साँप और तोरी की बेल

कादम्बरी मेहरा
- कादम्बरी मेहरा

 *** 1 ***
लाजो?
निरी लाजवंती! सुन्दर, सुशील, सुघड़!
सुलक्खन?
उसी के जैसा लंबा ऊँचा मगर पूरा लट्ठमार रांगड़!

दोनों का ब्याह हो गया। लाजो सत्रह अठारह की। सुलक्खन बीस साल का। जवानी दीवानी! अटूट प्रेम जागा!
लाजो के माँ जैसी एक बड़ी बहन और सात भाई। सुलक्खन के बस एक छोटा भाई जगता, गाँव का गुंडा।
सब जानते थे कि लाजो का ब्याह उसके ससुर मंगतराम की दस भैंसें और पाँच बीघा ज़मीन देखकर हुआ था। मंगतराम की बीबी घसीटी, कुख्यात घमंडी! घसीटी के दोनों पुत्तर, न काम के न काज के, नौ मन अनाज के!
बहू आ गयी मेहनती और अकलवाली। सुलक्खन तो सुधरने लगा मगर जगता? राम भजो जी! ना शरम ना इज्ज़त! गाँव भर की जवान बहू बेटियों का सिरदर्द!
घसीटी उसपर जी जान से निछावर। पेट पोंछानी औलाद जो ठहरा। बाप को काम से फुर्सत नहीं। यूँ भी वह कम ही दखल देता था। खेत से थकाहारा घर आता तो खाना आदि खाकर, नीम तले चारपाई बिछाकर, गुड़गुड़ी खेंचता।
चार वर्ष गुज़र गए लाजो के ब्याह को। दो पुत्रियाँ आ टपकीं। तीसरे ने भी ऐलान कर दिया। घसीटी की नज़रों में बेटियाँ अवांछित उधार थीं जो कभी नहीं चुकता। सुलक्खन की जेबें ख़ाली। बापू के ढोर डंगर, बापू के खेत। खानेवाले मुँह, सुलक्खन के और लाजो के।
घसीटी की जुबान, सान पर चढ़ी छुरी! बिजलियाँ छूटतीं उससे!
पर ग्रह तो घूमते रहते हैं और दिशा चक्र बदलते रहते हैं।
लाजो का भी भाग्य पलटा। सुलक्खन का दूर का मामा विलायत से आया तो हाथ पैर जोड़कर सुलक्खन भी साथ हो लिया। यह वह समय था जब इंग्लैंड के दरवाज़े काम करने वालों के लिए खुले थे। लाजो के सौभाग्य का जश्न मनाया गया। मंगतराम ने जगराता किया। लाजो सर पर बिन्डला, उसपर मटकी, मटकी पर दिया रखकर "जागो आईया" गाती हुई पूरे गाँव में नाची। घर घर दीवा बालती आशीर्वाद लेती घूमी। उसकी करारी आवाज़ पर सब कुर्बान।
सुलक्खन जाने लगा तो लाजो ने रो-रोकर वादा लिया कि उसे जल्दी बुला लेगा। मगर...

अभी पंद्रह दिन ही बीते थे सुलक्खन को गए कि सास ने अपनी मुँह लगी भतीजी निक्की से पुछवाना शुरू कर दिया कि लाजो कब मायके जायेगी। निक्की ने घुमा फिरा के पूछा तो लाजो ने हंसकर जवाब दिया कि मैं अपना घरबार छोड़कर क्यों जाऊँ। वहाँ मेरा मन नहीं लगेगा।

मगर घसीटी को उसका खाना पीना भारी पड़ने लगा। लाजो ने होंठ सी लिए। चुपचाप बोलियाँ ताने थप्पड़ों के बीच दिन काटने लगी। रोज़ सुबह शाम का मिलाके बीस किलो दूध का दही बिलोती। मक्खन निकलता तो घी बनाती। बेच्कर पैसा आता तो मंगतराम की टेंट में। सुलक्खन का मनी-ऑर्डर उसी के नाम से आता। वही अंगूठा छापती रसीद के पर्चे पर अगर पैसा आता तो मंगतराम की टेंट में।

अगर लाजो रोटियाँ न सेंकती तो शायद वह भी उसे नसीब न होतीं। अपनी दोनों नन्हीं बेटियों के लिए उसने चोरी करना सीख लिया था। चुपचाप रोटियाँ तहाकर वह अपनी कुर्ती की जेब में डाल लेती और इसी तरह चुराए हुए मक्खन के साथ बुर्कि बुर्कि तोड़कर खिला देती। पैसा बाहर से आने लगा तो मंगतराम की दम-चिलम भी बढ़ गयी। जाने क्या था उसके धुएँ में कि लाजो की साँस घुटने लगती थी। चिलम के बाद देर तक मंगतराम आँखें मूंदे चारपाई तोड़ता रहता था। ना कुछ देखता था ना सुनता था।

मगर इन सबसे लाजो को कोई डर नहीं था। वह जी तोड़ काम करती और अपनी जरूरतों को पूरा करने का रास्ता निकाल लेती। डर था तो लफंगे देवर जगतराम से। जबसे सुलक्खन ने देश छोड़ा था जगता कहीं न कहीं उसको अपने आस पास डोलता नज़र आ जाता था। देखने में, क़द काठी में वह अपने भाई से इतना मिलता था की शुरू शुरू में लाजो कई बार धोखा खा चुकी थी।

