सर्पदंश : मिथक और तथ्य - भाग 2

डॉ. गोविंद माधव

डॉ. गोविंद माधव, एम. डी.

सर्पदंश की जानकारी वाले इस आलेख का प्रथम भाग सेतु के जून 2018 अंक में

अगर किसी को साँप काट ले तो क्या करना चाहिए? उसके पहले आइये इस मिथक से पर्दा उठायें कि हर साँप जहरीला और खतरनाक ही होता है। ज्यादातर साँप जहरीले नहीं होते, और ये भी आवश्यक नहीं कि विषधर साँप के काटने से भी हमारे शरीर में विष प्रविष्ट हुआ ही हो। लगभग 60 से 70 फीसदी लोग सिर्फ और सिर्फ डर के मारे घबराये होते हैं और उनमें मात्र घबराहट के लक्षण होते हैं।

कौन-कौन से साँप जहरीले हैं? चार कुख्यात नाम हैं - करैत, कोबरा, रसेल वाईपर और स्केल वाईपर। हमारे देश में सिर्फ इन चार प्रकार के साँप 95 फीसदी विषयुक्त सर्पदंश के कारण बनते हैं। खारे पानी में रहने वाले सभी साँप जहरीले होते हैं जबकि मीठे पानी में रहने वाले एकदम विषहीन। जलीय साँपों की पूंछ तैरने में सहायता करने के उद्देश्य से चिपटी होती है इसीलिए बहुत बार लोग इन्हें मछली भी समझ लेटे हैं। स्थलीय साँपों में विषधर और विषहीन में विभेद करने के लिए हमें उनकी शारीरिक बनावट को ध्यान से देखना होता है। विषधर साँपों के सर तिकोने आकार में पीछे फैले हुए होते हैं जबकि विषहीन साँपों में ये गोलाकार। आंख की पुतली सामान्यतः गोल होती है सभी जीवों में, मगर विषधर साँपों में यह स्लिट शेप्ड यानी पतली दरारनुमा होती है। अगर पेट की त्वचा में धारीदार स्केल्स की एक से अधिक पंक्तियाँ हों तो लगभग साँप विषहीन होते हैं जबकि विषधर साँपों के पेट में स्केल की एक ही पंक्ति होती है। साथ लगे चित्र में इसे देखा जा सकता है। विषधर साँपों के ऊपरी जबड़े में पंक्तिबद्ध दांतों के अलावा पीछे की और मुड़े हुए तथा अन्य दांतों से काफी लम्बे दो ‘विषदंत’ यानी ‘फैंग’ होते हैं। इसीलिए विषधर सर्पदंश के घाव यानी दांतों के निशान (बाइट-मार्क) में विषदंत के निशान मौजूद होते हैं। चित्र में इसे भी ध्यान से देखें, यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है सर्पदंश की गंभीरता का अंदाजा लगाने के लिहाज से।

