समीक्षा: संवेदना की नम धरा पर - साधना वैद

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’
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संवेदना की नम धरा पर
लेखिका: साधना वैद
प्रकाशक: साधना वैद, 33/23, आदर्श नगर, रकाबगंज, आगरा
प्रकाशक का फोन: +91 931 991 2798
मूल्य: ₹ 200.00
ईमेल: sadhna.vaid@gmail.com
दूरभाष: +91 94258 06252
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साधना वैद जी से परिचय हुए 10 साल से ऊपर का समय गुजरा। परिचय का माध्यम उनका ब्लॉग ’सुधीनामा’ रहा। उनकी लेखनी शुरु से प्रभावित करती आई। जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं पर गंभीरता से और गहराई से विचार रखना और वो भी कविता और गद्य दोनों के ही के माध्यम से, यही साधना जी की खासियत है।

हाल ही में साधना जी द्वारा भेजा हुआ उनका कविता संग्रह ’संवेदना की नम धरा पर’ प्राप्त हुआ। 151 कविताओं का गुलदस्ता, जिसमें चिन्तन उनके मानस की गंभीरता और सजगता को उजागर करता है और अनुभूतियाँ उनके कोमल हृदय को जो कभी माँ का, तो कभी नारी का तो कभी स्वच्छंद सा विचरता मन एक अलग सा संसार निर्मित करता है।

लेखिका: साधना वैद
151 कविताओं में हर एक कविता का एक अलग अंदाज है। एक अलग आयाम है। कहीं भी दोहराव नहीं प्रतीत होता, यह मुझे इस संग्रह की विशेषता लगी।

एक बार जो पढ़ना शुरु किया तो न जाने कितने ही आयामों को छूते, मनोभावों के सागर में गोता लगाते  जब उस पार निकले तो पाया कि पूरी किताब पढ़ चुके हैं और इच्छा अभी भी और पढ़ते चले जाने की बाकी है।

कुछ कविता की बात करें तो एक बलात्कारी की माँ के दिल में उठता अपने ही पुत्र के प्रति घृणा और शर्मिंदगी के भाव को जितनी गहराई से वो ’कुंठित नारी’ शीर्षक की कविता में पेश करती है। वहीं समाज में घूमते इन नर पिशाच बलात्कारियों के रहते घर से बाहर निकलने को विवश पुत्री की आशंकित माँ के हृदय के भय को बखूबी ’पुराने जमाने की माँ’ कविता कलमबद्ध करती हैं।

’मैं शर्मिंदा हूँ’ के कुछ अंश:
आज याद करती हूँ
तो बड़ा क्षोभ होता है कि
तुझे पाने के लिए मैंने 
कितने दान पुणय किये थे
कितने मंदिर, मस्जिद
गुरुद्वारों में
भगवान के सामने जाकर
महीनों माथा रगड़ा था!
वो किसलिये?
तुझे जैसे कपूत को
पाने के लिए?
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चार पन्नों में इसी क्षोभ के बीच:
यहाँ की अदालत
तेरा फैसला कब करेगी
मैं नहीं जानती
लेकिन अगर तू
मेरे हाथों पड़ गया तो
एक हत्यारिन माँ 
होने का पट्टा मेरे माथे पर
ज़रुर चिपक जायेगा!

और उनकी एक अन्य कविता ’पुराने ज़मानें की माँ’ के कुछ अंश:
तुम्हारे लिए
मैं आज भी वही
पुराने ज़माने की माँ हूँ
मेरी बेटी
तुम चाहे मुझसे कितना भी
नाराज़ हो लो
तुम्हारे लिए
मेरी हिदायतें और
पाबंदियाँ आज भी वही रहेंगी
जो सौ साल पहले थीं
क्योंकि हमारा समाज,
हमारे आस-पास के लोग,
औरत के प्रति
उनकी सोच,
उनका नज़रिया
और उनकी मानसिकता
आज भी वही है
जो कदाचित आदिम युग में
हुआ करती थी!

पुनः 5 पन्नों में लिखी गई यह लंबी कविता कितने भीतर तक झकझोरती है, इसका अहसास आप इस कविता से गुजर कर ही कर पायेंगे।

अन्य कवितायें मसलन ’शुभकामना’, ’अब और नहीं’, गृहणी’, ’मैं वचन देती हूँ माँ’, ’मौन’, आदि नारी मन के भाव तो दूसरी तरफ ’दो जिद्दी पत्ते’, ’वसंतागमन’ में प्रकृति का सामिप्य। एक परिपक्व लेखन।

294 पन्नों मे 151 कविताओं का समावेश किये इस संग्रह ’संवेदना की नम धरा पर’ का मेरी पुस्तकों की अलमारी में खास स्थान रहेगा। खास बात यह भी है कि इस कविता संग्रह की प्रकाशक भी साधना जी स्वयं ही है। मुझे पूरी उम्मीद है कि जब आप इस संग्रह से गुजरेंगे तो आप भी इन्हीं अनुभवों को प्राप्त होंगे और यह संग्रह आपकी पुस्तकों के संग्रह में भी अपना विशिष्ट स्थान बनायेगी।

मेरी अनेक शुभकामनायें साधना जी के साथ हैं और मुझे इन्तजार है उनके अगले संग्रह का। मुझे ज्ञात है कि वे पूर्ण सक्रियता से अपने लेखन को सतत अंजाम देने में पूर्ण ऊर्जा के साथ लगी हैं।

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