गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में नौकरशाही एवं राजनीतिक स्वरूप का चित्रण

अनिल कुमार


गोविन्द मिश्र हिन्दी के चर्चित कथाकार माने जाते हैं। इन्होंने अब तक बारह उपन्यास, बारह से अधिक कहानी संग्रह एवं यात्रावृत्तांत, कविताओं आदि का लेखन कार्य किया है. इनके प्रमुख उपन्यासों में ‘लाल पीली जमीन’, ‘वह अपना चेहरा’, ‘धूल पौधों पर’, ‘अरण्यतंत्र’, ‘फूल इमारतें और बन्दर’, ‘धीर समीरे’, ‘शाम की झिलमिल’, ‘कोहरे में कैद रंग’, ‘पाँच अग्नों वाला घर’, ‘तुम्हारी रोशनी में’ आदि प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। गोविन्द मिश्र को साहित्य अकादमी, सरस्वती सम्मान, व्यास सम्मान आदि से सम्मानित किया जा चुका है।

गोविन्द मिश्र ने अपने लेखन में विविध प्रकार के समाजों का चित्रण किया है। एक और जहाँ उनकी लेखनी ग्रामीण परिवेश को संवेदनात्मक गहराई देती नजर आती है तो दूसरी पर नौकरशाही और राजनीति पर तीखा प्रहार करती दिखती है। गोविन्द मिश्र का लेखन शायद हिन्दी का ऐसा पहला लेखन है जिसमें भारतीय ब्यूरोक्रेसी का सच्चा चित्र सामने रख दिया है। नौकरशाही एवं राजनीति का सम्बन्ध किस तरह उनके अनुभव से साहित्य के माध्यम से पाठकों के सम्मुख आता है वह दर्शनीय है।

गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में नौकरशाहों का उल्लेख बहुत कुछ उसी तरह से किया गया है जैसा कि अधिकारी तंत्र का धर्म होता है। ‘फूल इमारतें और बन्दर’, ‘वह अपना चेहरा’ और ‘अरण्य तंत्र’ में नौकरशाहों एवं राजनीति के लोगों की कारगुजारी का पर्दाफास किया गया है। गोविन्द मिश्र ने खुद प्रशासनिक जिम्मेदारियों को उठाकर उससे जुड़े अनेक पहलुओं पर विचार किया है।

हिन्दी कथा साहित्य में अपनी तरह का अकेला लेखन माना जायेगा जो बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का खुलासा करता है। जातिगत भेदभाव, स्त्रियों का शोषण, मीडियाऔर पत्रकारिता की राजनीतिक दखलंदाजी। नेता-मंत्री से लेकर माफियाओं तक की घुसपैठ को उपन्यासकार ने दिखाया है। उद्योगपति, क्लर्क, प्रभुवर्ग की सामाजिक स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है।

डॉ.रामजी तिवारी ने लिखा है कि “गोपीकृष्ण मोहंती की डायरी उनके आत्ममंथन का सारभूत निष्कर्ष है। इसी में भ्रष्ट व्यवस्था के कारणों और परिणामों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया गया है। विभिन्न अनुषंगों से राजनीतिकरण की प्रक्रिया में जीनव मूल्यों की अपेक्षा, चुनावों की राजनीति, खरीदफरोख्त, भ्रष्ट नेताओं की दंभी प्रवृत्ति, बिचौलियों के मायाजाल, गठबंधन सरकार में नौकरशाहों की स्वच्छन्दता, शोषण की प्रणालियों के हस्तक्षेप, कुर्सी को बचाने के लिए किसी भी स्तर पर उतरने की आकुलता, भाई-भतीजावाद, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष, प्रतिशोध भावना आदि को बड़े कौशल से रेखांकित किया गया है। सम्पूर्ण विमर्शों के बाद मोहंती रेखांकित करते हैं कि राजनीती में सब हो सकता है, हमेशा चलने वाले हर हाल में ईमानदार रहने वाला आत्मीय सम्बन्ध नहीं बना पाता।”[1]

