हिन्दी विज्ञापन: संचार माध्यम का सशक्त स्रोत

डॉ. कंचन गोयल

- कंचन गोयल

प्रस्तावना:-आज दुनिया एक बड़ा बाजार बन चुकी है। उपभोक्तावादी और बाजारवादी संस्कृति में विज्ञापन कला विशिष्ट व्यवसाय के रुप में पनप रही है। "विज्ञापन का सुनहरा उसूल है -जैसा देश वैसा भेष। गाँव में उत्पाद बेचना है तो गाँव की बोली, शहर में बेचना है तो शहर की भाषा। आज ग्लोबलाइजेशन का एक पहलू यदि आपसदारी है तो दूसरा पहलू बाजारीकरण यानि कि एक देश का माल दूसरे देश में खपाना है।" आज की हिन्दी बिंदास है। सारे बंधनों को तोड़कर हिन्दी में अंग्रेजी और उर्दू के बेशुमार शब्द इस तरह घुल-मिल गए हैं जैसे दूध में शक्कर। हिन्दी को व्यवसायिक जगत की सर्वप्रमुख भाषा बनाने का श्रेय विज्ञापनों को ही जाता है।

विचारों का परस्पर आदान-प्रदान ही संचार है। सभी प्राणियों, राष्ट्रों, समुदायों और जातियों के बीच संचार की प्रक्रिया सदैव चलती रहती है। पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी प्रकार से अपने भावों को व्यक्त करता है जो संचार का ही एक रुप है। मानव को ईश्वर ने वाणी का उपहार दिया है इसलिए उसके द्वारा किए जाने वाले संचार को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। संचार की विकास यात्रा आज रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन से होती हुई इंटरनेट और सेल्युलर फोन तक जा पहुंची है। मारकोनी द्वारा बेतार और जॉन बेयर्ड द्वारा टेलीविज़न के आविष्कार के बाद तो संचार के क्षेत्र में क्रांति की स्थिति पैदा कर दी थी।
संचार, संस्कृत के ‘चर’ धातु से निःसृत है। ‘चर’ का अर्थ है ‘चलना’। इस प्रकार निरंतर आगे बढ़ने की प्रक्रिया ही संचार कहलाती है। संचार, अंग्रेजी के शब्द ‘कम्यूनिकेशन्स’ का पर्याय है जो लैटिन भाषा के ‘कम्यूनिस’ से उत्पन्न हुआ है। अपनी बात आम जनता तक पहुँचाने के लिए हिन्दी विज्ञापन संचार माध्यम का एक उपयोगी और सशक्त स्रोत है। "समाचारपत्र विज्ञापन का एक माध्यम है क्योंकि यह किसी कम्पनी द्वारा उत्पादित उत्पादों या संस्था द्वारा दी जा रही सेवाओं से संबंधित विज्ञापन संदेशों को लिखित शब्दों व चित्रों के रुप में ग्राहकों तक पहुँचाता है। रेडियो व टेलिविजन भी विज्ञापन के माध्यम हैं क्योंकि इनके द्वारा भी विज्ञापन संदेश, दृश्य व श्रव्य रुप में लक्षित उपभोक्ता तक पहुँचाये जाते हैं।"1

विज्ञापन उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सेतु का काम करता है। उत्पादक का लक्ष्य होता है ज्यादा बिक्री-ज्यादा मुनाफा। उपभोक्ता का उद्देश्य होता है कम पैसों में अधिक से अधिक संतुष्टि। उत्पादक विज्ञापन के माध्यम से अपने उत्पाद के प्रति अधिक से अधिक लोगों को आकर्षित करने के लिए, उत्पाद को इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि अधिक से अधिक लोगों का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो और इस हद तक उत्पाद भा जाए कि उपभोक्ता उसे लेने के लिए जेब खाली करने को तैयार हो जाए।