अब तो कह लो कि वह पक्की हो गयी थी, तीसरे बच्चे की माँ बनने वाली थी मगर जब वह निपट अजानी नई नवेली थी, एक दिन भारी गलती कर बैठी।

सावन भादों की सुरमई ऋतु में खेत पर सब्जियाँ तोड़ने गयी थी। रहट के पास, सूखे जामुन के पेड़ पर तोरी की बेल फैली थी। वह अभी तोरियाँ उतारने के लिए सोच ही रही थी कि देखा पेड़ की आड़ में सुलक्खन उसकी तरफ पीठ करके खडा है। लाजो ने टोकरी चुप चाप ज़मीन पर रखी और दबे पाँव उसके पीछे जा पहुँची बिना शब्द किये अपनी चूड़े वाली बाँहें उसके गिर्द लपेट कर अपने गाल उसकी पीठ पर रगड़ने लगी। तभी वह ठठाकर हँसा और घूमकर बोला, "तो फिर देर क्या है? आ जा!"

लाजो के काटो तो खून नहीं। यह तो जगता था जिसे वह सुलक्खन समझ बैठी थी। लाजो भागी। टोकरी भी वहीं फेंक दी। सीधी तीर सी घर में घुसी और अपनी कोठरी में जाकर कुंडा अन्दर से चढ़ा लिया। तब तो वह नई नई थी। सास उसे पूछती थी। उसने पूछा, "अरी क्या हुआ?"

लाजो सहमी सहमी धड़कते कलेजे से बोली, "कुछ नहीं बेबे, तोरी की बेल में साँप था हरे रंग का। मैं बाल बाल बच गयी।"
"बरसाती मौसम। डंडी साथ रखा कर।" कह कर सास चली गयी।

लाजो ने यह बात किसी को नहीं बताई। सुलक्खन को भी नहीं। मगर उस दिन से उसके मन में प्रेम का वह उन्माद हमेशा के लिए मर गया। पति का सानिध्य भी एक कर्तव्य मात्र रह गया। वह कभी अपने आप को माफ़ नहीं कर पाई। न ही कभी उसका घूंघट सर पर से खिसका। हर तरह से वह कोशिश करती कि जगतराम के सामने ना पड़े। मगर जगतराम को शर्म छू नहीं गयी थी। लाजो का तन मन उसे देखते ही घिन्ना उठता था।

सुलक्खन के विदेश जाने के बाद जाने क्यों उसे खड़का बना रहता कि जगता उस पर वार ना कर दे। उसका घूरना, बहाने से रास्ते में सामने आकर उसे चौंकाना आदि हरकतें उसे देवर की ओर से सतर्क रखतीं। जैसे तैसे तीन महीने और बीत गए। लाजो का पेट दिखने लगा था। पाँचवाँ महीना पूरा हो चला था। इधर सास को पिस्सू पड़ रहे थे कि अगर लाजो मायके ना गयी तो जचकी उसे ही करवानी पड़ेगी। लाजो चुप मार जाती। पैसा उसका पति भेज रहा था। भैंसों में एक भैंस उसकी भी थी जो उसके बापू ने उसे शादी में दी थी। दूध दही मक्खन आदि वही बनाती थी। क्यों न यहीं बैठ कर खाती। उसी का था सब कुछ।

मगर जहाँ कुमति का राज हो वहाँ की धरती दलदल की होती है। कलेश - हत्थी घसीटी को हर बात का बतंगड़ बनाने में महारथ हासिल थी। किसी भी बात को लेकर दुहाई देने लगती, हाय मुझे बेईज्ज़त किया। पति और बेटे के कान भरकर झूठ-मूठ की सहानुभूति बटोरती और बहू को कोसती। फिर मोहल्ले भर में गाती की बहू को खसम की कमाई पर घमंड है। निक्की उसके झूठ में उसकी सहायक।

एक सुबह चार बजे लाजो रात को जमाया दही बिलोने बैठी। सारा घर अभी सो रहा था। मक्खन बनाने का यही समय होता है। उधर जगतराम दूध चुआने भैंसों के तबेले में गया हुआ था। लाजो पीढ़े पर बैठी, घुटनों से दही के माट को थामे दोनों बाहों से मथानी चला रही थी कि अचानक जगता पीछे से आया और उसके गिर्द अपनी बाहें डाल दीं। लाजो छूटकर बिजली की फुर्ती से सामने छलांग लगाकर दौड़ गयी। दही का माट लुढ़क गया और जगता मुँह के बल सामने जा गिरा। माथे में चोट लगी और होंठ कट गया। लाजो अपनी कोठरी में घुस गयी और कुंडा चढा लिया। जगतराम उठ न पाया। मटकी में अटकी मथानी उसकी छाती में धंस गयी थी। शोर सुनकर मंगतराम की आँख खुल गयी। पौ अभी नहीं फटी थी। झुटपुटे में बेटे का हाल और चारों तरफ बिखरा छाछ देखकर उसका पारा चढ़ गया। वहीं अपने पलंग पर उठ बैठा और गालियाँ बकने लगा।

