आधुनिक बदलते भाव-बोध की कहानियाँ: जापानी सराय

भावना मासीवाल

- भावना मासीवाल

पीएचडी हिंदी (तु.सा.), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
ईमेल: bhawnasakura@gmail.com;  चलभाष: +91 844 710 5405

जापानी सराय अनुकृति उपाध्याय का पहला कहानी संग्रह है। यह संग्रह अपने कथानक और कथ्य की दृष्टि से नए कथा संसार के दरवाजे पाठकों के लिए खोलता है। पाठक इस दरवाजे से कथा में प्रवेश करते हुए नए बिंबों व प्रतीकों से मिलते हैं। यह बिंब व प्रतीक आम आदमी की जिंदगी के बिंब है जिनसे वह या तो घृणा करता है या उनसे डरता है। परंतु लेखिका इन डरावने व घिनौने कहे जाने वाले प्रतीकों से प्रेम करती है और अपनी कथा-कल्पना का हिस्सा बनाती है। वह अंजान डर, एकाकीपन, संबंधों की नीरसता में जीवन को पुन: खोजने और उसे अपनी तरह से जीने की ओर बढ़ती है। आज के पूंजीवादी समय में पूंजी तो है मगर मानवीय संबंध नहीं है। आदमी एकाकी जीवन जी रहा है। उसका एकाकी जीवन एक ओर उसके आत्म की तलाश है तो दूसरी ओर संबंधों में प्रेम, साहचर्य, सहभाव जैसे मानवीय संबंधों के खत्म होने की झटपटाहट है। इन संबंधों में पति-पत्नी संबंधों की नीरसता, साहचर्य, अपनत्व का अभाव एक उम्र के बाद पुन: साहचर्य की तलाश को जन्म देता है जहाँ मनुष्य अपने भीतर के उद्गारों को मिल बाँट सके। 

कहानी का संसार कल्पना और यथार्थ के महीन तंतुओं से मिलकर बनता है। इनका गलत तालमेल कहानी के भाव-बोध और उसकी पाठकीयता को प्रभावित करता है। अनुकृति उपाध्याय की कहानियाँ इस पाठकीयता को बनाये रखती है। उनकी कहानियाँ समान रूप से जापान और भारतीय परिवेश में दखल करती है जिसे कहानियों के शीर्षक, पात्र व परिवेश में सहजता से देखा जा सकता है। वैसे भी व्यक्ति जिस परिवेश में जीता है उसका परिवेश उसका सहभोक्ता होता है। लेखिका काल्पनिक पात्रों के माध्यम से स्वयं ही अपनी कहानी के यथार्थ में मौजूद है। कहानी की खुद से संवाद करने की शैली, तो कहीं लेखिका का स्वयं कथावाचक की भूमिका में कहानी के पात्रों को आगे बढ़ाने की कला, कहानी में उनके होने के बोध को पुख्ता करता है। उनकी कहानी के अधिकांश पात्र स्वयं से ही संवाद करते देखे जाते हैं। कहानी के पात्रों का खुद से संवाद भाषिक शैली के साथ ही उनके परिवेश के एकाकीपन, अजनबीपन और आत्म से साक्षात्कार करने के भावबोध को भी दिखाता है। जहाँ विदेशों में रह रहे लोग नौकरी व अपनी पहचान बनाने के लिए घर-परिवार से दूर है। एक तयशुदा जिंदगी में बंधे है। यहाँ संबंध बनते और टूटते हैं परंतु उसकी आहट और चोट व्यक्ति तक केंद्रित हो जाती है। यहाँ संबंधों में सहजता से अधिक व्यवहारिकता का भाव-बोध है। मानवीयता से अधिक मशीनी होने का बोध है। संबंध भी नौकरी की समय सीमा में बंधे है और व्यक्ति इस नियत समय से बाहर एकदम अकेला है। ‘जापानी सराय’ इसी आधुनिक भाव बोध में मनुष्य के हृदय हीन होते जाने की कहानी है। जहाँ बुद्धि की प्रबलता उसे देश और विदेश की यात्राएँ कराती है परंतु इन यात्राओं में हृदयपक्ष उसे कहीं नहीं  मिलता है। 

