केदारनाथ अग्रवाल: मैं-तुम-हम, जग-जल-थल के रंगों का अनूठा कोलाज

अनिता पाटील

- अनिता पाटील


केदार की कविता को कई तरह से आँका जाता है। उनको प्रगतिवादी आंदोलन से जुड़ा देख, शोषितों-मजदूरों के जीवनांकन को देख उन्हें हम प्रायः प्रगतिशील धारा का कवि कहते हैं। श्रम की प्रतिष्ठा वाली कविताओं से हम उनकी मार्क्सवादी विचारधारा से रू-ब-रू होते हैं लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि उनके काव्य में जीवन का सबसे अहम तत्व ‘प्रेम’ कई रंगों में, कई स्तरों पर मौजूद है। वे श्रमिक-शोषित-मजदूरों की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए भी उनके प्रेम की कोमल भावनाओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं। वैसे सत्तर साल की लम्बी अवधि में उन्होंने जो काव्य-सृजन किया, उसकी परख करने पर उजागर हो जाता है कि उनका काव्य-संसार अत्यंत व्यापक है, जिसमें सृष्टि के अनंत रंग समाहित हैं और कविताओं की अंतर्वस्तु पर यदि गौर करें तो स्पष्ट होता है कि प्रेम और प्रकृति सौंदर्य की कविताओं से आरंभ करके उन्होंने जनवादी चेतना को अपना कर शोषित-पीड़ित मानव समुदाय के उद्धार के लिए अपनी कविताओं के दायरे को समाज के उपेक्षित कई वर्गों तक फैलाने का प्रयास किया है।

उनके काव्य में अभिव्यक्त प्रेम-भावना पत्नी-प्रेम से शुरू होकर प्रकृति के प्रति अनुराग में विस्तार पा गई है और श्रमिक वर्ग के साथ उनके दिली लगाव से श्रम-सौंदर्य के प्रति अमिट श्रद्धा उत्पन्न हुई है। इसी विस्तार के कारण उनके काव्य में जीवन के अनगिनत रंग इंद्रधनुषीय आभा के साथ मौजूद हैं। उनकी कविताओं में मौजूद अनंत रंगों से मेरा सीधा परिचय एम.ए. की शिक्षा के दौरान हुआ। हालाँकि, तब तक मैं उन्हें केवल ‘प्रेम का कवि’ ही मानती थी और ‘हे मेरी तुम’ (1981), ‘मार प्यार की थापें’ (1981) की कुछ कविताओं से बहुत प्रभावित भी थी। मानना होगा कि प्रेम एक ऐसा रंग है, जो सबको अपने रंग में रंगता है और फिर व्यक्ति लहरों-सा नाचने-झुमने लगता है। ख़ास तौर पर केदार की निम्न कविताएँ सुनासुनी मुँह ज़ुबानी याद हो गई थीं - "हे मेरी तुम सोई सरिता!/उठो,/और लहरों-सी नाचो/तब तक, जब तक/आलिंगन में नहीं बाँध लूँ/और चूम लूँ/तुमको!/मैं मिलने आया बादल हूँ!" (हे मेरी तुम सोई सरिता, फूल नहीं, रंग बोलते हैं, 1981) और "आज नदी बिलकुल उदास थी/सोई थी अपने पानी में,/उसके दर्पण पर -/बादल का वस्त्र पड़ा था।/मैंने उसको नहीं जगाया,/दबे पाँव घर वापस आया।" (आज नदी बिलकुल उदास थी, फूल नहीं, रंग बोलते हैं, 1981)

