व्यंग्य: हम संप्रदाय से ऊपर उठ गए

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

दिमाग़ कुलबुला रहा है। इस कुलबुलाहट से व्यंग्य उपजता है। शायद इसलिए आदमी आदिम जमाने से व्यंग्य करने का शौकीन रहा है। वह जिस वस्तु को देख ले उसका वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करना उसकी प्रवृत्ति है। विश्लेषण के अंत में उसे निष्कर्ष भी निकलना होता है कि आदमी सर्वश्रेष्ठ है। उसने धरती पर छोटे-बड़े जीव देखे तो उसे बड़ी संतुष्टि हुई। उसने उनको नाम दिए - कीड़ा, मकोड़ा, चूहा, गीदड़, लोमड़ी आदि। लोगों ने इस वर्गीकरण को सप्रेम स्वीकार लिया। फिर एक आदमी दूसरे को कीड़ा, मकोड़ा कहने लगा। उसको पुरुषों में ही चूहे-गीदड़ मिल गए और महिलाओं में लोमड़ियाँ। उसे लगा ऐसा कर वह अपने समकक्षों को नीचा दिखा रहा है।

दूसरे आदमी को पशु तुल्य बनाने से उसे संतोष नहीं हुआ तो उसने जातियाँ बना दीं। जातियों की संख्या मुझे नहीं मालूम। तैतीस करोड़ देवी-देवताओं के डर के मारे जनगणना महानिदेशक जातियों की कुल संख्या बताने से डरते हैं। बचपन में किसी ने मुझे बताया था ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उनकी डायरेक्ट एप्रोच है। वे भगवान को जानते हैं, भगवान उनको जानते हैं। ब्रह्म जानाति ब्राह्मण:। मैं एक ब्राह्मण से मिला, उनसे पूछा - देव, आप कैसे ब्राह्मण हैं।  वे बोले हम सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, हम चतुर्वेदी हैं; द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी। मैंने कहा अनंतवेदी तो आप से ऊपर हुए न? वे गुस्सा हो गए, कहने लगे, मूरख, वेद चार ही हैं, अनंत नहीं। चलिए मान लेते हैं, सहृदय पुरखों ने जाति प्रथा कर्म आधार पर बनायी थी। तद्न्तर राजनीति ने जाति प्रथा को हथियार बना दिया, फूट डालो और राज करो। राजनीतिज्ञों का यह रामबाण सूत्र है, आज भी उतना ही कामयाब है, जितना अंग्रेज़ों के वक़्त था।

इक्कीसवीं सदी के हम लोग अब तक के सबसे समझदार लोग हैं। जाति और धर्म पुरातनपंथी हैं, हम इन्हें नहीं मानते। हम संप्रदाय से ऊपर उठ गए हैं, काले-गोरे से ऊपर उठ गए हैं। पर क्या करें मनुष्य हैं, हम में दिमाग़ है, जो नींद में भी काम करता है। हमने अब अपनी पहचान के नए मानदंड बना लिए हैं - आर्थिक मानदंड। अंग्रेज़ों ने इन्हें नाम दिया 'अपर क्लास' और ‘लोअर क्लास' हमने उसका भारतीय करण कर दिया - उच्च वर्ग और निम्न वर्ग। रेलगाड़ी में फर्स्ट क्लास, सेकंड क्लास आदि डिब्बे साथ मिलकर रेल चलाते हैं, वैसे ही उच्च वर्ग और निम्न वर्ग साथ मिलकर देश चलाते हैं। अनेकता में बेमिसाल एकता है। अब व्यंग्य करने का मज़ा है; उच्च वर्ग, निम्न वर्ग पर तंज कसे और निम्न वर्ग, उच्च वर्ग पर बाण चलाये।

निम्न वर्ग हर काम करता है, साथ ही सब दुःख-दर्द भी सहता है। उच्च वर्ग शारीरिक काम नहीं करता, सिर्फ ऐश करता है। श्रम का मूल्य कम है और पूंजी का ज़्यादा। आदमी ने जब से पूंजी नामक परी को घड़ा है, उसी का दीवाना हो गया है। जिसे देखो पूंजी चाहिए, ज़्यादा से ज़्यादा चाहिए। निम्न वर्ग के संघर्ष व उच्च वर्ग की लालसा ने एक सैंडविच वर्ग बनाया है। आपने सही पहचाना, मध्यम वर्ग। मैं और आप सभी इसी वर्ग में आते हैं। काम के वक़्त आराम करते हैं, आराम के वक़्त काम करते हैं। काम और आराम का समीकरण है मध्यम वर्ग, काम और आराम का सैंडविच है मध्यम वर्ग।