‘जापानी सराय’ कहानी दो अजनबियों के जिंदगी के एकांकीपन को बाँटती है। एक जिंदगी में जीने की कला सीख गया और दूसरी अभी रफ़्तार और यंत्रवत जिंदगी से जीने की कला से अंजान है जिसे साथी अजनबी जीवन का मंत्र देता है “सुन्न पड़ना स्वस्थ होना नहीं है”। यहाँ सुन्न होना जीवन की ख़ामोशी और व्यक्ति का एकांकी होना है। यह आज के मानवीय संबंधों का यथार्थ है जहाँ मनुष्य, मनुष्य से अधिक यंत्रों के अधीन हो गया है। और आपसी संबंध ‘चुप्पी’ के संशय में आत्मकेंद्रित होकर अपनी ही दुनिया में सिमट गए हैं। अब इस दुनिया का आदमी दिमाग और दिल से लेस नहीं है बल्कि लेखिका के शब्दों में “कड़ियल टांगो और जबड़ों और खोलो से लेस है।” जो कि व्यक्ति का आत्मकेंद्रित होना है। यहाँ आत्मकेंद्रित होना ‘स्व’ की पहचान नहीं है बल्कि मनुष्य का संवेदनहीन होना है।

जापानी पृष्ठभूमि में टोक्यो के बसंत और उस बसंत में प्रेम व प्रतीकात्मक अपनत्व की तलाश करती स्त्री की कहानी है-‘चैरी ब्लॉसम’। कहानी का शीर्षक प्रतीकात्मक रूप से प्रकृति के सौंदर्य व उसमें प्रेम को प्रदर्शित करता है। जहाँ एक ओर पूंजीवाद ने पैसा दिया मगर संबंधों को पूंजी की चपेट में खत्म कर दिया। केवल भारत में ही नहीं वैश्विक स्तर पर आज पूंजी का वर्चस्व है और मानवीय प्रेमपूर्ण संबंध आज भी गरीबी व तंगहाली का हिस्सा बनकर घूम रहे हैं। इसी में मनुष्य प्रकृति के सानिध्य में स्व, प्रेम व अपनत्व की तलाश कर रहा है। ख़ुद से बाते कर रहा है क्योंकि उसके पास उसके दुःख-सुख को बाटने वाला कोई नहीं है। “अपने-आप से बाते करने में बुराई ही क्या है? आपकी बात अपने से ही कह सुन पाना जरूरी है, बेहद जरूरी”। व्यक्ति का अकेला होना एक ओर उसके आत्म की पहचान व तलाश के प्रश्न को उठाता है दूसरा उसके निजी अकेलेपन के भाव-बोध को। ‘रेस्टरूम’ कहानी भी इसी एकाकीपन, अमानवीय व आभासी होती दुनिया की कहानी है। जहाँ जीवित दुनिया पूरी तरह आभासी दुनिया में बदल रही है। आज के इस यंत्रवत समाज में दुःख, पीड़ा सब सहभाव होकर बांटे नहीं जाते बल्कि सोशल मीडिया का हिस्सा बन गए है। “इसे सभी आंतरिक घुमड़ते जिन्हें बाँटना कठिन हो, चतुर शब्दों में ढाँप कर ट्विटर पर परोस दो एक निरंतर-गतिमान, बेहद, अशांत, यहाँ से वहां बेमतलब हिचकोले लेती दुनिया के सामने। इस आशा से कि शायद कोई फिल्म स्टारों और बिल्लियों और युद्धों के बेघर हुए लोगों की तस्वीरों, अर्नगल और लगातार शब्दों के रेले के बीच देखले, देख ले और देखकर कंधे उचकर दे, आँखे नचा दे, सर हिला दे। दुनिया इसे ही कंधे उचकाते, आँखे नचाते, सर हिलाते अजनबियों से भरी है, उसने सोचा। कहना-सुनना बाँटना कहा होता है?” आभासी दुनिया का बढ़ता प्रभाव मानवीय जीवन उसके संबंधो उसके भावों को भी आभासी बनाता जा रहा है। व्यक्ति का आभासी जीवन उसके चेहरे पर नकाब की तरह है। जिसके बाहर तो वह अतिसंवेदनशील है परंतु भीतर से सामने पड़ने पर वही संवेदना आँसुओं को देखकर भी आगे बढ़ जाती है। आत्मकेंद्रित आभासी जीवन में सभी व्यस्त है “कोई किसी की ओर नहीं देखता कि न जाने आँखों में क्या दिख जाए, कौन से संक्रमण आँखों से लपककर दृष्टि से दबोच ले।” मशीनी युग में संवेदनाएँ भी संक्रमण में तब्दील हो रही है। ‘रेस्टरूम’ कहानी इसी आधुनिक जीवन व मशीनी होते आत्मकेंद्रित व्यक्तिक भाव बोध पर केंद्रित है। 

