लघुकथा: पापी चमक

नफे सिंह कादयान
मेरे गाँव में एक बुजुर्ग है जिससे अक्सर मैं उसकी जिंदगी के पुराने किस्से इस आस में सुनता हूँ कि शायद कलम चलाने के लिए कुछ मसाला मिल जाए। एक दिन बाहर बाड़े में बैठे हुए आजादी के बाद हुए दंगों पर बात चली तो उसने मुझे कई क़त्लो-ग़ारद के किस्से सुनाए।

   ‘फिर तो ताऊ तूने भी दंगों में दो-तीन बंदे तो टपका दिये होंगे?’ मैंने मजाक में यूँ ही उससे हँसते हुए पूछा।

  ‘मैने कहाँ टपकाए यार, टपकाने का काम तो इस इलाके का दबंग दिदार सिंह टोल्ली ले करता था। मैं बेशक उनके साथ रहता पर अठारह-उन्नीस का होने के कारण वो मुझे बच्चा समझकर बेगार करवाते और बस लूटा हुआ थोड़ा चणा-चबैणा ही देते थे।’

  ‘ओह! ये तो तेरे सा ज्यादती की उन्होंने।’ मैं उससे दोबारा मजाक में बोला।

  ‘मुझे तो वो हरामी कुछ समझते ही नहीं थे। नीच कमीने एक रात कत्लो-गारत कर हसीन कमसिन कली उठा लाए। लम्बा छरछरा संगमरमरी बदन, होठ गुलाब की पंखुडि़यों जैसे, ... और गाल तो पके सेब जैसे दिखते थे। वो इतनी सुंदर थी कि अप्सराएँ भी इर्ष्या करने लगें। मैने जीवन में पहली बार इतनी हसीन परी देखी थी। उन जल्लादों ने उसे खण्डहरों में ले जा बुरी तरह मसला। मुझे भाला पकड़ाकर सालों ने पहरे पर बिठा दिया और अपने आप उस मासूम अबला पर कुत्तों की तरह टूट पड़े, नीच, बदमाश थे सब।’

  ‘ओह!’ मैने सुना तो सकते में आ गया। मैं उस मासूम के दर्द को महसूस करने लगा पर उस बुजुर्ग की आँखों में मुझे हताशा, निराशा, और कुछ कर न सकने की पापी चमक दिखाई दे रही थी।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।