेते हैं मुझसे। मेरी पहली कहानी 16 वर्ष की उम्र में मुंबई से निकलने वाले प्रतिष्ठित पत्र धर्मयुग में प्रकाशित हुई  तो आज तक पीछे मुड़कर नहीं देखा। पत्रकारिता मुम्बई से आरंभ हुई। डेस्क वर्क करना नहीं था। फ्री लांस ही किया। उन दिनों मुम्बई लेखकों, पत्रकारों और प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन का गढ़ था। धर्मयुग के संपादक डॉ. धर्मवीर भारती ने मुझे धर्मयुग के लिए बाल मनोरोग का स्तंभ अंतरंग लिखने को दिया था। तब धर्मयुग साप्ताहिक था लेकिन अंतरंग हर पखवाड़े छपता था। मैंने इस स्तंभ के लिए बहुत मेहनत की। मुझे मनोरोग स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के पास जाना पड़ता था। जिनसे केस हिस्ट्री लेकर मैं लिखती थी। यह कॉलम बहुत चर्चित हुआ और लगातार दो साल तक चला। फिर स्त्री मनोरोग का स्तंभ भी मैंने साल भर लिखा। उन्हीं दिनों नवभारत टाइम्स में भी विश्वनाथ सचदेव ने मुझसे स्त्री विषयक स्तंभ मानुषी के लिए लिखवाया। भोपाल से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका समरलोक में मेरा अंगना कॉलम  आज तक जारी है। यह कॉलम मैंने सन 2000 में लिखना आरंभ किया था। इस कॉलम के लिए भी मैंने आंकड़े जुटाकर स्त्री विषयक  लेख लिखे। जिनका संग्रह "मुझे जन्म दो मां" नाम से सामयिक प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ । इस पुस्तक पर राजस्थान के डीम्ड विश्वविद्यालय से मुझे पीएचडी की मानद उपाधि भी मिली तथा यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों में रेफरेंस बुक के रूप में मान्य है।

सत्यवीर सिंहः  मूलतः आपकी कहानियों ने देश दुनिया में धूम मचाई है। एक कहानी लेखक के लिए कौन-कौन सी बातें ध्यातव्य हैं ।

संतोष श्रीवास्तवः मेरे कहानी संग्रह, उपन्यासों पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से एम.फिल. हुए और बिहार सासाराम से तथा राज ऋषि भर्तृहरि मत्स्य विश्वविद्यालय, अलवर (राजस्थान) से कहानी और उपन्यास दोनों पर संयुक्त रूप से पीएच.डी. हो रही है। मेरी आत्मकथा "मेरे घर आना जिंदगी" पर भी लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. हो रही है। साथ ही मेरी कहानी एक मुट्ठी आकाश एसआरएम विश्वविद्यालय, चेन्नई में बी.ए. के पाठ्यक्रम में तथा लघु कथाएँ महाराष्ट्र राज्य के ग्यारहवीं के (युवक भारती) कोर्स में लगी है। यह सारी उपलब्धियाँ मेरी कहानी लेखन की मेहनत है। मैं मानती हूँ कि अलग हटकर कथानक पाठकों को आकृष्ट करता है। विषयवस्तु कहानी को अर्थ देने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कहानी में जिज्ञासा बनी रहनी चाहिए। लेखक कहानी की रचना करते हुए यथार्थ जीवन की प्रासंगिकता के द्वारा पाठकों तक अपनी पहुँच बना लेता है। मुझे उपदेशात्मक कहानियाँ पसंद नहीं। उसके लिए पंचतंत्र किस्सा तोता-मैना काफी है। प्रेमचन्द आज भी प्रासंगिक हैं। जबकि उनकी कहानी में वर्णित माहौल लगभग बदल चुका है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की "उसने कहा था" कहानी जैसी प्रेम कहानी मैंने दूसरी नहीं पढ़ी।

डॉ.सत्यवीर सिंहः  आपके लेखन के प्रेरणा स्रोत तथा सृजन की भूमिका के बारे में कुछ रोशनी डालिए

