रविदास की भक्ति भावना

नानक चंद

नानक चंद


मनुष्य के मन में सदैव ब्रह्माण्ड की अलौकिकता और रहस्यमयता के प्रति गहरी जिज्ञासा रही है। जगत, जीव, प्रकृति, उसके विभिन्न उपादान, घटना आदि उसे उद्वेलित करते रहे हैं। जन्म, मरण, रोग, दुख, बुढ़ापे आदि सत्य उसे यह चिंतन करने के लिए बाध्य करते रहे हैं कि यह जीवन क्षणिक है। अधूरापन, शून्यता और परवशता उसमें विकलता तथा सांसारिक घटनाएं उत्सुकता व आश्चर्य का भाव पैदा करती रही हैं। ज्ञान की अपूर्णता और सीमितता ने उसमें श्रद्धा व आदर का भाव भी जगाया है। उसने अनुभव किया है कि जीव और जगत किसी साधारण व्यवस्था से नहीं बल्कि किसी विशेष अलौकिक शक्ति से संचालित और सक्रिय हैं। कोई ऐसी परम शक्ति अवश्य है जो शाश्वत है और सबकी नियंता है। इस शक्ति के पीछे का सत्य क्या है? बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, योगीजन ने इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया है। परंतु उसका भेद प्राप्त करना इतना आसान नहीं है। रविदास  कहते हैं, ‘अनत बार तोहि धियान लगावा, मुनि जनि पै पार नहिं पावा।’ उस परमात्मा का पार पाने में कई जन्म गंवाने पड़ते हैं और अनंतकाल तक ध्यान लगाना पड़ता है। ‘सिव सनकादिक अंत न पाया, खोजत ब्रह्मा जन्म गंवाया।’  महान योगी भी उसके स्वरूप की थाह नहीं पा सकते, ‘जोगीसर पावै नहीं तू गुण कथन अपारा।’ फिर साधारण मनुष्य में इतना सामर्थ्‍य कहां कि वह उस परमसत्ता का भेद पा सके।

परम सत्ता को स्वीकार करने पर उसके रूप और आकार का विषय आता है। आचार्यों ने तत्त्व की दृष्टि से परमात्मा को सगुण और निर्गुण दोनों बताया है। वह साकार भी है और निराकार भी। जैसे जल बर्फ के रूप में हो तो उसका आकार होता और वह दिखती भी है, लेकिन जल के भाप बन जाने पर न तो बर्फ दिखती है और न उसका कोई रूप होता है।

रविदास ने परमात्मा के साकार व निराकार दोनों रूप स्वीकार किए हैं और अपनी वाणी में अनेक स्थानों पर उन्हें अभिव्यक्त किया है।  रविदास की दृष्टि में परमात्‍मा निराकार, निर्गुण, अनदेखे, तर्क से परे, ज्ञानातीत हैं, लेकिन सगुण साकार की भांति आनंदमय और अद्वितीय भी हैं:

निश्चल निराकार अति अनुपम निरभै गति गोविंदा।
अगम अगोचर अक्षर अतरक निर्गुण अति आनंदा।
सदा अतीत ज्ञान विवर्जित, निर्विकार अविनाशी।।

रविदास का आगे कहना हैः

तू स्रगुन निरगुन निरामयी न्रिविकार।
भक्ति की उत्कर्ष अवस्था में साधक के लिए सगुण-निर्गुण का भेद समाप्त हो जाता है। वह सभी जीव और पदार्थों में भगवद् दर्शन करने लगता हैः
अगुन स्रगुन दौ समकरि जान्यौ, चहुं दिस दरसन तोरा।
उन्होंने परमात्मा को अगम, अगोचर, अक्षर सर्वांगपूर्ण, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक भी माना है। वही जगत का रचयिता और विनाशकर्ता हैः

सर्वेश्वर, सर्वांगी, सरब गति, कर्ता, हर्ता सोई।

वह सर्वेश्वर संसार में सब कुछ करने वाला है, उसके विषय में क्या कहा जाए, वह तो गुणों के भण्डार हैं और संपूर्ण संसार में व्याप्त हैं।
सब कुछ करत न कहौं कुछ कैसे, गुन निधि बहुत रहत सम जैसे।