आज दुनिया एक बड़ा बाजार बन चुकी है। उपभोक्तावादी और बाजारवादी संस्कृति में विज्ञापन कला विशिष्ट व्यवसाय के रुप में पनप रही है। बचपन में मोहल्लों में कितनी मिठास से भरी आवाजें, लययुक्त और काव्यमय भाषा मुझे अपनी ओर आकर्षित करती थी... "लैला की उंगलियाँ हैं। मजनूं की पसलियाँ हैं। पतली-पतली, ताजा-ताजा ककड़ियाँ हैं।" गर्मियों की तपती दोपहर में एक बड़ी सुरीली आवाज़ गूंजती थी... "तर कर ले। तर कर ले। नीम्बू वाली है।"

नींबू का शरबत यानी लेमन-जूस बेचने का कितना निराला तरीका था। गर्मी में प्यास से बेहाल, सूखे गलों को अपनी ओर आकर्षित करने की कला से कितना परिचित थे वो लोग। एक और आवाज़, गंडेरी गुलाब वाली है। ठण्डी-ठण्डी मतवाली है। गंडेरी गुलाब वाली है। ठेले पर गन्ने की गंडेरियाँ होती, नीचे गुलाबी प्लास्टिक बिछा होता और ऊपर पारदर्शी बर्फ की सिल होती और उसके ऊपर गुलाब के खूबसूरत महकते फूल अपनी बहार दिखलाते। पहले छोटी सी दुनिया थी, छोटा सा बाजार था। अब बाजारवाद और उपभोक्तावाद का दौर-दौरा के कारण इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने पूरी दुनिया को बड़े गाँव में बदल दिया है। हर शहर में रात के समय बड़े साइनबोर्ड अपनी आँखें झपका-झपका कर लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। इन विज्ञापनों की भाषा अधिकतर हिन्दी होती है। खासतौर पर उन विज्ञापनों का संबंध निम्न और मध्य वर्ग से होता है।

"विज्ञापन का सुनहरा उसूल है - जैसा देश वैसा वेश। गाँव में उत्पाद बेचना है तो गाँव क गोली, शहर में बेचना है तो शहर की भाषा। आज ग्लोबलाइजेशन का एक पहलू यदि आपसदारी है तो दूसरा पहलू बाजारीकरण यानी कि एक देश का माल दूसरे देश में खपाना है।" आज की हिन्दी बिंदास है। सारे बंधनों को तोड़कर हिन्दी में अंग्रेजी और उर्दू के बेशुमार शब्द इस तरह घुल-मिल गए हैं जैसे दूध में शक्कर। हिन्दी को व्यावसायिक जगत की सर्वप्रमुख भाषा बनाने का श्रेय विज्ञापनों को ही जाता है। टाटा टी का विज्ञापन हिंग्लिश भाषा यानी कि अंग्रेजी और हिन्दी भाषा के खूबसूरत मिश्रण से तैयार किया है।

बहू अपनी सास से पूछती है, "मम्मी आपकी लव मैरिज हुई थी या अरेंज? "2

मम्मी जी - "आफ कोर्स! लव मैरिज।"

बहू - "लव मैरिज, वह भी उस जमाने में।"

मम्मी जी -"यह जब मेरे घर बारात लेकर आये तो घोड़ी पर बैठे थे। मैं भाग कर बालकनी में गई। मैंने उन्हें देखा। उनकी नजर ऊपर उठी। हम दोनों की नजरें मिली और हो गया प्यार। क्यों?  हुई ना लव मैरिज।
इसमें अंग्रेजी हिन्दी का मोहक वर्णन है। साथ ही पीढ़ी के बदलाव का भी संकेत दिया गया है और रोचकता तो बेमिसाल है। विज्ञापनों में हिन्दी का जैसा वर्णन रुप मिलता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। "यदि विज्ञापन आकर्षक, प्रभावशाली व सरस है तो विज्ञापन वस्तु की माँग पर अनुकूल प्रभाव पड़ सकता है।"3 अगर उत्पादक चाहता है कि मेरी वस्तु अधिक बिके तो उसे उस भाषा का प्रयोग करना होगा जो आम लोगों की भाषा हो।

