खुद के लिए बेनाम मत रहो - फाइनमेन

खुद के लिए बेनाम मत रहो - यह अस्तित्व में होने का एक बहुत ही दुखद तरीका है - फाइनमेन
मेहेर वान

- मेहेर वान

सन 1965 में प्रोफ़ेसर रिचर्ड फाइनमेन को भौतिकी में नोबेल पुरस्कार मिला था। रिचर्ड फाइनमेन एक महान शिक्षक थे। उनके द्वारा दिए गए शैक्षिक भाषण “फाइनमेन लेक्चर्स ऑफ़ फिजिक्स” के नाम से किताबों के रूप में प्रकाशित किये गए और यह आज भी पूरे विश्व में मशहूर हैं। छात्र और शिक्षक दोनों इन किताबों को बड़ी रूचि के साथ पढ़ते हैं। सन 1966 में उनके एक पूर्व-छात्र और भौतिकविद डॉ कोइची मानो ने उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए बधाई देते हुए एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने प्रोफ़ेसर फाइनमेन की तारीफ़ करते हुए लिखा कि आपने एक महत्वपूर्ण समस्या हल की है जिसके लिए आपको नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्होंने अपने बारे में बताते हुए लिखा कि वह एक बहुत ही सामान्य और लघु समस्या पर काम कर रहे हैं जिसका शीर्षक Studying the Coherence theory with some applications to the propagation of electromagnetic waves through turbulent atmosphere […]  है। डॉ कोइची मानो ने इसके ठीक नौ साल पहले सन 1955 में प्रोफ़ेसर फाइनमेन के दिशानिर्देशन में कैलिफोर्निया इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलोजी से पीएच.डी. पूरी की थी। कोइची मानो का पत्र पढ़कर प्रोफ़ेसर फाइनमेन काफी आहत हुए थे और इसके जवाब में उन्होंने कोइची मानो को यह बताते हुए एक पत्र लिखा था कि एक अच्छे वैज्ञानिक को किन समस्याओं पर हल करने की दिशा में काम करना चाहिए। यह पत्र हर एक शोधार्थी और सामान्य व्यक्ति के लिए भी आँखे खोलने वाला और प्रेरणादायक है।

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प्रिय कोइची,

मुझे तुमसे यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई कि तुम शोध प्रयोगशालाओं में इतने अच्छे पद पर हो। दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से, तुम्हारे पत्र ने मुझे तुम्हारे लिए नाखुश कर दिया जिसमें मुझे लगा कि तुम सच में काफी दुखी हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे शिक्षक का प्रभाव तुम्हें सार्थक समस्याओं के बारे में गलत अवधारणा देता रहा है। सार्थक समस्याएँ वे हैं जिन्हें तुम सुलझा कर या सुलझाने में मदद करके कुछ ठोस योगदान देते हो। विज्ञान में वह समस्या महान होती है जो काफी समय से अनसुलझी हमारे सामने पड़ी हो और हम किसी भी तरह उससे पार पाने के कोई रास्ते ढूंढ रहे हों। मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि और भी साधारण समस्याओं को हल करने का प्रयास करो जैसे कि तुम कह भी रहे हो, और अधिक साधारण समस्याओं को हल करो जब तक कि तुम्हे कोई ऐसी समस्या न मिल जाए जिसे तुम सरलता से हल कर सको भले ही वह कितनी भी आसान क्यों न हो। तुम्हें इस तरह मिली सफलता में ख़ुशी का एहसास होगा, और इससे तुम अपने सह-कर्मियों की मदद कर पाओगे, चाहे वह तुम्हारे किसी ऐसे सहकर्मी के दिमाग में आये हुए किसी प्रश्न हो हल करने के लिए हो जो तुमसे थोड़ा ही कमजोर हो। इन छोटी-छोटी खुशियों से तुम्हें बहुत दूरी नहीं बनानी चाहिए क्योंकि “सार्थक क्या है?” के प्रश्न के बारे में तुम्हारे अन्दर त्रुटिपूर्ण अवधारणा है। 