‘फूल इमारतें और बन्दर’ के प्रमुख पात्र ‘गोपीकृष्ण मोहंती’ को इस बात का बहुत मलाल होता है कि जिस अधिकारी वर्ग को प्रशिक्षण के दरम्यान देश और संविधान के प्रति वफ़ादारी का पाठ पढ़ाया जाता है वही उसको भूल जाता है, “मोहंती को विभिन्न प्रशिक्षण कार्यकर्मों में पढ़ाया गया है कि अधिकारी की वफ़ादारी देश और संविधान के लिए होनी चाहिए, किसी राजनेता या पार्टी के लिए नहीं। पढ़ाया कुछ भी गया हो व्यवहार में आज का अधिकारी उल्टा करता है।”[2]

‘भारतीय राजस्व विभाग’ में आया हुआ हर अधिकारी भ्रष्टाचार की दलदल में आकंठ डूब जाता है। मामूली सा क्लर्क कुछ ही दिनों में देश का शोषण करके अकूत संपदा अर्जित कर लेता है। इसका लेखा जोखा न तो सरकारें देती हैं न ही ऐसा कोई दंड विधान है जिसके द्वारा हकीकत सामने लाई जाय। इसके सबसे बड़े जिम्मेदार खद्दरधारी होते हैं जो जनता के सेवक के रूप में राज करना शुरू करते हैं और शासक के रूप में परिणत हो जाते हैं। रामजी तिवारी इस ओर ध्यान आकर्षित करते हुए मोहंती के शब्दों लिखते हैं “अफसरों की ढुलमुल प्रवृत्ति का परिणाम यह है कि पूरे सचिवालय में साबुत आदमी कोई नहीं बचा है। सारे मानवीय सम्बन्ध स्वार्थों और पदों में सीमित हो गए हैं।

 मंत्रियों, अफसरों और उद्योगपतियों के त्रिकोण में मानव सुलभ करुणा, प्रेम, त्याग, राष्ट्रनिष्ठा, कर्तव्य परायणता जैसे उदात्त गुण तिरोहित हो गए हैं। परिणाम यह हुआ कि पूरी व्यवस्था से सड़ांध की गंध आती है और सचिवालय कैंसर अस्पताल से बदतर दिखाई पड़ते हैं। मोहंती की दृष्टि में सरकार एक ऐसी अदृश्य चीज है जो मंत्री की धुन को पूरा करने के लिए जो करे वह जायज है।”[3]

देश में नौकरशाही का जितना स्वस्थ्य चेहरा दिखाया जाता है, आलोचकों की दृष्टि से हो सकता है परन्तु सहज ही विश्वास समाज नहीं कर पाता है। गोविन्द मिश्र ने इस ओर जरूर इशारा किया है कि “जहाँ सब कुछ झूठ पर चल रहा हो या चलाया जा रहा हो वहाँ समाज के लिए क्या हो सकेगा।”[4]  इन सब के पीछे भारतीय राजनीति के बड़े लम्बरदारों का हाँथ हुआ करता है। अधिकारियों के सम्मुख नेता एक नौसिखिया के अलावा कुछ भी नहीं होता है। नेता के भाषणों से लेकर विकास योजनाओं तक की फ़ाइल अधिकारियों के अधिकार में हुआ करती है।

नेता महज आमजनता को बरगलाकर कुर्सी हथिया सकता है।किन्तु देश को चलाने में अधिकारियों की बड़ी भूमिका होती है। पूंजीपतिवर्ग, सरकार और नौकरशाह दोनों को अपने ढंग से चलाना चाहता है। गोपीकृष्ण मोहंती विभाग में ‘चेयरमैन’ के पद पर आरूढ़ होने से पहले मीडिया तंत्र, राजनीतिक व्यक्तियों, पूंजीपतियों एवं उन सारे लोगों की गिरफ्त में आते हैं जिन जिन का कार्य आगे बढ़ने वाला था। सरकारें अपनी तोड़-फोड़ वाली राजनीति से बाज नहीं आती हैं।