हिन्दी विज्ञापनों में शब्दों की मितव्ययिता देखते ही बनती है। ध्वन्यात्मकता और काव्यात्मकता का पुट कानों में रस घोलता है। सरस तुकबंदी मन को आकर्षित करती है। विज्ञापनों ने हिन्दी को नई अर्थवत्ता, नई भंगिमा, नया अंदाज, नए तेवर, नई तरंग, नई उमंग, नई दृष्टि दी है। "विज्ञापनकर्ता विज्ञापित वस्तु की गुणवत्ता दिखाने के लिए कभी-कभी तुलनात्मक दृष्टि अपनाता है और ऐसी स्थिति में वह परोक्ष रुप से विज्ञापन की भाषा में तुलना का माध्यम ग्रहण करता है।"4

यथा -"पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें। घड़ी डिटर्जेंट पाउडर"

यथा -"सर्फ की खरीदारी में और भी समझदारी है।"

एक बहुत मशहूर विज्ञापन जिसकी आवाज़ कानों में दिन-रात गूंजती है -
 दूध जैसी सफेदी,
 निरमा से आये
 रंगीन कपड़ा भी खिल-खिल जाए
 सबकी पसंद निरमा
 वाशिंग पाउडर निरमा।
इसमें उपमा भी है और बड़ी प्यार लय और आवाज़ का जादू भी।
मुहावरों ने हिन्दी विज्ञापनों को अधिक कारगर और दमदार बनाया है -"कर लो दुनिया मुट्ठी में।"
"आपकी खूबसूरती में चार चाँद लगाए - नया इंटरनेशनल लक्स।"
"इरादा है बिजलियाँ गिराने का तो तरीका हमारे पास है।"
वाक्याँशों का प्रयोग हिन्दी विज्ञापनों में होता रहा है। हर बजट में समाए रैड लेबल चाय, अब दस, बीस और पच्चीस रुपयों में किफायती पैक में।
शुद्धता की पहचान, टाटा नमक।
साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान-डाबर च्यवनप्राश।
पूरे परिवार के लिए आदर्श उपहार लाइफबॉय मैल में छुपे कीटाणुओं को धो डालता है।
सर्दी-जुकाम, मुन्ने की नींद हराम।
दांतों का रखे ख्याल (कोलगेट टूथपेस्ट)
लाइफबॉय है जहाँ तंदरुस्ती है वहाँ।

प्रश्नवाचक वाक्य भी विज्ञापनी हिन्दी में अक्सर देखने को मिलते हैं-
उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों?
सिर दर्द से परेशान?
कुछ लेते क्यों नहीं?
विस्मय बोधक प्रयोग भी हिन्दी विज्ञापनों में खूब चलते हैं -ऐसी लज्जत और कहाँ। गोल्ड का जवाब कहाँ?  ऐसी निराली महक ओर कहाँ?
क्रियाविहीन वाक्यों के प्रयोग से भी भाषा में संक्षिप्तता और प्रभावोत्पदाकता आती है - कमाल की ताजगी, ताजा चाय।
सर्दी के दिनों में गर्मी का अहसास।
संयुक्त वाक्यों का प्रयोग भी हिन्दी विज्ञापनों में प्रायः किया जाता है -स्वस्थ दांत और मसूड़े, सांसों में ताजगी हिन्दी विज्ञापन के माध्यम से सामाजिक और धार्मिक सद्भावना को भी आम जनता तक पहुँचाया जा सकता है - मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में
 बाँट दिया भगवान को
 धरती बाँटी, सागर बाँटा
 मत बाँटो इंसान को।
पुनरुक्ति से भी विज्ञापन असरदार और लुभावने बनते हैं - फैशन का एक नया नाम, नया एहसास, नए फैशन का नया विलास। हिन्दी का लालित्य, मिठास और सरलता ने ही हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में सहायता की है। हिन्दी भाषा हर व्यक्ति के दिल पर राज करती है। बृजमोहन गुप्त का कहना है - "सम्प्रेषण पूरा कब होता है?  जब एक कुशल सम्प्रेषक, उपयोगी संदेश उपयुक्त माध्यम से प्रभावशाली विवेचन (ट्रीटमेंट) के जरिये सही पाठक को पहुँचा कर उसे वांछित प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित करता है।"5

