मेरी तीन रचनाएँ - विकास पाटील

तिरंगे का सच

सोच समझकर हमारा ध्वज बनाया
तीन रंगों में देश को अभिव्यक्त किया

अपनी मिट्टी के लिए
घर-दार, संसार छोडा
सीमा पर दुश्मनों के हुए शिकार
देश के लिए, कर दिए प्राण निछावर
झेली गोली छाती पर
मर मिटे वतन पर
त्याग, बलिदान, समर्पण इन्होंने किया
तिरंगे के केसरिया रंग में इन्हें बिठाया

हरा रंग हरियाली लेकर आया
किसानों ने अपने खून से उसे सींचा
साधु-संतों ने समझाया पाठ यहाँ
संसार की सबसे पवित्र भूमि के रूप में पाया
किसान खून पसीने से अजान पैदा करता है
महँगाई के कारण भूखा मरता है
देश के लिए त्याग करता है
हरे रंग में समाता है

सफेद रंग यहाँ राज करता है
कानून को जेब लेकर घूमता है
जाति-धर्म के नाम पर
लोगों का कर रहा है बँटवारा
राष्ट्रभक्ति, देशसेवा भूल गया है
अपनी तरक्की खूब कर रहा है
अशोक चक्र की गति उन्हें मिली है
शायद, खुले आम
देश को बेचने की रसीद मिली है


नई सभ्यता

जीवन में आए नए-नए सॉफ्टवेयर
पर उसमें आया अनैतिकता का वायरस
अनैतिकता देखते-देखते चारों ओर फैल गई
आत्मीयता, प्रेम, संवेदना को एक साथ डूबो ले गई
नए-नए आविष्कारों से लोग समीप तो आए
सभ्यता के नाम पर, संस्कार भूल गए
सभ्यता ने, छाया देनेवाले वृक्ष तोड़ दिए
बूढे माता-पिता को, वृदधाश्रम में छोड़ दिए
मम्मी-पापा जाते दफ्तर
बेटा-बेटी जाते शिशुघर
न कोई प्रेम, न कोई रिश्ता
सब, अपने कामों में व्यस्त
लोग मुस्कुराते हैं, पर हँसते नहीं
बाते करते हैं, पर बातचीत नहीं
उदास होते हैं, पर रोते नहीं
पास बैठे है, नजदीक नहीं
हाथ मिलाते हुए, दिखते है रोबो
मुस्कुराते हुए, दिखते है पुतले
इस सभ्यता में है, हर कोई अकेला
अपनों के प्रेम का, चाहता है मेला
भगवान ने भी कर दिया है, अपना एक्सटेंशन
पृथ्वी पर खोल दिया है, नरक का सबस्टेशन

बकरी

अब्बा ने पकडे थे पैर
चाचा ने छुरी चलाई
कुछ समझ में आए, उससे पहले
मेरी जान चली गई
याद है, जब बीमार थी, तुम्हारी छोरी
डूबा था शोक में परिवार
मैं भी थी उदास
न खाया चारा-घास
बच्ची निस्तेज पडी थी बिस्तर पर
दवा, दुवाओं का ना हुआ असर
जाकर छुवा पाव को मैंने
चेतना जाग उठी उसके मन में
मुस्कान देखी उसके चेहरे पर
भावनाओं का स्पर्श हुआ दिल पर
अब स्कूल जाने से पहले और
स्कूल से आने के बाद
खेल खेलती मेरे साथ
आपकी गोद में बैठती, कभी मुझे बिठाती
मेरे सामने बैठकर पढाई करती
मुझे घास डाल के खाना खाती
हम दोनों के खेल से आँगन खिलता
हम दोनों की उचलकूद देखकर, परिवार हँसता
अब्बा अपनी बेटी से मत कहना
मैंने उसे मार डाला है
शायद, वह आपसे और चाचा से
करेगी नफरत
वह कभी आँगन में नहीं चहकेगी
तरह-तरह के खेल नहीं खेलेगी
आपकी इस हरकत से
जीते जी मर जायेगी
न बैठेगी,  आपकी गोद में
हमेशा रहेगी सदमें में
अब्बा, आप अगर कहते
स्वयं मैं मर जाती
छोड देती साँसे, इस आँगन में
कम-से-कम, यह तो होता
अपने लोगों कि जान लेने का
पाप आपके हिस्से न आता
मैं बहुत खुश हूँ
आपकी गोद में मुझे मौत आयी
प्राण जाते वक्त
आपकी सूरत नजर आयी
काटकर मेरे एक-एक हिस्से को
बडे मजे से बाँटकर खायेंगे
पर क्या
आत्मीयता, प्रेम की नींद सोयेंगे?

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