उनका एक ही लक्ष्य हुआ करता है कि सामने वाले को कुर्सी से हटाकर सत्ता का उपभोग करें। इसमें अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।‘सेन्ट्रल सेक्रेटेरियेट’ के सचिव पद पर आरूढ़ व्यक्ति इन सब के निशाने पर आ जाता है। गोपीकृष्ण मोहंती की नियुक्ति में सारी व्यवस्था का अंकन हो गया है। भारत में नियुक्तियों को लेकर कैसी कैसी चालबाजियाँ हुआ करती हैं।

गोविन्द मिश्र ने बड़ी साफगोई से इस ओर इशारा किया है “पर हमारे देश के चालबाज अफसर बखूबी जानते हैं कि किसी भी संस्था को अपने अधीन लाना है तो पहले नियुक्तियों और तबादलों को अपनी तरफ घसीटो। आजकल वही पेशकस हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के जजों को लेकर है ताकि उन्हीं जजों की नियुक्ति हो सके जो अनुकूल फैसला लिखने वालें हो, जो ऐसा न करें उनका तबादला किया जाय।”[5]

भारत में नियुक्तियों को लेकर बहुत बड़ी धाँधली मची हुयी है। जज से लेकर तमाम ऊँचे ओहदों पर एक ही वर्ग का आधिपत्य हुआ करता है। शिक्षण संस्थानों से लेकर सचिवालय तक। रिजर्व बैंक के अधिकारियों से लेकर इंटेलिजेंस ब्यूरों तक। भारत में अपने की भावना इस कदर व्याप्त है कि उसके पार वे देख ही नहीं पाते हैं। गोपीकृष्ण मोहंती के विभाग में ‘पिछड़ेवर्ग’ के अधिकारी के साथ होने वाला दुर्व्यवहार इसी ओर इशारा करता है।

गोविन्द मिश्र इसका विश्लेषण करते हुए लिखते है “नियमों के हिसाब से हमें पिछले पाँच साल की चरित्र पंजिका देखना चाहिए और जिसकी सबसे अच्छी हो, जो लगातार ‘आउटस्टैंडिंग’ हो उसे चुनना चाहिए- ऐसे अफसर श्री सेवक राम हैं। ये ‘बैकवर्ड कास्ट’ के हैं इसलिए भी इन्हें चांस मिलना चाहिए, पर्सनल सचिव ने कहा। बात बहुत वजनी होकर नहीं निकली क्योंकि वे स्वयं बैकवर्ड कास्ट के थे।”[6]

मनोज सिन्हा ‘बैकवर्ड क्लास’ पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं, “नौकरशाहों ने धीरे-धीरे भारत की सामाजिक व्यवस्था के किले में सेंध लगाकर इसे कमजोर करने का कार्य किया। अस्तित्त्व के संघर्ष के दौर में एक बहुत बड़ा वर्ग जिसे “अन्य पिछड़ा वर्ग” (Other Backward Class- OBC) कहा जाता है, अपनी एक अलग स्थिति को पाने के लिए संघर्षरत था। इस वर्ग की न तो सामाजिक-आर्थिक स्थिति अच्छी थी, न ही इसे आरक्षण का लाभ मिल रहा था। आरक्षण की राजनीति ने नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण को जन्म दिया। इसके कारण जाति के राजनीतिकरण की प्रक्रिया भी शुरू हुयी और यह वर्ग एक बहुत बड़े वोट बैंक के रूप में उभरने लगा। इस राजनीति को 1990 के दशक में एक नया आयाम मिला। जिससे भारतीय नौकरशाही के चरित्र में भी महत्त्वपूर्ण बदलाव आया।”[7]  आरक्षण के बावजूद सेवकराम जैसों को चेयर पर्सन की कुर्सी नहीं मिल पाती है।

