कविता: जरुरी है, कभी कभी बच्चा बन जाना

- अक्षय मेहता

सूक्ष्मजैविकी विभाग, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर; चलभाष: +91 958 727 0844

जरुरी है, कभी कभी बच्चा बन जाना

संगीन चेहरों को मुस्कुराहटों से भर देना
और कुछ काम बेवजह ही कर देना
जरुरी है, कभी कभी खुल कर हंसना
कल की उलझने कल के लिए रखना
कुछ देर कोट पेंट उतार कर कंचे खेल लेना
बिखरी दोस्ती के कंचे दोनो हाथों में समेट लेना

जरुरी है , कभी कभी बच्चा बन जाना

बरसात के पानी को पूरे बदन से छूकर देखना
कभी नर्म गद्दे छोड़कर रेत के ढेर पर लेटना
जरुरी है, कभी समोसे के लिए ही हाथापाई कर लेना
और एक थाली में पांच का साथ बैठकर खा लेना
कभी बहुत सारी टाफियां जेब में डालकर खुश हो जाना
कभी नीचे लेटकर रोना और बेतुकी मांगे मनवाना

जरुरी है कभी कभी बच्चा बन जाना

कभी बचपन की नोटबुक को पीछे से खोलना
दोस्तों से कट्टी होकर खुद ही उनसे बोलना
कभी नर्सरी की पोयम्स को फिर से पढ़ना
कभी आम की डालियों पर फिर से चढ़ना
झूठी दुनियादारी को बचपने की हवा में उड़ा देना
दोस्त अगर कटी पतंग जैसे हो तो उन्हें ढूंढकर बचा लेना

जरुरी है, कभी कभी बच्चा बन जाना

कभी कुर्सी के गुरुर को छोड़कर जमीन पर बैठना
कभी फ़ोन की स्क्रीन छोड़कर उन तारों को देखना
जरुरी है, बेफ़िक्रों की टोली के संग चलना
खुद से आगे निकलकर सबके रंग में रंगना
कभी मोहल्ले की मिट्टी का स्वाद फिर से चखना
बड़ा बन जाना, बस बड़े हो जाने से बचना

जरुरी है, कभी कभी बच्चा बन जाना

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