"कितनी बार कहा कि रात को देर तक बाहर ना रहा कर। ऊपर से पीकर आ जाता है। देखकर नहीं चला जाता अंधे?चार रुपये के मक्खन का नुकसान कर दिया? चार रुपये में पाँच किलो दाल चढ़ती है। आप कुछ कमाना नहीं। घर का है तो मोरी में लुढाना नालायक ना हो तो। "

तभी घसीटी भी वहाँ आ गयी। लाजो को उसने भी नहीं देखा था। जगतराम उठकर बाहर जा चुका था। अतः उसने बहू को कोसना शुरू कर दिया, "महारानी अभी तक सो रही है। वखत वेले छाछ बिलोती तो नुकसान तो न होता। आये बाहर ज़रा तो झोंटा नोचूँ इसका। हड्ड-हरामी अभी निकल जाएगी।"

लाजो अपमान और मार की आशंका से डर कर अन्दर बैठी रोती रही। दिन चढ़ने लगा। जब घसीटी को दूध उबालना पडा और चूल्हा जलाना पड़ा तब वह ज़रा पिघली। लाजो के दरवाजे के पास मुँह ले जाकर बोली, "अरी अब कुछ खाए पीयेगी भी या पेट के बच्चे को भूखा मारेगी?"

लाजो डरती डरती बाहर निकली रसोई के सारे धंधे समेटे। मगर मन ही मन ठान लिया कि इतनी मेहनत करके तो वह कहीं भी दो रोटी का जुगाड़ कर लेगी। उसी दिन दोपहर में जब सब सो रहे थे उसने जरूरी सामान की गठड़ी बाँधी। भैसों के तबेले में से अपनी भैंस खोली ज़ेब में आठ रुपये की अपनी कुल संपत्ति संभाली और चिलचिलाती धूप में दोनों बेटियों को साथ ले निकल पडी। भैंस की पीठ पर उसने गठरी और बड़ी बेटी को बैठाया, छोटी को गोद में संभाले वह खेतों खेतों निकल ली।

*** 2 ***
उसकी माँ का गाँव छः कोस पर था। डामर की सड़क पर आते आते उसके पैर जलने लगे। तभी एक बैलगाड़ी नज़र आ गयी। पूछने पर उसने बताया कि वह केवल दो कोस दूर पर मल्लीकोट नामक गाँव तक जा रहा था। लाजो को हल्का सा याद था कि उसकी बड़ी बहन वहीं आस पास रहती थी। आज वहाँ तक ही सही। बाद में बहन उसे घर भिजवा देगी। ऐसा सोचकर उसने गाडीवान से सिर्जन चौधरी के बारे में पूछा। सिरजन मल उसका जीजा था। गाड़ीवान उसे जानता था। एक रुपये में तय करके लाजो बैठ गयी। भैंस को पीछे बाँध दिया। शाम गहराने से पहले पहले लाजो बड़ी बहन के घर बिना बुलाये आ गयी।

सिरजन चौधरी जात का कुम्हार था। दस बीघे पुश्तैनी ज़मीन पर गन्ना उगाता था। खाने को बहुतेरा था उसके पास क्योंकि कोई व्यसन नहीं पाल रखा था। गाँव का सरपंच था। आस पास के गावों में उसकी इज्ज़त थी। वह नेकदिल इंसान था और कर सकता था तो सदा सबकी मदद के लिए तैयार रहता था।

लाजो की हालत देखकर ही वह समझ गया कि लड़की दुःख काट रही है। जगतराम की काली करतूतों की कहानियाँ बिरादरी में मुँह काला करवा रही थीं। मंगतराम के नशे पानी के भी चर्चे थे। उसने सहर्ष उसे शरण दे दी। लाजो चुपचाप उसकी बखरी के एक कोने में बनी कोयला रखने की कोठरी में साफ़ सफाई करके दुबक गयी। भैंस का दूध बेचकर पैसे भी उसकी जेब में आने लगे। उसकी व्यवस्था और सुघड़ाई मिल जाने से बहन का भी हाथ थोड़ा खुला।

समय आने पर लाजो ने एक पुत्र को जन्म दिया। अबतक घसीटी ने एकबार भी न पता किया था की लाजो और उसकी दोनों बेटियाँ कहाँ गईं। हालांकि बात छुपी न रही कि लाजो अपनी बहन और जीजा के घर पड़ी हुई थी। पर जब सुना कि पुत्र हुआ है तो झट नाइन को भेज दिया बुलाने के लिए। सिरजन चौधरी ने साफ़ साफ़ मना कर दिया। लाजो और सुलक्खन के बेटा हुआ है यह कहकर भांडों से ढोल भी बजवा दिया। अब घसीटी की बड़ी बदनामी हुई।

"लड़की सुलच्छनी ना होती तो क्यूँ चौधरी उसका जिम्मा उठाता? मंगतराम और उसकी बीबी हैं ही कुपत्ते। सारा काम करती थी और सांड देवर की रोटियाँ पेल रही थी। अब अपने बल बूते बच्चे पाल लेगी।" जेठानी और शरीके के ताने सुनकर घसीटी ने खुद मंगतराम को भेजा। उसने दलील दी कि घर में जनानियों में छोटी मोटी तकरार तो हो ही जाती है। इससे शरीफ घर की बहूएँ घर की इज्ज़त से नहीं खेल जातीं।"