नौकरशाही में जाति-धर्म को केंद्र बनाकर जिस तरह की राजनीतिक चालें चली जाती हैं वह बेहद चिंतनीय है। लेखक ने ‘वह/अपना चेहरा’ में जिस चहरे की तलास की है वह अब गायब हो गया है उसकी जगह एक नौकरशाह बैठ गया है, इसलिए वे कहते हैं कि “चिड़ियाघर के जानवर बेहतर कौम हैं।”[8]  ये जीनियस हैं इसलिए इनमें हिप्पोक्रेसी दिखावा की सबसे बड़ी मिसाल ये जीनियस हैं।

इस विभाग की अफसरों की स्थिति नेताओं से होती हुयी सी.बी.आई. तक से प्रभावित होती है। वह अपने से कोई निर्णय नहीं कर पाता है। उसे अनेक ओर से दबाव में रखकर कार्य करवाया जाता है गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि “इस विभाग के अफसर की स्थिति जाल में फंसी मकड़ी जैसी है- इस तरफ पब्लिक, उधर स्टाफ़ उसे हमेशा टंगरी मार देने के चक्कर में, इधर सी.बीआ.ई. उसकी हर चीज को शक से देखता हुआ, इधर कमिश्नर एक ख़ास खुशामद की उम्मीद करता हुआ..इधर से बोर्ड उस पर हिदायतें पर हिदायतें लादता हुआ।”[9] आला अधिकारियों में ‘हैरार्की’ व्याप्त है, वह भी बहुत बड़े स्तर पर। गोविन्द मिश्र की यह चिंता रही है कि नौकरशाही में भारतीय योरोपियों से क्यों नहीं सीखते हैं। जहाँ पर समानता का आग्रह है। बिना भेदभाव के सब के साथ मिला जुला जा सकता है, किन्तु भारत के सन्दर्भ में यह मुमकिन नहीं होता है। यहाँ पर व्यक्ति माने कुछ भी नहीं सब कुछ पद हो जाया करता है।

एक ईमानदार क्लर्क सारी जिन्दगी ईमानदारी से काम करे तो भी उसे सम्मान की नज़रों से नहीं देखा जाता। अधिकारी भ्रष्टाचार कर जाए तो भी वह सम्मान का अधिकारी होता है, “यहाँ सिर्फ पद और पदों की श्रेणियां हैं, आदमी नहीं। अवर सचिव, उपसचिव, संयुक्त सचिव, अतिरिक्त सचिव, सचिव। नीचे वाली श्रेणी बहुत हुआ अपने ठीक ऊपर वाली के साथ उठ बैठ सकती है। अवर सचिव के सामाजिक स्तर पर सम्बन्ध संयुक्त सचिव और सचिव से होना नामुमकिन है।”[10]  ऐसी ऊँच-नीच की भावना उसे कहीं ना कहीं सामाजिक परिवेश से मिल जाया करती है। इस वसुधैव कुटुम्बकम वाली संस्कृति में तो ऊँच-नीच का भेदभाव शुरू से विद्यमान था। वह आज एक झटके में कैसे दूर हो सकता है। क्योंकि शत प्रतिशत अधिकारी उसी कुटुंब के होते हैं।