वह निर्गुण निरपेक्ष हैं तो वे दयालु, करुणामय और रक्षक भी हैं। रविदास दशरथ सुत राम को ईश्वर नहीं मानते, ‘राम कहत सब जगत भुलाना सो यह राम न होई’ परंतु दूसरी ओर, वह राजा राम की सेवा न कर पाने पर दुख व्यक्त करते हैं, ‘राजा राम की सेव न किन्हीं।’ रविदास की दोनों मनःस्थिति निर्गुण व सगुण दोनों की स्वीकारोक्ति प्रकट करती है।

अपनी वाणी के अनेक स्थलों पर, रविदास ने अपने आराध्य श्री हरि को राम, गोविंद, माधो, कृष्ण, गोपाल, दामोदर, विट्ठल, विष्णु, कमलापति, रघुनाथ आदि नामों से पुकारा है। ये नाम ईश्वर के प्रति उनकी सगुण प्रवृत्ति के परिचायक है। रविदास द्वारा अनेक पौराणिक चरित्रों का गुणगान यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि उन्‍होंने अपनी भक्ति में परमात्‍मा के सगुण रूप को आत्मसात किया है। उनकी वाणी में भक्ति की सगुण और निर्गुण दोनों धाराएं देखी जा सकती हैं। इसलिए शास्त्रीय दृष्टि से, उनकी भक्ति साकार-निर्गुण है।

इसके अतिरिक्‍त, रविदास की भक्ति में कमोबेश साधन और रागानुगा भक्ति का भी मिश्रित रूप दिखाई देता है। प्रेमाभक्ति में अनन्यता, शरणागति, आत्मसमर्पण, दास्य भावना, आत्मनिवेदन, स्मरण आदि जो मुख्य भाव हैं, वे सभी पूरे रूप में रविदास की भक्ति में दर्शनीय हैं। वह कहते है:
              चित सिमरन करउं नैन अवलोकनो, श्रवण बानि सुजसु पूरि राखउं।
    मन सों मधुकरु करउं चरन हिरदै धरउं, रसन अमृत राम नाम भाखउं।।

परमात्मा की प्राप्ति के अनेक मार्ग बताए जाते हैं। इनमें भक्ति, कर्म, ज्ञान और योग शामिल हैं। ये मार्ग अत्यंत कठिन और विकट बताए गए हैं। इनमें सकाम व सिद्धी की आकांक्षा प्रमुख है तथा संतोष और आनंद की अनुपस्थिति है। परमात्मा को शरीर तपाने या गलाने से नहीं बल्कि सरल और सुगम भक्ति मार्ग से प्राप्त किया जा सकता है। रविदास कहते हैं कि ज्ञान भक्ति नहीं है और न ही एकांतवास में की जाने वाली तपश्चर्या भक्ति है।  ‘भक्ति न रसदान, भक्ति न कथै ज्ञान, भक्ति न बन में गुफा खुदाई।’ इनमें भक्ति का माधुर्य और आनंद का अभाव है, ये नीरस और श्रमसाध्य मार्ग हैं।

परमात्मा समग्र हैं और जीव उनका अंश है। जीव का समग्र के साथ सहज संबंध है। उनसे बिछड़कर वह संसार में जन्म लेता है। उसकी दशा ऐसे बालक के समान है जो अपने पिता से अलग हो गया है। वही उसके सब कुछ हैं,‘तुम्हहि मात पित प्रभ मेरो, हौं मसकीन अति भोरा।’ उनसे बिछड़ने के दुख में एक-एक क्षण एक युग के समान है, ‘कह रविदास स्वामि तैं बिछुरै, एक पलक जुग जाई।’ परमात्मा स्वामी है और हम उनके दास। अंश का अपने अंशी से संबंध और अपनत्व का अनुभव करना स्वाभाविक है क्योंकि वह उससे अलग हुआ है। परमात्मा के प्रति यही प्रेम, अनन्यता और आसक्ति ही भक्ति है।