संतोष श्रीवास्तवः मेरे लेखन के प्रेरणा स्रोत मेरे बड़े भाई विजय वर्मा और मेरी माँ थीं। मैं रजिस्टर में कहानियाँ लिखती थी। एक दिन मेरा रजिस्टर विजय भाई के हाथ लगा। उस समय मेरी उम्र 14 वर्ष थी। वैसे भी घर में विजय भाई का बड़ा रुतबा था। सुनवाई हुई -"यह सब तुमने लिखा है?"
मैंने आँखें झुका लीं। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। अब पड़ी डाँट.....  लेकिन ,
"कब से लिख रही हो? बताया क्यों नहीं कि लिखती हो? इतना अच्छा लिखा है तुमने। कलम में दम है तुम्हारी। अब यह वाली जो कहानी है इसमें मैं थोड़े सुझाव लिख देता हूँ। इसे रीराइट करो।"
मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था लेकिन 45 वर्ष की अल्पायु में वे दुनिया से चले गए और मेरा मार्गदर्शक मुझसे छूट गया। लेकिन इतना अवश्य कहूँगी कि मुझे माँजा उन्होंने।  माँ स्वयं गीत लिखती और गाती थीं। वे उर्दू फारसी की अच्छी जानकार थीं। हमेशा कहतीं "एक दिन तू सूरज सी चमकेगी।" उनकी इस सोच को यथार्थ रूप देने में जी-जान से जुटी हूँ। उनका आशीर्वाद सदा मेरे साथ रहा। यही वजह है कि राही सहयोग संस्थान रैंकिंग 2018, 2019 में वर्तमान में विश्व के टॉप 100 हिंदी लेखकों में मेरा नाम शामिल है और भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा विश्व भर के प्रकाशन संस्थानों को शोध एवं तकनीकी प्रयोग हेतु देश की उच्चस्तरीय पुस्तकों के अंतर्गत मेरे उपन्यास 'मालावगढ़ की मालविका' का चयन हुआ।
मेरी रचनाओं के सृजन में हर बार मैं स्वयं मौजूद रही। अपनी रचनाओं के चरित्रों के संग हँसना, रोना, दर्द महसूस करना मेरे रचनामय  होने के आयाम रहे।

सत्यवीर सिंहः आपके कहानी संग्रहों के नाम तथा उनकी संक्षिप्त विषयवस्तु 

संतोष श्रीवास्तवः  मेरा पहला कहानी संग्रह या यूं कह लीजिए कि पहली प्रकाशित पुस्तक “बहके बसन्त तुम” कहानी संग्रह है जो 1996 में 'यात्री प्रकाशन, दिल्ली' से प्रकाशित हुआ। ब्लर्ब में श्रीकांत जी ने लिखा है कि संग्रह की कहानियाँ एक जिंदगी को दूसरी जिंदगी से ठीक वैसे ही जोड़ती हैं जैसे पुल नदी के दो किनारों को जोड़ता है। पुल खुद आवाज नहीं करता। नदी कल-कल करती बहती है। हाँ पुल से कोई भारी वाहन गुजरे तो पुल धमकता है वैसी ही इस संकलन की कहानियाँ हैं। दूसरा कहानी संग्रह है “बहते ग्लेशियर” जो 1999 में यात्री प्रकाशन, दिल्ली से  प्रकाशित हुआ। प्रसिद्ध आलोचक भारत भारद्वाज ने इसका ब्लर्ब लिखते हुए लिखा कि संतोष की कहानियाँ निराशा एवं डिप्रेशन में लिखी कहानियाँ नहीं हैं बल्कि नाजुक संबंधों के बारे में बहुत करीब से लिखी गई कहानियाँ हैं जो हमारे अंतर्मन को गहराई से झकझोरती हैं। इसमें कुल 20 कहानियाँ हैं। तीसरा कहानी संग्रह प्रेम संबंधों की कहानियाँ हैं जो नमन प्रकाशन, दिल्ली ने "प्रेम संबंधों की कहानियाँ "शृंखला के अंतर्गत इसे 2012 में प्रकाशित किया। नमन प्रकाशन ने देश के प्रतिष्ठित कहानीकारों की  कहानियों की 20 पुस्तकें इस शृंखला के अंतर्गत प्रकाशित कीं। जिसमें मेरी भी यह पुस्तक शामिल है। इस संग्रह में उन कहानियों को लिया गया है जो जीवन में प्रेम के विभिन्न पक्षों, रिश्ते आदि पर लिखी गई हैं। चौथा कहानी संग्रह “आसमानी आँखों का मौसम” भी नमन प्रकाशन, दिल्ली से  2014 में प्रकाशित हुआ। मेरी कहानियों के फैन प्रसिद्ध रंगकर्मी तथा थिएटर आफ रेलेवेंस के प्रणेता मंजुल भारद्वाज ने इस पुस्तक के ब्लर्ब में लिखा- "संतोष जी के पास कथ्य और कहन का अपना नजरिया है लेकिन वह हमारे आसपास का ही है। उनकी तमाम कहानियाँ जीवन को उसके विभिन्न कोणों से पकड़कर गहरी पड़ताल करती हुई एक ऐसा रचना संसार रचती हैं जिसमें चुनौती है, संघर्ष है और संवेदनाओं का महीन ताना-बाना है। पाठक को मोहविष्ट कर अनुभूतियों, द्वंद, चेतना, रस, रूमानियत और रोमांस की समग्रता में समेटने की क्षमता है लेखिका में।"

