हिंदी दलित आत्मकथाएँ – एक मूल्यांकन - पुनीता जैन: समीर लाल ’समीर’ की नजर से

समीक्षक: समीर लाल 'समीर'

किताब: हिंदी दलित आत्मकथाएँ – एक मूल्यांकन 
लेखिका: पुनीता जैन
मूल्य: ₹ 795 रुपये
प्रकाशक: सामयिक बुक्स, नई दिल्ली-110002
वेबसाइट: www.samayikprakashan.com
ईमेल: samayikprakashan@gmail.com


जब पुनीता जैन जी की किताब हाथ में उठाई तो अहसास हुआ कि कभी इस दृष्टिकोण से दलित साहित्य पर किसने एक समग्र चिन्तन किया है हिंदी साहित्य में।


इधर दलितों को लेकर जब कभी बात हुई या सुनी तो वह उनके हालातों, उत्पीड़न, आरक्षण आदि तक सीमित रही। मगर इस पुस्तक के माध्यम से हिंदी में लिखी गई उत्कृष्ट दलित आत्मकथाओं के बारे में जाना। पुनीता जी ने जब इन आत्मकथाओं का अध्ययन किया होगा तो कितने गहरे दर्द अहसासे होंगे, न जाने कितनी बैचेनी से गुजरी होंगी, यह उनके विवेचन में स्पष्ट नजर आता है।

पुनीता जैन

इस पुस्तक को उन्होंने दो भागों में बांटा है; एक ‘दृष्टि’ और दूसरा ‘अन्तर्पाठ’। ‘‘दृष्टि’ खंड में दलित साहित्य की पृष्ठभूमि एवं दलित चिन्तन को समझने का प्रयास है तो ‘अन्तर्पाठ’ में हिन्दी दलित लेखन में उपलब्ध तमाम आत्मकथाओं का विश्लेषण किया है, जिसमें मोहनदास नैमिशराय की ‘अपने अपने पिंजरे’, ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’, कौसल्या बैसंत्री का ‘दोहरा अभिशाप’, के।नाथ की विभिन्न पुस्तकें मसलन ‘तिरस्कार’, ‘मेरे गांव का कुँआ’, ‘कांटों में उलझता जीवन’ ‘जाति अभिशाप’ आदि एवं माताप्रसाद की ‘झोपड़ी से राजभवन’ जैसी अनेक आत्मकथाएँ शामिल हैं।


जैसे जैसे आप किताब पढ़ते हैं वैसे वैसे किताब आपको जकड़ती जाती है। कलम इतनी सशक्त और निगाह इतनी पैनी कि हर विश्लेष्ण को आप बार बार पढने को आतुर होते हैं।


हर अध्याय आपको रोकता है। हर अध्याय अपने दर्द का, विडंबनाओ का अहसास कराता है। तमाम प्रश्न उठाता है। आपके अंदर हर उस पुस्तक को पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करता है, जिनका जिक्र इस पुस्तक में आया है। यह एक सफल विवेचना का चरम होता है और पुनीता जी इसमें पूर्णरूप से सफल रही हैं।


हर अध्याय का अंत उस अध्याय में किये गए विवेचन के सन्दर्भ देकर किया है जो एक अच्छा प्रयोग लगा।
समीर लाल 'समीर'


पुनीता जी ने अपनी इस पुस्तक को डॉ. तुलसीराम की पुस्तक ‘मुर्दहिया’ को समर्पित किया है। उनका कहना है कि यही वह पुस्तक है जिसने अपनी घनीभूत संवेदनाओं और करुणा से मुझे झकझोर दिया। लेखक की भावभूमि पर स्वयं को खड़ा करने तथा उस मर्मान्तक पीड़ा की अनुभूति ने मेरी कलम को भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दलित की सनातन पीड़ा को विस्तार से समझने हेतु विवश किया। यहीं से हिन्दी की प्रत्येक उपलब्ध दलित आत्मकथा के भीतर उतरने की यात्रा प्रारम्भ हुई। संपूर्ण किताब से गुजरते हुए आपको वही एक सहयात्री वाला अहसास और उस पीड़ा का अनुभव होगा जिससे लेखिका गुजरी होंगी।

यह एक अलग तरह की यात्रा है और मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप भी इसे उसी तरह अनुभव करेंगे जैसा कोई भी संवेदनशील हृदय करेगा। मैं इस पुस्तक के लिए पुनीता जी को साधुवाद देता हूँ एवं आप सभी से इस पुस्तक को पढ़ने की अनुशंसा करूंगा।

1 comment :

  1. bhut sundar arthpurna samiksha badhai sameer ji.
    neelesh sarvate bhopal

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