काव्य: आयशा हलीम

आयशा हलीम

कहने से नहीं होगा कुछ करके भी दिखाओ


जो गूंधें आटा हम तो रोटी तुम भी बनाओ,
कभी हम देर  से उठे तो चाय तुम भी ले आओ,
औरत आदमी छोड़ो कभी इन्सान बन जाओ,
जो कम हो नमक खाने मे तो हँस के टाल जाओ,
मेरे नखरे न सही तो मेरे ऊपर सवाल भी न उठाओ,
कहने से नहीं होगा कुछ करके भी दिखाओ,

अपनी डिग्रियाँ गिनाते हो
कभी मेरे शौक भी पूछो,
बहुत बातें नहीं कही कभी उन्हें भी बूझो,
तोहफे की ख्वाइश नहीं है,
बस मुस्कुराते हुए घर आओ,
अपनी थकान बताते हो,
कभी मेरी दिक्कतों से बतियाओ,
कहने से नहीं होगा कुछ करके भी दिखाओ,

सफाई पर सवाल न उठाते हुए...
कभी झाडू तुम भी उठाओ,
अपना लैपटॉप तो सलीके से रखते हो,
कभी मेरी डायरी से धूल हटाओ,
हम तुम्हारा नाम नहीं लेते...
तो तुम मेरा नाम भी न चिल्लाओ,
गर हम "आप" कहते हैं,
तो थोड़ी तमीज़ तुम भी दिखाओ,
कहने से नहीं होगा कुछ करके भी दिखाओ,

कभी अखबार हमें थमा के पहले,
बच्चे तुम भी बहलाओ,
हमारी मदद नहीं तो...
कुछ बाते करने किचन में आओ,
पसीने पर लटकती ज़ुलफो
को कभी प्यार से पीछे हटाओ,
हम घिसें जब तक बर्तन,
कपड़े तुम भी तहाओ,
कहने से नहीं होगा कुछ करके भी दिखाओ,

कमरे में जिन कपड़ों पर सिलवटें लाते हो,
कभी उनमे इस्त्री भी करो,
जिस जिस्म से खेल जाते हो,
कभी उसके ज़ख्म भी भरो,
जिन ज़ुल्फों को खींचते हो,
कभी उनकी चोटी भी बनाओ,
कहने से नहीं होगा कुछ करके भी दिखाओ।


1 comment :

  1. वाह, सरल शब्दोंमे अति सुन्दर अभिव्यक्त 🙏

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