डॉ.सत्यवीर सिंहः आपका सृजन समकालीन समाज का दर्पण है। आपके विचार 

संतोष श्रीवास्तवः साहित्य समाज का दर्पण ही होता है। हाँ, जब फैंटेसी, तिलिस्म, भूत प्रेत की रचनाएँ लिखी जाती है तो वह केवल मनोरंजन के लिए होती है। साहित्य मनोरंजन नहीं है। उसमें अनुभूति की तीव्रता और भावना की प्रधानता होनी चाहिए। श्रेष्ठ साहित्य एक सार्थक, स्वतंत्र एवं संभावनाशील विधाओं से जीवन के यथार्थ, अंश, क्षण, खंड, प्रश्न, केंद्र बिंदु विचार या अनुभूति को गहनता के साथ व्यंजित करता है। संवेदना ही एक ऐसी चीज है जो साहित्य और समाज को जोड़ती है। साहित्यकार के अंतस में युगचेतना होती है। दूर क्यों जाएँ मेरे उपन्यास "मालवगढ़ की मालविका" को ही लीजिए। वर्षों पहले कानूनी रोक लगा दी गई सती प्रथा की इक्का-दुक्का घटनाएँ समाज में घटित होती ही रहती है। मैने इसे आधार बनाकर एक ऐसी स्त्री की रचना की है जो आज के संदर्भ में भी इससे जुड़े सवालों से दो-चार होती है। मंगल पांडे फिल्म में भी उपन्यास का एक अध्याय फिल्माया गया है। जब नायिका को सती होने ले जाया जा रहा है और पति की चिता पर बैठते ही एक अंग्रेज हवा में गोलियाँ दागता आता है और चिता से नायिका को उठाकर घोड़े पर बिठाकर ले जाता है। वह विरोध करती है। गाँव वाले अंग्रेज के बंगले पर पत्थर बरसाते हैं पर अंग्रेज यही वाक्य दोहराता है कि वे तुम्हारा मर्डर कर रहे थे। इसी तरह "लौट आओ दीपशिखा" उपन्यास में मैंने पाश्चात्य संस्कृति लिव इन रिलेशन के गुण दोष बताए हैं। यह उपन्यास फिल्म अभिनेत्री परवीन बॉबी के जीवन पर केंद्रित है। हालांकि उपन्यास की नायिका अभिनेत्री नहीं चित्रकार है लेकिन परवीन बॉबी के जीवन की सारी सच्चाइयाँ उस पर केंद्रित हैं। तो निश्चित ही मैं कह सकती हूँ कि मेरे लेखन ने समकालीन समाज से जुड़ने की कोशिश की।

सत्यवीर सिंहः आपके लिए साहित्य साध्य है या साधन?

संतोष श्रीवास्तवः निश्चय ही साध्य है। मैंने अपने विचारों को मूर्त रूप देने के लिए कलम को साधन बनाया जिसके जरिए मैं अपने लक्ष्य पर पहुँचती रही। जब मैं अपने उपन्यास" टेम्स की सरगम" की रचना कर रही थी तो वर्षों तक मैं उपन्यास की कथा भूमि में स्वयं को आरोपित करती रही। अगर ऐसा नहीं करती तो रचना कर्म होना असंभव था। संयुक्त उपन्यास "ख्वाबों के पैरहन" (प्रमिला वर्मा, संतोष श्रीवास्तव) लिखते समय भी मैं पूरी तरह उपन्यास की कथाभूमि और कथा पात्रों में डूब चुकी थी। उपन्यास के अंतिम अध्याय तक कथा नायिका रेहाना ने मुझे चैन नहीं लेने दिया और जब उसकी मृत्यु हो गई तो मुझे लगा मेरा अपना ही कोई मुझसे बिछड़ गया है। मै हफ्तों डिस्टर्ब रही। इस उपन्यास के 8 अध्याय प्रमिला वर्मा और 8 अध्याय मैने लिखे हैं। इसके अब तक दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और उर्दू में अनुवाद भी हो चुका है।

डॉ.सत्यवीर सिंहः आप के समकालीन महिला कथाकारों के नाम जिन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया ।

संतोष श्रीवास्तवः अपनी समकालीन महिला लेखिकाओं के लेखन के बारे में तो जानती हूँ पर उनके उल्लेखनीय कार्यों से परिचित नहीं हूँ। दो ही नाम स्मृति में कौंधते हैं। मृणाल पांडे जो एक पत्रकार और भारतीय टेलीविजन की जानी मानी हस्ती हैं। वे दैनिक हिंदुस्तान की 'वामा' पत्रिका की संपादक भी रह चुकी हैं। आकाशवाणी प्रसार भारती में भी उनके उल्लेखनीय कार्य रहे। विभा रानी नाट्य कर्मी भी हैं। उन्होंने स्वरचित सोलो नाटकों में अपने अभिनय के चुनौतीपूर्ण कार्य में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