"घर की इज्ज़त बाद में मंगतराम। औरत को पहले अपनी इज्ज़त की परवाह होती है। जा पूछ अपने छोटे से जिसे तू सरकारी सांड बना कर घुमा रहा है। बाहर का पैसा तेरे दिमाग पर चढ़कर बोल रहा है। लाजो के बच्चों को ना रोटी ना फल। तेरी आँख का पानी मर गया है चरस के नशे से। क्या तूने सुलक्खन को बताया कि लाजो कहाँ है? नहीं ना? अब जा। आज के बाद लाजो का मनी आडर मेरे पते पर पहुँच जाएगा और तू देखता रहेगा।" चौधरी ने गंभीरता से उसे डांटा।

मंगतराम अपना सा मुँह लेकर वापस चला आया। चौधरी ने लाजो के पैसे अपने घर मंगवाने का इंतजाम करवा दिया। लाजो ने जीजा के पैर छू लिए। मगर इस बात को लेकर जगतराम ने बहुत झगड़ा फसाद किया। डाक बाबू को मारा पीटा। चौधरी चार तगड़े जवानों को लेकर मंगतराम के घर गया और "निकाल बाहर जगते को" की गुहार लगाई। मंगतराम खुद मिमियाता हुआ आया, "चौधरी जी हुकुम करो। सब आपका ही है, मगर बेटे की कमाई पर माँ बाप का भी तो हक होता है। उसकी माँ दिन रात रोती है।"

"ठीक है। आधी रकम तेरी, आधी लाजो की। मत भूल उसके सात भाई हैं और एक जीजा। और तेरा सिर्फ जगता।" धमकी देकर वह उलटे पैरों वापस लौट गया। लाजो को उसने पोस्ट ऑफिस में ही पैसा जमा करने का तरीका सिखाया।

लाजो रोज़ पीर मनाती मत्थे टेकती। तावीजें पहनती कि किसी तरह सुलक्खन उसे बुला भेजे। तीन बरस और गुजर गए। तभी जीजे का फुफेरा भाई गाँव आया। उसका साला इंग्लैंड जा रहा था। उसे सुलक्खन के पते ठिकाने की दरकार थी ताकि जाते ही उसे पैर टिकाने का ठिया मिल सके। उसका नाम था भूषण। तमाम ही हुज्जत के बाद आखिर मंगतराम ने पता दे दिया। जब वह सुलक्खन से मिला तो देखा वह दिन भर सड़क पर रोड़ी बिछाने का काम करता था। रात को मुर्गी व रोटी पेट भरकर खाता और गट गट शराब पीकर सो जाता। एक सामूहिक आवास में रहता था मगर तनखा के पैसे जोड़कर एक घर खरीद रखा था जिसकी किराए की आमदनी बना ली थी। थोड़ी बहुत काम चलाऊ अंग्रेजी सीख ली थी मगर उसका ओछापन ना गया न ही उसकी भाषा में सुधार आया।

हफ्ते बाद ही भूषण की भी नौकरी लग गयी। वह भी मजदूरी पा गया। वहीं उसी घर में उसे भी एक बिस्तर मिल गया। एक दिन शराब के नशे में सुलक्खन ऊँचे ऊँचे गाने और बोलने लगा। भूषण ने उसे शांत करने की कोशिश की तो वह बिफर कर बोला, "कौन है मेरे जैसा यहाँ? मैं मकान मालिक हूँ। मेरे बैंक में बारह सौ पौंड हैं। मेरे गाँव में दस..." भूषण को ताव चढ़ गया। वह भी गरजा, "बड़ा आया पैसेवाला। बीबी तेरी जीजे के करेले तलती है। पाँच-पाँच साल की तेरी कंजकां लोगों के भांडे मलती हैं। तेरा एक ही एक पुत्तर जूठे निवाले खाकर पल रहा है। फिट्टे मू तेरे पैसे का। तेरे मकान पर फाहे रखने हैं, अगर तेरे बच्चे बेघर पड़े हैं तो?"

सुलक्खन कटी पतंग सा नीचे नीचे तिरने लगा। "क्या बोला? मेरी लाजो अपने बाप के घर नहीं रहती?"