इस कहानी संग्रह की ‘शावर्मा’ और ‘हरसिंगार के फूल’ कहानी पति-पत्नी संबंधों में प्रेम के ठंडेपन और ऊबासी और संबंधों की उकताहट पर केंद्रित है। जहाँ संबंधों में प्रेम और साहचर्य का पूर्णत: अभाव है। संबंध मुखौटो के भीतर दम तोड़ रहे हैं और नए मुखौटो के साथ नए संबंध गढ़ रहे हैं, इस दौर में व्यक्ति भीतर के खालीपन, एकांकीपन को दबाए घूम रहा है। ‘शावर्मा’,‘हर सिंगार के फूल’ इसी खालीपन व एकांकीपन की टकराहट व साहचर्य की तलाश का प्रतीकात्मक रूप है। कहानी की पात्र मौत के करीब पहुँचकर भी जापानी व्यंजन ‘शा वर्मा’ को न खा पाने के अफ़सोस से डर जाती है। यह ‘शावर्मा’ केवल जापानी भोज्य पदार्थ मात्र नहीं है बल्कि स्त्री जीवन में प्रेम की अतृप्ति व उसे पूर्ण करने की लालसा के रूप में लक्षित होती है। इस तृप्ति के अहसास को मृत्यु भी डरा नहीं पाती है। इसी प्रकार ‘हरसिंगार का फूल’ कहानी भी मोना और विश्वा के माध्यम से सामाजिक रूप से वैवाहिक जीवन में सफल परंतु भीतर से अतृप्त लालसाओं की पूर्ति के लिए जीती स्त्री की कथा है जो मृत्यु की छाया में भी प्रेम की अतृप्त लालसाओं को तृप्त करती देखी जाती है। कहानी ‘हरसिंगार के फूल’ व्यक्ति मन में प्रेम एकांकीपन व उससे उपजी असंतुष्ट,अतृप्ता के भाव को उजागर करती है। ‘शावर्मा’ और ‘हरसिंगार के फूल’ दोनों ही कहानियाँ वैवाहिक संबंधों से इत्तर स्त्री-पुरुष के सहभाव के संबंधों की तलाश की कहानी है। लेखिका इन कहानियों में स्त्री मन की अतृप्त इच्छाओं, स्त्री का भी परिवार से अधिक स्वंतत्र व्यक्तित्व है और वह भी साहचर्य के भाव के साथ जीती है को बहुत ही स्पष्टता के साथ इन कहानियों में उकेरती हैं। इनकी कहानियों में विवाह, प्रेम से अधिक सामाजिक जिम्मेंदारी के भाव-बोध के साथ उभरता है।  