सत्यवीर सिंहः साहित्य का भविष्य और भविष्य के साहित्य पर आपके विचार 

संतोष श्रीवास्तवः इन दिनों साहित्य के साथ और भी विधाएँ जुड़ गई हैं। नृत्य, नाटक, मूर्तिकला में भी साहित्यकार रुचि ले रहे हैं। फिल्म के लिए संवाद लिखना, स्क्रिप्ट लिखना आदि कामों में यश और धन मिलने से उनका लेखन प्रभावित हो रहा है। अब पर्यटन भी मानो एक जरूरत बन गया। पिछले कुछ सालों से यात्रा वृतांत और यात्रा संस्मरणोँ की बाढ़ सी आ गई है। कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक ही नहीं अब डायरी, जीवनी या आत्मकथाओं पर भी लेखक की कलम खूब चल रही है। इन विधाओं की वजह से कविता, कहानी, उपन्यास प्रभावित हो रहे हैं। दरअसल ऐतिहासिक, पौराणिक, आधुनिक, उत्तर आधुनिक से होते हुए हम आज जिस दौर में हैं उसमें पूरे समाज की पड़ताल करते हुए विस्तृत परिसर को खंगालने का काम निरंतर जारी है। भविष्य में इसमें और तेजी आ सकती है।
वैसे साहित्य में बदलाव तो होता रहता है। देखते ही देखते हम टेक्नोलॉजी के युग में पहुंच गए। ई बुक्स, यूट्यूब, वेब पत्रिकाएं तरह-तरह के साहित्यिक ऐप पाठक  कम, लेखक ज्यादा। एक होड़ सी लगी है खुद को स्वयं ही साबित करने की। स्वयं के खर्च से किताबें प्रकाशित कर मुफ्त में किताबे बांटना। एक तरह से खरीदकर पढ़ने की परंपरा ही समाप्त होती जा रही है। किंडल आमेजान में किताबें बेशुमार हैं। गूगल विश्व साहित्य परोस रहा है। डाउनलोड करिए और पढ़िए। यह तो हुई वर्तमान के साहित्य की बात। भविष्य में अतीत के ग्रंथों को पुनर्नवा किया जाएगा। रामायण महाकाव्य के कथानक  लेखकों की अपनी दृष्टि से लिखा जा रहे हैं। भविष्य में रामायण महाकोष की तैयारी है जो विभिन्न भाषाओं में होगा। मैं सोचती हूँ अतीत के साहित्य का भविष्य में एक नए तरह का अध्ययन इंटरप्रिटेशन जारी रहेगा और ऐसा केवल साहित्य में नहीं बल्कि अन्य कलाओं में भी होगा। शेक्सपियर और कालिदास पर काफी काम हो रहा है। भविष्य में भी होगा। रतन थियाम की ऋतुसंहार, कावलम नारायण पणिक्कर द्वारा भास के नाटकों की प्रस्तुति, मुम्बई में अतुल कुमार द्वारा शेक्सपियर के नाटक की प्रस्तुति पिया बहुरूपिया। यानी तकनीकी प्रयोगों द्वारा उच्च स्तरीय कामों की हम उम्मीद कर सकते हैं। वैसे अमीश त्रिपाठी ने शिव पुराण को तीन वॉल्यूम में लिख कर शिवजी को साधारण पुरुष बता दिया है। अब यह बात किसी को मान्य है किसी को अमान्य पर अमीश त्रिपाठी ने शिवपुराण के बहाने लाखों कमा लिए।

संतोष श्रीवास्तव की कहानियों के ऑडियो अनुराग शर्मा के स्वर में

डॉ.सत्यवीर सिंहः  कविता लेखन गद्य लेखन के सूत्र अलग-अलग हैं उनके मूलभूत अंतर और साधारण साम्य पर आपके विचार।

संतोष श्रीवास्तवः  भारत में कविता का इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता है। कविता छंदों की शृंखला में विधिवत बंधी रस अलंकार और भावों को लिए मानो चित्र सा रचती  पाठक को रसास्वादन कराती है। कालांतर में कविता का स्वरूप बदलता गया। अब तो कविता गद्य में भी लिखी जा रही है। छंद मुक्त लिखी जा रही है। लेकिन कविता का एक धर्म होता है और उस धर्म को कवि को निभाना होता है। अपने समय को गहराई से व्यक्त करना, समकालीन दुनिया के संकट के बारे में चिंतित होना, अभिव्यक्ति के संकट के इस दौर में कवि उन लोगों की वाणी बनते हैं जो बोल नहीं सकते। यही बात गद्य में भी लागू होती है। यहां प्रेमचंद की कहानी "दो बैलों की कथा" को याद किया जा सकता है। मराठी के कवि नामदेव ढसाल ने गोलपीठा पुस्तक में (वेश्याओं और उनकी बस्ती पर लिखा काव्य ग्रंथ) दबे कुचले पीड़ित मनुष्य के पक्ष में अपनी कविता में प्रतिबद्ध तरीके से आवाज उठाई। कविता में जो घटता है वह बाद में अवधारणा बन जाता है और गद्य में जो रचित होता है वह धरोहर हो जाता है। कविता कहीं से भी शुरू हो सकती है। एक बिंदु से, रूपक  से ,घटना से, बिंब से, प्रतीक से कवि के हृदय से गुजरकर कलम में उतरती है। कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का उत्तम साधन है। गद्य ठहरकर सोचने के लिए पाठकों के मन में सीधे उतर जाता है। लेकिन जमीनी सच्चाईयों से जुड़ा गद्य हो तब........क्षणिक मनोरंजन किसे याद रहता है।