"नहीं! उसके बाप को तो जब तेरा लड़का हुआ तब भांडों ने खबर दी। भाई उसे लेने आये तो लाजो ना मानी। सिर्जनमल ने उन्हें फटकार कर भगा दिया। जबसे लाजो का घरवाला इंग्लैंड गया तुम सबने बहन की खबर नहीं ली कि वह जीती है या मर गयी। अब जब वह यहाँ चुप चाप सर ढाँक के पड़ी है तो तुम लेने आये हो। क्या धरा है तुम्हारे घर जो चार मुँह और खिलाओगे? दो हफ्ते में वापस उसी नर्क में ठेल दोगे इज्ज़त के नाम पर। लाजो मुझपर बोझ नहीं है। इसलिए तुम सब जाओ। सो लाजो भाभी जीजे के तबेले में पड़ी है नौकरानी बनकर।"

सुलक्खन को जैसे सर पर डंडा पडा हो। उसके माँ बाप ने उसे झूठ कहा था कि वह झगड़कर मायके चली गयी। और अपनी भैंस भी ले गयी। इसी गुस्से में उसने कभी लाजो को पत्र नहीं डाला न ही उसके पत्रों का जवाब दिया। अगले महीने ही उसने लाजो को बुला भेजा।

*** 3 ***
लाजो तन के चांदी के गहने, जोड़े हुए रुपये आदि सब अपनी बहन की बेटियों को देकर विदा हो ली। अपनी भैंस उसने अपने छोटे भाइयों को दे डाली।

दो दिन बाद वह इंग्लैंड की बर्फीली धरती पर तीन नन्हें बच्चों को चिपटाए आ खड़ी हुई। मगर सारी ठण्ड सुलक्खन को देखते ही काफूर हो गयी। शरमाकर उसने सर का दुपट्टा और आगे खींच लिया। बाप ने तीनो बच्चों को अंक से लगाया तो उसके आँसू निकल पड़े। उस भाव बोझिल क्षण में उसकी दृष्टि सुलक्खन के पार, पीछे खड़े भूषण की आँखों में जा अटकी जिसकी बदौलत उसे यह सुख मिला था। अचानक सुलक्खन ने उसकी कलाई पकड़ ली और कांपते हाथों से चार सोने की चूड़ियाँ पहना दीं। लाजो नत मस्तक नीर बहाती रही मानो संकल्प ले रही हो फिर कभी जुदा न होने का।

नई ज़िंदगी नया जीवन, मेहनती को क्या देश क्या परदेश। अंग्रेजी आती न थी। बच्चे स्कूल जाने लगे। लाजो घर बैठी ही सौ धंधे ढूंढ लेती। बच्चों से ही उसने काम चलाऊ शब्द सीखने शुरू कर दिए। वह उन्हें अपना गुरु मानती थी। रानी की दूकान में जब सब्जी तरकारी लेने जाती अपनी बड़ियाँ और अचार भी रखवा आती बेचने के लिए। डिमांड बढ़ने लगी। फिर समोसे सप्लाई करने लगी। सुलक्खन ने नौकरी छोड़ दी। पास ही के पेटीकोट लेन मार्किट में अपना स्टाल लगाने लगा। लाजो ने इंग्लैंड में एक और बेटे को जन्म दिया। जैसे जैसे लड़के बड़े होते गए सुलक्खन के स्टाल संख्या में बढ़ने लगे बड़ा बेटा गिरीश उसका दाहिना हाथ था। स्कूल की पढाई इतनी जरूरी नहीं थी जितनी उसकी दैनिक कमाई। 14 साल का बच्चा शाम को 500 पाउंड हाथ में लेकर घर आता। सुलक्खन सिर्फ जम्पर बेचता था और पाँच पौंड से अधिक दाम नहीं लेता था। लाजो उसकी मदद करने आ जाती। लाल रंग की निवाड़ वाली फोल्डिंग कुर्सी में बैठी बैठी हाँक लगाती "फ़ोन्न नाइन नाइन ओनली फॉर यू --- कम ऑन ब्रदर ---कम ऑन लेडी ---" और दबादब पाँच पाँच के नोट अपनी आगे बाँधी हुई पॉकेट में भरती जाती। यूँ ही उसे देखते हुए एक जमाना गुज़र गया।

बेटियाँ ब्याह गईं। हर शादी में उसने दो किलो सोना चढ़ाया। गाँव के मकान को पक्का करवाया। अपने सारे भाइयों को उसने एक एक करके इंग्लैंड बुला लिया। वह भी मेहनत करके लखपति बन गए। बहन की बेटियों की शादी इंग्लैंड के लड़कों से करवाई। भूषण की बेटी को उसने अपनी बहू बनाया और भूषण को अपना मुँहबोला भाई। उम्र के साथ साथ उसने मंदिर और गुरूद्वारे में सेवा का नियम भी ले लिया। जाने कितना दान वह करती थी मगर लाख मिन्नतों के बावजूद उसने जगतराम को नहीं बुलाया। एक बार जिद में आकर जगते ने खुद कोशिश की मगर हाई कमीशन के दफ्तर में उसने कुछ ऐसी धाँधली की कि वीसा देने वाला अफसर नाराज़ हो गया। और उसने जगते के पासपोर्ट पर काला ठप्पा लगा दिया यानि वह कभी भी इंग्लैंड नहीं जा सकता।

गिरीश और छोटा बेटा बिमल थोड़ा ही पढ़े थे मगर अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूलों में पढ़ाया। लाजो की समृद्धि का पारावार नहीं था। परिवार में कोई बुरी आदत उसने नहीं पड़ने दी हालाँकि सुलक्खन की पीने की आदत नहीं गयी। लाजो के पोते इतने लायक निकले कि उन्होंने तमाम पैसा बड़ी योजनाओं में लगा दिया और अपनी खुद की कम्पनियाँ बना लीं। सुलक्खन सूट बूट पहनकर दामी कार चलाता। लाजो के बाल सफ़ेद, आँखों पर मोटा चश्मा। कान में हियरिंग एड लग गयी। सब झंझटों से दूर वह पोते दोते जमा कर कहानियाँ सुनाती। बड़ी बहू के साथ ही रहती।