विष यानी ‘स्नेक वेनम’ असल में है क्या और साँपों में विष क्यों होता है? विषहीन साँप तेज भागने में सक्षम होते हैं, अपने शिकार को जबड़े में जकड़ने के बाद उसके चहुँ-ओर लिपटकर उसे दम घोंटकर मार देते हैं। मरे हुए शिकार को निगलना आसान होता है। मगर सभी साँप इतने फुर्तीले और ताकतवर नहीं होते। इसीलिए प्रकृति ने उन्हें विषदंत प्रदान किया है। ऊपरी जबड़े में लगे दो विषदंत एक विशेष प्रकार की लार ग्रंथि से निकलने वाले रसायन को शिकार के शरीर में पहुँचाने वाले इंजेक्शन मात्र हैं। लार ग्रंथि हमारे पास भी है, और उससे निकलते लार में कई तरह के प्रोटीन निर्मित एंजाइम होते हैं जो भोजन को पचाने में मदद करते हैं। पाचन है क्या - खाद्य पदार्थ में मौजूद बड़े कणों को छोटे कणों में तोडना, फिर बड़े अणुओं वाले यौगिक-रसायनों को छोटे अणुओं में बदलना ताकि वे रक्त प्रवाह में शामिल होकर हर कोशिका तक पहुँच पायें और फिर ऑक्सीजन से अभिक्रिया कर के उर्जा यानी ATP पैदा कर सकें। बड़े मांसाहारी जानवरों के पास तो हाथ-पैर और बड़े जबड़े हैं जिनकी सहायता से वे मांस को नोच-खसोट कर और चबा-चबा कर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल लेते हैं। फिर लार में मौजूद एंजाइम बड़े अणुओं को तोड़ना प्रारंभ कर देते हैं। मगर असली पाचन की प्रक्रिया पेट में होती है जहाँ अमाशय की मांसपेशियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और अन्य रसायनों की मदद से ठोस भोजन को द्रवित ‘काइम’ यानी एक तरह के सूप में बदल देती है। मगर बेचारे साँप उन्हें तो शिकार साबुत ही निगलना होता है। अमाशय की जगह पूरे धड़ में एंठन पैदा करना पड़ता है। इसीलिए उन्हें ऐसे रसायनों की आवश्यकता होती है जो निगलने के पहले से ही भोजन को ‘तोड़ना’ और ‘गतिहीन’ करना शुरू कर दे। इन दोनों शब्दों पर ध्यान दें। दरअसल विष के भी मुख्यतः यही दो काम होते हैं- शिकार के शरीर को तोडना और शिकार को गतिहीन यानी पैरालाइज़ करना। हर साँप काविष कमोबेश इन्ही में से किसी एक काम के लिए बना होता है। इस आधार पर हम विषधर सर्पों का वर्गीकरण ऐसे करते हैं - ‘वैस्कुलोटॉक्सिक’ और ‘न्यूरोटॉक्सिक’।

विष साँपों के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह तो आप समझ ही गए होंगे। इसीलिए साँप जल्दी किसी पर विष का प्रयोग नहीं करते बल्कि शिकार के लिए बचा के रखते हैं। अगर साँप बहुत दिन से भूखे हों तो जाहिर सी बात है उनकी विषग्रंथि भरी हुई होगी और विषदंत जहाँ भी लगेंगे, अधिक मात्रा में विष इंजेक्ट करेंगे।

वैस्कुलोटॉक्सिक साँपों में सबसे कॉमन और खतरनाक नाम है ‘वाइपर’। इन्हें भारत में जाड़ा बहिरा, सियारचंदा, पत्थरचट्टा, चित्तेबरवा, कौड़िया आदि नामों से जाना जाता है। चित्र में आप देख सकते हैं कि नाम के अनुरूप ही इनके शरीर पर गोल-गोल सिक्के जैसे निशान बने होते हैं। ये पथरीले इलाकों, चट्टानों या निर्जन स्थानों पर रहते हैं। ये बहुत ही सुस्त और शांत साँप हैं। मनुष्यों से दूर ही रहते हैं। अक्सर सड़क पार करते समय गलती से इनके ऊपर पैर पड़ जाने से ये आत्मरक्षा में काट लेते हैं।

