कहानी: डेटिंग इन पार्क

रिम्पी खिल्लन सिंह

रिम्पी खिल्लन सिंह


वह अक्सर जा बैठा करती थी पार्क में उन औरतों के झुन्ड के बीच जो ज़िन्दगी से रिटायर सी थी। उनके पास फुर्सत थी क्योंकि अब घरवालों के पास उनकी ज़रूरत के जो भी काम होते थे उन्हें निपटा कर वे औरतें अपने जीने का सामान जुटाने यहाँ आ जाया करती थीं। घर से यही कहकर निकलती थी कि अब थोड़ा भगवान का भजन भी कर लें, पता नहीं कब जीवन लीला समाप्त हो जाये। सोलह साल की अल्हड़ लड़कियों की तरह ये सब खुद को भी और घर वालों को भी धोखा देकर निकल आती थीं। जो पहले पहुँचती, वह दूसरी को नम्बर दाग देती और डेट फिक्स हो जाती।

आज कान्ता पहले पहुँच गयी थी। सामने एक प्रेमी युगल बैठा था। थोड़ा हट कर और थोड़ा सट कर, पर कान्ता की अनुभवी आँखें कब ताड़ने से बाज आती। वह समझ गयी कि किस्सा डेटिंग का है पर उसे तो अपनी डेट्स का इंतजार था ताकि उन्हें बता सके कि आज क्या-क्या किया जा सकता है। नुक्कड़ पर गोपी चाट वाले की दूकान है। घर में वही घीया, लौकी, तरकारी खाकर बाज आ चुकी कान्ता की जीभ पर कई मसालों के स्वाद उछल रहे थे, तभी उसे पम्मी आती दिखाई दी।

"पम्मी, कितनी देर लगा दी। कितनी मुश्किल से निकलती हूँ घर से, सारा दिन की चौकीदारी है। बहू को तो नौकरी से ही फुर्सत नहीं" कान्ता एक ही साँस में शिकायतों की दुकान लगाती जा रही थी। फिर उसने गहरी साँस लेते हुए कहा, "अब जाकर बहू वापिस आयी है तो थोड़ा निकल पायी हूँ।"

कान्ता अपनी कहानी सुना रही थी लेकिन उसकी निगाहें उस प्रेमी युगल पर ही थी। अपनी शिकायतों की पोटली एक तरफ रख, वह पूरी तरह से मस्ती के मूड में आ गयी और पम्मी का ध्यान उस प्रेमी युगल की तरफ खींचते हुए बोली, "अरी देख क्या ज़माना आ गया है। कब से दोनों लगे हुए हैं सामने। एक हम थे जो बस एक बार बंध गये खूँटे से तो बँध गए और इन्हें देखो रोज़ नयी कहानी।" पम्मी जो अब तक कान्ता की बकबक लगातार सुन रही थी, हाथ नचाते हुए बोली, "आय-हाय, जैसे तुझे रोज़ नयी कहानी लिखने का मौका मिलता तो तू छोड़ देती? पता है मुझे,घर से कह कर निकलती है कि भजन करने जा रही हूँ और लेने आती है चाट के मज़े, चटोरी कहीं की। तू तो ऊपर वाले के पास पहुँचते पहुँचते भी चाट ही माँगेगी।"

कान्ता ने सीज़फायर करते हुए कहा, "ठीक है, भई ठीक हैं, बाकी गपोड़ियाँ और चटोरियाँ कहाँ रह गयीं? मन्दा, आशा, राज़ सबको पूछ आ रहीं हैं कि नहीं? तभी सामने का युगल थोड़ा और करीब सट गया था। कान्ता की आँखें लगभग बाहर आने को हुईं, वह पम्मी का हाथ दबाकर बुदबुदाई, "हाय क्या करेंगे अब?"
पम्मी उसका हाथ झटकते हुए बड़बड़ाई, "मुझे क्या पता क्या करेंगे। तू तो ऐसे पूछ रही है जैसे मैं रोज़ यही सब करती हूँ। अच्छा छोड़ वो देख मन्दा और आशा भी आ गईं", पम्मी ने पार्क के गेट की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"भई मन्दा कहाँ रह गई थीं तुम दोनों", कान्ता उन्हें देखकर दूर से ही चिल्लायी।

