हिंदी के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय वर्चस्व में परीक्षण एवं मूल्यांकन: भाषा शिक्षण के संदर्भ में

संजय प्रसाद श्रीवास्तव

संजय प्रसाद श्रीवास्तव

जूनियर रिसोर्स पर्सन/लेक्चरर ग्रेड (हिंदी) राष्ट्रीय परीक्षण सेवा-भारत, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरु

परिचय
           आज हिंदी भाषा भारतवर्ष तक सीमित नहीं रह गई बल्कि ग्लोबल, तकनीक, भू-मंडलीकरण की ओर बढ़ गई है। विश्व के लगभग 73 राष्ट्रों के 150 विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन की सुविधा है। विदेशों से प्रकाशित हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायक सिद्ध हुई है।

   अतः शैक्षिक विकास के लिए मूल्यांकन पद्धति शिक्षा-स्तर के अनुकूल होना चाहिए। साथ ही परीक्षा-प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। शिक्षण, अधिगम एवं मूल्यांकन तीनों ही शिक्षा व्यवस्था के तीन स्तंभ है एवं अभिन्न अंग भी है। 21वीं सदी में शिक्षा के बदलते स्वरूप एवं परिदृश्य और नई चुनौतियों से निपटने के लिए हमें शिक्षण के साथ परीक्षण एवं मूल्यांकन की पद्धति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। इसी के अंतर्गत हिंदी भाषा शिक्षण की प्रासंगिकता एवं सार्थकता निहित है।

परीक्षण एवं मूल्यांकन की भूमिका
            परीक्षण परीक्षा का वह रूप है जो किसी समूह से संबंधित किसी व्यक्ति विशेष की बुद्धि, व्यक्तित्व, अभिक्षमता और उपलब्धि के मापन के लिए प्रयुक्त किया जाता है। अतः दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि परीक्षण वह प्रक्रिया है जिसके द्‌वारा मुख्य रूप से पाठ्‌यक्रम के ज्ञानात्मक अनुभव कौशल की जाँच की जाती है। परीक्षा तथा परीक्षण मूल्यांकन का एक उपकरण अथवा पद्धति है। इसके माध्यम से छात्र के ज्ञान, क्षमता, कौशल, रुचि आदि को जाँचा जाता है। इसे सामान्यतया पूर्व घोषणा के बाद संचालित किया जाता है तथा इसका निर्माण इस प्रकार किया जाता है कि यह किसी अधिगम प्रक्रिया के अंतर्गत आने वाली विशिष्ट इकाई को पूर्णतः सम्मिलित कर ले।
            वेबस्टर शब्दकोश के अनुसार— “परीक्षण प्रश्नों, अभ्यासों अथवा अन्य साधनों की एक श्रृंखला है जिनसे किसी व्यक्ति अथवा समूह  के कौशलों, ज्ञान, बुद्धि, क्षमताओं अथवा अभिक्षमताओं का मापन होता है।” परीक्षण को परिभाषित करते हुए कुछ विद्वानों ने इस प्रकार से विचार व्यक्त किये है—
            नूनली के अनुसार—“एक परीक्षण एक मानकीकृत परिस्थिति है जो किसी व्यक्ति को एक अंक प्रदान करती है। एक परीक्षण मानकीकृत तब होता है जब दो परीक्षण प्रशासक एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए छात्रों के उसी समूह पर एक समान परिणाम प्राप्त कर सकें।”
            अंक का तात्पर्य छात्रों के कार्यों के आंकिक संकेत से है।
            शिक्षार्थी ने किसी विषय के किसी पक्ष विशेष या पूर्ण विषय के ज्ञान को किस प्रकार से आत्मसात किया है— इस तथ्य की जानकारी को पता लगाना मूल्यांकन कहलाता है। मूल्यांकन से संबंधित अनेक विद्वानों ने विचार निम्नलिखित रूप से प्रस्तुत किए हैं—
गैरिसन तथा अन्य (Garrison and others) के अनुसार—मूल्यांकन सामान्यतया उस प्रक्रिया के रूप में सोचा जाता है जिसके द्‌वारा एक शिक्षक एक शिष्य या शिष्यों के समूह के विषय में निर्णय करने के लिए विभिन्न स्रोतों से सूचनाएँ एकत्र करता है।