तुम मुझसे मेरे करियर के चरम पर मिले थे जब मैं तुम्हें ईश्वरीय जैसी महान समस्याओं के बारे में दिलचस्पी लेता हुआ प्रतीत हुआ होऊंगा। लेकिन उस समय मेरे पास एक और पीएच.डी. छात्र (अलबर्ट हिब्स) था जो इस विषय पर काम कर रहा था कि समुद्र के ऊपर चलने वाली हवाएँ पानी की लहरों का निर्माण कैसे करती हैं? मैंने उसे छात्र के रूप में इसीलिए स्वीकार किया था क्योंकि वह खुद मेरे पास अपनी समस्या लेकर आया था, जिसे वह हल करना चाह रहा था। तुम्हारे साथ मैं गलती कर दी थी, मैंने तुम्हें खुद ही समस्या सुझा दी थी, जबकि मुझे तुम्हें समस्या खुद तय करने के लिए कहना चाहिए था; इससे तुम्हारे मन में शोध कार्य करने में ‘सुखद, रुचिपूर्ण, और महत्वपूर्ण क्या है’ के बारे में गलत अवधारणा बन गई (जैसे कि जिन समस्याओं को तुम खुद देख/समझ पाते हो उनके हल करने के लिए ज़रूर तुम कुछ कर सकते हो)। मुझे दुःख है और मुझे माफ़ कर दो। मुझे आशा है कि यह पत्र मेरी गलती को थोड़ा ठीक कर देगा। मैंने ऐसी तमाम समस्याओं पर काम किया है जिन्हें तुम साधारण कहोगे, मगर उन्हें हल करने में मुझे बहुत आनंद आया और मुझे बहुत अच्छा महसूस हुआ, क्योंकि मैं कभी-कभी ही सही थोड़ा-थोड़ा सफल हो पा रहा था। उदाहरण के लिए, अत्यंत चिकने तल पर घर्षण गुणांक नापने के प्रयोग, जिसमें यह जानना की कोशिश थी कि घर्षण कैसे काम करता है (इसमें मैं असफल रहा था)। या कि क्रिस्टलों की प्रत्यास्थता उस क्रिस्टल के परमाणुओं के बीच लगने वाले आपसी बलों पर कैसे निर्भर करती हैं या कि प्लास्टिक की चीज़ों को कैसे इलेक्ट्रोप्लेटेड धातु की चीज़ों से अच्छी तरह कैसे चिपकाया जाये (जैसे रेडियो में लगी नोब से प्लास्टिक का रोलर)? या युरेनियम के बाहर न्यूट्रिनो कैसे छितरते हैं? या प्रकाश की किरणें फिल्म की परत चढ़ाए हुए कांच पर से कैसे परावर्तित होतीं है? या बड़े धमाकों में आघात तरंगें कैसे बनती हैं? या न्यूट्रोन्स को गिनने वाले यन्त्र को कैसे डिजाइन किया जाए? कुछ पदार्थ सिर्फ L-ऑर्बिट से ही इलैक्ट्रोन्स लेते हैं और K-ऑर्बिट से इलैक्ट्रोन नहीं लेते। बच्चों के ख़ास तरह के खिलौने (जिन्हें फ्लेक्सगोंन कहा जाता है) बनाने के लिए कागज़ को मोड़ने के विधियों का सार्वभौमिक सिद्धांत कैसा हो? हल्के नाभिकों में ऊर्जा के स्तर कैसे हैं? टर्बुलेंस यानी वायुमंडलीय विक्षोभ का सिद्धांत (जिस पर मैंने वर्षों काम किया और असफल रहा)। इसके साथ ही क्वांटम सिद्धांत की तमाम महानतम समस्याएँ।

कोई भी वैज्ञानिक समस्या बहुत छोटी और आसान नहीं होती यदि हम सच में कुछ अच्छी तरह से उसे हल करना चाहते हैं। 

तुम कहते हो कि तुम एक बेनाम इंसान हो। लेकिन तुम अपनी पत्नी और बच्चे के लिए बेनाम नहीं हो (क्योंकि तुम उनके दैनिक जीवन की समस्याएँ हल करते हो)। तुम अपने सहकर्मियों के लिए भी बेनाम नहीं रहोगे यदि तुम अपने सहकर्मियों के साधारण सवालों के उत्तर दोगे जब वे तुम्हारे ऑफिस में आयेंगे। तुम मेरे लिए बेनाम इंसान नहीं हो।

तुम खुद के लिए बेनाम मत रहो - यह अस्तित्व में होने का एक बहुत ही दुखद तरीका है। 

अब दुनिया में खुद के लिए एक स्थान की तलाश करो और खुद का ईमानदारी के साथ मूल्यांकन करो, जोकि तुम्हारी जवानी के अनुभवहीन आदर्शों से सम्बंधित न हों और न ही वह उन आदर्शों से सम्बंधित हों जैसे तुमने अपने शिक्षक के आदर्शों के बारे में कल्पना की है।

शुभकानाएँ, और ख़ुश रहो

भवदीय,
रिचर्ड पी. फाइनमेन

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