सुलक्खन बहत्तर वर्ष का था जब उसका बापू मंगतराम चल बसा। जगता सारी जायदाद का मालिक बन गया क्योंकि लाजो कुछ भी नहीं बँटाना चाहती थी। दरअसल इन चालीस बयालीस वर्षों में वह कभी भी अपनी ससुराल नहीं गयी। जगते की शादी भी हुई थी मगर उसकी बीबी एक बच्चे को जन्म देकर जल्दी मर गयी। अब वह भी दादा बन चुका था।

बापू को मरे दो साल भी नहीं गुजरे थे कि घसीटी का भी बुलावा आ गया। बरसते पानी में टाइलों वाले आँगन को पार करने लगी कि हाथ की लाठी फिसल गयी। बूढी जर्जर देह, झट कूल्हे की हड्डी टूट गयी। बूढी हिल भी ना पाई। पास ही पटियाला शहर के अस्पताल में ले जाया गया मगर वह ठीक ना हो सकी। महीनों कराहती अपाहिज होकर रोती कलपती रही। सुलक्खन की रट लगाती रही। सुलक्खन खुद अधिक पीने के कारण बहुत अच्छी सेहत का नहीं रह गया था। फिर भी माँ का अंत समय जानकार भारत चला गया।

भारत जाने पर उसने दिल्ली के ही एक बैंक में अपने कागज़ पत्तर लाकर में संभालकर रख दिए क्योंकि अक्सर गाँव के लुटेरे बाहर से आने वाले लोगों को लूट लिया करते हैं। खासकर पासपोर्ट छीन लेते हैं जिसको लाखों में बेचा जा सकता है। सूट टाई आदि उतारकर उसने तंग पैजामा और कमीज पहन ली। जगतराम उसे अपनी पुरानी सी कार में सीधा गाँव ले गया। माँ बेटे का ही आसरा देख रही थी सुलक्खन के पहुँचते ही चल बसी। अच्छी तरह उसका संस्कार आदि निपटा कर पन्द्रहवें दिन सुलक्खन वापिस इंग्लैंड जाने के लिए दिल्ली पहुँचा।

*** 4 ***
गाँव की ऊबड़ खाबड़ सड़क पर हिचकोले खाती छकड़ा एम्बैसेडर गाडी का पटियाला शहर तक थकाऊ सफ़र सुलक्खन की कमर पर भारी पडा। सारी ज़िन्दगी उसने बोझिल काम लिया था कमर से। अगले दिन दिल्ली तक का लम्बा सफ़र, जिग-जैग ट्रैफिक, धड़धड़ाती ट्रकें, रस्ते में ढाबों का तेल भरा खाना आदि कुल मिला कर उसको रास न आया। न कोई रूटीन समय का न कोई परहेज़ खाने का। सुलक्खन अधमरा हो गया। अगले दिन सुबह उसने अपने कागज़ पत्तर बैंक से निकाले। बेटों को खबर दी। अपना आरक्षण चेक करवाया। मगर दोपहर का खाना खाने के बाद उसकी हालत बिगड़ने लगी। चक्कर सा आया और उलटी हो गयी। जगता एक डाक्टर को बुला लाया। उसने पेट खराब होने की गोली दे दी। होटल वापस पहुँचते पहुँचते सुलक्खन का चेहरा पीला पड़ने लगा। जैसे ही वह पलंग पर लेटा उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

जगतराम ने फोन मिलाकर उसके बेटों को बुला भेजा। बहुत कोहराम मचा। जगता बहुत रोया पीटा। दाह संस्कार आदि निपटा कर जब दोनों भतीजे वापस लौटने लगे तो जगतराम ने बड़े भाई के कागज़ पत्तर उन्हें सौंप दिए। पैसे भी सभी पकड़ा दिए। गिरीश और बिमल अधेड़ उम्र के समझदार मर्द थे। उन्होने अपनी मर्जी से सारे भारतीय नोट चाचा को उपहार दे दिए। मृत पिता के कपडे लत्ते भी बाँट दिए। मगर उन्हें पिता का पासपोर्ट नहीं मिला। बहुत ढूँढा मगर नहीं मिला। जगते ने रो रोकर दुहाई दी कि वह सब कुछ अकेला झेल रहा था। जब फोन वगैरह कर रहा था तब किसी ने हाथ मार दिया लगता है। पासपोर्ट तो लाखों में बिक जाता है। उसने समझाया कि घर तो जा ही रहे हो। पासपोर्ट खो जाने की इत्तिला होम ऑफिस को दे देना। यहाँ की पोलिस तो नखरे दिखाएगी और पैसे झाड़ लेगी। वे दोनों रोते पीटते घर आ गए।