अनुकृति उपाध्याय की ‘प्रेजेंटेशन’ कहानी परिवार, पति-पत्नी संबंधों के बीच स्त्री का अपने सपनों को उड़ान देने की कहानी है। इस उड़ान को कई तूफानों से गुजरना पड़ता है। परिवार में माता-पिता लड़कियों को शिक्षित तो करना चाहते हैं मगर शिक्षा का उद्देश्य विवाह के लिए अच्छे वर और सामाजिक पहचान सुनिश्चित करने से इत्तर कोई महत्व नहीं रखता है। सपनों को माता-पिता पहले विवाह के बंधन में बांधते है और फिर पति, परिवार और उसकी जिम्मेदारियों में। ‘प्रेजेंटेशन’ कहानी की पात्र मीरा आधुनिक पढ़ी-लिखी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है। जो पेशे से इंजीनियर है, टॉपर है, कॉलेज सलेक्शन उसे विदेश से नौकरी देता है मगर परिवार, आस-पडोस के लिए उसकी उम्र का बढ़ना और विवाह, चिंता का विषय है। मीरा के सपने विवाह में दबा दिए जाते हैं। पिता और पति की जिम्मेदारियों में उसका दबा व्यक्तित्व नौकरी में खुद को जीवित करता है। मीरा संबंधों के प्रति ईमानदार है परंतु संबंध उसे घर की चारदीवारी में रखना चाहते है। कर्तव्यों और दायित्वों से लादना चाहते है। इसी परिवार के रुढ़िवादी माहौल में दीपू जैसा पात्र भी है जो किशोरावस्था में है और अपनी शारीरिक बनावट और जरूरत के प्रति सजग है। उसकी यही सजगता उसे अपनी मामी मीरा के साथ जबरन संबंध बनाने से भी भयभीत नहीं करती है। “दीपू की बाँह मीरा की कमर के गिर्द थी और उसकी  गहरी साँसें मीरा के कानों में। एक हाथ में थाल थामे मीरा ने दूसरे हाथ से दीपू को धकेलने की कोशिश की। ‘मामी’ दीपू फुसफुसाया, मामी, प्लीज...’ मीरा सिर से पाँव तक काँप गई। हाथ की थाल तीखी खनखनाहट के साथ नीचे गिर गए। दीपू चौंक कर कमरे के बाहर हो गया”। मीरा परिवार के भीतर ही यौन शोषण से गुजरती है। परंतु बोल नहीं सकती है। वह किशोरावस्था के दीपू की मानसिक स्थिति को समझ जाती है जो उसके अपने परिवेश से उपजी है। जहाँ बच्चों को सेक्स और जेंडर के बारे नहीं बताया जाता है और वह चोरी-चुपके से अश्लील फिल्मों व वीडियों व गलत लोगों की संगत में किशोरावस्था में इस तरह के ज्ञान को आर्जित करता है। इस प्रकार प्रेजेंटेशन कहानी एक ओर विवाहित स्त्री का परंपरा, आधुनिकता व रूढ़ियों की टकराहट से खुद को पाने का संघर्ष है तो दूसरी ओर किशोरावस्था के युवाओं की बलात्कार, यौन शोषण जैसे अपराधों में बढ़ती मनोवृति को भी कहानी दीपू के माध्यम से इंगित करती है।    