अपने आप में उखड़ी मन्दा कान्ता के पास आकर बैठ गई और आशा पम्मी के कान में कुछ खुसर फुसर करने लगी। मन्दा उखड़े हुए स्वर में बोली, "तुझे कान में खुसर फुसर करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं खुद ही बताती हूँ। बस ज़रा टीवी देख रही थी कि पोता हाथ से रिमोट छीन ले गया। मैंने डाँटा तो बहू बोली, "इस बुढ़ापे में भी टीवी का मर्ज लगा है, अब छोड़िये ये टीवी-वीवी और बच्चों को देखने दीजिए। अब बताओ हमारा मन न होता क्या टीवी देखने का।" मन्दा कातर आँखों से बोली, "हमें भी तो अच्छा खाने का, पहनने का मन होता है। देह बुढ़ाने के साथ इच्छाएँ थोड़े ही न बुढ़ा जाती हैं।" उसकी आँखों से आँसू बरसने ही वाले थे कि तभी कान्ता उसका हाथ हाथों में लेते हुए बोली, "अरे तभी तो कहती हूँ कि टाईम पर आया करो यहाँ, मैं क्या किसी टीवी से कम हूँ, बोलो कौन सी दुनिया की खबर चाहिए तुम्हें वो पड़ोस की लल्ली की? कल घूम रही थी उसी के साथ। अरे कुछ नहीं, चार दिन घुमायेगा, फिर यही छोड़ जायेगा। मेरा यार बदमाश। ऐ ये मेरा फोन देख, इसमें भी सबकुछ दिखाई देता है आजकल। लो बाकी भी आ गईं ", कान्ता उत्साह से बोली। वह छोटे बच्चे की तरह उछलती जा रही थी। उसने सबको जल्दी से बैठने को कहा, "बैठो भई, जल्दी बैठो। गोपी की दूकान से छोटू को बुलवा लेती हूँ, यहाँ बैठ कर गोल गप्पे खिला जायेगा।" मन्दा ने गले को खरखराते हुए जवाब दिया, "ऐं हैं, मेरा तो गला खराब है ।कान्ता फिर अपने हाथ नचाते हुए बोली, "भई जिसे नहीं खाना न खाये, मैं तो सब कुछ खा के मरूँगी।" " सही कहा कान्ता तूने जल्दी बुला ले", आशा बोली।

धूप थोड़ी ढलने लगी थी। सामने बैठा प्रेमी युगल थोड़ी दूर वाली बेन्च पर खिसक गया था। "कब से यहां बैठे हैं दोनों, शाम ढलने को है, भइ अब तो घर को जाओ", आशा तन्ज कसते हुए बोली। कान्ता ने तुरन्त अपने मुँह फट लहज़े में आशा को झाड़ लगायी, "हाँ, तुझे बड़ी शर्म है, जीभ का चस्का गया तेरा इस उम्र में, सब का पता रखना है तुझे। तो फिर इनकी तो उम्र है।" कान्ता की इस बात पर आशा तड़पड़ाई, "हाँ, और जैसे मेरी उम्र पूरी ढल गयी। अब भी कइयों को धोबी पछाड़ दे सकती हूँ। वो तो घर में बहू-बेटी के सामने थोड़ी फीकी ही रहती हूँ। आज भी बाल ठीक से रंग लूँ ना और सही से कपड़े पहन लूँ तो आधी लगूँगी अपनी उमर से।" आशा अपने उड़ते बालों को ठीक करते हुए बोली। "हाँ भई तू तो वो क्या कहें कि कटरीना कैफ है", कान्ता ने फिर चुटकी ली। सब ठठा कर हँस पड़ी। तभी आशा की नज़र दूर से आती सविता पर पड़ी। उसने कहा लो भई, ये भी आ गई। देर आये, दुरूस्त आये। अभी सविता ठीक से बैठ भी न पायी थी कि कान्ता ने सवाल दाग दिया, "और क्या बना आयी सविता आज घर में?" "कुछ नहीं वही रवि की पसंद की भिन्डी और दाल। मुझे नहीं पसन्द, इसलिए सोचा बाहर ही कुछ खा लूंगी। मैं तो गोल गप्पे के साथ टिक्की भी खाऊँगी", जीभ को होंठों पर घुमाते हुए सविता ने ऐलान सा किया।