बैरन तथा बर्नार्ड (Baron and Bernard) के अनुसार—किसी दिए हुए व्यक्ति के व्यक्तित्व, निष्पादन अर्थात् योग्यता के महत्व को निश्चित करने की प्रक्रिया ही मूल्यांकन है।” 

मूल्यांकन’ परीक्षण या परीक्षा पर आधारित होता है। कक्षा में अध्यापन के द्‌वारा छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव, और परिवर्तन को देखना शिक्षक का दायित्व है। इसका आँकलन ही मूल्यांकन है। मूल्यांकन की प्रक्रिया अवधारणा और अनुप्रयोग की दृष्टि से सार्वभौम है। किसी भी शैक्षिक कार्यक्रम के दौरान निर्णय लेने में मूल्यांकन की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूसरे शब्दों में मूल्यांकन का अर्थ मूल्यों के अंकन या मूल्यों को निर्धारित करने से है। मूल्यांकन प्रक्रिया के अंतर्गत शिक्षा के उन सभी महत्वपूर्ण व आवश्यक प्रगतियों का आँकलन किया जाता है, जिसके द्‌वारा बच्चों की रुचियाँ व्यक्तित्व का व्यवहार, मानसिक क्षमताओं व कार्यक्षमताओं तथा आदतों का अध्ययन कर पाना सहज हो जाता है। अतः कहा जा सकता है कि मूल्यांकन एक योगात्मक प्रक्रिया है जिसके द्‌वारा किसी पूर्व निर्मित शैक्षिक कार्यक्रम अथवा पाठ्यक्रम की समाप्ति पर छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि ज्ञात की जाती है।

परीक्षण के प्रकार
परीक्षण एवं मूल्यांकन शिक्षण का एक अभिन्न अंग है। शिक्षक पूरे सत्र में शिक्षण कार्य में व्यस्त रहते है। शिक्षण कार्य के अतिरिक्त परीक्षण हेतु प्रश्न निर्माण करने और परीक्षण को क्रियान्वित करने में शिक्षक जागरूक रहते है।
भाषा परीक्षण भेद के मुख्य चार आधार हैं
(क) उद्देश्य (ख) निर्माण (ग) उपयुक्तता (घ) चलन

(क) उद्देश्य सदा भिन्न होता है। कार्य के आधार पर उद्देश्य का निर्धारण होता है। हम उद्देश्य को भिन्नता के आधार पर चार भागों में बाँट सकते है—
* क्षमता परीक्षण  इस परीक्षण को अभिरुचि अथवा रुझान परीक्षण भी कहते है। इस परीक्षण के द्‌वारा किसी विशेष विषय के प्रति रुचि और उस विषय में परीक्षार्थी की क्षमता और सामर्थ्य संबंधी ज्ञान का परीक्षण किया जाता है। इनके उपयोग से विशिष्ट पाठ्यक्रम के लिए विद्यार्थियों के चयन के लिए होता है।
* प्रवीणता परीक्षण  प्रवीणता किसी कार्य को प्रतिभासोच और अभ्यास के द्वारा कुशलतापूर्वक संपादित करने की दक्षता है। भाषा शिक्षण के क्षेत्र में प्रवीणता से तात्पर्य भाषा संबंधित कार्य के निष्पादन से है। बोलनेसुननेपढ़ने एवं लिखने की प्रवीणता में ही भाषिक प्रवीणता समाहित है।
* उपलब्धि परीक्षण  इसका प्रयोग किसी विशेष शिक्षण-पाठ्यक्रम या अनुदेशनात्मक कार्यक्रम में प्रस्तुत सामग्री को कितना सीखा गया हैयह ज्ञात करने के लिए उपलब्धि परीक्षण किया जाता है। इस परीक्षण के द्वारा दिए गए निश्चित समय में व्यक्ति की सामान्य योग्यता का मूल्यांकन होता है।
* निदानात्मक परीक्षण  इसे उपचारात्मक परीक्षण भी कहा जाता है। इस परीक्षण से यह पता चलता है कि वर्तमान में क्या और कितना पढ़ाया जाना आवश्यक है। साथ ही सीखने के उन क्षेत्रों की पहचान की जाती है जिनमें सीखने वालों को निदानात्मक पाठ्यक्रम की आवश्यकता होती है।

(ख) निर्माण की भिन्नता के आधार पर परीक्षण के कई प्रकार होते है। जैसे—
* परीक्षणीय कौशल
* प्रश्न प्रकार
* उत्तर प्रकार