अनुकृति उपाध्याय की कहानियों में ‘इंसेक्टा’ कहानी कथ्य के स्तर पर एक बेहतरीन कहानी के रूप में उभरती है। यह कहानी बालमन की कहानी है, उसके भीतर के मनोविज्ञान की कहानी है। माता-पिता की अपेक्षाओं के बीच बच्चों का विकास उन्हें गलत राह पर ला खड़ा करता है और बच्चा अपने माता-पिता की हत्या तक का विचार बना लेता है। ‘इंसेक्टा’ आहत बालमन के मनोविज्ञान पर केंद्रित कहानी है जिसे उसके माता-पिता अपनी अपेक्षाओं की कसौटी में खड़ा करने की कोशिश में मानसिक रोगी बना देता है। बालमन अपनी सहजता के साथ जीवन को जीना चाहता है मगर घर परिवार में माता-पिता की अपेक्षाएँ व सामाजिक दबाव उसे सामान्य से असमान्य बालक बना देता है। वर्तमान समय में कम अंक व परिवार की अपेक्षाओं पर असफलता का बोझ बच्चों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रहा है। ‘इंसेक्टा’ कहानी बच्चों और माता-पिता के बीच अपेक्षाओं से भरी गठरी को खोलने में मदद करती है। परिवार में बच्चों और माता-पिता के बीच यह संबंध अवसाद और आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण है। यह अवसाद उसे आत्मकेंद्रित और एकांकी बना देता है और वह खुद से संवाद करना आरंभ कर देता है-“मेरी जिंदगी तो जस्ट लाइक मी और हमारी नाक कटा दी के बीच झूलती है... आय एम नॉट ए पर्सन...।” बालक का एकांकी होकर आत्मालाप उसके पारिवारिक व सामाजिक परिवेश की असफलता को दिखाता है। बालक का जहाँ प्रकृति व जीव-जंतुओं से प्यार करना। शिक्षा में रचनात्मक और खोजी प्रवृति, माता-पिता और शिक्षक के अनुकूल नहीं थी। बालक की यही जिज्ञासु मनोवृति समाज में उसे गंदा लड़का बनाकर मानसिक रूप से बीमार बना देती है। “उस बार स्टैग बीटल का जोड़ा ले गया था स्कूल, नेचुरल साइंस के प्रोजेक्ट के लिए। कितनी मुश्किल से मिला था यह जोड़ा। धरती के नीचे छिपे रहते हैं, सिर्फ कुछ हफ्तों के लिए बाहर निकलते हैं... टीचर ने फब्ती कसी थी और जाहिलों से भरी क्लास खिलखिला पड़ी थी। ... सब मम्मी डैडी को बताया था लेकिन उन्हें क्या? बी स्ट्रांग... स्कूल नया होने पर थोडा-बहुत होता ही है। ...सब मुझे ही सीखना चाहिए, सब मेरी ही गलती है..”। परिवार और विद्यालयी शिक्षा में आज भी बच्चों को स्वतंत्र रूप से चिंतन के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है बल्कि शिक्षा का ढ़ांचा परंपरागत शिक्षण पद्धति को अपनाता है जो प्रत्येक बालक के विकास में सफल नहीं है।

शिक्षा व्यवस्था के साथ ही माता-पिता व शिक्षक का इस तरह का व्यवहार बच्चे के आत्मविश्वास को तोड़ता है और  उन्हें अपराध की तरफ बढ़ाता है। जीव-जंतुओं (इंसेक्ट्स) से बालक का अब तक सर्वाधिक प्रेम था अब वही उसका डर बन जाता है जो उसे किताबों पढने नहीं देते है। बच्चा हर बार माता-पिता से इसकी शिकायत करता है और माता-पिता उसके नहीं पढने के बहाने बताकर डांट देते हैं। डर का मनोविज्ञान होता है-“जब नए स्कूल का पहला रिजल्ट आया था और वह फर्स्ट नहीं आया था तो मम्मी-डैडी हतप्रभ हो गए थे। कैसे? उनका होनहार बेटा पाँचवे नम्बर पर? उसने बताना चाहा था- डैडी, मम्मी, कुछ भी ठीक नहीं है... मेरे कमरे में गार्डन से कीड़े घुस आते हैं, झुण्ड के झुण्ड... आँधी-जैसी तितलियाँ, कान-फाडू शोर करने वाले झींगुर और सिकाडा... कमरा उनसे भर जाता है, साँस तक लेना मुश्किल हो जाता है... पढ़ा-लिखा नहीं जाता... इम्तिहान के दिनों में रोज एमरल्ड मॉथ्स का झुंड हरे बादल की तरह मेरे कमरे में घुमड़ आता था, बिजली की बत्ती को ढांक लेता था... मॉथ्स मेरे कान, नाक में घुस जाते थे, मुँह पर पट्टी की तरह चिपक जाते थे... मैं चिल्ला भी नहीं पाता... मैं सो नहीं पाता मम्मी, मेरे कान में हमेशा खरखराहट सी होती रहती है, डैडी... फर्श पर गिलगिले घोंगे और स्लग्स छा जाते हैं... हर रात ये होता है... यह घर बेच दीजिए डैडी, कहीं और चलिए। ...पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगता, वाहियात दोस्त बना लिए... कहाँ हैं कीड़े? सिर्फ तुम्हारे सर में भरे हैं। शर्म आनी चाहिए तुम्हें!...” अनुकृति उपाध्याय अपनी कहानी के कथ्य व शिल्प की कला में एक्सपेरिमेंट करती देखी जाती है। यह एक्सपेरिमेंट कहानियों के शीर्षक व कहानी कहने की कला में लेखिका के सीधे प्रवेश व उनके पात्रों का खुद से संवाद है। उनकी कहानियाँ व्यक्ति के अवचेतन मन के माध्यम से चेतन की यात्रा कराती है और जीवन के यथार्थ चित्र को सामाजिक घरातल पर उकेरती हैं।