वर्णवादी व्यवस्था में फंसा हुआ नौकरशाह यही सीख पाया है अभी तक कि उससे ऊँची और नीची जाति, व्यक्ति, धर्म, ओहदा कौन है कौन नहीं। फिर अधिकारी स्तर पर जाने वाला व्यक्ति, व्यक्ति न होकर मशीन का एक पुर्जा होकर रह जाता है। उसकी रचनात्मकता, उसका व्यक्तिगत चिंतन, व्यक्तिगत इच्छा कुछ भी नहीं रह जाती वह दफ्तर और फाइलों का होकर रहा जाता है। उसकी कुल सीमा सचिवालय का भवन और उसकी कुर्सी रह जाती है। जोड़ तोड़ की सरकार को काँग्रेस बाहर से समर्थन देने पर विवश हुयी थी। गोविन्द मिश्र ने उसी को इंगित करते हुए लिखा है कि “आजकल तो चुनाव लड़े बगैर एमपी हुए लोग पीएम हो जाते हैं। जो भी आदमी का काम हो उससे फटाफट सम्पर्क बना डालना यह पृथ्वी को आता था। बड़े अफसरों से लेकर प्रधानमंत्री तक उसकी पहुँच थी। देश में कई छोटी छोटी पार्टियों ने मिलजुल कर सरकार बनाई थी, और अपना एक प्रधानमंत्री भी चुन लिया था एक ऐसा व्यक्ति जो संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं था। कांग्रेस बाहर से सपोर्ट देने को तैयार हो गयी थी कि किसी तरह भाजपा को सत्ता में न आने दिया जाय।”[11]  यह राजनीतिक गठजोड़ सीधे नौकरशाही को प्रभावित करता है। भाजपा और कांग्रेस दोनों जगह द्विज ही काबिज रहे थे। आज के दौर में यदि नौकरशाही के चरित्र को देखें तो और भी घिनौना स्वरूप सामने आता है। आज “भाजपा का ध्येय किसी तरह कांग्रेस को बाहर रखना है ज्यादा देर रही तो अपने आप ही टूट जायेगी।”[12]

लालफीताशाही और राजनीति का चोलीदामन का साथ सदा से रहा है, विशेषकर भारत के सन्दर्भ में। भारत में आजादी के बाद भ्रष्टाचार का ग्राफ निरंतर बढ़ता चला जा रहा है। इंदिरा, राजीव, वीपी सिंह, पीवी नरसिम्हा राव सरकार के आसपास कई सारे घोटाले हुए जिनमें बोफोर्स घोटाला, हर्षद मेहता की दलाली, नेताओं की खरीद फरोख्त बड़े स्तर के भ्रष्टाचार थे जिनमें नौकरशाह भी सम्मिलित था। गोविन्द मिश्र ने उस समय की राजनीतिक हालत के बारे में लिखा कि “कुछ हमारे इस समय में गड़बड़ी है कि लोग झूठ ही सुनना चाहते हैं, झूठ में ही रहना चाहते हैं।”[13]

मूल्यों का संक्रमण मात्र समाज में ही नहीं हुआ है, वह तेजी से संस्थानों में भी फ़ैल गया है। प्रजातांत्रिक सरकारें अपने स्वार्थ के लिए लोकतंत्र का गला घोट देती हैं। अपने बचाव और जेब को भरने के लिए वे एक से एक बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार करते हैं, जिनमें उनका साथ सरकारी नौकरशाही तंत्र करता है। नेता महज पाँच साल के लिए आता है और जितना हो सकता है लूटकर चलता बनता है, अधिकारी तंत्र सारी जिन्दगी कायम रहता है फिर भी वह अनैतिक कार्य करता है। नौकरशाहों के लिए दंडात्मक कार्यवाही के लिए संसद भवन, न्याय पालिका जैसी संस्थाएँ हैं किन्तु जब रक्षक और निर्माण कर्त्ता ही भक्षक और विध्वंसक बन जाय तो सारा सिस्टम ही फेल हो जाता है।

नौकरशाही तंत्र में व्यक्ति शोषण बहुत प्रभावी रूप से सामने आया है, जातिगत शोषण, दैहिक शोषण, मानसिक शोषण उसका निरंतर होता है। स्त्री शोषण का ग्राफ़ अधिकारी तन्त्र में बढ़ गया है। सरकारी से लेकर प्राइवेट संस्थानों में स्त्री का दैहिक शोषण ज्यादा होता है। अपने पद और पैसे के घमंड में चूर अधिकारी वर्ग द्वारा स्त्रियों की अदला-बदली एवं कार्यस्थल पर उसका यौन शोषण भी हुआ करता है।