"खा लेना, पेट तो तेरा ही है।" तभी कान्ता को कुछ याद आया, कोने में बैठी राज की तरफ उकड़ूँ बैठते हुए पूछा, " तेरा क्या जाना सचमुच पक्का हो गया है?।" राज को जैसे झटका सा लगा, "पता नहीं अब इस उम्र में मैं मुम्बई जाकर क्या करूँगी? बेटा बहू की तो नौकरी है, सारा दिन घर में बैठकर मैं दीवारें ताकूँगी। बेटा है कि घर बेचकर जाने की ज़िद पर अड़ा है। पास वाले पेड़ पर

कई चिड़ियाँ चीं चीं कर रही थीं जैसे उन्होंने अपनी डेट फिक्स कर रखी हो। "पर तू उसे समझाती क्यों नहीं" कान्ता ने फिर कुरेदा। "क्या समझाऊँ?" राज की आवाज़ में बेबसी थी। कान्ता फिर भी अड़ी थी, "समझा कि तू वहाँ अकेली कैसे रहेगी?" इस पर राज की बेबसी पूरी तरह बाहर आ गयी थी वह सिसक रही थी और भरी बदली की तरह बरस रही थी, बड़ी मुश्किल से खुद को थामते हुए भरभराई आवाज़ में बोली, "पर वो तो कहते हैं कि मैं अकेली कहाँ हूँ? वो दोनों मेरे साथ हैं। साथ तो वो यहाँ भी हैं, पर कभी देखा है दोनों को मेरे साथ बैठकर बातें करते हुए? अगर करते भी हैं तो बस वही दवाई ले ली? खाना खा लिया? चश्मे का फ्रेम बदलना है क्या? बस इतना ही चाहिए मुझे क्या?" राज की आवाज़ काँप रही थी। वह एक नदी थी जिसका बाँध टूट चुका था और अब वो बाढ़ ला सकती थी, कभी भी। "मैं हाड़ माँस का पुतला हूँ क्या सिरफ? बूढ़े शरीरों में दिल नहीं होता क्या? वो शरीर से भी पहले मर जाता है क्या?" राज बुरी तरह बिसूरने लगी थी।

चिड़ियों की चहचहाहट शोर में बदल गयी थी। कान्ता भाँप गयी थी कि अब इस जलजले को रोक पाना मुश्किल है इसलिए बात बदलते हुए बोली, "अरे, छोड़ ये सब देख गोपी भी आ गया। अरे गोपी सबसे पहले राज की मनपसंद भल्ला पापड़ी बना दे भइया, उसके बाद हम खायेंगे।" उनकी बातों से अनजान गोपी ने चुटकी ली, "अरे इतनी चाट तो मालिक की पूरे मुहल्ले में नहीं बिकती जितनी आप लोग पार्क की बेंच पर बैठे बैठे चट कर जाती हैं।" कान्ता चिल्लायी, "तेरे बाप का पैसा लेकर खाते हैं क्या? चुप रह और बना चाट"। गोपी खिसिया गया, बोला, "लो भई लो मैं कब मना कर रहा हूँ और चाची आप तो वैसे भी जा रही हो ना अगले हफ्ते मुकेश भैया के साथ। खा लो, खा लो, फिर नहीं मिलने वाली ऐसी चाट।"

तब तक सामने बैठी लड़की का भी मन हो आया था गोलगप्पे खाने का। उसने लड़के से फरमाईश की "चलो गोल गप्पे ही खिला दो।" लड़के ने आवाज़ दी "भइया, इनके बाद हमें भी खिला देना"। कान्ता ने ज़ोर से चुटकी ली "हाँ भइया ज़रूर खिला देना। डटे हैं सुबह से इसी बेन्च पर, न भूख सताये है न प्यास, पता नहीं कौन सा फैवीकोल चिपका रखा है?" गोपी मुस्करा दिया। प्रेमी युगल की तरफ खोमचा लिए चल दिया I