मनुष्य जन्म अनमोल और दुर्लभ है, और उससे भी दुर्लभ है-भक्ति। अनेक जन्मों के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त होता है। कोई-कोई जीव मनुष्य जन्म की दुर्लभता को अनुभव कर पाता है। रविदास कहते हैं, ‘दुलभ जनमु पुन फल पाइओ, विरथा जात अविवेकै।’ भगवद् भक्ति प्राप्त करना आसान नहीं है। ईश्वरीय कृपा से ही हृदय में भक्ति का बीज अंकुरित होता है। उसके बाद, गुरु चरणों की शरणागति और नाम प्रसाद, सत्संग, संतों की वाणी से भक्ति का यह बीज विकसित होकर पूर्ण वृक्ष बन जाता है। भक्ति, प्रभु प्राप्ति का सरल और सुगम मार्ग है।

वृहद् रूप से, भक्ति दो प्रकार की है-एक, वैधी या साधन भक्ति और दूसरी, रागानुगा भक्ति। भक्ति की जो प्रेरणा शास्त्रों से प्राप्त हो, वह वैधी भक्ति हैं। इसलिए इसे विधिप्राप्त भक्ति भी कहते हैं। इसमें भक्ति के लिए बाह्य साधन अपनाए जाते हैं। रागानुगा प्रेम भक्ति का रूप है।

रविदास की भक्ति में भगवद्प्रेम की पराकाष्‍ठा परिलक्षित होती है। समग्र रूप से उनकी भक्ति प्रेमाभक्ति ही है। उन्‍होंने भक्ति के कठोर सिद्धांतों का अनुकरण करने का उपदेश नहीं दिया है अपितु प्रभु प्राप्ति के सरल-सुबोध मार्ग प्रेमाभक्ति पर बल दिया है।

भक्ति में प्रेम का ऊंचा स्‍थान है। भगवद् प्रेम में मनुष्य उन्मत्त होकर ईश्वर के गुणों का गान करता है, श्रवण करता है, उन्हीं की चर्चा और चिंतन में निमग्न रहता है। सभी आश्रय छोड़कर उसका मन ईश्वर में रम जाता है। प्रेमाभक्ति में त्याग और बलिदान की आवश्यकता है। इसमें जीवन देकर भगवद् प्रेम मिल जाए तो भी सस्ता मानना चाहिए। प्रेम के आगे प्राणों का भी कोई मोल नहीं है। रविदास कहते हैं, ‘कहै कलाली प्याला देऊं, पीवन हारे का सिर लेऊं।’ जिस प्रेमरसिक भक्त ने हृदय में प्रभु प्रेम को बसा लिया उसके लिए प्राणों का कोई महत्व नहीं रहता। शरीर खण्ड-खण्ड हो जाए तो भी प्रियतम के प्रति उसका समर्पण कम नहीं होता।

मीनु पकरि फांकिउ अरु काटिउ, रांधि कियो बहु बानी।
खण्ड खण्ड करि भोजनु कीनो, तउ न बिसरियो पानी।

निर्भयता और दृढ़ता भगवद्प्रेमी के गुण हैं। वह प्राणों की चिंता किए बिना प्रेम पथ पर अडिग रहता है।

सच्चे प्रेम की राह में, मैं और मेरेपन का भाव प्रेम में बाधा है।
जब हम होते जब तू नाहीं, अब तूही मै नाही।
जीव को भली-भांति अनुभव हो जाता है कि सब कुछ मिथ्या और असार है, सच्चा है तो केवल, प्रभु प्रेम।

ऐक अभिमानी चात्रिंगा, विचरत जग मांही।
जदपि जल पूरण मही, कहुं वा रुचि नाहीं।।
जैसे कामी देषै कामिनी, रिदै सूल उपाई।
कोटि बैद बिध उपचरै, वाकी बिथा न जाई।।

