काव्य: वर्षा सरन

वर्षा सरन

लापता थी मैं


लापता थी मैं
मन के वीरान खंडहरों में
गुमशुदा अस्तित्व की सँकरी गलियों में
सोच के संकुचित दायरों में
अनजानी सी परिस्थितियों में
भूलभुलैया से जीवन के गलियारों में
सहसा
किसी ने मुझे अपना हाथ दिया
अपनत्व का साथ दिया
मेरे सर पर अपना हाथ फेरा
और कराया मुझ से मेरा परिचय
और गुम हो गया खुद
एक अंधेरे से संसार में
इससे पहले कि मैं उसका पूछती नाम
चला गया वो
बिना बताये अपना नाम
मैं स्तब्ध थी
अवाक थी
कि बिना किसी व्यापार के
कोई ऐसा भी करता है
कोई ऐसा दिव्य प्रेम करता है
जो ईश्वरीय आभा से परिपूर्ण था
सादा और गंभीर था
कभी कभी मुझे उस पर होता था
संदेह
पर वो एक सम्पूर्ण मानव था
एक अवतार शायद
सही गलत से ऊपर
एक निर्विवाद सत्य ही सत्य
अब मैं खोजती हूँ उसे
अपने मन के भीतर
मुझ में ही समाया था वो
उस के विचार समा गए मुझमें
और वो मेरे भीतर।

चिरस्थायी


चिरस्थायी
यहाँ कुछ भी नहीं
न धन, न दौलत
न यौवन, न स्वास्थ्य
न ये काल, न वो
काल अस्थायी है
समय के अवशेष
जो बिखरे हैं इधर उधर
कुछ मनोरम पृष्ठ भूतकाल के
उनकी खुशबू फैली है
दिशाओं में
और कुछ कड़वी यादें
जो जीवित है
मानसपटल पर
झकझोरते हुए ह्रदय का कोना कोना
बस वही स्थायी था
किन्तु देह के साथ
वो भी लकड़ियों सङ्ग जल गया
राख हैं
कुछ जीवन
बताने कि अस्थायी है सब कुछ
चिर काल तक कुछ भी नहीं
केवल आत्मा के आवागमन हैं
इस काल से उस काल तक

विश्व युद्ध


यूरोपीय उपनिवेशवाद
का दंश झेला है
कितने विकासशील देशों ने
बिना किसी मतलब
हज़ारों गुलाम देशों के
सैनिक शहीद हो गए
युद्ध की विभीषिका में
'शहीद' शब्द निर्रथक है
आत्म आहुति अपने प्राण की
अपनी मजबूरियों के साथ
दे दी, इन बेबस सैनिकों ने
स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और हिंसक युद्ध
जो था सीमित अधिकतर
एक बड़े महाद्वीपीय भूभाग में
अचानक से फैल गया
बन महामारी सम्पूर्ण जगत में
ये लोभ और अहंकार की लड़ाई
बन गयी थी कितने गरीबों के जान की विदाई
और आज लगता है उस पर मुलम्मा
प्रथम, द्वितीय विश्व युद्ध का
जब कि कितने राष्ट्र  जो परतंत्र थे
वे अपरिचित थे
इनके स्वार्थ और मानवीय असंवेदनाओं की
पराकाष्ठा से
जिसने भी पढ़ा होगा विश्व युद्ध
वो जानता ही होगा
यूरोपीय संघर्ष को
जो बन गया अंततः विश्व संधर्ष
मूल्यांकन करना ही चाहिए
ऐसे निरर्थक, हिंसक युद्धों का
जो है तो इतिहास
पर कभी भी दोहराए जा सकते हैं।