डॉ.सत्यवीर सिंहः आज काव्य और कवि हाशिये पर है इसके जिम्मेदार कौन है। कौन सी शक्तियों का हाथ है।

संतोष श्रीवास्तवः 21वीं सदी का कविता संसार बहुत विस्तृत है। कवि और कविताओं की बाढ़ सी आ गई है। सुनने और पढ़ने से अधिक सुनाने और पढ़वाने की चिंता है। कवि स्वयं अपने प्रचार का माध्यम बनता जा रहा है। आत्ममुग्धता भी पराकाष्ठा पर है। यह सवाल केवल साहित्य से जुड़े लोगों में ही नहीं दिखाई देते बल्कि साधारण पाठक भी ऐसी चिंता जताते हैं। आप चाहे चौपाल में बैठे हो या कॉफी हाउस में या साहित्यिक समारोह में। निचोड़ यही उभरता कि हिंदी कविता के नाम पर जो कुछ लिखा जा रहा है उसकी भाषा शैली आखिर क्यों पाठकों तक नहीं पहुंच पा रही है। स्कूल और कॉलेज के दिनों में हमें कबीर का रहस्यवाद, तुलसीदास की अवधी, रीतिकाल की रचनाएँ जो समय बेहद कठिन लगती थी पर आज भी उनका प्रभाव हमारे जीवन पर है। उनमें से कुछ तो आज भी कण्ठस्थ हैं। पर आज की कविताएँ साहित्यिक समारोह से बाहर आते हैं हम भूल जाते हैं। क्या इसकी वजह उनका छंदात्मक नहीं होना है। या उसमें गेयता, पठनीयता, संगीतमयता, तारतम्यता, सुरुचि और रस ग्राह्यता नहीं है या कोई अन्य कारण है। लेकिन मुझे लगता है कि आज की कविता जो हाशिए पर नजर आती है उसका कारण है उसका आलोचना से दूर होना। कविता अब सिर्फ वाहवाही चाहती है। यही चाहत मारक है। वैसे भी नई पीढ़ी में विचारों का संकट है। कविता लिखते समय युवा पीढ़ी को टॉलस्टॉय याद आते हैं या गोर्की। किसी को केवल सामाजिक विसंगतियाँ ही नजर आती हैं। कोई सत्ता की धज्जियाँ उड़ाने में ही विश्वास रखता है। कोई मार्क्सवाद को अपने जीवन का आदर्श बना लेता है। कई अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाते। कवि ने स्वयं खुद को हाशिए पर ढकेला है और इस स्थिति से वह स्वयं ही उबर  सकता है।

सत्यवीर सिंहः काव्य प्रसारण में दृश्य श्रव्य माध्यमों की भूमिका पर आपके विचार।

संतोष श्रीवास्तवः आजकल यूट्यूब चैनलों की भरमार है जिससे नए-नए कवि अपनी कविताओं को स्वयं के वीडियो में प्रस्तुत कर लाइक, कमेंट और सब्सक्राइब की माँग करते हैं। अपने ही सृजन पर याचना की यह प्रवृत्ति से वह स्वयं तो पोषित होते हैं पर कविता पोषित नहीं होती। श्रव्य माध्यमों की बहुत बड़ी भूमिका है। अपनी कविता जन जन तक पहुँचाने का यह एक सशक्त माध्यम है। मीरा बाई, कबीर के समय कहाँ प्रेस थी पर उनकी बात श्रव्य माध्यम से ही हम तक पहुँची। इस दिशा में बुक्स इनवॉइस डॉट कॉम बेहतर काम कर रहा है। उनकी टीम लेखकों की पुस्तकों को अपनी आवाज दे रही है जिसे आप ऑनलाइन आराम से सुन सकते हैं। मेरी लगभग सभी कहानियों को इनवॉइस डॉट कॉम ने आवाज दी है। अब मेरे उपन्यासों पर काम चल रहा है जिससे वे पार्ट वाइज डब कर रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न संचार कंपनियां भी इस दिशा में कार्यरत हैं।