और मैं इन्हें एक साँस, एक लय में गाया करती थी और इन गीतों के गाने का सिलसिला आज तक बरकरार है। जब वे प्रेम की बात कर रहे होते हैं, तो प्रकृति के हर अंग-रंग का मानवीकरण करते हैं। यह मानवीकरण जीवन से दूर नहीं है और उनका प्रेम स्टिरियोटाइप, सनातन, दकियानूस नहीं बल्कि परिवर्तन में अटूट विश्वास रखने वाला है। यही वजह है कि उनकी कविताओं में प्रेम के अनेक रंग विद्यमान हैं। उनकी कविताओं से गुज़रते हुए यह सहज ही समझा जा सकता है कि प्रेम एक ऐसा तत्व है, जो सार्वकालिक है और काल भी उसे नहीं जीत सकता। ग़ौरतलब है कि 70 साल की उम्र में भी केदार अपनी पत्नी को ‘तुम’ ही संबोधित करते थे। वृद्धावस्था के बावजूद काल उनके प्रेम में झुर्रियाँ पैदा नहीं कर सका।

उन्होंने ‘हे मेरी तुम’ काव्य संकलन में लिखा भी है - "इस संग्रह का नाम मैंने ‘हे मेरी तुम’ रखा है। मैं अपनी पत्नी को ‘तुम’ कह कर ही प्यार से सम्बोधित करता हूँ। इसीलिए मेरी पत्नी यानी ‘तुम’ इन कविताओं में सम्बोधित होकर ‘हे मेरी तुम’ हो गई हैं। भले ही कुछ लोगों को यह नाम विचित्र लगे, मुझे तो बहुत ही सहज और सरल लगता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसे मैं अनन्त काल तक अपनी पत्नी को पुकारता, जीता रहूँगा और अपना मन सस्नेह खोलता रहूँगा। हम दोनों के न रहने पर भी हम दोनों एक दूसरे से जीते-जैसे बातें करते रहेंगे और हमारे घर के ये कुटुम्बी पौधे फूल लाते रहेंगे और हमारी, आज जैसी याद, सब को दिलाते रहेंगे।" (हे मेरी तुम, पृ. 7, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009)

केदार के प्रेम का यह त्रैकालिक या शाश्वत पक्ष है। वास्तव में हम जिससे प्रेम करते हैं, वह सदा-सर्वदा अपनी स्मृतियों में मरणातीत बना रहता है। सच तो यह है कि प्रेम का रंग छोड़े नहीं छूटता। लेकिन भारतीय समाज व्यवस्था में प्रेम करना और प्रेम पर लिखना अत्यंत जोख़िम भरा काम रहा है और केदार ने यह जोख़िम उठायी। दो राय नहीं कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर हम प्रेम और स्मृतियों के रंग में बारंबार रंगते रहते हैं। इसीलिए केदार कहते हैं - "हे मेरी तुम!/जी रहा हूँ/ज़िन्दगी अपनी/और तुम्हारी,/एक साथ,/हाथ में लिये हाथ।" (वाक्य पूरा कर रहा हूँ, हे मेरी तुम, पृ. 67, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009) एक-दूसरे से अलहदा रहकर दोनों की ज़िंदगी एकसाथ जीने का जज़्बा साहित्य में नए अर्थों की अपार संभावनाएँ लिए केदार की कविताओं में उपस्थित हुआ था।

