उजाला आता है: क्षितिज जैन "अनघ"

क्षितिज जैन "अनघ"
उजाड़ उदास-से तरुओं पर भी 
फिर ऋतुराज का रूप छाता है 
नभ सा ही क्यों न गहरा जाये  
अंधेरा छँटता उजाला आता है।
       जीवन वृत्त के नियम सबपर 
       रहती सर्वदा ये काली रात नहीं  
       पथ पर पुष्प भी हाथ लगते हैं  
       होता बस काँटों का घात नहीं।
नहीं मन में रोदन किया करती
व्यथाओं या संतापों की कहानी 
कभी कभार हर्ष भी बहता दिखे 
बन नयनों से झरता खारा पानी।
        निर्भाव को भाव समझ बैठे होठ
        तरल होकर फिर से मुस्कराते हैं 
        कुम्भ हो या हो हृदय के सपने
        यदि टूटते, हम दुबारा बनाते  हैं।
जहाँ कल था यादों का मलबा पड़ा
आज वहाँ निर्माण दिखता जाता है
नभ सा ही क्यों न गहरा जाये
अंधेरा छँटता, उजाला आता है।
           कल कानन में बवंडर आया था 
           पर आज खगों का कलरव कैसा?
           शोक की छाया काँपती थी जहाँ
           वहीं यह बालकों का उपद्रव कैसा?
भूमि खुद ही उर्वरा बन जाती 
जब पुरुषार्थ के हल चलते  हैं
कल तक चुभने वाले ये कंकर
आज अंकुर होकर निकलते हैं।
           माना अवसर पाते ही कायर तम
           दृगों के सम्मुख व्यापा, छा गया
           तब भी भय नहीं खाया मानव ने  
           जो ढूंढ दीपक, बाती जला गया।
संसार भर के विवेकी जन हमें 
समय का उपदेश बहुत देते हैं 
एक न एक दिन बदल जाएगा  
यही सोचकर नैया हम खेते हैं।
           सुदिन यदि नश्वर, तो दुष्काल भी 
           अमरत्व से रहा किसका नाता है? 
           नभ सा ही क्यों न गहरा जाये
           अंधेरा छँटता, उजाला आता  है।

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