कहानी: अम्मी ने आपको सलाम भेजा है

- दिनेश श्रीवास्तव


उनका नाम तो वैसे उस्मान अली था पर जाने कब लोग उन्हें मोहित कह कर पुकारने लगे थे। अब तो उन्हें गए एक जमाना बीत गया। वे गए। मोहित-बहू भी चली गयीं। उनकी बेटियाँ तो पहले ही ब्याह के बाद घर छोड़ गयी थीं। जहाँ उनका घर हुआ करता था, बस एक खंडहर रह गया है।

पर एक दिन वहाँ मोहित का भरा पूरा परिवार रहता था। मोहित हमारे गाँव में पैदा नहीं हुए थे। हमारे गाँव में उनकी ननिहाल थी। पिता की अकाल मृत्यु के बाद उनकी माँ उन्हें लेकर वहाँ आ गयी थीं। उनकी सारी जिंदगी गाँव के लोगों को मामा, मामी, खाला, खालू, नाना, नानी जैसे रिश्ता-सूचक नामों से ही पुकारते गुजरी।
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मोहित धोबी। सफेद झक बनियान। खूब सफेद झक धोती। खूब चाव से बाँधी गयी, एक घेर की लकझक पगड़ी।  एक टाँग घुटने से मुड़ती नही थी, सो वे लाठी टेक कर चलते थे। मूँछें बेतरतीब बढ़ी हुई, सफेद। छोटी सी दाढ़ी सफेद। सर के बाल, पगड़ी के नीचे से झाँकते, सफेद। आवाज़ ठसकदार। कंधे मजबूत। सरल, विश्वास जगाती पैनी निगाहें। बांयी बांह उचका, वे धुले वस्त्रों की गठरी पीठ पर टिका लेते और दांयें हाथ से लाठी टेकते आते, रोज शाम। धुले कपड़े वापस करने।

वे धुले कपड़े देते और फिर गंदे कपड़ों की गठरी कंधे पर टांग कर, धोबियों के टोले पर लौट जाते थे। जाते जाते वे बच्चों को लंगड़ी मार कर गिरा देने का भय दिखा जाते या फिर तरह तरह से आँखें मटका कर चिढ़ा जाते।
घर पहुँचने पर मोहित-बहू गंदे कपड़ों को रेह, बकरियों की लेंड़ी तथा पानी से भरे हौदों में भिगोतीं। फिर हौदे के किनारे गड़ी खूंटियों में फंसा कर गार-गार कर उन कपड़ों का ढेर लगा देती थीं। सबेरे मोहित कलेवा करके, गधों की पीठ पर इन्हीं कपड़ों का ढेर लाद कर नदी के किनारे जाते। कपड़ों का ढेर वे पाटों के पास लगा कर गधों की आगे के दो टांगों को आपस में बाँध कर चरने को छोड़ देते थे। इसके बाद वे खुदा का नाम लेकर और पास के दह में रहने वाले पनबुढ़वा बाबा को सलाम करके पानी में उतरते।  वे एक-एक कपड़े को पहले पानी में भिगोते और फिर पाटे पर पटकते थे। कपड़ों को पटकते समय वे पता नहीं क्या कहते थे पर हम यही समझते थे कि वे "हनछो हनछो" की आवाज निकलते हैं। तीन चार बार पटकने के बाद वे कपड़े को फिर नदी में खंगालते और पाटे पर रख कर से निचोड़ कर फिर नदी में भिगो कर पाटे पर पटकना शुरू कर देते। हर खंगाल के बाद कपड़े साफ़ होते जाते और पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद वे उन्हें किनारे पर रख कर अगले कपड़े उठा लेते।

यह क्रम करीब दस बजे तक चलता। तब तक मोहित बहू थोड़ा सा गुड़, थोड़ी सी रात भर की भिगोई हुई मटर या चने की दाल और प्याज लिए आ जातीं और मोहित चबैना चबा, पानी पी फिर जुट जाते। मोहित बहू एक बाल्टी में नील घोल कर, ठाकुरों के कपड़ों में नील लगातीं और गार कर सूखने के लिये फैला देतीं। तीन चार बजे तक कपड़े सूख जाते थे और वे धुले कपड़े गधों पर लाद कर वापस ले जाते। नील लगे कपड़ों पर इस्त्री करते और अपनी सफेद झक "यूनिफार्म" में घर घर बांटने निकल पड़ते थे। बाकी कपड़े या तो लोग उनके घर से लोग ले आते थे या फिर मोहित बहू बाँट आतीं।