परीक्षणीय कौशल के ‘क्या तथा कैसे’ के आधार पर पाँच प्रकार के परीक्षण माने जाते है।

* श्रवण-परीक्षण (i) श्रवण क्षमता परीक्षण (ii) ध्वनि बोध परीक्षण (iii) अनुतान परीक्षण (iv) बलाघात एवं स्वराघात परीक्षण (v) श्रवण बोध क्षमता परीक्षण आदि।
* भाषण-परीक्षण – (i) उच्चारण क्षमता परीक्षण (ii) ध्वनि उच्चारण परीक्षण (iii) अनुतान परीक्षण (iv) आघात-परीक्षण आदि।
* वाचन-परीक्षण – (i) वाचन बोध परीक्षण (ii) पाठ्य-पुस्तकेतर वाचन परीक्षण (iii) शब्दावली बोध परीक्षण (iv) अनुच्छेद वाचन परीक्षण (v) वाचन गति परीक्षण
* लेखन परीक्षण – (i) वर्ण रचना परीक्षण (ii) श्रुतलेख परीक्षण (iii) आंशिक वाक्य लेखन परीक्षण (iv) शब्दावली परीक्षण
* संस्कृति तथा साहित्य परीक्षण – (i) सामान्य/विशिष्ट प्रश्न परीक्षण (ii) मौखिक प्रश्न परीक्षण (iii) लिखित प्रश्न-परीक्षण आदि।

(ग) परीक्षण  उपयुक्तता के आधार पर परीक्षण  इसके चार प्रकार होते है।
*   उद्देश्य संबद्ध परीक्षण
*   स्तरोचित परीक्षण
*   अवधि-संगत परीक्षण
*   उपयोगी परीक्षण
(घ) चलन अथवा प्रचलन के आधार पर परीक्षण के छः प्रकार माने जाते है—
*   प्राचीन कालीन परीक्षाएँजैसे—कौशल परीक्षाबुद्धि परीक्षा
*   आधुनिक कालीन परीक्षण  विवेचनात्मक शक्ति परीक्षणस्मृति परीक्षणक्षमता परीक्षण, अर्जित ज्ञान परीक्षण।

परीक्षा की विशेषताएँ
  * परीक्षा एक प्रकार का आँकलन है जिसमें छात्रों से ऐसे प्रश्नों के उत्तरों की अपेक्षा की जाती है जो उन्हें पहले से ज्ञात नहीं होते है।
  * परीक्षार्थियों को अधिक प्रयास के लिए प्रेरित करना चाहिए।
  * परीक्षा में शैक्षिक स्तर समान होना चाहिए।
  * विद्यार्थियों और शिक्षकों को शिक्षण के दौरान क्या कमी रह गई, यह जानने का अवसर प्रदान करता है। शिक्षक भी अपनी शिक्षण विधि में सुधार ला सकते है।
  * परीक्षाएँ विद्यार्थी को विषय विश्लेषित करने की क्षमता को बढ़ाता है।

मूल्यांकन की विशेषताएँ
  * मूल्यांकन में सभी उपकरणों का प्रयोग किया जाता है जिसके माध्यम से किसी विद्यार्थी के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों के विषय में सूचनाएँ एकत्रित करना।
  * मूल्यांकन शिक्षण एवं सीखने की प्रक्रिया है, इसे निरंतर चलते रहना चाहिए।
  * मूल्यांकन किसी व्यक्ति विशेष के विकास से संबंधित होता है।
  * मूल्यांकन संख्यात्मक एवं गुणात्मक होता है।
  * मूल्यांकन का संबंध व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व से होता है।

उपचारात्मक और निदानात्मक शिक्षण
छात्रों के अध्ययन के दौरान कई प्रकार की त्रुटियाँ देखी जाती है। इसे समझने के लिए निदानात्मक परीक्षण की व्यवस्था की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य है बालक के ज्ञान की परीक्षा न होकर उसके अध्ययन से संबंधित कठिनाइयों और त्रुटियों को समझना और उसे प्रकाश में लाना है। उपचारात्मक विधि का प्रयोग मनोविकृतियों को ढूँढ़कर उसका विधिवत् उपचार करना है।