प्रेम से भगवान भक्त के वश में हो जाते हैं। भक्त के पास ऐसा कौन सा साधन है कि भगवान इतने विवश हैं। यह साधन प्रेम है जो भगवान को बांध देता है। यह प्रेमपाश इतना दृढ़ है कि उससे छूटने का कोई उपाय नहीं है। प्रेमी भक्त निश्चिंत है, वह कहता है, ‘प्रेम की जेवड़ी बांधिओ तेरो जन, कहि रविदास छुटिबो कवन गुन।’ भक्त को भली-भांति ज्ञान है कि उसके पास प्रेम रूपी अचूक बंधन है और भगवान के लिए उससे मुक्त होना सरल नहीं है। रविदास उलाहने भरे स्वर में कहते हैं, ‘जउ हम बांधे मोह फांस, हम प्रेम बंधनि तुम बांधे अपने छूटन को जतनु करहू, हम छूटे तुम आराधे।’ ‘आपने तो हमें मोह के बंधन में बांध दिया लेकिन बदले में हमने आपको प्रेम में बांध लिया है। आप स्वयं को छुड़ाने का यत्न करें हम तो आपकी भक्ति करके छूट जाएंगे।’

ईश्वर ही प्रेम हैं और प्रेम ही ईश्वर है। जीव प्रेममय ईश्वर का अंश है इसलिए उसका स्वरूप भी प्रेममय है। दोनों प्रेम सूत्र से बंधे हैं। दोनों में कोई अंतर नहीं है।
तोही मोही अंतर कैसा। कनक कटिक जल तरंग जैसा।।

दोनों के बीच संबंध सनातन और नित्‍य है। इस संबंध का आधार है, प्रेम। भक्त और भगवान का परस्‍पर स्वरूप इस प्रकार हैः

जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा।
जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा।।

परमात्‍मा और जीव का संबंध अभिन्‍न है। रविदास परमात्‍मा के प्रति भाव प्रकट करते हुए कहते हैं कि आप इस संबंध को तोड़ना चाहें तो आपकी मर्जी, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता। आपके सिवा मेरा कोई नहीं है:
माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि।
तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि।।

रविदास भगवान से निवेदन करते हैं कि मेरे हृदय में आपके प्रति प्रेम ऐसा होना चाहिए जैसे चकोर का चंद्रमा से, कमल का सूर्य से और पपीहे का स्वाति नक्षत्र के बादल के साथ होता है।

ससि चकोर सूरज कंवल, चात्रिक घन की रीति।
रविदास इंवि मुहि राषियो, हित चित पूरण परीति।।

भगवद्प्रेम में सब जगह परमात्मा ही दिखाई देते हैं। इस संबंध में, रविदास का कहना है, ‘एक अनेक बिआपक पूरक जत देखउ तत सोई।’ श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है, ‘यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्यां न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।’ सोते-जागते, खाते-पीते, रोते-हँसते उसे भगवान ही ध्यान में रहते हैं। उसे अपनी आंखों के सामने बस अपने प्रियतम ही नजर आते हैं। प्रेमी भक्त के लिए संपूर्ण जगत प्रभुमय है।
मिलन में सुख, उल्लास और मादकता है। प्रभु से मिलन का अपना सुख है पर मिलन की आस लिए प्रेम के पथ पर चलने का भी अलग ही सुख है। प्रेमपथिक को यात्रा और गंतव्य दोनों में एक समान आनंद की अनुभूति होती है। इस संबंध में, रविदास जी की भावाभिव्यक्ति इस प्रकार हैः

प्रेम पंथ की पालकी, रविदास बैठियो आई।
सोचै साथी मिलन कूं, आनंद कह्यो न जाई।।

दुख से भरे इस जगत में सुख कहां? सुख तो प्रभु मिलन में है। जब प्रभु से चित्त लगा लिया तो दुखालय रूपी संसार में होते हुए भी मन निर्लिप्त और समभाव रहता है। दुख और पीड़ा लेशमात्र नहीं सताती। प्रियतम से नाता जुड़ने पर जीव बेगमपुर अर्थात आनंदलोक का अधिकारी हो जाता है। इसलिए विलम्ब किस बात का?