वैस्कुलोटॉक्सिक विष शिकार के शरीर में प्रवेश करते ही ऊतकों को गलाना शुरू कर देता है। इसीलिए घाव के स्थान पर सूजन और दर्द शुरू हो जाता है जो लगातार बढ़ता ही जाता है। रक्त कोशिकाएं टूटने लगती है, छिन्न-भिन्न रक्तकण रक्तवाहिकाओं के प्रवाह में उथल-पुथल मचा देते हैं, खून में ‘द्रव और ठोस कणों के बीच का संतुलन’ बिगड़ जाता है, कहीं खून जमने लगता है तो कहीं से बहने लगता है। रक्तवाहिकाओं यानी धमनी और शिराओं की दीवार भी तहस-नहस होने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप रक्तचाप (ब्लडप्रेसर) लगातार कम होने लगता है, इस स्थिति को ‘हाइपोटेंसिव शॉक’ कहते हैं। जब रक्तचाप ही नहीं तो रक्त का प्रवाह कैसे हो? शरीर के शेष अंगों में पर्याप्त खून और उसमें घुले ग्लूकोस, ऑक्सीजन आदि की आपूर्ति कम होने लगती है, परिणामस्वरूप अंग एक-एक करके तबाह होने लगते हैं। नष्ट होते ऊतकों के टुकड़े किडनी (गुर्दे) की संकरी धमनियों और केशिकाओं में अटक जाते हैं, परिणामस्वरूप ‘किडनी फेलियर’। मेडिकल भाषा में इसे ‘एक्यूट रेनल फेलियर’ या ‘एक्यूट किडनी इंजरी’ भी कहते हैं, एक्यूट इसीलिए क्योंकि सब कुछ अचानक से हो जाता है। किडनी का मुख्य काम है शरीर के जल-वार्धक्य के साथ यूरिया और अन्य उत्सर्जी हानिकारक पदार्थों को मूत्ररूप में बाहर निकालना। किडनी फेलियर की स्थिति में मूत्रनिर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है तो शरीर में पानी जमा होने लगता है, शरीर फूलने लगता है। हानिकारक यूरिया आदि रसायन शरीर के आंतरिक क्रियाकलाप में बाधा पहुँचाने लगते हैं, हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े आदि प्रभावित होने लगते हैं। त्वचा पर लाल चकत्ते आ सकते हैं, लाल पेशाब निकल सकता है। वैस्कुलोटॉक्सिक सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति के खून को निकालकर अगर एक परखनली या वायल में छोड़ दिया जाये तो 20 मिनट के बाद भी ये खून नहीं जमता, द्रव ही बना रहता है, ट्यूब को उलटने पलटने पर पानी की तरह सरकता है। जबकि स्वस्थ व्यक्ति या विषहीन सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति का खून 20 मिनट में जम जाता है, उलटने पर सिर्फ सीरम ही सरकता है, रक्तकण और प्लाज्मा पेंदी में चिपके होते हैं। इस साधारण से टेस्ट से हम कितनी आसानी से और बड़े कम समय में ही यह महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर लेते हैं कि वैस्कुलोटॉक्सिन शरीर में प्रविष्ट हुआ है या नहीं। हालाँकि ऊपर बताये अन्य लक्षणों पर भी गौर करना बहुत आवश्यक है। एक और बात, कई बार लोग सर्पदंश के घाव के ठीक ऊपर अंग को रस्सी से बांध देते है, इस से विष का प्रसार तो नहीं ही रुकता बल्कि वहाँ रक्त प्रवाह रुकने के कारण ऐसे ही सूजन बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि ये सूजन विष की वजह से है या बंधने की वजह से। कुछ लोग घाव में ब्लेड या किसी दूसरे नुकीले औजार से चीरा लगा देते है, इस विश्वास से कि विष खून के साथ बह जायेगा। विष तो नहीं बहता, उल्टे बहता खून विष के प्रभाव को देखने में बाधा उत्पन्न करता है, घाव में इन्फेक्शन, टेटनस आदि जैसे गंभीर परिणामों का खतरा बढ़ता है सो अलग से। अगर पीड़ित का कुछ फायदा ही पहुँचाना है तो बस इतना कर सकते हैं कि सर्पदंश के तुरंत बाद घाव को साफ़ पानी से धो सकते हैं, अंग को सीधा इस तरह रख सकते हैं ताकि वह ज्यादा हिले-डुले नहीं, मरीज को ज्यादा से ज्यादा पानी पिला सकते हैं। हालाँकि एक समय-सीमा के बाद ये सब भी हानिकारक हो सकते हैं इसीलिए जल्द से जल्द डॉक्टर के पास पहुँचने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए।

वैस्कुलोटॉक्सिक विष-प्रभाव की गंभीरता के हिसाब से डॉक्टर पीड़ित को टेटनस का टीका, दर्दनिवारक सुई, संक्रमण रोकने के लिए एंटीबायोटिक, रक्तचाप बढ़ने के लिए आइवी फ्लूइड में डोपामिन- नॉर एड्रीनलीन, खून में गड़बड़ी जैसे हेमोलिसिस या डीआईसी जैसी जानलेवा स्थिति के उपचार के लिए ताजा खून या प्लाज्मा आदि देते हैं। किडनी फेलियर की स्थिति में डायलिसिस की भी आवश्यकता पड़ती है। कभी कभी गैंग्रीन बन जाने की स्थिति में पैर या हाथ जैसे अंगों को काटने की भी नौबत आ जाती है। लेकिन जो सबसे आवश्यक उपचार है वह है- ‘एंटीटॉक्सिन’ जिसकी चर्चा हम आगे करने वाले हैं। यहाँ बस इतना समझ लें कि समय पर इलाज शुरू हो जाए तो करीब 98 प्रतिशत मरीज बचाए जा सकते हैं।