भाषा कौशल-परीक्षण
            भाषा शिक्षण का उद्देश्य है, सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना जैसे कौशलों का विकास करना। लगभग 1910 ई. से भाषा कौशलों का वस्तुनिष्ठ परीक्षण प्रारंभ हुआ। धीरे-धीरे व्यवहारिक एवं तकनीकी दृष्टि से इसमें सुधार हुआ है। विभिन्न भाषा कौशलों के लिए वस्तुनिष्ठ प्रश्न परीक्षण के द्‌वारा विस्तार से विश्लेषण किया जाएगा।
            अन्य भाषा शिक्षण में भाषा कौशल परीक्षण का विशेष महत्व है। भाषा शिक्षण का उद्देश्य है, सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना जैसे कौशलों को विकसित करना। भाषाई कौशलों की विशेषता के अनुरूप विविध परीक्षणों के निर्माण की आवश्यकता होती है। विशिष्ट योग्यता के मापन के लिए परीक्षणमें विविध प्रकार की सामग्री का तथा विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

1. श्रवण कौशल परीक्षण
            अन्य भाषा-शिक्षण के प्रारंभिक स्तर पर छात्रों के श्रवण-कौशल को विकसित करने पर बल देना चाहिए। श्रवण-कौशल से तात्पर्य है अध्येय भाषा की ध्वनि को सुनकर पहचानने, स्मरण रखने तथा उनसे निर्मित शब्दों, वाक्यांशों तथा वाक्यों के अर्थ को ग्रहण करने संबंधी कुशलता को विकसित करना।

1.1  ध्वनि-अभिज्ञान परीक्षण

परीक्षार्थियों के लिए निर्देश – छात्र पूछे जा रहे प्रश्नों को सुनकर मौखिक उत्तर देंगे। प्रत्येक प्रश्न का पहले एक उदाहरण दिया गया है। आप उदाहरण के अनुसार अपना उत्तर देंगे।

प्रश्न आदेश – आप पहले एक ध्वनि सुनेंगे, उसके बाद उस ध्वनि से मिलती तीन बानियाँ सुनेंगे। आप को बताना है कि उन तीनों ध्वनियों में वह ध्वनि है या नहीं।
उदाहरण -               ‘फ़’             फ़            उत्तर  है
(1) ‘’             ज़            उत्तर  नहीं
(2) ‘’             ढ़ड़              उत्तर  है
प्रश्न  आदेश  आप एक साथ दो शब्द सुनेंगे। आपको बताना है कि वे दोनों शब्द समान है या असमान।
उदाहरण  ‘तात-टाट’                उत्तर  असमान
(1) ‘पढ़  पढ़’   -           उत्तर  समान
(2) ‘डाल - दाल’-           उत्तर  असमान

1.2 अनुतान परीक्षण
            अन्य भाषा का अनुतान – मातृभाषा से भिन्न होता है। छात्र में अन्य भाषाओं के अनुतान साँचे को पहचानने की कुशलता विकसित हुई है अथवा नहीं, इसके परीक्षण के लिए अनुतान-की समानता और भिन्नता की पहचान कराई जाती है। उदाहरण स्वरूप सामान्य वाक्य तथा प्रश्नसूचक वाक्य सुनवाए जाते हैं और छात्रों से प्रश्न पूछा जाता है कि ये वाक्य समान हैं अथवा भिन्न –
            तुम पढ़ते हो।      -           तुम पढ़ते हो!
            राम दौड़ता है।   -           राम दौड़ता है?
1.3 बोधन-परीक्षण
            बोधन परीक्षण के माध्यम से छात्रों के बोध का परीक्षण करना है। इसमें स्वनिमों की पहचान की योग्यता बलाघात और अनुतान की पहचान तथा अवधारणा शक्ति को विकसित करना है। अन्य भाषा में बोधन का संबंध शब्द भंडार के विकास तथा व्याकरण के ज्ञान को विकसित करना है। दैनिक प्रयोग में आनेवाले शब्दों के माध्यम से बोधन परीक्षण लिया जाता है।
            जल – फल, दूध, पानी
            घर – स्कूल, पड़ोस, मकान