ध्यान देना होगा कि ‘प्रेम’ से तात्पर्य केवल ‘मांसलता’ ही नहीं है, लेकिन बिना मांसलता के प्रेम पूर्ण हो ऐसा भी संभव नहीं। यदि आकर्षण प्रेम का अवलम्ब है तो निश्चय ही कोई-न-कोई रूप भी अनिवार्य है। बिना रूप के आकर्षण नहीं और बिना आकर्षण के प्रेम नहीं। जब रूप-आकर्षण-प्रेम की सीढ़ी चढ़ जाएँ तो मांसलता से कैसे बचा जा सकता है। अशोक त्रिपाठी ने ‘जमुन जल तुम’ की भूमिका ‘कैफ़ियत के बाद’ में स्पष्ट किया है - "प्रेम मानवीय जीवन की एक अनिवार्य मूल प्रवृत्ति है। अगर प्रेम का सम्बन्ध हम मांसलता से जोड़ने का दुस्साहस करें और जो निश्चय ही मांसलता से उपजता है, तो प्रेम रोटी की भूख की तरह एक भूख भी है, जिसकी तृप्ति अनिवार्य है अन्यथा जीवन में असंतुलन अपरिहार्य है।... प्रेम को केवल हृदय से जोड़कर देखना उसे शुद्ध भावना का व्यापार बताना, छल करना है। लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि प्रेम का सम्बन्ध केवल मांसलता से ही है। परन्तु, प्रेम का सम्बन्ध मांसलता से भी है, इसमें भी शंका की गुंजाइश नहीं है।" (जमुन जल तुम, पृ. 6, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009) देखिए केदार का वर्णन - "उसके अंगों के छूने की/अब विद्युत दौड़ेगी इनमें/उसके ओठों के चुम्बन की/अब मदिरा उतरेगी इनमें/उसने मेरी सेज सजायी/सेज सजाकर संग सुलाया/संग सुलाकर अंग मिलाया/ओठों को रस पान कराया।" (उसके अंगों के छूने की, जमुन जल तुम, पृ. 47, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009)

जीवन की यही सच्चाई कि प्रेमपाश में बँध कर ही सुकून मिलता है। आख़िर यह मान लेने में क्या हर्ज है कि प्रेम की बुनियाद आकर्षण है और यह आकर्षण ही हमें बाँधे रखता है। "आदि कवि वाल्मीकि से लेकर कविता में घोर श्रृंगारिक अभिव्यक्ति के बावजूद वासना से रहित मानी जाने वाली सूर की कविता तथा मर्यादित प्रेम की प्रतीक तुलसी की कविता तक में, प्रेम का उद्गम स्रोत रूपाकर्षण ही रहा है।" (जमुन जल तुम, पृ. 6, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009) वरना तुलसी अपनी पत्नी से मिलने के लिए अंधियारी-बरसाती रात में बाढ़ आई नदी पार कर क्यों जाते?

लेकिन ध्यातव्य है कि केदार का प्रेम केवल प्रेमी-मिलन तक सीमित नहीं बल्कि इस प्रेम-चित्रांकन में सृष्टि के प्रत्येक अंग का अंतर्संवाद और चरित्रांकन होता है। इसीलिए विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है - "केदार प्रकृति के विशेषतः बादल, पत्थर, पानी, हवा, मिट्टी, वृक्ष के और फसल-कृषि फल के सौंदर्य का चित्रण मन लगा कर करते हैं, कृषि फल प्रकृति का श्रम के माध्यम से संस्कृति का रूपांतरण है। फसल है तो मनुष्य की श्रम संस्कृति किंतु वह प्रकृति का ही रूप लगती है - उपयोगिता एवं सौंदर्य की अन्योन्याश्रयता का सर्वोत्तम रूप।" (विश्वनाथ त्रिपाठी, पेड़ का हाथ, पृ. 16, वाणी प्रकाशन, 2002) यह भी कि जहाँ उपयोगिता है, वहाँ सुंदरता भी है। और जहाँ सुंदरता है, वहाँ निश्चय ही प्रेम है। ‘प्रेम’ एक परिमंडल में संलिप्त होकर अनेक रंगों में अंकित होता है।