डॉ.सत्यवीर सिंहः आप नवीन जन माध्यमों पर निरंतर सक्रिय हैं इन माध्यमों पर प्रस्तुत कविताओं पर आपके विचार

संतोष श्रीवास्तवः यह जमाना डिजिटल और संचार माध्यमों का है और संचार क्रांति ने हिंदी साहित्य का वैश्विक रूप गढ़ने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। भाषाएँ संस्कृति की वाहक होती है और संचार माध्यमों जैसे ई पत्रिकाएं, विभिन्न साहित्यिक ऐप, ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर। इन पर प्रस्तुत किया गया साहित्य केवल क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। वह पूरे विश्व में पढ़ने के लिए सामग्री प्रस्तुत करता है। यही वजह है कि हिन्दी साहित्य प्रचुर रूप में लोगों तक पहुँच रहा है लेकिन इस साहित्य की गुणवत्ता में गिरावट आई है। कविता पर ही बात करें तो उसे  लिखकर जाँचे परखे बिना, प्रतिष्ठित कवियों का मार्गदर्शन लिए बिना तुरंत उसे प्रकाशित होने भेज देना और संपादकों की भी इस सामग्री के प्रति उदासीनता हल्की-फुल्की रचनाओं को पाठकों तक पहुँचा रही है। हमारे समय में संपादक रचना को पढ़कर स्वीकृति, अस्वीकृति, रचना में संशोधन की जानकारी देते थे। अब तो जो भेजा जाता है तुरंत स्वीकृत। हफ्ते भर में ई पत्रिका का पीडीएफ आपकी मेल पर और जब से कोरोना महामारी ने वैश्विक स्तर पर पांव पसारे हैं अपनी कविताओं को सुनाने के लिए कवि फेसबुक लाइव होते हैं। गूगल मीट पर आते हैं जबकि उन कविताओं में एकाद कवि ऐसा होगा जिसकी कविता असरदार हो। यूट्यूब चैनलों की भरमार, लाइक, सब्सक्राइब और कमेंट की अपेक्षा। श्रोताओं से एक सस्ता साहित्यिक बाजारवाद जन मानसिकता में घुसपैठ किये है। अपने प्रस्तुतीकरण की बड़ी-बड़ी न्यूज़ फोटो सहित समाचार पत्रों में कवि स्वयं ही भेजता है, छपता है खुश होता है। कविता पर यह बड़ा भारी संकट है।

सत्यवीर सिंहः ऑनलाइन पत्रिकाओं की आजकल भरमार है। क्या ई- जर्नल, प्रिंट पत्रिकाओं का विकल्प हो सकती है ? 

संतोष श्रीवास्तवः वैसे तो ई-जर्नल शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जर्नल ऑफ हिंदी रिसर्च पत्रिका का प्राइम फोकस हिंदी की पढ़ाई से संबंधित लेख प्रकाशित करने के लिए है। यह पत्रिका हिन्दी अनुसंधान में छात्रों और कर्मियों को प्रेरित करने के उद्देश्य से मंच प्रदान करता है। इसमें हिंदी साहित्य के महाकाव्य, व्याकरण, इतिहास, भारतीय सौंदर्य, धर्म, वैदिक अध्ययन, बौद्ध साहित्य, भारतीय और पश्चिमी तार्किक सिस्टम, भारतीय दर्शन, प्रवचन और ज्योतिष शास्त्र जैसे विषयों के जर्नल काफी लोकप्रिय हैं। ऑनलाइन पत्रिका चाहे जितनी भी संख्या में निकल रही हो पर प्रिंट मीडिया का अपना ही वर्चस्व है। इसकी जगह कभी ई पत्रिका नहीं ले सकती। हालांकि ई पत्रिकाओं में काफी काम हो रहा है पर उसे लंबे समय तक कहां सुरक्षित रखा जा सकता है इस बात पर भी विचार करना होगा।


सत्यवीर सिंहः आप स्वयं काफी पुरस्कारों से सम्मानित हैं और अपने पुत्र की स्मृति में कविता सम्मान प्रदान करती है।  क्या पुरस्कार लेखक की श्रेष्ठता का प्रमाण है - 