लाजो लुट गयी। उसका आधार खिसक गया। दोनो बहुएँ उसे प्यार से दिलासा देतीं रहीं मगर स्त्री को पता होता है कि पति के बिना उसकी सत्ता न के बराबर हो जाती है। बेटियाँ जँवाई सब आये। पूरे पंद्रह दिनों तक आने जाने वालों का ताँता नहीं रुका। लाजो ने पति की आत्मा की शांति के लिए कोई कसर न रख छोडी। तीसरे हफ्ते दोनों बेटे वसीयत आदि के चक्कर में पड़े। वकील को पासपोर्ट खो जाने की बात बताई।

लाजो चीखी, "अरे बावलों, आते ही क्यूँ न खबर की पुलिस को?"
"कोई बात नहीं बेबे हम अभी वकील को बता देते हैं।"

वकील ने कहा कि घबराओ मत। मरण प्रमाणपत्र जमा करते ही वह अपने आप कैंसिल हो जाएगा। पुलिस को बताने का कोई फायदा नहीं। बात आई गयी हो गयी।

मगर भारत तो भारत है। सबसे ज्यादा विचित्र! अगले हफ्ते ही जगते का फोन आ गया, "मैं आ रहा हूँ। मुझे हीथरो पर लेने आ जाना।"

लाजो सन्न रह गयी। सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे। पिछले पैंतालिस वर्षों में जिसे विजिटिंग वीसा भी नहीं मिला था वह अचानक इस उम्र में लन्दन कैसे आ सकता है? उसे किसने स्पॉन्सर किया? कहीं मीठे बनकर भाई को तो नहीं पोट लिया? मगर सुलक्खन तो इसके बहुत खिलाफ था। भाई की बेईमानियों और काहिली से अच्छी तरह वाकिफ था।

लाजो ने अपने मुँह बोले भाई भूषण को बुला भेजा। उसने गाँव में अपने रिश्तेदार जीजे को फोन करके पूछताछ की। उधर से जवाब मिला कि किसी को नहीं मालूम कि जगता कहीं बाहर जा रहा है। आगे तहकीकात में थोड़े दिन लग जाएँगे। जगतराम के आने में दो तीन दिन ही रह गए थे। दोनों बेटों ने चाचा के अवश्यम्भावी आगमन के लिए अपने आपको तैयार कर लिया। बहुओं को जात बिरादरी का लिहाज, ना करें तो बदनामी होती है।

लाजो दम साधे बैठी रही। इतने वर्षों उसने अपने सीने के घाव को दबाये रखा और उसकी सडांध से अपने बच्चों को दूर रखा। न वे छलबल जानते थे ना बेईमानी। उनके दोस्त यार सब जातों के थे। लाजो इन सीमाओं से स्वयं मुक्त हो चुकी थी। उसकी सबसे पहली पड़ोसन लाहौर से थी जिसने उसे मशीन पर कपड़े सीना सिखाया था। मार्किट में उसकी साथवाली पिच अजरा की थी जो हेलो पत्रिका की रिपोर्टर थी और साथ ही रविवार को बेबी गारमेंट्स बेचकर अतिरिक्त आमदनी बना लेती थी। अपनी बहू-बेटियों को अपने दुखड़े सुनाकर उसने कभी सहानुभूति एकत्र नहीं की। मगर आज उसका वर्षों का दबा हुआ आक्रोश उसके सीने में चक्रवात की तरह घूम रहा था। चक्रवात जो ऊपर की ओर उठता है। वह सर दर्द से तड़पने लगी। लगता था कि उसकी नसें फट जायेंगी। रूबी, उसकी पोती उसे सुबह शाम दवाई आदि समय से देती थी रोज़। उसने रक्तचाप की मशीन लगा कर देखा तो परेशान हो उठी।

"दादी आपको क्या वरी है? मे बी, यू आर मिसिंग दादा।"
"यस रूबी। योर दादा नो लाइक जगता कमिंग इंग्लॅण्ड। यू स्टॉप हिम।"
"तुसी छोड़ दो वरी दादी डैड और चाचू आप देख लेंगे। यू रेस्ट एंड स्लीप।"
उसे दूध के साथ सिरदर्द की गोली खिलाकर वह अपनी माँ को बुला लाई। उसकी माँ साधना सास को समझाने लगी, "आ भी जायेंगे तो कौन सा नुक्सान है। गिरीश को नौकर रखना पड़ता है अपनी पिच पर। चाचा को वहीं कुर्सी पर पीछे बैठा देंगे। पहरा देता रहेगा, अपना खर्चा निकाल लेगा काम शाम करके।"
"वह बात नहीं साधना। जगता जलनखोर है। वह मुझसे खार खाता है। मुझे बर्दाश्त नहीं कि वह मेरे राजपाट को नज़र लगाए। बेइमान भी है और चोर भी। उसे मुझसे दूर रखना।"
"नो प्रोब्लम बेबे। हम उसे छोटे बिमल के घर में रख देंगे। यूँ डोंट वरी।"