दो राय नहीं कि प्रेम और सौंदर्य जीवन के दो ऐसे अनिवार्य तत्व हैं, इनके बिना कोई रचना संभव नहीं हो सकती। इससे परे रहकर कोई रचना जीवन के मर्म को ज्ञापित भी नहीं कर सकती। सर्व-स्वीकार्य होगा कि जीवन का मूल आधार ‘प्रेम’ और ‘सौंदर्य’ ही तो है। इसलिए हम माक्र्सवादी विचारधारा की बात करते हुए भी ‘प्रेम’ की ही बात कर रहे होते हैं। किसी के प्रति अपनत्व का भाव ही तो प्रेम है। माक्र्स को शोषितों से अपनत्व था और उन्हें अपनी पत्नी जेनी से प्रेम तो था ही और इस प्रेम ने ही अंततः दुनिया को एक नवीन विचारधारा दी, जो हमेशा बलवती रहेगी। प्रेम के लिए फुर्सत के पलों की ज़रूरत नहीं होती। बाग-बगीचे और होटलों में सजावट भरे कमरे केवल जि़्ास्मानी और इश्क़िया मिजाज़ वालों के लिए हो सकते हैं। प्रेम बेफ़िक्रों के लिए नहीं और उसका कोई पर्याय भी नहीं। है तो बस एक-दूसरे के लिए फ़िक्र यानी चिंता। यही चिंता प्रेमी के चित्त को एक-दूसरे के साथ बनाए रखती है। मजदूर भी अपनी पत्नी-प्रेमिका से प्रेम करता है और वह सदा के लिए करता रहता है। "शोषित और मजदूर भी प्रेम करता है, उसकी ज़िन्दगी में भी गाहे-बगाहे कोमल भावनाओं के संवेदनशील क्षण आते हैं, जब वह अपनी पत्नी-प्रिया के प्रति अतिरिक्त सौन्दर्य-सिक्त हो उठता है।" (जमुन जल तुम, पृ. 7, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009)

केदार का प्रेम परकीया-प्रेम नहीं बल्कि स्वकीया-प्रेम है, जो चित्त में ‘अपनत्व की चिंता’ लिए हुए चिरकालीन है और ‘तुम बिन मेरा क्या होगा’ की तुलना में ‘मैं तुम्हें अकेला नहीं होने दूँगा और अकेले ही दुःख झेलने न दूँगा’ की भावना से ओतप्रोत है। वह साथ और हाथ छोड़ना नहीं चाहते, इसीलिए कहते हैं - "हे मेरी तुम!/जी रहा हूँ/जि़्ान्दगी अपनी/और तुम्हारी,/एक साथ,/हाथ में लिये हाथ।" (वाक्य पूरा कर रहा हूँ, हे मेरी तुम, पृ. 67, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009)

कहा जा सकता है कि केदार की कविता में जीवन के हर रंग मौजूद हैं। इन्हीं रंगों ने पाठकों को आकर्षित किया है। इसीलिए रामविलास शर्मा ने ‘मेरे साक्षात्कार’ में कहा है - "हिंदी आलोचना में केदार की चर्चा कम ही हुई है, यह सही है, किन्तु उनकी कविताओं का एक प्रबुद्ध पाठक वर्ग हमेशा रहा है और वह बराबर बढ़ता गया है।... केदार की रचनाओं में राजनीति की निर्णायक भूमिका है, किन्तु राजनीति से हटकर उन्होंने जो कविताएँ लिखी हैं, वे कम महत्व की नहीं हैं। ऊपर से बहुत सरल दिखने वाली कविताओं में कलात्मक सौंदर्य की बारीकियाँ छिपी हुई हैं।" (मेरे साक्षात्कार, रामविलास शर्मा, पृ. 124, किताबघर प्रकाशन, 2007) मुलाहज़ा है यह कविता - "हे मेरी तुम!/घटते-घटते;/अब बिल्कुल घट गई;/मेरी औकात,/गर्दिश-गुबार में -/आर्थिक अंधकार में।" (न चलता घर, हे मेरी तुम, पृ. 33, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009) कविता में व्यक्त ‘आर्थिक अंधकार’ कई अथर्ों को समाहित किए हुए है। यह अंधकार वृद्ध होने के बाद भी तो उपजता है। पेशे से वकील ठहरे केदार जी की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। कमासिन गाँव से उन्हें कोई आमदनी न थी। हृदय से कवि ठहरे केदार का मन वक़ालत में नहीं लगता था। लेकिन आर्थिक साधनों के अभाव में वक़ालत करनी पड़ती थी। जब तक वे सरकारी वकील रहें, तब आर्थिक स्थिति ठीक रही होगी। 64 साल की उम्र में 10 अप्रैल 1975 को डाॅ. शर्मा को एक पत्र में वे लिखते हैं - "वकालत बिगड़ रही है। पेशे से बेपेशा हो रहा हूँ। देखो ये खर्चे कब तक चलते रहेंगे। इधर खर्च ही खर्च है। नाती की शादी में बहुत कुछ लगेगा।" (पेड़ का हाथ में उद्धृत, पृ. 6, वाणी प्रकाशन, 2002) जो कि "घटते-घटते;/अब बिल्कुल घट गई;/मेरी औकात,/गर्दिश-गुबार में -/आर्थिक अंधकार में।" (न चलता घर, हे मेरी तुम, पृ. 33, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009) के भाव का सटीक बोध कराता है और "आर्थिक अंधकार" अन्य परिस्थितिजन्य भी हो सकता है। देखिए - "हे मेरी तुम!/वृद्ध हुए हम/क्रुद्ध हुए हम,/डंकमार संसार न बदला,/प्राणहीन पतझार न बदला,/बदला शासन, देश न बदला,/राजतंत्र का भेष न बदला,/भाव-बोध-उन्मेष न बदला,/हाड़-तोड़ भी-भार न बदला/हे मेरी तुम!/कैसे जियें? यही है मसला।" (वृद्ध हुए हम, हे मेरी तुम, पृ. 17, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009)