अभी कल ही की बात तो लगती है जब उन्होंने एक गैर-ठाकुर के कपड़ों पर नील लगा कर इस्तरी कर दिया था। जैसे ही वह आदमी इस्तरी किये कपड़े पहन कर बाजार गया तो ठाकुरों ने उसकी बहुत फ़ज़ीहत की ही, मोहित के घर जाकर सारे धुले कपड़ों को फिर से गंदे पानी में फ़ेंक दिया था। इन लोगों के कपड़ों पर इस्तरी करने की हिम्मत मोहित ने दुबारा नहीं की।

मोहित में न जाने कहाँ का स्वाभिमान था कि वे कभी कुछ भी नहीं माँगते थे। कटाई के दिनों में हर घर से एक बोझा भर अन्न पाते और कपड़े वापस करते समय थोड़ा बहुत अनाज। इससे ज्यादा के लिए उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। पहली लड़की हुई तब भी नहीं। यहाँ तक कि दूसरी लड़की हुई तब भी नहीं। जब उन्हें पता चलता कि उनकी बहू ने किसी से कुछ माँगा है तो वह उस पर भी खूब बिगड़ते।

मेरे कॉलेज जाने का रास्ता, धोबी घाट के पास से गुजरता था। उसके पास एक पुराना और बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था। कभी कभार शाम के वक्त वे अपनी बहू का इंतज़ार करते वहीं पर बैठे मिल जाते थे। मैं भी उनके साथ बैठ कर थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें कर लेता था। मोहित बहू के आते ही हम लोग साथ ही वापस आ जाते। धीरे धीरे वे मुझसे काफी स्नेह करने लगे थे हम दुनिया-जहान की बातें करते। वे मुझे हमेशा बुरी सँगत से बचे रहने को कहते थे।

एक दिन मुझे उनके सामान्यतया गंभीर रहने वाले चेहरे पर एक गहरी उदासी की छाया दिखी। बहुत पूछने पर उन्होंने मुझे बताया तो था पर कसम भी खिला दी थी कि यह बात उनके जीते जी मैं किसी से नहीं बतलाऊंगा। अब जब उनकी रूह गाँव के कब्रगाह में क़यामत का इंतज़ार कर रही है, मोहित बहू का इंतकाल हो चुका है, बेटियाँ अपनी अपनी घर गृहस्थी में व्यस्त हैं और उनका घर खंडहर बन चुका है तो मैं उनकी कहानी आपको बता सकता हूँ। वे तो चाहते थे कि उनकी व्यथा उनके साथ ही दफन हो और किसी को उसकी भनक तक न पड़े।
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तब मोहित जवान थे। कड़ियल जवान। उनके नाना जीवित थे। वे अपनी अम्मी, नानी, और नाना के दुलारे थे। उनकी अनुमति लेकर वे रंगून गए।  वे कपड़े धोने और इस्तरी करने के अलावा कुछ नहीं जानते थे। एक लॉन्ड्री में नौकर हो गए। उन दिनों अमीर लोग कुर्तों में सोने की चेन के साथ सोने के बटन लगाते थे। एक बार धोने के लिए आये कपड़ों में उन्हें ऐसा ही एक बटन, चेन और तकरीबन बीस हज़ार रुपये मिले। उन्होंने कपड़े के मालिक को खोजा और उसका सामान लौटा दिया। उनकी इस ईमानदारी से लॉन्ड्री की सोहरत बढ़ी और लॉन्ड्री चल पड़ी। मालिक ने उनकी तनख्वाह बढ़ा दी और लांड्री का सारा काम उन पर छोड़ कर सागौन की लकड़ी का धंधा करने लगा।  वे जवान थे, अच्छा कमाते थे, अपने काम में माहिर थे। महीन कुर्तों में चुन्नटों वाली इस्तरी तो वे इतनी अच्छी करते थे कि सारे रंगून के महीन कुर्ते उसी लॉन्ड्री में धुलते थे।

पड़ोस में एक और धोबी अपनी बीबी और लड़की के साथ रहता था। उसकी उम्र जब मुश्किल से आठ साल थी तब जाने किस दबाव में उसके दादा ने उसकी शादी एक पैंतीस साल के आदमी से कर दी थी। शादी के साल भर के अंदर ही जब वह लड़की को घर ले जाने की जिद करने लगा तो एक दिन उसका बाप उसे लेकर रंगून आ गया था। मोहित वहाँ उन लोगों के पहुँचने के सात आठ साल बाद रंगून आये। वही लड़की उन पर फ़िदा हो गयी। सलीमा नाम था। वह उनके खाना बनाने के प्रयासों को देख कर खूब खिलखिलाती।

