व्यंग्य: अपनी ताकत का संज्ञान लें

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


मैं जेल गया हूँ। चौंकिए मत, मैं किसी अपराध के कारण जेल नहीं गया। रिश्वत लेना, कालाबाज़ारी करना या तस्करी करना कोई अपराध है क्या! ऐसे दुष्कर्म करने के लिए बिरले लोग ही जेल जाते हैं। मित्र पूछते हैं तुम जेल क्यों जाते हो! कौन-से रिश्तेदार अंदर हैं? क्या तुम्हारी जान-पहचान नहीं है। माना, तुममें आदमी होने के बावजूद तिकड़म लगाने के गुण नहीं है, पर थानेदार या राजनेता की जेब तो गर्म कर सकते हो। तुम बार-बार जेल की हवा खाते हो, हमें यह अच्छा नहीं लगता। मैं देश-विदेश में रहते कई बार जेलों में गया हूँ। यह मेरा शौक है। जेलों में जा कर मैं कथित अपराधियों से मिलता हूँ, उनको सुनता हूँ और बाहर आ कर हमारी न्याय प्रणाली को कोसता हूँ। मुझे कोसना अच्छा लगता है। भारतवंशी हूँ, मुझे यही आता है, इसी से मेरी पहचान है।

उन दिनों मैं भोपाल में था। वहाँ किसना से मिला। वह ढाबे में काम करता था। वह युद्ध बंदी था, अमीरों और ग़रीबों के बीच युद्ध का, अगड़ों और पिछड़ों के बीच युद्ध का। उस ढाबे में जहरीली शराब पीने से दो लोग मर गए। ढाबा मालिक ने असली विलायती शराब का एक बॉक्स थानेदार को भेंट चढ़ा दिया और पंचनामे में नकली अद्दे की बोतल किसना के नाम लिखवा दी। असली शराब का मालिक सेठ, और नकली का रखवाला किसना। किसना सिर्फ नौकर था, वह न्याय की तराजू पर चढ़ गया। एक पलड़े में कुछ नोट थे और दूसरे में किसना। नोट किसी की जेब में जबरन घुस कर भारी हो गए और किसना आजन्म के लिए बारहताड़ी में। इस सबसे किसना को ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा। पहले वह बचा-खुचा खा कर ढाबे में सो जाता था; अब नपा-तुला खा कर जेल में सो जाता है। मालिक का ढाबा यथावत चालू है। कानून के सामने सभी समान हैं। जिसका काम दाल-रोटी खाने और चक्की पीसने से हो जाए उसे उसी अवस्था में रखना ही न्याय है।

उसी हफ़्ते भोपाल में यूनियन कार्बाइड में गैस लीकेज हुआ। हज़ारों लोग जहरीली गैस से दम घुटने से मर गए। लाखों लोग बीमार हो गए। कंपनी के मुखिया एंडरसन टालमटोल करते भोपाल आए। भोपालवासियों को उम्मीद थी पुलिस एंडरसन को पकड़ लेगी। दुनिया के बड़े लोकतंत्र में वह प्रजातंत्री सरकार थी या कलंक, क्या मालूम; पर सरकार, अपने विमान से उसे सुरक्षित निकाल ले गई। जेल की सज़ा तो दूर, उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ। अच्छा हुआ, न्याय-नायिका की आँखों पर पट्टी बंधी हुई है, अन्यथा वह भी शर्मसार हो गई होती। एंडरसन ताउम्र निर्दोष रहा, उसे अपराधी सिद्ध कर सकने वाले अफ़सर बहुत ऊँचे उठा दिए गए। इतने ऊपर कि उन्हें नीचे सपाट मैदान नज़र आता था, लाशों पर मंडराए गिद्ध उन्हें कभी नहीं दिखे। पिछले दिनों में एक सुधार गृह गया। बच्चों की जेलों को सुधार गृह कहना शालीन लगता है। सभ्य और प्रगतिशील समाज में बुराइयों के अच्छे-से सर्वनाम होने चाहिए। यहाँ एक

आदिवासी से मिला। वह कंस्ट्रक्शन साइट पर मज़दूरी करता था। भीषण ठंड में ठिठुर रहा था तो पास के स्टोर में घुस कर कपड़े और कम्बल चुरा लिए। ऐसे मामलों में पुलिस बहुत मुस्तैद होती है, उसे रंगे हाथों, सबूत सहित पकड़ लिया। पिटाई से उसकी ठंड दूर हो गई और दो-तीन हज़ार का सामान चुराने के अपराध में उसे जेल की यूनिफार्म मिल गई। इधर माल्या दिन-दहाड़े नौ हज़ार करोड़ रुपये ले भागा और विदेश में बस गया। नीरव मोदी को घपला-ओलंपिक का यह रिकॉर्ड छोटा लगा, उसने बड़ा कीर्तिमान बनाया और इस खुशी में अमेरिका भाग गया। पुलिस अंकगणित में कमज़ोर है। उसे हज़ार, दस हज़ार, लाख तक की गिनती आती है; करोड़ शब्द का ठोस रूप उसे क्या मालूम! करोड़ों के मामले राजनेताओं का अधिकार क्षेत्र है। इसलिए पुलिस चौदह हज़ार रुपये और चौदह हज़ार करोड़ रुपये के घपले में अंतर नहीं समझ पा रही, भगोड़ों को पकड़ नहीं पा रही।