दौड़


मुझे सड़क पर रेंगते, भागते
फर्राटा दौड़ लगाते
मशीनी यंत्रों
मानविक यंत्रों
और मस्तमौला पशुओं की चाल
से लगता है बहुत डर
जिधर देखो उधर जल्दी है
दौड़ में फर्स्ट आने की आकांक्षा है
रनर अप बनने का शौक भी
इनकी शान के खिलाफ है
कभी-कभी ऐसी दौड़ भरते हैं कि
ईश्वरीय भेंट कर लेते हैं
कभी कभी ईश्वरीय भेंट करने में
कोई दलाल आ जाता होगा शायद
और वह भी भ्रष्ट दलाल
तभी अस्पताल नामक एक
ऐसी संस्था में दाखिल हो जाते हैं
जहाँ कराहते जिस्म
और बुदबुदाते होंठ हैं
और मोटी रकम ऐंठते
कमीशनखोर डॉक्टर और
मेडिकल स्टोर हैं
हाँ एक बात तो है
इन जगहों पर जाकर
थोड़ी-बहुत रफ्तार कम होती होगी
किसी का निश्चित समय सीमा के लिए
किसी की अनिश्चित...
लेकिन रफ्तार के शौकीन
को  भला कौन रोक सकता!

मानवता का मोल


अन्तर्मन से मिलन को
तनहाई जरूरी है
एकांत दिशाओं की खामोशी
जरूरी है
पर यहाँ तो शोर है...
कतारबद्ध दुखी मानसपटल में
सवाल बहुत
द्वन्द का उद्वेग है
मंदिर नहीं ये तो
महामंदिर है
आस्था का केंद्र है
बहुत बड़ा व्यापारिक स्थल
पंडितों और व्यापारीगण का
जहाँ होते हैं समझौते
कागज के नोटों से
इतना चढ़ाया
तो इतना दर्शन
आसानी से मिलता
रहने का साधन
यहाँ शोर वहाँ गुल
अरे रेरेरेरे...
फिर अचानक हुई बिजली गुल
और अनियंत्रित होती जाती भीड़ है
मानवता को ताक पर रख
किसी का जूता
किसी का सिर
ये क्या अजब सी
रेलम पेल है
बख्श दो अब तो
ईश्वर को
इस अपने  नकली झोल से
और कर दो मुक्त हवाओं
में इंसानियत के असली मोल को।


खोज


खोजना किसी को क्या इतना जरूरी है?
पहाड़ों, दरियाओं, लहरों
जंगलों, ग्लेशियरों, या आसमानी
हसरतों के बीच
इंद्रधनुषी इच्छाओं की परतों के बीच
चाँदनी रातों की ठंडी नम
मुलायम रेशमी किरणों के बीच
क्यूँ जुनून है?
कि कोई छुपा हुआ दिख जाए
पर दीखता ही नहीं!
साक्षात तो नहीं दिखता
बस कपोल कल्पनाओं में आकर
सर पर एक हल्का सा धप्पा मार कर
आँखों को शरारत से मटकाता हुआ
शायद, वह कहता है
देखा, नहीं ढूँढ पाये न मुझे
एक अजीब सी चकरघिन्नी में
फँसी मैं भी
रोज सोचती हूँ कि
आज तो खोज ही लूँगी उस मायावी को
फिर हताश हो जाती हूँ
जब हाँफ जाती हूँ
अथक प्रयास से
हाँ, खुद में भी खोजती हूँ
पर फिर वे विलुप्त हो जाते हैं
फिर सोचती हूँ कि
अकस्मात ही किस्मत के सहारे
मैं शायद उनसे मिलूँ
और फिर शायद ऐसे समा जाऊँ उस जादूगर (ईश्वर)की
बाँहों में कि
नज़र भी न आऊँ

मौन संवाद


मन ही मन तुमसे कुछ कहती हूँ 'प्रभु'
अविरल धार भर अश्रुओं की
आँखों में, मौन संवाद
संप्रेषित करती हूँ
फिर सोचती हूँ
कैसे सुना होगा तुमने
मेरे मौन मन को
जो करता है चीत्कार
दिल ही दिल में
अभी आँखों को ठीक से पोंछ भी न पाती हूँ
कि कोई सकारात्मक संदेश
सुनाई दे जाता है
फिर दिल को थाम
मुस्कुरा देती हूँ
किन्तु चंद घंटों पश्चात
किसी और समस्या से ग्रसित हो जाती हूँ
थक हार तेरे ही चौखट पर सर रख देती हूँ
और आशीर्वाद के रूहानी फूल
इन पलकों
इन होठों पर सजा लेती हूँ
कभी मुस्कुरा कर
तो कभी आँखों से तेरे दरश को पा कर!

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