न्यूरोटॉक्सिक सर्प यानी करैत और कोबरा। करैत चमकीले रंग का दुनिया का सबसे जहरीला साँप माना जाता है। इसके बारे में हम पिछले आलेख में बात कर चुके हैं। कोबरा यानी नाग, नागराज, फनिक, गेहुँअन या फन धारी सर्प जिसके मस्तक पर बने चिन्ह को हिन्दू मान्यताओं में कृष्ण के चरण चिन्ह या शंख की आकृति के रूप में देखा जाता है।

न्यूरोटॉक्सिक सर्पदंश के प्रभाव से शिकार का ‘तंत्रिकातंत्र’ यानी दिमाग, तथा उसे पूरे शरीर से जोड़ने वाली नसों के जाल और मांसपेशियों का नियंत्रण सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। असल में न्यूरोटॉक्सिन हमारी ‘नर्व्स’ के इलेक्ट्रिकल सिग्नलिंग एवं संचालन में रुकावट पैदा करता है। मस्तिष्क अब शरीर की विभिन्न ऐच्छिक और उसके बाद अनैच्छिक गतिविधियों को नियंत्रित नहीं कर पाता है। पीड़ित की संवेदनशीलता और क्रियाशीलता घटने लगती है। यह एक तरह का लकवा ही है, जब पीड़ित चाहकर भी अपनी मांसपेशियों का प्रयोग नहीं कर पाता। सर्पदंश मस्तिष्क के जितने निकट हो, प्रभाव उतना ही शीघ्र प्रकट होने लगता है। यदि करैत सोये हुए आदमी की गर्दन में डस ले तो चूँकि विष-प्रभाव से नसें काम करना बंद कर देती हैं, दर्द का भी अनुभव नहीं होता। कई बार तो पीड़ित की मौत नींद में ही हो जाती है, अनजान सन्नाटे वाली मौत। अगर साँप ने पैरों में डसा हो तो विष को मस्तिष्क तक पहुँचने में समय लगता है। विष के प्रभाव से सबसे पहले आँखो की पलकें भारी होने लगती है। पूर्णतया होश में होते हुए भी व्यक्ति आँखें पूरी तरह से खुली नहीं रख पाता है। धीरे-धीरे अन्य मांसपेशियाँ भी कमजोर होने लगती हैं। सबसे गंभीर स्थिति तब होती है जब डायाफ्राम तथा साँस लेने में मददगार अन्य पेशियाँ भी कमजोर पड़ने लगती है, तब साँस लेने में तकलीफ होने लगती है, आदमी अपनी बात एक साँस में पूरी नहीं कर पाता है, शरीर में ऑक्सीजन का स्तर घटने लगता है तथा कार्बनडाइऑक्साइड का स्तर बढ़ने लगता है, त्वचा का रंग नीला पड़ने लगता है, मुंह में स्रावित होनेवाले लार को भी घोंटना मुश्किल हो जाता है इसीलिए मुंह में एकत्रित हो रहा लार एक कोने से हलके फेन की शक्ल में बाहर निकलने लगता है जब इंसान बेहोश हो रहा होता है तब। अगर साँसे कमजोर होकर रुक जाती हैं तो मृत्यु निश्चित है।