‘छिपकली’ और ‘जानकी और चमकादड़’ कहानियाँ प्रतीकात्मक स्वरूप में पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी के वर्चस्व और प्रकृति से दूर और असहज होते मनुष्य की कहानी है। जिसने प्रकृति प्रदत्त सुविधाओं को अपने जीवन का हिस्सा बनाया परंतु प्रकृति का सानिध्य उसे डरावना लगा। वह सामान्य सी छिपकली से डरता, उसकी शारीरिक संरचना, रंग से नफरत करता है और उसे मारना चाहता है। यह भावबोध मनुष्य का पूंजी के वर्चस्व के साथ गरीब के प्रति उभरा व्यवहार है जिसे समाज का एक वर्ग अपने घर के फर्श तक पर देखना नहीं चाहता है। ‘छिपकली’इसी भाव-बोध से उभरी कहानी है। गीता का छिपकली से डर और वहीं उसके बेटे का प्रकृति की हर निर्मित से प्यार पूंजी के दौर में भी प्रेम की सहजता को जीवित रखता है। अभी उसके मस्तिष्क के भावावेग की निर्मिती ‘इन्सेक्टा’ कहानी के बच्चे के समान नहीं हुई  है। वह बच्चा सहज सभी से प्रेम करता है है फिर वह कहानी का पंख तुड़ा कौवा, छिपकली, खुजैला कुत्ता हो या कनकटकी बिल्ली हो। समाज जिससे नफ़रत करता है बच्चे की मानवीय व सहज प्रवृति उससे प्रेम करती है। उसके लिए यह सभी प्राणी कौतूहल से भरे और ‘क्यूट’ है। उसका बालमन तो उसकी तकलीफ पर रोता है और उसकी हरकतों पर हँसता है। बच्चे की सहजता, प्रकृति प्रेम व सुंदर-असुन्दर के भाव बोध से निर्मित नहीं है। ‘छिपकली’ कहानी में काला कौवा, छिपकली, खुजेला कुत्ता, कलकटकी बिल्ली समाज के कुरूप हिस्से का प्रतिनिधित्व करते है जिसे महानगरीय चमक-दमक में आदमी देखने से कतराता है। यह गरीबी व आर्थिक विपन्नता, अभावों का प्रतिनिधित्व करती है। समाज का एक हिस्सा जिसे छिपकली के समान कुरूप, गंदा, हायजिनिक मानता है और गरीबी की बजाय गरीबों को ही हटाने का हिमायती बन बैठता है। अनुकृति उपाध्याय की ‘जानकी और चमकादड़’ कहानी भी ‘छिपकली’ कहानी के समान ही प्रतीकात्मक कहानी है। आधुनिक, भौतिकतावादी परिवेश और उसकी मानसिकता से मनुष्य ने प्रकृति के संसाधनों से पूंजी बनाई और फिर उसी प्रकृति का सानिध्य उसे सीलन, मच्छर और बीमारी का कारण लगने लगा। अर्थात मनुष्य की स्वार्थ लिप्साओं ने उसे अनुपयोगी बना दिया। आज के अतिभौतिकतावादी समय में मनुष्य ने हर खुबसूरत लगने वाली चीज को अपने कमरे की सजावट का हिस्सा बना लिया और वहीं उसकी नजर में बदसूरत चीज को उसने खतरा मानकर उसे मार दिया फिर वह प्रतीकात्मक स्तर पर पीपल का पेड़ हो या चमगादड़। जबकि दोनों ही प्रकृति और मनुष्य के वजूद का हिस्सा हैं। 