भारत में आज हिन्दी ही विज्ञापनों की इकलौती भाषा है जिसे हर व्यक्ति, उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक समझ लेता है। हिन्दी का जादू हर व्यक्ति के सिर पर चढ़कर बोलता है। 'कौन बनेगा करोड़पति?'  प्रोग्राम में अमिताभ जब भौंपू शब्द का प्रयोग करते थे तो कितना भला लगता था। अनपढ़ से लेकर पढ़े-लिखे सभी को यह आत्मीय स्पर्श का एहसास कराता है, गँवारपन की कोई गंध नहीं है। यह हिन्दी की शक्ति का परिचायक है। विज्ञापन को तुक में बांधने के लिए काव्यात्मकता लाने के लिए किसी भी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है -संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे।
आयोडेक्स मलिए, काम पर चलिए।
कोमल, सुन्दर, घन, मुलायम, काले चमकीले बाल।
गार्डन की साड़ियाँ, पहनती हैं सुन्दर नारियाँ।
ले चल मुझे वहाँ, सपनों का देश हो जहाँ।

माँ के दूध का विज्ञापन देखिए -
बच्चों को स्तनपान कराएं, अपने माँ होने का दायित्व निभाएं। माँ का दूध सर्वोत्तम दूध।
‘रसना’ की विज्ञापन रणनीति का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। ‘रसना’ ने शोध और अनुसंधान के बाद बाजार का विश्लेषण किया और लक्षित उपभोक्ता की पहचान की। तत्पश्चात् उन्होंने विज्ञापन की विषय-वस्तु का प्रारूप बनाया और ‘बचत तथा स्वाद’ पर अपना ध्यान केन्द्रित किया ताकि घरेलू महिलाओं व बच्चों को प्रभावित किया जा सके। ‘रसना’ के एक विज्ञापन में संदेश था -‘रसना का एक आश्चर्यजनक पैक स्वादिष्ट शर्बत के 32 गिलास तैयार करता है और दूसरे विज्ञापन में समय पर ध्यान देते हुए कहा गया था -‘आपके मेहमानों के लिये मात्र एक मिनट में शर्बत तैयार।"6 फिल्मी अभिनेत्रियों द्वारा ‘लक्स साबुन’ क्रिकेट सितारों द्वारा एक्शन जूतों की प्रशंसा, दर्दनिवारक ‘एनासिन’ के विज्ञापन में एक चिकित्सक तथा ‘एरियल’ पाऊडर के विज्ञापन में वस्तु निर्माता, उत्पाद विशेष की प्रशंसा करते हैं और उपभोक्ता को उनका उपभोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।
यथा -‘डनलप इज डनलप’
 मेरी खूबसूरती का राज -‘लक्स और क्या?

विज्ञापन के व्यावसायिक चिन्ह (ट्रेडमार्क या मोनोग्राम) लोगों का ध्यान जल्दी ही अपनी तरफ खींचते हैं और स्मरण शक्ति के चौखटे में तस्वीर की तरह फिट हो जाते हैं। उपभोक्ता वर्ग बाजार में केवल इस व्यावसायिक चिन्ह को देखकर वस्तु खरीद लेता है। टाटा, केल्विनेटर, एल.जी., नेशनल पैनासोनिक, व्हील, डालडा, ग्वालियर सूटिंग्स आदि के व्यवसायिक ट्रेडमार्क पर उपभोक्ता किसी भी वस्तु पर इनकी छाप को ही विश्वसनीयता व गुणवत्ता का प्रतीक मान लेता है।

"सूचना प्रौद्योगिकी के नवीन आविष्कारों ने हिन्दी के साहित्यिक स्वरूप से आगे बढ़कर उसके प्रयोजन मूलक रुप को अधिक विस्तार दिया है तथा इसे कामकाज हिन्दी के साथ व्यावसायिक हिन्दी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है और आगे हो रहा है।"7