संतोष श्रीवास्तवः पुरस्कार लेखक की श्रेष्ठता का प्रमाण है ऐसा मैं नहीं मानती। आजकल पुरस्कारों की पारदर्शिता पर वैसे भी सवाल उठ रहे हैं। एक लेखक जिसे हम जानते तक नहीं अपने 50 वर्ष के जीवन काल में 100 किताबें लिख लेता है और कोई एक संस्था उसे मूर्धन्य साहित्यकारों के नाम के पुरस्कार प्रदान कर देती है। पुरस्कार रेवड़ियों की तरह बांटे जा रहे हैं । कुछ तो प्रायोजित भी होते हैं। अपने कवि पुत्र 23 वर्षीय हेमंत की स्मृति में प्रतिवर्ष हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार के आयोजन में मैंने इन स्थितियों को बारीकी से जाना समझा। हेमंत स्मृति कविता सम्मान अपनी पारदर्शिता की वजह से ही राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार माना जाता है। उसे राष्ट्रीय स्तर का दर्जा प्रसिद्ध आलोचक कवि डॉ नामवर सिंह ने ही दिया है।
अगर मैं खुद की बात करूं तो इतने सारे राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार पाकर मैं जितनी आनंदित हूँ उतनी ही सचेत भी कि कहीं ऐसा न हो कि अब जो मेरी रचना आए वह पाठकों की दृष्टि में कमजोर साबित हो। तो पूरी लगन से जुटी रहती हूँ। मेरे लेखन के लिए पुरस्कार हमेशा चुनौती रहे हैं।

सत्यवीर सिंहः आपने तो विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है और वहाँ से सम्मान भी प्राप्त है विश्व में हिंदी की वास्तविक स्थिति कैसी है- 