न्यूरोटॉक्सिक सर्पदंश से इन्सान पल भर में काल के गाल में समा सकता है, इसीलिए यहाँ शीघ्रातिशीघ्र उपचार की आवश्यकता है। अगर ऊपर बताये गए लक्षण आ रहे हों तो जितनी जल्दी हो सके पीड़ित को डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। अगर सांस लेने में हल्की-फुल्की परेशानी हो तो सिर्फ ऑक्सीजन मास्क लगाने से भी काम चलता है लेकिन तब स्थिति गंभीर हो जाती है जब इन्सान फेफड़ों को जरा सा भी फैला-सिकुड़ा नहीं पा रहा होता है। ऐसी स्थिति में गले से होकर फेफड़े तक एक रबर की नली (इंडोट्रैकियल ट्यूब) घुसाई जाती है जिसे बाहर एक गुब्बारे जैसे बैग (अम्बु बैग) से जोड़ा जाता है। इस बैग को हाथ से दबाने से दबाव उत्पन्न होता है और प्रेशर के साथ हर साँस अन्दर धकेली जाती है। हॉस्पिटल में पहुँचते ही इस रबर की नाली को एक मशीन से कनेक्ट कर दिया जाता है जिसे वेंटिलेटर कहते हैं। यह स्वचालित यंत्र ज़रूरत के हिसाब से कृत्रिम साँसें पीड़ित को देता रहता है, तब तक विष के प्रभाव को कम करने के अन्य उपाय किये जाते हैं। विष की काट के रूप में एंटीटॉक्सिन यहाँ भी आवश्यक है। मांसपेशियों की कमजोरी से उबरने के लिए निओस्टिगमिन नामक इंजेक्शन का प्रयोग किया जाता है, मगर इसके कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं जिसे रोकने के लिए साथ में एट्रोपिन का इंजेक्शन दिया जाता है।

यद्यपि किसी भी दवा का प्रयोग बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं करना चाहिए वरना गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। लेकिन करैत या कोबरा का सर्पदंश इतना घातक होता है कि कई बार लोग अस्पताल तक पहुँच ही नहीं पाते। भारत में अस्पतालों और चिकित्सकों की उपलब्धता तो किसी से छुपी हुई नहीं है, आधे लोग तो अभी भी झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे जिन्दा हैं। इसीलिए प्राणरक्षा के उद्देश्य मात्र से मैं इन दवाओं के बारे में विस्तार से बता रहा हूँ, मगर इनका प्रयोग किसी प्रशिक्षित चिकित्सक की निगरानी में ही होना चाहिए। साँस लेने में परेशानी महसूस कर रहे वयस्क को निओस्टिगमिन इंजेक्शन 1 मिलीलीटर आईवी हर 5 मिनट पर दिया जाता है, और एट्रोपिन का एक एम्पल हर 15 मिनट पर। यानी निओस्टिगमिन के तीन डोज पूरे होने पर एट्रोपिन का एक डोज। स्थिति में सुधार होने पर यह अन्तराल बढाया जाता है। एट्रोपिन के प्रभाव से आदमी में थोड़ी देर के लिए पागलपन या बुखार के लक्षण दिख सकते हैं मगर इनसे घबराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि दवा बंद होते ही ये लक्षण स्वतः ही मिट हो जाते हैं।

एंटीटॉक्सिन क्या है? यह कैसे काम करता है? विष काटने के लिए इसकी कितनी मात्रा दी जाती है? इसके क्या दुष्प्रभाव हैं? क्या झाडफूंक से भी सर्पदंश ठीक हो जाता है? क्या सर्पदंश से मृत व्यक्ति दुबारा जीवित हो सकता है? क्या विषहीन सर्प के दंश में भी उपचार की आवश्यकता है?

इन सब प्रश्नों के उत्तर के लिए अगले अंक की प्रतीक्षा करें। (क्रमशः)
सम्पादकीय नोट: रांची, झारखण्ड निवासी डॉ. गोविंद माधव, एमबीबीएस, एमडी (मेडिसिन) द्वारा आरम्भ किया गया यह नया स्तम्भ सेतु के पाठकों को स्वास्थ्य, सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी देने के उद्देश्य से सेतु के आगामी अंकों का स्थायी अंग होगा। शिक्षा और व्यवसाय से चिकित्सक डॉ. माधव साहित्यकार भी हैं।

4 comments :

  1. बहुत उपयोगी आलेख। कृपया प्रथम भाग का लिंक भी इसी लेख में दें । आगामी अंक की प्रतीक्षा है

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  2. Nice one.. Where are the pictures as mentioned in the article

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