खैर मोहब्बत रंग लाई। जब लड़की का पेट काफी बढ़ गया तब कहीं उसके अब्बू की आँख खुली। पहले तो उन्होंने उसकी खूब पिटाई की। लड़की ने मोहित का नाम लिया। हिन्दुस्तानियों की पंचायत बुलाई गयी। पंचों ने बताया कि इस पाप की सजा तो यही होती है कि सलीमा को पत्थरों से मार कर ख़तम कर दिया जाए। पर सरकार का डर था और एक तरफ से सलीमा की माँ और दूसरी तरफ से मोहित हाथ जोड़े घिघियाते और तरह तरह से रहम की भीख माँगते खड़े थे।

पंचायत ने अजीब सा फैसला सुनाया। पहला तो यह कि मोहित उस लड़की से मिलेंगे नहीं। फिर यह कि वे उसके मियाँ के रंगून आने और लड़की के साथ हिंदुस्तान वापस जाने का खर्चा देंगे। तीसरी बात यह कि बिरादरी को मोहित इतना बड़ा भोज देंगे जिसमें लड़की के वजन के बराबर नमक खर्चा हो। और अगली बात बताते बताते मोहित की आँखें डबडबा गयी थीं - वह यह कि लड़की या लड़का जो भी हो सलीमा के मियाँ को मिलेगा।
जब तक सलीमा का मियाँ रंगून पहुँचा, उसे लड़का हो चुका था। मोहित उसे देख तक न पाए। वे वहां के बुजुर्गों के पास फिर से गए, उनसे बहुत गिड़गिड़ाए कि कम से कम उन्हें उनका लड़का दे दिया जाये, वे उसे पाल लेंगे। उन्हें यह भी डर था कि लड़के के साथ बहुत दुर्व्यवहार किया जाएगा।  पर उनकी बात किसी ने नहीं सुनी।
उन्होंने सुना भी कि सलीमा भी बहुत रोई थी जाते वक्त। उसका पति घर पर अकेला था- और इस बीच दो और शादियाँ कर चुका था। पर थोड़े दिनों में ही दोनों बीबियाँ उसे छोड़ गयी थीं। उसने दरियादिली का नाटक खेलते हुए सलीमा और उसके बच्चे को ठीक से रखने की कसम खाई थी।

काफी दिनों के बाद में उन्हें पता चला था कि पंचों में से एक सलीमा के मर्द का मामा था। मोहित उसके पास गए थे। वह बोला, "अरे बेटवा, अल्लाह माफ करें। हम तोहैं का बताई। अरे तू तौ जवान हौ, अल्लाह तोहैं हुनर देहे अहइँ। ओकर के अहइ? बुढ़ाये के बाद ओका के खियाये। हम का करित। तू बिआह कई लेह्या। अल्लाह तोहैं बहुत बरक्कत देइहैं"

 फिर उनका मन रंगून में नहीं लगा। कुछ दिनों बाद वे नाना के पास लौट आये और उनका धंधा संभालने लगे। कुछ सालों बाद अपनी अम्मी के बहुत जोर देने पर उन्होंने शादी की। उनकी होने वाली बहू विधवा थी, पर सुन्दर, सुशील, और बहुत ही कर्मठ। धीरे धीरे उनका गम कामों और गृहस्थी के बोझों तले दबने लगा।
अपनी ख़राब टांगों पर हाथ मार कर उन्होंने कहा था, "बेटा, इन टांगन माँ बड़ी फुरती रही। ऊ तौ अल्लाह क कहर हुई गवा रहा"। उन्होंने बताया कि एक बार वे घर की मरम्मत कर रहे थे। मोहित-बहू मिट्टी का गारा बना बना कर उन्हें उन तक पहुँचा रहीं थीं। "बेटा, हमें अइसा लगा कि सलीमा तसला माँ माटी लेहे चली आवत बा। हमरे जियरा माँ बहुत जोर से हुलास उठी। अउ हम सोचे कि दौड़ि के हम ओका धई लेई"। और वे दीवार पर से कूद पड़े। दीवार तो विशेष ऊँची नहीं थी पर नीचे ईटें बिखरी पडी थीं। उनकी एक टांग में बहुत चोट आयी। गाँव के गड़ेरिये ने महुए के पत्ते पर आमा हल्दी का लेप बना कर कड़ुए तेल में गरम करके पैर पर बांधा और खुदा की प्रार्थना करने को कहा। लोगों के कहने पर भी मोहित बीस मील दूर स्थित सरकारी अस्पताल नहीं गये। घाव ठीक होने के बाद पता चला कि एक टांग घुटने के पास से नहीं मुड़ती। वे बोले कि अब तो जब भी सलीमा की याद करके कलेजे में हूक उठती है तो मैं इस घुटने पर हाथ फेर लेता हूँ।  और मन ही मन उसको सम्बोधित करके कहता हूँ -"देखि ल्यो। तोहार सूरति मोहित के मन से उतरी नाय। हमरे लगे एकर सटिकफिटिक बा"।
और उस दिन उन्हें सलीमा सपने में दिखी थी, बहुत दिनों के बाद। "का मालूम कहाँ अहइ। कइसे अहइ। हमार बेटौना कइसे अहइ"। कहते कहते उनकी आँखें छलक आईं। तब तक दूर से मोहित बहू की आवाज सुनायी पड़ी और उन्होंने पगड़ी के कोने से आखें पोंछी और अपनी कसम दी कि मैं इसके बारे में किसी को नहीं बताऊंगा।
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फिर एक दिन मोहित ने नाचने की कोशिश की थी और नतीजतन वे फिर गिर पड़े थे। उनकी पत्नी पूछती रहीं कि वे क्यों नाचे जब कि उन्हें अच्छे से मालूम था कि लंगड़े लोग नाच नहीं सकते। और कई बार के सवाल के जवाब उन्होंने एक चीख से दिया था, "चुप रहु। तैं न समझबे"।