संतोष श्रीवास्तवः जी, डॉ.सत्यवीर सिंह जी मैंने 26 देशों की यात्रा की है। लेकिन 22 देशों की यात्रा मैंने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई द्वारा स्थापित संस्था अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार मित्रता संघ की ओर से की जिसकी मैं सन 2000 से 2010 तक मनोनीत सदस्य थी। यह संस्था भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य करती है। मेरी पहली यात्रा जर्मनी की थी जहाँ हाइडल बर्ग यूनिवर्सिटी में विद्यार्थियों के लिए कार्यशाला आयोजित की। उपहार स्वरूप हम अपने साथ पौराणिक ग्रंथ और सरस्वती की कांस्य प्रतिमा ले गए थे लेकिन मैं यह देखकर दंग रह गई कि वहां वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य, सूर, तुलसी, मीरा, जायसी पहले से ही पुस्तकों में उपलब्ध हैं। हिंदी संस्कृत के इंस्टीट्यूट डिपार्टमेंट भी हैं और उन्हें पढ़ाने वाले जर्मन प्रोफेसर भी हैं। जर्मनी विद्वानों को लेकर ही भारत के साथ एक सूत्र में बंधा है। संस्कृत साहित्य में छिपी हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति को विश्व मंच पर लाने का श्रेय जर्मन विद्वानों को ही है। मैं जिन देशों में गई जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, दुबई, उज़्बेकिस्तान, थाईलैंड आदि देशों में मैंने वहाँ हिंदी नाटकों के मंचन का अद्भुत कार्य देखा। रामलीला तो वहाँ हर साल खेली जाती है साथ ही शकुंतला, दुष्यंत, विश्वामित्र, मेनका, गौतम, अहिल्या आदि नाटक भी हिंदी संवादों सहित खेले जाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में वहाँ की नाटक मंडली ने 100 साल के भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई इतिहास को  मंचित किया। एक महीने तक प्रतिदिन इसके शो होते रहे। मैंने सिडनी में नाडिया के जीवन पर आधारित नाटक भी देखा। जिसमें अमेरिका और मॉरिशस से भी लेखक शामिल हुए थे। नाडिया ऑस्ट्रेलिया में जन्मी भारतीय हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री थी जिसने हिंदी फिल्म निर्देशक होमी वाडिया से बहुचर्चित इश्क किया और उनसे शादी कर मुंबई में जा बसी और होमी वाडिया के प्रोडक्शन तले फिल्मों में अभिनय किया। उनकी फिल्म हंटरवाली आज तक लोगों के जहन में जिंदा है।
 इटली के रोमा खुद को भगवान राम की संतान मानते हैं और राम सीता के उपासक हैं। रामचरितमानस की चौपाइयां उन्हें कंठस्थ हैं। इसी तरह इंग्लैंड और अमेरिका से कृष्ण भक्ति धारा इस्कॉन के जरिए विश्व के कई देशों तक पहुँची। इस्कॉन की पूरे विश्व में 450 शाखाएँ हैं और अमेरिका में लॉस एंजेल्स के पास पूरा वृंदावन ही बसाया गया है। कई देशों में उनके मंदिर उनके अनुयाई भजन रथयात्रा सड़कों पर हरि कीर्तन करते ढोल मजीरे बजाते भक्तगण दिखाई देते हैं। कहना न होगा कि कृष्ण ने सरहदें मिटाने में बड़ी भूमिका अदा की है।
 पूरे विश्व के अधिकतर देशों में छोटा भारत बसता है और इसका श्रेय प्रवासी लेखकों को ही मिलना चाहिए। उन्होंने साहित्य नाटक धर्म संस्कृति पर जमकर कलम चलाई है और विदेशियों को भारत की महानता से परिचित कराया है। वह प्रवासी लेखक ही हैं जिन्होंने भारत के लज़ीज़ भोजन की पहचान अपने साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल होने वाले विदेशी मेहमानों को कराई। अब तो आलम यह है कि भारत के हर प्रदेश का भोजन वहाँ पसंद किया जाता है और भारतीय रेस्त्रां में टेबल की बुकिंग एडवांस में करानी पड़ती है। 
जापान में रहने वाले प्रवासी साहित्यकार जापानियों द्वारा बेहद पसंद किए जाते हैं। उनके साहित्य में जापानियों को जिस भारत के दर्शन होते हैं उसे उन्होंने विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सम्मिलित किया है। विश्वविद्यालयों में संस्कृति दिवस मनाते हैं। इस दिन जापानी लड़कियां साड़ी पहनकर विश्वविद्यालय आती है और कैंपस में भारतीय पकवानों के जगह जगह स्टाल लगाए जाते हैं। भारतीय संगीत नाटक आदि के शो करके मानो भारत को जापान में जीवंत कर देते हैं। वहाँ हिन्दी साहित्य, पंचतंत्र, महाभारत खूब प्रचलित है और उनका जापानी भाषा में अनुवाद भी हुआ है। 
लंदन में जितना अधिक साहित्य लिखा जा रहा है उतनी ही तेजी से साहित्यिक संस्थाएं भी स्थापित हो रही है। पुरस्कार आयोजित किए जा रहे हैं। खासकर भारत से जब कोई साहित्यकार वहाँ पहुंचता है तो उसके सम्मान में इन संस्थाओं द्वारा आयोजन किए जाते हैं। यह स्थिति कमोबेश हर जगह मौजूद है। 
मॉरीशस में हिन्दी साहित्य संचार माध्यम और प्रवासी लेखकों द्वारा पूरी शान से प्रतिष्ठित है।
 हालैंड यानी नीदरलैंड में हिंदू ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन ओहम है जिसके  रेडियो टेलीविजन नेटवर्क और पत्रिकाएँ प्रकाशित प्रसारित होती हैं। ओहम डच सरकार का मीडिया है जो हिंदी भाषा साहित्य और रचनाकारों पर फिल्में बना रहा है। मेरी रचना भी ओहम से प्रसारित की गई ।
फीजी में खूबसूरत हरे-भरे जंगल में पौधों के नाम भी भारतीय हैं। तुलसी, चंदन, आम, नींबू, इमली, सिरसा बेल, अमरुद साथ में सब्जियों के नाम भी भारतीय यानी की गली कूचे, बाजारों में हिंदी की धारा बही चली जा रही है। 
बलगारिया के बलगारीय अध्ययन के भारतीय केंद्र के द्वारा हिंदी को नई दिशा गति मिल रही है। बौद्ध धर्म दर्शन से प्रभावित बल्गारिया भारतीय भाषाओ और साहित्य इतिहास और संस्कृति के प्रति गहरी रुचि रखता है। वहाँ संस्कृत और हिंदी दोनों के अध्ययन केंद्र हैं।
 यह युग कंप्यूटर का युग है। कंप्यूटर के क्षेत्र में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ भाषाई दीवार को कब का लांघ चुकी है। हिन्दी ने विश्व स्तर पर जो अपना मुकाम बनाया है वह हमें गौरवान्वित करता है।

सत्यवीर सिंहः नवोदित नवांकुर लेखकों, कवियों को आपका संदेश

संतोष श्रीवास्तवः मेरी संस्था अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच साहित्य की विभिन्न विधाओं तथा नाटक और चित्रकला में योग्यता रखने वाले नवांकुरों को मंच प्रदान करती है। हम ऐसी प्रतिभाओं को जिन्हें न तो उभरने का माहौल मिला और न ही उनके पास आगे आने का कोई साधन है तलाशते हैं। एक तरह का टैलेंट हंटिंग का काम करते हैं। जिन नवांकुरों को हमने सपोर्ट दिया वे आज पुष्पित, पल्लवित होकर छतनारा वृक्ष बन चुके हैं। नई पीढ़ी में उत्साह बहुत है। वह कल्पना में नहीं जीता यथार्थ में और वर्तमान में जीता है। मेरा उनसे यही आग्रह है कि वह अपने इन गुणों में धैर्य और जोड़ लें। पहली सीढ़ी से अंतिम सीढ़ी पर छलांग न लगाएं। खुद को खंगाले। जितना खुद लिखें उससे दुगना पढ़ें। पढ़ने से ही लेखनी में निखार और प्रौढ़ता आती है।


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