श्रद्धांजलि: अटल बिहारी वाजपेयी

रमेश जोशी

प्रधान सम्पादक, 'विश्वा', अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, संयुक्त राज्य अमेरिका


बात 14 अक्तूबर 1995 की है। अटल जी के कविता संकलन 'मेरी इक्यावन कविताएँ' का श्री नरसिम्हा राव द्वारा विमोचन का समाचार। विमोचन में बोलते हुए राव साहब ने अटल जी को अपना गुरु बताया था।

मैं उन दिनों लगातार कुण्डलिया छंद लिख रहा था जो जनसत्ता, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, कादम्बिनी आदि में छप भी रहे थे। जैसे ही समाचार पढ़ा कई कुण्डलिया छंद अनायास ही बन गए जिनमें से कुछ इस प्रकार से थे -

शिष्य अटल जी के बने पछताएँगे आप
जो इनका चेला बना उसका पत्ता साफ़

उसका पत्ता साफ़, चंद्रशेखर बतलाएँ
पी.एम. की कुर्सी पर कितने दिन रह पाए

कह जोशी कविराय इरादा बदल दीजिए
इनके चेले शेखर जी से सीख लीजिए


सुनो अटल जी राव की मानो नहीं सलाह
चौथेपन में कैरियर क्यों कर रहे खराब

क्यों कर रहे खराब, इक्यावन पद्य सुनाएँ
सिर पर रखकर पैर सभी वोटर भग जाएँ

कह जोशी कविराय पड़े पछताना कल को
कर कविता बरतरफ सँभालो अपने दल को


चेले तो मिलते बहुत पर है एक सवाल
नहीं चाहिए 'गुरु' इन्हें चहिए 'गुरु घंटाल'

चहिए 'गुरुघंटाल' दलालों से मिलवाए
कुर्सी, कोठी, कार, कमीशन खूब दिलाए

कह जोशी कविराय शिष्य जब समझ जाएँगे
गुरु है फाका मस्त छोड़कर भग जाएँगे


'कैदी कवि अपहरण का' हम को आया ख्वाब
हम कितने बेचैन थे कह ना सकें जनाब

कह ना सकने जनाब, मित्र ने जब समझाया
'कवि का बाँका बाल नहीं कोई कर पाया

कह जोशी कविराय सभी कवि से डरते हैं
अल-फरान*  क्या चीज राव भी गुरु कहते हैं।
(*एक तत्कालीन अतिवादी संगठन )


राजनीति और काव्य का नहीं ज़रा भी मेल
जो राजा शायर बना, बिगड़ा उसका खेल

बिगड़ा उसका खेल, ज़फर को जेल हो गई
गया तख़्त औ' ताज शायरी फेल हो गई

कह जोशी कविराय एक पर ध्यान दीजिए
बना रहे हैं राव आपको समझ लीजिए


नेताजी कवि हो गए, बदल गए बदमाश
सूटकेस तज पढ़ रहे श्लेष और अनुप्रास

श्लेष और अनुप्रास, गोष्ठियाँ भी करते हैं
'वंस मोर, क्या खूब, बहुत सुन्दर' कहते हैं

कह जोशी कविराय कष्ट सहना पड़ता है
कवि से हो 'गर काम रसिक दिखना पड़ता है।

अटल जी ने उस पत्र का ज़वाब भी भेज दिया। इतनी सहजता, इतना ज़मीनी और जीवंत जीवन। लोकतंत्र में यही सहजता और विनम्रता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है जो आज की राजनीति में समस्त विश्व में विरल होती जा रही है। नेता लोग अपने शिलापट्ट के लिए सिरफोड़ी करते दिखाई देते हैं, आत्मप्रशंसा और आत्ममुग्धता से ग्रस्त हैं। विश्व राजनीति में आ रहा यह टुच्चापन डराता है। उनका पत्र इस प्रकार था-

अटल बिहारी वाजपेयी, नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा
19 अक्तूबर 1995

प्रिय जोशी जी

आपका 14 अक्तूबर का पत्र तथा चुटकियाँ मिलीं। पढकर मज़ा आ गया। आप चुटकियाँ लिखने पर ध्यान दें, प्रकाशन के लिए भेजें। हिंदी में शिष्ट हास्य की कमी है।
जहाँ तक राजा के शायर होने का सवाल है तो मैं राजा नहीं हूँ यह लोकतंत्र का ज़माना है। सेनेगल के राष्ट्रपति बहुत अच्छे कवि है। फिर कुल जमा 51 कविताएँ लिखने वाला व्यक्ति कवि भी नहीं कहा जा सकता।

दीपावली की शुभकामनाओं के साथ, आपका,
अटल बिहारी वाजपेयी

2 comments :

  1. बहुत सुंदर व प्रभावी संस्मरण जोशी जी बधाई

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  2. जितनी अच्छी अभिव्यक्ति उतना ही सरल और सौम्य उत्तर,बधाई

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