कहानी संग्रह की अंतिम कहानी अनुकृति उपाध्याय की ‘डेथ सर्टिफिकेट’ है। यह कहानी मानवीय संबंधों की मृत्यु की कहानी है। कॉर्पोरेट दुनिया में मृत्यु एक आसान शब्द है जो लाभ-हानि से तय की जाती है।‘डेथ सर्टिफिकेट’ कहानी जया की हत्या में पति, दोस्त, सहकर्मी और बोस के शामिल व्यक्तिगत हित तथा उसे हत्या से मृत्यु बना देने की कहानी है। प्रत्येक व्यक्ति यहाँ जया की मृत्यु की उलझी गुथी को सुलझाने से अधिक कंपनी शेयर के दाम, असुविधाओं से डरा और व्यक्तिगत लाभ के प्रति चिंतित है। अनुकृति उपाध्याय की कहानियों का संसार जापान और भारतीय परिवेश से निर्मित है। जिसमें आधुनिक भाव बोध व्यक्ति के अस्तित्व की तलाश में उसे नितांत एकांकी और अजनबी बना देता है। मानवीय संबंध यहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ व हित में समाप्त हो गए हैं।

इस कहानी संग्रह में कुल 9 कहानियाँ हैं जो अलग-अलग विषयों पर केंद्रित होने के बावजूद आपस में जुड़ी हैं। इन कहानियों के शीर्षक अपने कथ्य के अनुसार बहुत ही आकर्षक हैं और सहज ही पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। ये शीर्षक पाठकों के अंदर जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। यह शीर्षक सिर्फ जिज्ञासापूर्ण नहीं है बल्कि कहानियों के पाठ से सीधा संबंध रखते हैं। नये बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से लेखिका ने एक नये कथा संसार की रचना की है जिसमें मनुष्य एकांकी जीवन जी रहा है। वह संबंधों में होने के बावजूद अवसाद से घिरा है। इस अतिभौतिकतावादी समय में मनुष्य की उपभोगी प्रवृति ने उसे पूंजी केंद्रित बना दिया और मानवीय संवेदनाओं को धराशाही कर दिया। ‘वसुदे वकुटुम्बकम’ का भाव व्यक्ति केंद्रित होकर एकालाप तक सिमट गया है। लेखिका का कहानी संसार भारतीय और जापानी परिवेश से निर्मित है जिसका भावबोध व स्पष्ट प्रभाव उनकी कहानियों के शीर्षक और उसके परिवेश में देखा जा सकता है। कहानी में परिवेशगत कथ्य, पात्र, उनका नामकरण उनके परिवेशगत यथार्थ की समझ को प्रमाणिक बनाता है। संवाद में अंग्रेजी शब्दों व वाक्यों का चयन आज के समय के समाज की आपसी बोलचाल की भाषा के रूप में कहानी व पात्रों को और भी सजीव करता है। ‘जापानी सराय’ शब्दों के माध्यम से अपने समय और समाज में व्यक्ति के मन की यथार्थ स्थिति को चित्रित करता है। कहानी को पढ़ते हुए कथ्य, संवाद, पात्र, परिवेश परिस्थिति सभी एकात्म होकर पाठकों के लिए एक नए भावबोध का सृजन करते हैं जो अन्यत्र दुर्लभ है। निश्चित रूप से अनुकृति उपाध्याय का यह कहानी संग्रह एक नई चेतना के प्रवाह से युक्त है।                                                


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