विज्ञापनों का मुख्य उद्देश्य किसी वस्तु या सेवा के बजाए कम्पनी के लिए प्रतिष्ठा व साख बनाना होता है। साथ ही ऐसा वातावरण और भावना पैदा करना होता है जिससे लोग कम्पनी को मित्रवत् स्वरूप में ले। इस प्रकार के विज्ञापनों में विज्ञापन करने वाला अपनी रीति-नीति, अनुसंधान, गतिविधियों व सामाजिक जिम्मेदारियों आदि के बारे में अपने कार्यक्रमों के बारे में इंगित करता है। लोक सेवा, सामाजिक सहयोग हेतु विज्ञापन प्रचारित किए जाते हैं। विषय चाहे एड्स हो या पर्यावरण, शिक्षा हो या समाज सुधार, ट्रेफिक रुल्स हो या पेट्रोल बचत हो, एक मुद्दा उससे जुड़ी संस्था का महत्व सामाजिक दृष्टि से अभिनव है। ऐसे विज्ञापनों में कहीं विनय होती है तो कहीं चेतावनी का पुट, कहीं आदेश, तो कहीं निर्देश लेकिन सम्पूर्ण कार्यवाही के पीछे एक उद्देश्य होता है कि अच्छे नागरिक बनें, समाज में खुशहाली और अमन चैन रहे। यथा - "एड्स की रोकथाम के लिये पंजाब राज्य एड्स नियंत्रण समिति द्वारा रेड रिब्बन एक्सप्रेस का उद्घाटन किया गया। -- संस्था द्वारा सहयोग प्राप्त होने से यह रेल समूचे उत्तर भारत में एड्स के रोकथाम व प्रचार-प्रसार हेतु कार्यशील है। ‘रैड रिबन एक्सप्रैस।"8
राष्ट्रीय विज्ञापन जनहित में जारी किये जाते हैं और साथ ही साथ में जनता विज्ञापन के द्वारा सुरक्षा के उपाय और जीवन बहुमूल्य के बारे में सूचित करते रहते हैं।
-‘मौत का कारण भूकम्प नहीं, असुरक्षित इमारतें होती हैं।
-‘स्वतन्त्रता की 52वीं वर्षगाँठ पर राष्ट्र को समृद्ध बनाने हेतु आइए हम सब संकल्प लें...।
- रेलगाड़ियों को अनावश्यक रुप से नहीं रोकेंगे।
- टिकट लेकर ही यात्रा करेंगे।
- विस्फोटक का ज्वलनशील पदार्थ लेकर सफर नहीं करेंगे।
- लावारिस या अनजान वस्तुओं को नहीं छुएंगे।
- पूर्वोत्तर रेलवे आपकी सुरक्षा के लिए...।
- पूरब से सूर्य उगा, फैला उजियारा।
- जागी हर दिशा-दिशा, जागा जग सारा।
- चलो पढ़ाएँ! कुछ कर दिखायें।"9
 - राष्ट्रीय साक्षरता मिशन

हिन्दी विज्ञापन मनुष्य के जीवन का अटूट अंग बन चुके हैं। देश की एकता, अखण्डता और हित की स्थापना में संचार माध्यम के सशक्त स्रोत की भूमिका निभाते हैं। विज्ञापनी हिन्दी सशक्त है, समय की आवाज़ है। किसी भी भाषा में इतना सामर्थ्य नहीं है कि वह हिन्दी भाषा के शब्दों को पचा सके। विज्ञापनों में हिन्दी का दिल धड़कता है। बाजारीकरण में हिन्दी विज्ञापनों ने अपनी एक खास पैठ बना ली है। हिन्दी की इसी अस्मिता को बनाए रखते हुए हमें उसे अधिक से अधिक सशक्त और सम्प्रेषणीय बनाना है।

सन्दर्भ सूची-
1 डॉ. निशात सिंह, मीडिया लेखन कला, पृष्ठ 3
2 डॉ. नगमा जावेद मलिक, विज्ञापनों में हिन्दी का स्वरूप, अनुसंधान, जनवरी-मार्च 2014, पृष्ठ 7
3 डॉ. माणिक मृदेश, समाचार पत्रों की भाषा, पृष्ठ 107
4 विज्ञापन माध्यम एवं प्रचार, पृष्ठ 19
5. जनसंचार विविध आयाम, बृजमोहन गुप्त, पृष्ठ 114
6. डॉ. निशान सिंह, मीडिया लेखन कला, पृष्ठ 245
7. बहुवचन, प्रो. विजय कुलश्रेष्ठ (हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका) जनवरी-मार्च 2008, पृष्ठ 96
8. डॉ. कंचन गोयल, मीडिया और अनुवाद, पृष्ठ 137
9. वही, पृष्ठ 156

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