परिहास: छिपकली

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

लोग हमें मक्खीमार कहते हैं। इसलिए नहीं कि हम निठल्ले हैं। बल्कि इसलिए कि मक्खी मारने में हमें महारत हासिल है।
मक्खी मारना हमने बचपन में ही शुरू कर दिया था। गाँव की गंदगी के बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। गाँव होते ही गंदे हैं। अब गंदगी में मक्खी-मच्छर नहीं पैदा होंगे तो और क्या होगा? मच्छर का आकार बहुत छोटा होता है। सिर्फ हाथों के सहारे उसे मारना मुश्किल पड़ता है। हालाँकि इसमें भी, किसी हद तक, कामयाब हुए हैं हम। लेकिन जिसे हमने कला के स्तर तक पहुँचाया वो है मक्खी का शिकार।
अमरीकियों के पास बेइंतहा दौलत है। यह दौलत ही उनकी परेशानी का सबब है। वो परेशान हैं कि इस दौलत का करें तो क्या करें। इसके लिए उन्हें अजीबोगरीब किस्म की हरकतें करनी पड़ती हैं। अमरीकी समुद्र में पानी के नीचे शादी कर लेते हैं और हवा में लटकते हुए भी। छत में रस्सी बांध कर नहीं बल्कि खुले आसमान में पैराशूट से कूद के। हिन्दुस्तानी बेचारे इस उधेड़बुन में ही दुनिया से कूच कर जाते हैं कि पानी के नीचे अग्निदेव को कैसे आमन्त्रित करें और आसमान में अगर किसी तरह हवन-कुंड टांग भी लिया तो वर-कन्या उसके फेरे किस प्रकार लगाएंगे?
रिसर्च में भी बहुत पैसा लगाते हैं ये अमरीकी। अच्छी बात है। रिसर्च करके ही तो चाँद तक पहुँच पाए। कुछ सिरफिरे ऐसे भी हैं जो सिर्फ रिसर्च करने के लिए रिसर्च करते हैं। रिसर्च के लिए विषयों की कमी है क्या? मछली पानी में तैरती है तो भला क्यों? रिसर्च करनी पड़ेगी। कुत्ता भूँकता है तो क्यों? रिसर्च करनी पड़ेगी। एक सज्जन ने मक्खी पर रिसर्च करके यह महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की कि मक्खी जब उड़ती है तो, जितनी देर आपको ताली बजाने में लगती है, उतनी देर में वो दो इंच अपने सामने बाँई तरफ उड़ती हुई चार इंच ऊपर उठ जाती है। इसलिए मक्खी को अगर बिल्कुल ऊपर पहुंचाना है तो उसके चार इंच ऊपर दो इंच बाँई तरफ ताली बजाईये। कामयाबी शर्तिया मिलेगी। यह पूछने पर कि फुटा लाकर पैमाइश करने तक मक्खी अपनी जगह बैठी रहेगी या नहीं, वो बगलें झाँकने लगे।
हमने जब अपना मक्खीमार करिअर लॉन्च किया था तब यह खोजकर्ता पैदा नहीं हो पाए थे। इसलिए उनकी रिसर्च का लाभ उठाने से वंचित रह जाने के बावजूद हमने मक्खी मारने में वो ऊँचाइयाँ हासिल कीं कि क्या बतायें। हमें फख्र है कि एक बार जब हमने आलपिन को भाले की तरह मक्खी के सीने के पार किया तो तालियों की गड़गड़ाहट से हम बहरे होते-होते बचे।
माँ कहा करती थीं कि जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। यह शास्वत सत्य है। पर एक शास्वत सत्य यह भी है कि प्राणी जन्म लेते ही सीखना शुरू करता है और हर क्षण कुछ न कुछ सीखते हुए आखिरी साँस तक सीखता रहता है। यह कहना भी ग़लत नहीं है कि सीखा हुआ ज़िंदगी में कहीं न कहीं काम ज़रूर आता है।
बूढ़े हो चले हैं। एक पैर कब्र के करीब पहुँच चुका है। लेकिन शिकार करना अब तक जारी है। जाली के दरवाजों की वजह से मक्खी अब घर में घुस नहीं पातीं तो क्या हुआ? छिपकली तो कहीं न कहीं से अंदर आ ही जाती है। मक्खी के शिकार में जो दाँवपेंच सीखे थे वो छिपकली के शिकार में काम आए।