कविता का न कोई क्षेत्र ही निर्धारित किया जा सकता और न सीमा ही। वह हर दायरे से मुक्त होकर ही उसकी अन्तर्वर्ती दुनिया के यथार्थ को उजागर कर सकती है। ऐसा करते हुए वह अपने हर शब्द में अनेक अर्थ-रंग-प्रसंग समाहित किए होती है। कहा जा सकता है कि कवि मुक्त भाव से सबको मुक्त करने की सतत कोशिश करता है और उम्मीद करता है कि "जीवन की धारा;/धारा काटे निठुर कगारा;/मानव को मानव हो प्यारा;/जग हो फूल गुलाब हमारा।" (फूल तुम्हारे लिए खिला है, हे मेरी तुम, पृ. 18, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009)
‘हे मेरी तुम’ को लेकर हम प्रायः यह सुनते आए हैं कि यह कविताएँ केवल पत्नी को सम्बोधित कर लिखी गई हैं। कमला प्रसाद ने ‘कविता तीरे’ में सही लिखा है - "ये कविताएँ पत्नी को सम्बोधित होकर भी उतनी ही दूसरों के लिए हैं। यहाँ पत्नी का रिश्ता दो शरीरों का नहीं, चीज़ों, फूल-पत्तियों, पेड़-पौधों, पालतू जानवरों, अनुभवों, सपनों, सामाजिक हरकतों, ज़्ामाने के प्रति शिकायतों, जीवन के विभिन्न रागात्मक आदान-प्रदान से बने आप्त वाक्यों से भरपूर है। इन सभी रिश्तों को कवि ऐंद्रिय सुन्दर दुनिया से पाता है। देखने में यहाँ दो प्राणी हैं, पर जाने-अनजाने इतिहास और संस्कृति तथा देश-काल से ढले ये दोनों जन नमूने के तौर पर पूरी दुनिया भी होते हैं। पत्नी श्रोता होकर अनुभवों के अर्जन में भागीदार हैं। संकलन में कवि सामाजिकता को पारिवारिकता बना लेता है - तथ्य, शिल्प, रूप और रचना विधान के साथ दरअसल इसी पारिवारिकता के लिए व्यवस्था के जाल में फँसा, कर्मजगत की सर्जनात्मकता से उच्छिन्न मध्यवर्ग ललक रहा है। केदार जी कहते हैं - अच्छा हुआ, हम आधुनिक बौद्धिक न हुये और टूटते-टूटते भी पेड़-पौधों और फूलों को प्यार करते रहे।" (कमला प्रसाद, कविता तीरे, पृ. 128, वाणी प्रकाशन, 2009)