सरकार को महाघपलेबाज भगोड़ों के नए अते-पते मालूम हैं, पर वह हमेशा की तरह दीनदयालु है। उसके पास घिसा-पिटा बहाना है कि उन्हें पकड़ कर लाने में कानूनी अड़चनें हैं। उन पर डंडा उठाने में सरकार ही डरती है तो बेचारे सिपाही की क्या औकात! अन्यथा सरकार चाहे तो भारतीय पुलिस का अदना-सा सिपाही निर्दोष बाबा रामदेव को भेष बदल कर भागते हुए भी पकड़ सकता है। सरकार के अति बुद्धिमान अफसर ही ऐसे लचर कानून बनाते हैं, वे अपने मतलब के लिए लूपहोल छोड़ते हैं ताकि अमीरों की हमेशा पौ-बारह रहे और ग़रीबों पर हमेशा तलवार लटकी रहे। हज़ारों साल पहले भी न्याय व्यवस्था ऐसी ही थी, कुत्ते की पूँछ जैसी। मुझे इसमें कुत्ते को नहीं घसीटना चाहिए, बेचारे निरीह प्राणी पर अवमानना का मुकदमा चल जाएगा। मुझे लगता है, विश्व भर की जेलों में कम से कम आधे बंदी तो ऐसे हैं, जिनके अपराध छोटे-छोटे हैं। उनका पहला अपराध यह है कि उन्होंने इतनी छोटी वारदात की। ज्ञानियों ने पहले ही सतर्क किया था - चोर, चोरी से न जाए, हेराफेरी से जाए। छोटी वारदात कर उन्होंने बस अपना ही जुगाड़ किया। ऊपरी लोगों का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा। उन्होंने डकैत उद्योगपतियों जैसा हाथ मारा होता तो भारतीय पुलिस क्या, इंटरपोल भी कुछ नहीं उखाड़ पाती। इतिहास ने हमें सिखाया है कि बिन लादेन या दाऊद इब्राहिम जैसे डॉन को पकड़ने के लिए ग्यारह देश की पुलिस भी कम है। छोटी वारदातें करते हुए पकड़े गए इन बंदियों को पुलिस की सेवा करने का ख़्याल नहीं आया। खुद के ही लाले पड़ रहे थे तो वकील खड़ा करने के लिए वे पैसे कहाँ खोदते! गवाह घड़ने, तोड़ने और खरीदने का गोरखधंधा उनकी समझ के बाहर था। वे अरबपति होते तो उनका ड्राइवर गुनाह अपने सिर ले लेता। जब तक सुनवाई पूरी होती विरोधी प्रत्यक्षदर्शी गवाह परलोक सिधार जाते, उनके सारे अप्रत्यक्षदर्शी काले गवाह सफेद हो जाते।

कुछ कीजिए न्यायमूर्ति। विश्व भर की और खास कर विकासशील तथा अविकसित देशों की न्यायपालिकाएं, संज्ञान लेने में विशेषज्ञ हैं। जनता संतुष्ट हो जाती है कि कोर्ट ने संज्ञान ले लिया। भारत में कोर्ट का संज्ञान लेना घोड़े की लीद उठाने जैसा है। लीद उठाई, और पूरे देश में महात्मा गांधी की अस्थियों जैसे बिखरा दीं। देश पवित्र हो गया। जनता ने जान लिया कि कोर्ट ने संज्ञान ले लिया और ज़रूरी कार्यवाही हो गई। क्या असर हुआ इससे किस को मतलब! भारतीय संविधान बहुत सशक्त है, दुनिया के श्रेष्ठ संविधानों का निचोड़ है। उसका सारा रस

कानून की किताबों में है, और जो लुगदी बची है, कार्यपालिका उसे पाकर बहुत खुश है। कानून की लुगदी, कानून के रस से ज़्यादा भारी है।

मेरे एक मित्र न्यायाधीश हैं। वे दो नंबर भी जाते हैं तो लोग कहते हैं - माननीय दो नंबर गए हैं। एक बार मेरे मुँह से भी निकल गया - माननीय, तो वे सकपका गए। पूछने लगे - कहीं मैं व्यंग्य तो नहीं कर रहा। मैं कैसे कहता कि व्यंग्य तो तत्काल होता है, न्याय की तरह दस-बीस साल बाद नहीं होता। वे सुबह की नर्म धूप सेंक रहे थे, कहने लगे - स्टेनो का इंतज़ार कर रहा हूँ, फैसले डिक्टेट करवाना है। चलिए, कहीं तो वे डिक्टेटर हैं। वे रुआँसे हो कहने लगे - बहुत काम पड़ा है। तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख, बहुत वर्क लोड है। काम की तादाद को लेकर सी जे तक की आँखों में आँसू हैं।

मैं हतप्रभ हूँ। उनके संज्ञान में लाना चाहता हूँ कि आम आदमी खुद बिक भी जाए तो वह कार्यपालिका को ख़रीद नहीं सकता। अफ़सरशाही अमीरों के पैरों की जूती है। आपके पास अमीरों का आना-न आना, उनके अपने फायदे-नुकसान के गणित पर टिका है। लेकिन आमतौर पर आपकी चौखट पर जो आता है, उनमें बहुत से लोग वंचित हैं, पीड़ित हैं। उन्हें न्याय की आपसे ज़्यादा, सख्त और शीघ्र ज़रूरत है। आप अपनी ताकत का संज्ञान ले लें बस।
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