1.4 वाक्य के संदर्भ में बोधन       
            इसके अंतर्गत छात्र से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अध्येय भाषा के वाक्य संरचना तथा व्याकरणिक रूपों को पहचानने तथा समझने में समर्थ है, या नहीं। इसके लिए व्याकरणिक रूपों के परीक्षण तैयार करना है। जैसे - आप कुछ वाक्य सुनेंगे, बाद में आप से एक-एक प्रश्न पूछा जाएगा। प्रत्येक प्रश्न केविभिन्न प्रकार के उत्तर होंगे, सही उत्तर को रेखांकित करना है—
मेरा घर दिल्ली में है।
मेरे घर में दो कमरे है।
मेरे घर में बुनाई का काम होता है।
मेरे पिता जी बूढ़े हैं।
वे बुनाई का काम करते हैं।

प्रश्न: तुम्हारा घर कहाँ है?
शहर में, दिल्ली में, गाँव में?
छात्र को सही उत्तर को रेखांकित करना है।

2. भाषा-परीक्षण
            शिक्षण तथा परीक्षण की दृष्टि से भाषण-कौशल के दो स्तर निर्धारित किए जा सकते है—उच्चारण एवं अभिव्यक्ति। इस परीक्षण का उद्देश्य है कि छात्र विभिन्न वाक्य-संरचनाओं के उपयुक्त आघात तथा अनुतान के साथ किस मात्रा तक प्रभावकारी एवं उपयुक्त गति के साथ बोल सकता है।

2.1 उच्चारण परीक्षण
            उच्चारण परीक्षण में अध्यापक का लक्ष्य ध्वनियों के उच्चारण का परीक्षण करना है। छात्र की मातृभाषा तथा अध्येय भाषा की ध्वनि-व्यवस्था का व्यतिरेकी विश्लेषण करना तथा शिक्षण बिंदुओं का निर्धारण आवश्यक है। उच्चारण-परीक्षण में निम्नलिखित तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है—
* अनुकरण-अभ्यास – जैसे – शर | मशक | वश; सर| कसर | बस |
* न्यूनतम युग्मों का उच्चारण - छात्र दो ध्वनियों के न्यूनतम अंतर को पहचानने तथा सही उच्चारण करने में समर्थ हो, जैसे - भात-बात, माल-बाल, शर-सर आदि
* कंठस्थ सामग्री के संदर्भ में परीक्षण

2.2 अनुतान-परीक्षण
            प्रत्येक भाषा की अपनी अनुतानगत प्रकृति होती है। अनुतान परीक्षण में भी अनुकरण, स्मृति तथा वाक्यों को मौखिक प्रस्तुति एवं वाचन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

(3) वाचन-परीक्षण
            वाचन परीक्षण का उद्देश्य है कि छात्र अध्येय भाषा की लिपि के एकाकी, संयुक्त वर्णों के शब्दों को किस मात्रा तक जानता है। लिपि प्रतीकों के माध्यम से विचारों तथा भावों को आत्मसात करने की कुशलता वाचन कुशलता है। इस परीक्षण से यह भी पता चलता है कि छात्र किस प्रवाह, गति, प्रभावकारिता के साथ उच्चारण कर सकता है?

(4) लेखन परीक्षण
            लिपि प्रतीकों के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति लेखन कुशलता को दर्शाता है। लेखन कौशल में वर्णों की बनावट, वर्तनी तथा रचना की कुशलता को विकसित की जाती है। यह परीक्षण लेखन कौशल के विकास में शब्द भंडार, वर्तनी तथा व्याकरण संबंधी कुशलता को परखने के लिए किया जाता है। लेखन परीक्षण का उद्देश्य जैसे वर्णन रचना परीक्षण, वर्तनी परीक्षण, रचना परीक्षण की कुशलताओं का परीक्षण करना है।