केदार की कविता के केन्द्र में प्यार है और जीवन का केन्द्र और मूलाधार भी प्यार ही तो है। यह प्यार हर स्तर पर मौजूद है। जब वे कहते हैं - "चिड़ीमार ने चिड़िया मारी;/नन्हीं-मुन्नी तड़प गई/प्यारी बेचारी।/ हे मेरी तुम!/सहम गई पौधों की सेना;/ पाहन-पाथर हुए उदास;/हवा हायकर/ठिठकी ठहरी/पीली पड़ी धूप की देही।" (चिड़ीमार ने चिड़िया मारी, हे मेरी तुम, पृ. 13, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009) तो चिड़िया की मौत के साथ-साथ वे प्रकृति के प्रत्येक अंग की उदासी-दुःख को अभिव्यंजित करते हैं। इसी तरह की संवेदनशीलता ‘आज नदी बिलकुल उदास थी’ में भी दिखाई देती है। केदार ने अपनी कविताओं से स्पष्ट किया है कि प्रेम ही सबको जीत सकता है। उसके आगे काल की भी कुछ नहीं चलती। केदार ने लिखा है - "काल कलूटा बड़ा क्रूर है।/उसका चाकू और क्रूर है -/उससे ज़्यादा।/लेकिन अपना प्रेम प्रबल है।/हम जीतेंगे काल क्रूर को;/उसका चाकू हम तोड़ेंगे;/और जियेंगे;/सुख-दुख दोनों/साथ पियेंगे;/काल क्रूर से नहीं डरेंगे-/नहीं डरेंगे-/नहीं डरेंगे।" (काल कलूटा बड़ा क्रूर है, हे मेरी तुम, पृ. 14, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009) इसीलिए "प्रेम की ताक़त को कवि ने अजेय, क्रूर, काल को तोड़ने वाली कहा है। यही जिजीविषा है। इसी के बल-बूत आम आदमी अपनी अंतिम विश्व विजय के लिए आश्वस्त है। कवि इसी की ओर इशारा करता है, यह कहते कि, "हे मेरी तुम, यही खुशी है, प्यार न बदला।" (कमला प्रसाद, कविता तीरे, पृ. 128, वाणी प्रकाशन, 2009)

केदार कविताओं में केवल अपनी ही अपनी बात नहीं करते। उनके काव्य-संकलन ‘हे मेरी तुम’ और ‘मार प्यार की थापें’ में अभिव्यक्त ‘मैं’ स्वत्व की विवेचना से विस्तार पाकर ‘हम’ में तब्दील हो गया है और जग-जल-थल, यत्र-तत्र-सर्वत्र को समेटे हुए है। केदार ने ‘मार प्यार की थापें’ की भूमिका में लिखा भी है - "मैं मात्र निजी व्यक्तित्व का रचयिता कभी नहीं रहा और न मैंने आज तक अपने-ही-अपने को कविताओं में रचा है। मैं समाज और देश से ऊपर उठकर कोई ऊँचा या गैर आदमी नहीं बना और न मैंने ऐसा कुछ बनने का प्रयास ही किया। हाँ, यह अवश्य है कि एक दार्शनिक दृष्टि से, मैं, जग और जीवन के घटनाक्रम को देखता-समझता और परखता रहा हूँ और उनका मानवीय मूल्यांकन उसी के बल पर करता रहा हूँ। ऐसी रही मेरी प्रगतिशीलता - इसी से बनी है मेरी मानसिकता - यही मानसिकता कविताओं में व्यक्त हुई है। इसीलिए यह कविताएँ न क्षणिक अनुभूति की प्रामाणिकता की पुत्रियाँ हैं, न अकेलेपन की निजता की राजकुमारियाँ।" (भूमिका, मार प्यार की थापें, पृ. 5, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, 2009)