अब सबका ध्यान फिर एक बार राज की तरफ फोकस हो गया। आशा ने कहा "भई अगर तू सचमुच जा रही है तो मुझे वो आँवले का मीठा मुरब्बा ज़रूर सिखा देना। अब तक तो तुझसे बनवा लेती थी। तेरे जाने के बाद कौन बनायेगा?" कान्ता बोली "लो इसे राज की नहीं, आँवले के मुरब्बे की फिक्र है"। आशा की हाजिर जवाबी सामने थी, "ओ मेरी बोली मैना जाने वालों की फिक्र किसको होती है? उनसे मिलने वाले सुख को ही तो सभी रोते हैं। इतने दिन हमारे साथ हरि भजन करके कुछ नहीं सीखा।" "हाँ भई तूने तो गीता घोट के पी रखी है। आज जाते जाते कोई बढ़िया सा भजन गा देना।" कान्ता ने फरमाईश की। तब तक गोपी उन्हें खिला पिलाकर दूसरी दूकानदारी पर निकल गया था। लड़की चटखारे ले लेकर गोलगप्पे खा रही थी और लड़का उसे खाते हुए देख रहा था। सूरज थोड़ा और ढलने लगा था। कुछ चिड़ियाँ अपने घोंसले की तरफ उड़ते हुए दिखाई देने लगी। आशा गा रही थी "मैं रंगी अपने श्याम रंग, मोहे फीका लगे सब जग, न भाए को ई और संग, मैं रंगी अपने श्याम रंग।"

प्रेमी युगल ने एक दूसरे का हाथ कसकर थाम लिया था। सारी मंडली जोर जोर से गीत गा रही थी शाम अपने पूरे शबाब पर थी। थोड़ी देर में भजन समाप्त होने वाला था। सामने वाला जोड़ा भी अब उठकर जाने को था। बची खुची चिड़ियाँ भी घर की तरफ फुर् करके उड़ गयी थीं कि कहीं रास्ता न भूल जायें।

कान्ता ने आखिरी टेक ली और मंडली विसर्जित होने को थी तभी राज उनकी तरफ मुड़ी और बड़ी ताकत से बोली, "मैं नहीं जाऊंगी मुकेश के साथ, मुझे उन दोनों से लेना देना क्या है? मेरी दुनिया तो तुम्हीं लोग हो। मैं नहीं रह सकती इस पार्क के बिना, तुम से मिले बिना। बेच दे घर, आती है ना उसके बाबूजी की पेन्शन। मैंने भी थोड़ा पैसा जमा कर रखा है। रहूँगी किराये पर लेकर मकान। बोलो कल कितने बजे मिलोगी? मैं सब ठीक कर दूंगी,बस तुम सब कल टाईम पर आ जाना।" प्रेमी जोड़ा भी तब तक पार्क के आखिरी मुहाने पर था। लड़के ने लड़की को भींचकर उसके होठों पर अपने होंठ रख दिए थे, ये सोचकर कि उन्हें अन्धेरे में कौन देखेगा। पर वे कई जोड़ी बदमाश आँखें कुछ ही दूरी से खड़ी उन्हें निहार रही थी। धीरे से कान्ता ने भजन की आखिरी टेक फिर दुहराई "मैं रंगी साँवरे रंग, गहरा चढ़ गया ऐसा रंग, मुझे न भाए और कोई भी संग।" आशा ने जोर से कान्ता के बगल में चुटकी काटी। कान्ता ज़ोर से खिलखिलाई। उसकी खिलखिलाहट से लड़का और लड़की दोनों सकुचाए और सड़क की तरफ लपके। पार्क का सन्नाटा थोड़ी देर के लिए ही सही वापिस ज़िंदगी की खिलखिलाहटों में बदल गया था।

2 comments :

  1. सरल और संवेदनशील भावनाओं से ओत प्रोत आज के समाज का सही मूल्यांकन किया गया है इस कहानी में लेखिका द्वारा। उजड़ते बदलते संबंधों का चित्रांकन बहुत ही सुरुचिपूर्ण उदाहरण के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। स्त्री की संवेदनशीलता उसकी कमजोरी भी है और शक्ति भी। आशा है कि भविष्य में भी ऐसे ही सुन्दर और तथ्यपूर्ण विषयों को ऐसी सुलभ और मार्मिक कहानियों को लेखिका रिम्पी खिलन सिंह प्रस्तुत करती रहेंगी।

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  2. शरीर और मन जब एक होड़ में आ जाएं और मन भागते भागते थोड़ा आगे निकल जाए तो जिजीविषा बढ़ जाती है और उसे बनाए रखने के लिए हमें एक युद्ध में उतरना पड़ता है,अपने सुरक्षित घेरों से बाहर। राज और उसके साथ की हर वह औरत जो परिवार और समाज द्वारा फालतू मान ली गयी है इसी युद्ध में उतरती हैं उपने बने और जीवित रहने का युद्ध।
    स्पष्ट और जीवंत अभिव्यक्ति एक नए मुद्दे के साथ ऐसी ही बेहतरीन कहानियों की आशा आपकी कलम से है मैम।

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