काव्य: निष्ठा मिश्रा

दुःख होता है

हाँ, तुम प्रकृति का प्रेम नहीं देखना चाहते 
अगर देखते तो देख पाते
धरा और आकाश को मिलते हुए क्षितिज का रूप लेकर।
लोगों की आँखो में जैसे धूल झोंक कर
जा मिलता  है आकाश धरा से
और करता है सागर के जलों से प्रेयसी धरा का अभिषेक।
तुम देखते हो केवल वह आसमानी रंग
पर वह धरा का कर आलिंगन
रंग देता है अपने रंग में
कुछ शेष बची रह गईं उन नदियों के धार को।
समझ लेते हो उनकी प्रसन्नता का प्रवाह
तुम्हें लगती  हैं वह मात्र संवेदनहीन चट्टान
पर वे नहीं फोड़ते स्वयं से टकराने
वाली उन नदियों के माथे को
तुम नहीं समझ पाते कि जिन पर्वतों 
से टकराकर वे अठखेलियाँ कर बह रही थीं,
अब तुम उन्हें काटकर बना बैठे हो अपने  मार्ग की सुगमता
और अब अनवरत अश्रुओं की धार लिए बहती हैं वे।
तुम सुन पाते तो सुनते की कैसे
पवन अपने उत्साह के वेग से
श्पर्श करता है जब वृक्षों  को तो
गाते हैं मधुर संगीत टहनियाँ और पत्ते।
तुम्हें उपलब्ध है साफ सुथरा, पीने को जल
अगर तुम महसूस कर पाते तो करते
उन असंख्य जीव, जन्तुओं की जिह्वा की प्यास को
जिन्हें मिलता नहीं, मिलता भी है 
तो पीने को किसी कचरे और नाले का गंदा पानी
कैसे बूँद-बूँद की खोज में पत्थरों से सर टकराकर
तोड़ देते हैं दम, और फिर जब मिलते हैं उनके कंकाल
डाल देते हो बड़ी आसानी से उन जीवों को विलुप्तप्राय
जीवों की श्रेणी में और उनको संरक्षित
करने का झूठा ढोंग रचते हो।
हाँ, अब पीड़ा होती है कि सृष्टि की सबसे सुंदर रचना तुम हो!
और तुम्हीं संसार को किये जा रहे हो बदसूरत
तुम विवेकपूर्ण थे, अब विवेकहीन होते जा रहे हो
क्यों आँखे मूंद ली हैं तुमने
क्यों बहरे बने हो?
क्यों भावना शून्य बनते जा रहे हो
क्यों तुम पुकारना नहीं चाहते
अब भी जल की तलाश में भटक रहे
उन मासूम, बेदम हो रहे जीवों को?
क्यों स्वार्थ की शरण जा बैठे हो?
मुझे दुःख है की तुम केवल मनुष्य भर शेष रह गए हो
कहाँ है मनु की  मनुष्यता का मनुष्य?

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