बौरी करिलै राम सनेहा।
संग सहेली ब्याह चली सब, छांडि़ नैहरी रा गेहा।।

प्रेम तो अमृत है उस अमृत रस की एक बूंद भी मिल जाए तो कोटि जन्मों की प्यास बुझ जाती है। प्रभु से एकाकार होने पर जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है और दिव्य सुख की अनुभूति होती है।

एक बूंद सौं बुझि गई, जनम जनम की प्यास।
जनम मरन बंधन टूटई, भये रविदास खलास।।

प्रभु मिलन का सुख तो वही प्रेमिका जानती है जिसने अपने हृदय में आनंद अनुभव किया हो। मिलन होने पर प्रभु और जीव में कोई भेद, छिपाव और दुराव नहीं रहता। प्रेमी को परमात्मा के सिवाय कोई दिखाई नहीं देता, न वह किसी की और की बात सुनता है और न वह किसी से बोलता है। मिलन की मादकता ऐसी ही है।

सह की सार सुहागन जानै। तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै।
तनु मनु देइ न अंतरु राखै। अवरा देखि न सुनै अभाखै।।

प्रेम के दो पक्ष हैं, एक संयोग और दूसरा, वियोग। भक्ति में वियोग को ऊंचा स्थान प्राप्त है। इसे संयोग से श्रेष्ठ बताया गया है। विरह में पीड़ा का जो आनंद है वह मिलन में नहीं है। मिलन में प्रेम की संपन्नता है, उसके बाद कुछ शेष नहीं रहता। विरह में प्रतीक्षा और आशा का प्रवाह है, निरंतरता है जबकि मिलन उस प्रवाह का विराम है और ठहराव है। मिलन में तप और साधना की कठोर प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें पात्रता और शर्तों की कठिनाई है परंतु विरह में प्रियतम के प्रति तड़प और भावों की दरकार है, अन्य कोई शर्त नहीं। चूंकि जीव का जन्म वियोग से हुआ है इसलिए उसके मन में अपने स्वामी के प्रति अनुरक्ति और विकलता स्वाभाविक है।

बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे।
कहि रविदास आसि लगि जीवउ चिर भइयो दरसन देखे।

इसलिए प्रेम के प्रवाह को कैसे रोका जा सकता है? प्रेम का अमृतरस तो रोम-रोम में समा जाता है, उसे दुर करना कठिन है। प्रेम से पीडि़त रोगी का कोई उपचार नहीं है। उसके लिए तो विरह ही रोग है और विरह ही इलाज है।
राम प्रेम हौं बरजि किमि, अब बरजत नहीं काज।
रोम रोम में अमी रमि गयौ, ताहि न होत इलाज।

विरह का रोग उसके लक्षण और प्रभाव सब परमात्मस्वरूप है। राम रूपी औषधि से ही इस रोग की पीड़ा दूर हो सकती हैः
रविदास मोरे मन लागियो, राम प्रेम का तीर।
राम रसायन जउ मिलहिं, तउ हरै हमारो पीर।।

विरह की यह अग्नि अत्यंत पीड़ादायक है। एक तो प्रियतम से विछोह और ऊपर से उनकी याद, यह पीड़ा और भी भीषण हो जाती है बिल्कुल उसी प्रकार जैसे चूने की कंकरी पर पानी डालने से उसकी उष्णता और भड़क जाती है।
ज्यूं सुधि-आवत पीव की, विरह उष्ण तन आगि।
ज्यूं चूने की कांकरी, ज्यौं छिटके त्यौं आगि।।

निष्कर्ष रूप में, रविदास की प्रेमाभक्ति में संयोग का आनंद और वियोग की गहन वेदना के दर्शन किए जा सकते हैं। विशुद्ध और भक्तिसिद्ध संत के रूप में उनके विरह भाव में गहरी बेचैनी, अधीरता और तड़प है।
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