‘वह/अपना चेहरा’ में अपने इंसानी चेहरे की तलास में युवा अधिकारी भटकता रहता है। वह दफ्तर में उद्दाम काम वासना को अपनी आँखों से देखता है। रचना और केशवदास का अन्तरंग सम्बन्ध किसी से छिपा नहीं रहता। निरंतर पदोन्नत्ति के फेर में वह अपना खुद का शोषण करवाती भी है। अपने साथ के कर्मचारियों से वह कई कदम तेजी से आगे बढ़ जाना चाहती है, उसमें उसकी देह का साथ भी मिल जाता है। वर्षों के अनुभव और युवा दृष्टि से देखा गया त्राणकारी  दृश्य लेखक ने बड़ी साफगोई से व्यक्त किया है।

तीन अक्षरों के आईएएस के भीतर सारे जुल्म और अपराध माफ़ कर दिए जाते हैं। स्त्री शोषण से लेकर बड़े बड़े भ्रष्टाचार तक के लिए जगह नहीं बचती। आईएएस, आईपीएस जैसी संस्थाओं में घमंड और गुरूर का पैमाना बहुत जाया हुआ करता है। यह सच है कि देश के भीतर कानून व्यवस्था और आर्थिकी को प्रगति देने के लिए अधिकारी तंत्र की बड़ी भूमिका होती है। परन्तु वह अपना दायित्त्व भूल जाती है।

देखा जाय तो विश्व मानचित्र पर भारत की नौकरशाही सबसे भ्रष्ट उतरेगी। गोविन्द मिश्र ने लिखा है, “वे जानते थे हिन्दुस्तान आज़ाद होने भर से आज़ाद नहीं हो जाएगा। अंग्रेजों के बाद भी हुकूमत चलेगी –विदेशी चमड़ी की, उस वर्ग की जो अंग्रेजी बोलते हों, या क्लास वन सरकारी नौकरी में हों। दूसरी नौकरियों के मुकाबले देश में आईएएस की विशेष स्थिति थी।”[14]

इस सर्विस में चुन के आये लोग अपने को जर्नलिस्ट कहते थे, न कि विशेषग्य, “उन्हें मालूम था कि एक बार ये तीन अक्षर के ‘आईएएस’-आपके साथ जुड़ गया तो फिर आप क़त्ल भी कर डालिए, आप साफ़ बरी निकल जायेंगे। आईएएस की जो नस्ल भारत में स्वतंत्रता के बाद विकसित हुई, पता नहीं कैसे उसकी खासियतों में मंत्रियों की चमचागिरी करना, उनके आदेशों को आँख मूँदकर मानना और किसी मातहत के कंधे पर बन्दूक रखकर गलत सही कामों को बेधड़क करवा डालना..ये भी आ गये।”[15]

व्यवस्था के भीतर तक जाकर लेखक ने जिस तरह से यथार्थ बयानी की है, वह अपने तरह  का बड़ा विद्रोह समझा जायेगा। साहित्य में नाम और तिथि के अलावा सब कुछ सही और स्पष्ट पाया जाता है। यदि नौकरशाही व्यवस्था में इतनी बड़ी त्रुटी विद्यमान है तो उसे सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए। संसद भवन और न्यायालय को इस पर विशेष ध्यान देना होगा। इनके लिए भी दण्डात्मक कठोर कार्यवाही का प्रावधान होना चाहिए।