दवा के बावजूद उस रात वह बड़ी मुश्किल से सो पाई। उसकी घबराहट कुछ हलकी पड़ी। नींद ने उसके मस्तिष्क को शक्ति दी। सुबह के सपने अक्सर दिल की आवाज़ होते हैं। उन्हीं सपनो में उसने वर्षों पहले रहट के पास तोरी की बेल से लिपटा हरे रंग का साँप देखा। वह डरकर जाग पड़ी। बाहर तीखी धूप खिली थी। रात का कोहरा साफ़ हो गया था। उसके मन की धुंध भी छँट चुकी थी। दिल पर छठी इंद्रिय दस्तक दे रही थी। उसकी विचारशक्ति पूरे वेग से चलायमान थी। वह उठी। पति को मरे एक महीना अभी पूरा नहीं हुआ था। कायदे से उसे घर के बाहर नहीं जाना चाहिए था। मगर कर्म ही धर्म है।

अतः वह ट्राउज़र और जम्पर पहनकर तैयार हो गयी। साधना ने पूछा भी कि वह कहाँ जा रही है। वह उसे कार से छोड़ देगी मगर लाजो ने मना कर दिया। बोली, "घर बैठे सेहत को जंग लग रहा है। जरा ताज़ी हवा गुण करेगी। पार्क में थोड़ी देर टहल कर आती हूँ।"

पार्क उसके घर से दो स्ट्रीट छोड़कर था। लाजो ने लाठी उठाई और टेकते टेकते दूर निकल गयी। बस स्टेशन से उसने पुलिस चौकी की बस पकड़ी और सीधी पुलिस स्टेशन आ गयी। वहाँ उसने किसी महिला से बात करने की मांग की। पुलिस सार्जेंट हैटी विलियम्स ने उसे एक बंद कमरे में सोफे पर बैठाया। चाय मंगवाई और बेहद प्यार से उसे अपनी शिकायत रखने की दरखास्त की। लाजो सधे स्वर में बोली, "आई रिपोट वन मैन कम इन लंडन। नो वीज़ा। इल्लीगल। टुमारो माई होम।"

हैटी बहुत चकराई, "नोबडी कैन कम विदाउट वीज़ा। ही कांट बोर्ड दी प्लेन" उसने सारा माजरा पूछा।

लाजो ने हिम्मत से टूटी फूटी अंग्रेजी में समझाया, "माई हसबंड गो इंडिया। ही डेड इन इंडिया। वन मंथ। हिज पासपोट लॉस्ट। गौन। हिज बॉडी बर्न इन दिल्ली। माई टू सन्स पासपोट नॉट फाइंड। माई ब्रदर इन ला जगतराम। सेम फेस सेम बॉडी। ही टेक पासपोट। चीट चीट आल्वे। नाओ कमिंग इंग्लैंड। "

अब हैटी समझी, "यूँ थिंक ही इस यूजिंग योर हस्बैंड्स पासपोर्ट तो कम हियर?"
"यस मैडम जी। ही कम टुमारो।"
हैटी अपने सीनियर को बुला लाई। पहले तो वह लाजो को देखकर मूँछों में हंसता रहा। फिर जब उसने लाजो का पता नोट किया तो उसके होश उड़ गए। लाजो शहर के सबसे दामी मकानों की बस्ती में रहती थी। उसके नाम से तीन कम्पनियाँ पंजीकृत थीं जिनके डायरेक्टर उसके बेटे और पोते थे।

अगले दिन जगतराम लन्दन पहुँच गया। लाजो के दोनों बेटे उसे लेने पहुँच गए। आगमन-द्वार पर खड़े देर तक बाट जोहते रहे। सारे यात्री चले गए पर चाचा जगतराम बाहर नहीं आया। कुछ देर बाद एक परिचारिका आई और उन्हें अन्दर बुलाकर ले गयी। जगतराम पुलिस के घेरे में बैठा था। देर तक कई अफसरों ने गिरीश और बिमल से पूछताछ की। उन्हे शक था कि कहीं इस साजिश में वे भी तो शामिल नहीं थे। गिरीश ने साफ़-साफ़ कहा कि उन दोनों ने कोई स्पॉन्सरशिप नहीं भेजी थी। चाचा अपने दम पर आया था। पुलिस ने उन्हें बताया की किस तरह वह अपनी उजबक हरकतों से शक के घेरे में आया और उनको मिली सूचना के हिसाब से पकड़ा गया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर वह इतना उजबक ना होता तो शायद निकल जाता।

चाचा बहुत गिड़गिड़ाया मगर पुलिस ने साफ़ मना कर दिया और वापिस भारत भेज दिया। गिरीश ने बहुतेरा पूछा कि उनको सूचना किसने दी मगर पुलिस ने उन्हें नहीं बतलाया। क्योंकि यह आम आदमी की व्यक्तिगत गोपनीयता के अधिकार का मामला है।
संपर्क: 35, दी एवेन्यू, चीम, सरे, एस एम 2 7 क्यू ए यूके

2 comments :

  1. निसंदेह कादम्बरी मेहरा में पाठक को अपने कधारस में बांधने की जादुई शक्ति है। प्रतीकात्मकता, जीवन का बहुआयामी संघर्ष, नाम-शब्द-मुहावरों की पंजाबियत ......पराये पासपोर्ट से अपना वीजा लगवा विदेश पहुंचना-शातिर दिमाग में समाई अपराध वृत्ति को भी रेखांकित करता है।
    बहुत बढ़िया कहानी ।

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