प्रश्न-पत्र निर्माण परीक्षा पद्धति
प्रश्न-पत्र कक्षा में पढ़ाए गए पाठ्यक्रम के अनुरूप होना चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि यह पाठ्यक्रम का अतिक्रमण न कर सके। समय सीमा को ध्यान में रखकर प्रश्न-पत्र निर्माण करना चाहिए। प्रश्न सुस्पष्ट होना चाहिए। प्रश्न की भाषा सरल होनी चाहिए। अलंकारिक भाषा के प्रयोग से बचना चाहिए। परीक्षा परिणाम आज विद्यालय की ख्याति से जुड़ गई है। हमारी परीक्षाएँ सिद्धांतों पर आधारित ज्ञान की परीक्षा का रूप ले रही है। जीवन एवं व्यवहार से संबद्ध होकर ही परीक्षाएँ अपना औचित्य सिद्ध कर सकती है। अतः इस विषय पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन
सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का अर्थ शिक्षण के साथ-साथ चलने वाले मूल्यांकन से है।इसका मूल उद्देश्य है कि विद्यार्थी में अपेक्षित विकास हुआ है या नहीं। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) का अर्थ छात्रों के विद्यालय आधारित मूल्यांकन की प्रणाली से है जिसमें छात्रों के विकास के सभी पक्ष शामिल है। सीसीई, बोधात्मक, मनोगतिक और भावात्मक कौशलों के विकास में सहायक सिद्धहोती है। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन, विद्यार्थी की शैक्षणिक (scholastic) एवं गैर-शैक्षणिक (non-scholastic) अनुक्षेत्रों में उपलब्धियों एवं उनसे संबंधित प्रगति स्तर को नियमित रूप आँकलन करने में  सहायक होती है। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन से विद्यार्थी के प्रतिभाग के स्तर को समुन्नत बनाने में सहायता मिलती है जिससे उसके सर्वांगीण विकास होता है। इस प्रकार सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का महत्व शिक्षा, शिक्षण एवं अधिगम की व्यवस्थाओं में अपेक्षित संवेदनशीलता, गुणवत्ता, सार्थकता तथा सजगता लाने की दृष्टि से सहज रूप में आँका जा सकता है।

शिक्षण प्रक्रिया के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित कराने के कारण इसे व्यापक मूल्यांकन विधि कहा गया है। अतः इस प्रकार का मूल्यांकन पारंपरिक परीक्षाओं की तरह लिखित एवं प्रश्नोत्तर पर केंद्रित नहीं होता बल्कि इस विधि द्‌वारा पाठ्यवस्तु की प्रस्तुति के पूर्व से लेकर उसकी समाप्ति के बाद तक विद्यार्थी के अधिगम एवं विकास का मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाता है।

निष्कर्ष
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि हिंदी भाषा शिक्षण में परीक्षण एवं मूल्यांकन से संबंधित अनेक प्रयोग किए गए है। आज इस दिशा में नई तकनीक को प्रयोग में लाया जा रहा है। परीक्षा प्रणाली और मूल्यांकन की प्रक्रिया को और सुदृढ़ कैसे बनाया जाए, इस विषय पर विस्तार से और गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।

शिक्षण, परीक्षण, मूल्यांकन परस्पर संबद्ध प्रक्रियाएँ है। शिक्षक और छात्र दोनों ही शिक्षण और अधिगम की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण अंग है। छात्र भाषा सीखने में कहाँ तक समर्थ हो सका है साथ ही अध्यापक का शिक्षण कितना प्रभावशाली है, इसका समय-समय पर मूल्यांकन होना चाहिए। मूल्यांकन का महत्व शिक्षण में सुधारात्मक भूमिका के रूप में होती है। मूल्यांकन का प्रयोग अधिगम और शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाता है। साथ ही शिक्षण तकनीकों में परिवर्तन और परिवर्धन के लिए भी किया जाता है। अतः मूल्यांकन के लिए परीक्षण आवश्यक है।

अंत में कहा जा सकता है कि हिंदी के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय वर्चस्व को ध्यान में रखते हुए भाषा कौशल के विकास के लिए विभिन्न अभ्यास एवं गतिविधियों के साथ-साथ कौशल परीक्षण हेतु विभिन्न मूल्यांकन पद्धतियों के निर्माण करने पर बल देना चाहिए।


सहायक ग्रंथ सूची
(क) शैक्षिक मापन एवं मूल्यांकन, डॉ. के.पी. पाण्डेय, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण-2011
(
ख) भाषा 1, 2 की शिक्षण-विधियाँ और पाठ नियोजन, डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा, श्री विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा, संस्करण-2013
(
ग) भाषा-शिक्षण: सिद्धांत और प्रविधि, मनोरमा गुप्ता, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, संस्करण-2005
(
घ) हिंदी भाषा प्रकृति, प्रयोग और शिक्षण, हीरालाल-बाछोतिया, आर्य प्रकाशन मंडल, दिल्ली, संस्करण-2012
(
ङ) मूल्यांकन शब्दावली प्रबोधिका – संपादक – एम. बालकुमार, राष्ट्रीय परीक्षण सेवा-भारत, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरु, संस्करण-2013 

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