आय से अधिक संपत्ति और रहने की सुविधाओं को काटना चाहिए। सामान्य सी जिन्दगी इन्हें जीना होगा। कर्ल्क की हैसियत से दूसरे विभागों की तरह इनका उपयोग हो। इसके लिए नेताओं को इनकी बैसाखी नहीं बनना चाहिए। सिविल सर्विस में आये हुए अधिकारी अधिक सामाजिक ज्ञान नहीं रखते न ही उन्हें भूत और भविष्य, नीति और मूल्यों की पहचान होती है। ये मात्र अर्थ की ओर उन्मुख हुआ करते हैं। न्यायपालिका से पूर्व इन्हें भी जनता के सम्मुख अपने कार्यों को रखने का प्रावधान बनना चाहिए। जितनी कम सुविधा और पद की गरिमा को कम आँका जायेगा इस वर्ग का दिमाग उतना ही ठिकाने लगेगा।

'फूल… इमारतें और बंदर' उपन्यास में अधिकारी-तंत्र की कारगुजारियों का उल्लेख करते हुए गोविन्द मिश्र ने लिखा है 'सचिवालय ही इनका सब कुछ होता है। इनकी आत्मा मरने के बाद भी सचिवालय के आसपास बंदरों के रूप में भटकती रहती है। हर आने जाने वाले से जैसे ये कुछ कहना चाहते हो। साहब ये बदंर यहीं रहते हैं, आप इनकी आँखों में मत देखिएगा, लौटिये नहीं, इधर-उधर भी कतई नहीं वर्ना ये समझेंगे कि आप डर गए और आप पर सवार हो जायेंगे। सीधे चलते चलिए।'

प्रतीकों के सहारे गोविन्द मिश्र ने नौकरशाहों के चरित्रों का उदघाटन भी किया है, ‘अरण्य तंत्र’ उपन्यास में सारे पात्र प्रतीक के सहारे सामने आये हैं। उस कंक्रीट के जंगल में आदमी कम पशुओं वाली प्रवृत्ति के जानवर ज्यादा निवास करते हैं। इन प्रतीकों में आये सारे नौकरशाह हैं जो “बेईमान तो सब साले हैं कोई सवा सेर कोई डेढ़ सेर।”[16]  गधा, हाँथी, बारासिंघा, भालू, बन्दर, सिपान्जी, नीलगाय, खच्चर, घोड़ा, चिघाड़ू हाँथी, शांत हाँथी, ऊँट, हिरन, तेंदुआ, जिराफ, जंगली भैंसा, परिंदा, शेर, पीलीकोठी जैसे पात्रों के गुण नौकरशाहों में मिल जाया करते हैं। इनके गुणों में और जंगल के पशुओं में बहुत साम्य पाया जाता है।

ये नौकरशाह जिस भी चीज को छू लें वह खराब हो जाय, जिस भी पेड़ पर पेशाब कर दें वह जल जाय, “आप तो वन विभाग के हैं, पेड़ों पर पेशाब नहीं की जाती, पेड़ों का आदर करते हैं, तो बोला- मेरी पेशाब कोई साधारण पेशाब नहीं है, जब पीएफओ था तो एक बबूल के पेड़ पर नियमित मूतता रहा, वह बबूल का पेड़ आम का हो गया।”[17]  लोकतांत्रिक व्यवस्था में बबूल के पेड़ों को भी आम का बना देना मुश्किल नहीं रह गया है। नौकरशाहों ने वह सब कुछ किया जो अलोकतांत्रिक था। हिरन उस जानवर का प्रतीक है जो दूसरों से अपनी सुरक्षा ही करता है, वही दफ्तर में भी करता है। जंगल के जानवर चरकर जंगल को तबाह करने पर उतारू रहते हैं। वहाँ ऊँच-नीच का बड़ा भेदभाव है। शेर जगंल का राजा है वह दफ्तर में भी राजा का ही दायित्त्व निभाता है।