मुझे उच्च वर्ग का ज़्यादा अनुभव नहीं है। बस, मैंने उच्च वर्ग के लोगों के नाम सुने हैं। जैसे बिल गेट्स, वॉरेन बफेट, ज़करबर्ग, अंबानी। इन्हें हमेशा सिक्युरिटी घेरे रहती है, उनको स्पर्श कर पाना कठिन है। हाँ, इस वर्ग में ट्रंप जैसे अभिजात्य लोग भी हैं जो जब, जिसे चाहें, अनचाहा स्पर्श दे देते हैं।  ये पैदाइशी उच्च वर्ग के नहीं है; ठोकरें और धक्के खा-खा कर उच्च वर्ग में आये हैं। हम सब मध्यमवर्गियों के लिए ये मिसाल हैं, फैसबुक और ट्विटर पर फॉलो करने लायक हैं।

बात तो मैं अपने ही वर्ग की कर रहा था। एशिया हो, यूरोप हो या अमेरिका, हर जगह मध्यम वर्ग सबसे भारी है। हमारा वर्ग सृष्टि का सबसे मुखर वर्ग है, कोई भी मसला हो हम टाँग अड़ा देते हैं। शोषक बनना हो तो निम्न वर्ग को निचोड़ देते हैं, और शोषित बनना हो तो उच्च वर्ग की हाय-हाय शुरू कर देते हैं। अपने मध्यम वर्ग की बहुत निजी बात मैं आपको ही बता रहा हूँ, इसे गोपनीय रखें - भ्रष्टाचार हमीं करते हैं और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी हमीं खड़े होते हैं। हिन्दी की बात अंग्रेज़ी में करते है, सबके सामने अंग्रेज़ी को गाली देते हैं, पर अपने बच्चो को इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेजते हैं। चरित्र के इस उदात्त और व्यावहारिक स्वरूप के कारण मुझे अपनी 'क्लास' पर बहुत गर्व है।

मैं भलीभाँति जानता हूँ - आप भी 'मिडिल क्लास' हैं।'  आप 'ऊपरी' बर्थ वाले होते तो तान कर सो रहे होते, इस तरह व्यंग्य नहीं पढ़ रहे होते। उच्च वर्ग के लोग ऐसी साधारण चीज़ें थोड़े ही पढ़ते हैं। उनके सलाहकार जो कहते हैं वही पढ़ते हैं, उनको जो ब्रीफिंग में सुनाया जाता है वही सुनते हैं। हमारे वर्ग की शानदार बात है, हमारा बहु-चरित्रवान होना। एक चरित्र ही तो है जो उच्च वर्ग और निम्न पास हमसे कम होता है। हम डंके की चोट अपना चरित्र 'डिक्लेयर' कर सकते हैं। उसमें कुछ लफड़ा हो जाए तो उसे शालीन तरीके से ढँक कर रख सकते हैं। हमारे यहाँ कभी 'सीबीआई' वाले या आयकर अधिकारी छापे नहीं मारते।

निम्न वर्ग वाले हमसे एक ही जगह आगे हैं कि उनके पास खोने को कुछ नहीं होता। सारे विश्व की सरकारें उनके लिए बहुत कुछ करना चाहती हैं। उनको वोट बैंक बना लूटना चाहती हैं। तब हम निम्न वर्ग के पहरेदार की तरह खड़े हो जाते हैं। हम काम करने वाले लोग हैं। सरकार जो देती है, उसे बीच में हड़प करने का रास्ता हम उच्च वर्ग को बताते हैं, इस तरह वे और उच्च बन जाते हैं। हम बैंक में हो तो अपने पासवर्ड उन्हें दे देते हैं। वे मंदिर-मस्जिद-चर्च तनवाते हैं, और हम उन परम्पराओं को पोषित करते हैं, उनकी जय-जयकार करते हैं।

हमारा वर्ग बहुत महत्त्वकांक्षी है। चालीस हज़ार रुपए वेतन हो तो हम साठ हज़ार खर्च करते हैं। उच्च वर्ग की नकल करते हुए हम वहाँ पहुँचने के सपने देखते हैं। मुझे खुशी है कि अब जाति से कोई स्टेटस नहीं बनता। स्टेटस बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यदि आप मिडिल क्लास हैं तो थोड़ा संघर्ष करिए और साथ ही मक्खन लगाइए। आप पाएँगे कि 'अपर मिडिल क्लास' नामक वर्ग आपसे ज़्यादा दूर नहीं है। अगर आप निम्न वर्ग के हैं तो काहे कि चिंता, अपने वर्ग को कस कर लात मारिए और कुछ ऊपर उठिए, आपके लिए ‘लोअर मिडिल क्लास’ का रुतबा हाज़िर है। आइए, एक साथ बोलें, "बटर सैंडविच क्लास ज़िंदाबाद, मिडिल क्लास ज़िंदाबाद।"
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