कमला प्रसाद ने इस बात को रेखांकित करते हुए लिखा है - ‘मार प्यार की थापें’ एवं ‘हे मेरी तुम’ की "कविताओं में अधिकांशतः एक ऐसा धरू, और ‘मैं’ के आमने-सामने का संसार है, जिसमें ‘हम’ का रूपांतरण संज़्ाीदगी के साथ हो गया है। कुछ और कविताओं में रोज़मर्रा की घटनाएँ अपने पूरे आकार में रच ली गई हैं। उनमें घटनाओं का राजनीतिक चरित्र और निहित मानवीय मूल्य का स्वरूप घुला-मिला तो है ही, अन्ततः वे कवि की रचना-प्रक्रिया में ढल-ढल कर कविताएँ बन गई हैं - उनका घटनापन छूट गया है। कविताओं से बाहर जैसा कि उन्होंने कहा भी है कि प्रगतिशीलता का कतई यह लक्ष्य नहीं होता कि कविता कविता न रहे, नंगी-बूची हो जाए और व्यक्ति अथवा राजनीति का बचन मात्र। कविता को संश्लिष्ट इकाई होना ही चाहिए। लेकिन ऐसा होने में उसे काव्यशास्त्रीय जामा नहीं पहनाना चाहिए। ऐसी कविता की प्रगतिशीलता नई मानसिकता की प्रगतिशीलता होती है जो दार्शनिक दृष्टि से बनती है और निरूपित होकर सत्य का समर्थन और असत्य का उन्मूलन करती है।" (कमला प्रसाद, कविता तीरे, पृ. 126-127, वाणी प्रकाशन, 2009)

अपने प्रेम से, दिल से बावस्ता होते हुए, अपने इर्द-गिर्द की चीज़ों को समेटते हुए केदार ने जो वर्णन किया है, वह जितना सरल है, उतना ही संश्लिष्ट भी। वह जीवन और प्रेम में आईं गुत्थियों को बड़े ही आसानी से सुलझाने वाला है। आज के समय में केदार के विशेषतः दो काव्य-संकलन - ‘हे मेरी तुम’ और ‘मार प्यार की थापें’ का बारंबार अध्ययन होना चाहिए। निश्चय ही ऐसा करने से बिखरे हुए रिश्तों और सिमटे हुए जज़्बातों को सही दिशा मिल सकती है। वास्तव में जीवन की पूँजी ‘एक-दूसरे का साथ’ है, ‘प्यार’ है और सर्वोपरि है ‘मानवीयता की भावना’। यदि एक-दूसरे का साथ ही छूट जाए और इन्सान असंवेदनशील-अमानवीय बन जाए, तब प्रकृति का मानवीकरण कैसे संभव होगा! ‘कोयल की कूक’ और ‘चिड़िया की चहचहाट’ से मन में उपजने वाली प्रेम-सौंदर्य भावना को परखने-जीने-जिलाने और रेखांकित करने के लिए संवेदनशील हृदय की ज़रूरत होती है और यदि संवेदनाएँ ही धीरे-धीरे संकटग्रस्त हो जाएँ तो किसी भी भावना से मानवीय मूल्यों को कैसे आत्मसात किया जा सकता है! ‘मैं’ का ‘तुम, हम और सब’ में अंतरण से ही जीवन को बेहतर दिशा मिल सकती है और औरों के दुःख-दर्द से बावस्ता हुआ जा सकता है। किसी भी भावना से पूरित होने के लिए ‘स्व’ का ’सत्व’ जानना और अन्य तत्वों का अंगीकार करना आवश्यक है, जिसे केदार की कविता से गुज़रते हुए महसूस किया जा सकता है।


डाॅ. अनिता पाटील
3014 सहायक प्रोफेसर क्वार्टर्स, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, आवासीय परिसर, नागक्कुड़ी, कंगलान्चेरी पोस्ट, तिरुवारूर-610 101
मोबाइल - 8508303014, ई-मेल -anitapatil.hcu@gmail.com

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