‘प्रशासन पुराण’ के नाम से गोपाल चतुर्वेदी ने इस उपन्यास पर लिखते हुए दिखाया है कि “बाह्य स्तर पर क्लब के सरकारी सदयों की जीवन गाथा है। पर विचार और नैतिक बुनावट के स्तर पर क्लब का प्रतीक अपने आप में अनूठा है। हर अफसर औपचारिक व्यवहार में प्रचलित मानकों का मुखौटा लगाए रहता है। उसकी आंतरिक असलियत, दबी छिपी हिंसा, वहशीपन, खेल के मैदान के प्रतियोगी समय में ही उजागर होता है। यही इंसानी छायाओं की पशुवत प्रवृत्तियों की जनक है। तभी टेनिस कोर्ट पूरे देश का विस्तार है, द्योतक है, प्रतीक है।”[18]  ऐसे अफसर या उनके प्रतीक जंगल में फ़ैलकर फ़ाइल और घास दोनों चरते हैं। गोविन्द मिश्र ने लिखा कि, “हिन्दुस्तान की नौकरियों में बस चापलूसी चलती है। काम की कद्र नहीं। अच्छा काम करने का इम्पिटस नहीं। वहाँ अच्छा काम करने वाले साइड लाइन लगा देते हैं।”[19]

इन नौकरशाहों के गुणधर्म को परखते हुए यही कहा जा सकता है कि जानवरों के जंगल में आदमियों को पूरी जगह थी परन्तु आदमियों विशेषकर नौकरशाहों के जंगल में न आदमियत की जगह है न ही आदमी की है। जानवर तो कतई नहीं, “असली जंगल में सबके लिए जगह थी। आदमी के जंगल में आदमी के अलावा किसी के लिए जगह नहीं, आदमी भी अपनी पसंद का ही।”[20]

गोविन्द मिश्र के तीन उपन्यासों में नौकरशाही को विभिन्न दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न किया गया है। गोपीकृष्ण मोहंती के सचिव पद की रस्साकसी से लेकर, रचना और केशवदास के प्रेम संबंध तक। प्रतीकों के माध्यम से पशुवत व्यवहार को भी दर्शाया गया है। साथ ही नौकरशाही और पूंजीपति, उद्योगपति, मीडियाकर, नेता-मंत्री और क्लर्कों की जिन्दगी को बहुत ही मार्मिकता के साथ चित्रित किया गया है।

संदर्भ
[1] लेख, भ्रष्टतंत्र में डूबती मूल्यनिष्ठा, उपन्यासकार गोविन्द मिश्र: सं. सुवास कुमार,  अमन प्रकाशन कानपुर, प्रथम संस्करण 2017 पृष्ठ संख्या 154
[2] फूल इमारतें और बन्दर: गोविन्द मिश्र, राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम आवृत्ति 2015, पृष्ठ संख्या 105
[3] लेख, भ्रष्टतंत्र में डूबती मूल्यनिष्ठा, उपन्यासकार गोविन्द मिश्र: सं. सुवास कुमार, पृष्ठ संख्या 153
[4] फूल इमारतें और बन्दर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 139
[5] फूल इमारतें और बन्दर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 11
[6] फूल इमारतें और बन्दर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 63
[7] समकालीन भारत एक परिचय: सं.मनोज सिन्हा, पृष्ठ संख्या 219-220
[8] वह/अपना चेहरा: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या, राजकमल प्रकाशन- नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2015,पृष्ठ संख्या 10
[9] वह/अपना चेहरा: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 25
[10] वह/अपना चेहरा: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 44
[11] फूल इमारतें और बंदर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 34
[12] फूल इमारतें और बंदर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 86
[13] फूल इमारतें और बंदर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 215
[14] फूल इमारतें और बंदर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 155
[15] फूल इमारतें और बंदर: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 155
[16] अरण्य तंत्र: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या, किताबघर प्रकाशन- नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2013, पृष्ठ संख्या- 17
[17] अरण्य तन्त्र: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 17
[18] लेख, प्रशासन पुराण, गोपाल चतुर्वेदी, उपन्यासकार गोविन्द मिश्र: डॉ. सुवास कुमार, पृष्ठ संख्या 217
[19] अरण्य तंत्र: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 143
[20] अरण्य तंत्र: गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 176

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।