छिपकली का शिकार शुरू करवाने का श्रेय श्रीमती जी को जाता है। शादी के बाद हम दोनों शहर आए जहाँ हम मुलाजिम थे। घर में जैसे ही दाखिल हुए श्रीमती जी अचानक पलटीं और हमसे लिपट गईं। हम बागबाग हो गए। इससे पहले कि हम पकड़ मजबूत करें श्रीमती जी ने दायें हाथ की उंगली से पीछे दीवार की तरफ इशारा किया जहाँ एक छिपकली अपने शिकार पर घात लगाए बैठी थी। अगर आपकी जान आपके सीने में मुंह छुपा कर सुबकियाँ लेते हुए बताए कि छिपकली दूर भी बैठी हो तो उसकी जान निकल जाती है, तो क्या आप बर्दाश्त कर पाएंगे? हम भी नहीं कर पाए। हौले से अपनी जान को सीने से अलग किया, पास पड़ा अखबार उठाया, उसे एक मुगदर की शक्ल दी और छिपकली की जान के पीछे पड़ गए। हमारी हिम्मत बढ़ाने के लिए श्रीमती जी बराबर नारे लगाती रहीं, ‘वो उस कोने में चली गई, वहाँ परदे के पीछे, वो रोशनदान के पास देखिए’। हमें पसीने में लथपथ हाँफते देख श्रीमती जी ने एक गहरी लंबी साँस ली और उदास स्वर में बोलीं, ‘रहने दीजिए, आप से न हो पाएगा।‘ अब हम रहने कैसे देते? हम जैसे अनुभवी शिकारी की ऐसी बेइज्ज़ती! हम दोगुने जोश से शिकार में लग गए। छिपकली की माँ कब तक खैर मनाती? अब अधिक देर नहीं लगी हमें छिपकली को धराशाई करने में। जीत का सेहरा पहन हम श्रीमती जी से मुखातिब हुए तो उनकी आँखों में वो चमक दिखाई दी जो, बाद में, सलमान खान की जवानी के दिनों में लड़कियाँ उसके लिए रिज़र्व रखती थीं। अरे, इस चमक के लिए हम घर को एक बार नहीं, हज़ार बार खुशी-खुशी तहस नहस कर सकते थे।
वो दिन है और आज का दिन। पैंतालीस साल। खुदा झूठ न बुलवाए, कम से कम पाँच हज़ार छिपकलियाँ शहादत पा चुकी हैं हमारे हाथों। अगर शेर के सिरों की तरह छिपकली के सिर दीवार पर सजाने का रिवाज़ होता तो दीवारें कम पड़ जातीं हमारे घर की।
अब लगने लगा है कि ज्यादा हो गया। हाथ, पैर और आँखें शिथिल हो गए हैं। तहस नहस घर को दोबारा सेट करने में साँस फूलने लगा है। मन तो है कि साफ-साफ कह दें श्रीमती जी से कि अब ये हमारे बूते का नहीं रहा। पर कह नहीं पाते।
पैंतालीस साल के विवाहित जीवन में अधिकतर हम दोनों अकेले ही रहे हैं। कुछ समय तक बच्चे साथ थे। फिर वो पहले होस्टलों में और बाद में नौकरी के चक्कर में बाहर चले गए। अकेले रह गए हम पति-पत्नी। उस अकेले रहने में और कमबख्त लॉकडाउन में अकेले रहने में बड़ा फर्क है। दो महीने से ऊपर होने को आए, श्रीमती जी के अलावा किसी और की शक्ल देखने को नहीं मिली। उनकी आँखों में अब वो वाली चमक नहीं थी, छोटी-छोटी बातों पे झगड़ा होने लगा। आज के झगड़े में तो तैश में हमने कह ही दिया, “तलाक क्यों नहीं दे देतीं हमें?”
“फिर छिपकली कौन मारेगा?” कहते हुए श्रीमती जी की आँखों में वह सलमान खान वाली चमक थी।

1 comment :

  1. Very well written Jeej so familiar with your Makhi mar you are really good at it even chipkali marna you have mastered. Very interestingly narrated

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