हुआ यह था कि गाँव के किसी धोबी के यहाँ शादी में नाच आयी थी। नाचने वाला लड़का बीस बाईस साल की उमर का था। उसने लाल रंग का कसा हुआ कुरता और खूब बड़े से घेर वाला लाल लहँगा पहन रखा था। लहंगे पर सैकड़ों छोटी छोटी घंटियाँ टंकी हुई थीं। पैरों में बहुत सारे घुँघरू बांध कर बड़ी ही सुरीली बांसुरी बजाता था। उसका गला भी खूब सुरीला था। साथ में एक ढोल बजने वाला, एक छोटी कांसे की थाली में रस्सी बांध कर उसे छोटी सी लकड़ी सी मार मार कर बजाने वाला और एक मसालची था। मिट्टी के तेल से भरी बोतल के मुँह को जूट से बंद करके जूट को जला दिया गया था। ऐसी दो मसालों से काफी उजाला हो जाता गया था।

हाँ तो नाचने वाला लड़का, "नचनिया" बांसुरी बजाते बजाते एक झटके से घूम जाता और सैकड़ों घंटियों की मधुर आवाज, घुँघरू, ढोल तथा काँसे की थाली द्वारा पैदा की गयी आवाज सबको रोमाँचित कर रहीं थी। वह लगातार बांसुरी बजा रहा था और उसके पैर फिरकी की तरह कभी आगे, कभी पीछे, कभी गोल घेरों में और कभी एक ही जगह घूम रहे थे।

 फिर उसने गाना शुरू किया था। चौपाई नुमा गाने, जिन्हें हमारे यहाँ 'चटनी' कहा जाता था। चटनी शायद इसलिए कि उनमें अक्सर चटखारेदार बातें होती थीं, जैसे कि ब्लाउज या पेटीकोट धोते वक्त धोबी के मन में उठाने वाली बातों का सहज सा वर्णन। गाते गाते वह फिर नाचने लगता था।

तब तक मोहित भी लाठी टेकते टेकते वहां पहुँच गये थे। इस नाच का न जाने उन पर क्या प्रभाव पड़ा कि वे भी लाठी छोड़ कर नाचने लगे। भला कैसे संभलते, गिर पड़े।  लोग "मोहित गिर गये, मोहित गिर गये" कह कर उनकी और दौड़े और उन्हें उठा कर खड़ा किया।

तब तक नाचने वाला लड़का, उन तक आया और उन्हें एक तरफ ले जाकर आहिस्ते से बोला- "क्या आप ही उस्मान अली उर्फ़ मोहित धोबी हैं?"

"हाँ बेटा", मोहित ने कहा।

 "मेरी अम्मी ने आपको सलाम भेजा है। उन्होंने कहलवाया है- तोहका सलीमा केर सलाम"।

मोहित को जैसे बिजली का झटका लगा। उन्होंने मशालों की रोशनी में नाचने वाले लड़के की सूरत देखी- हाँ तो, वही आँखें, वही नाक, वही होंठ, वही बरौनियाँ। वही सलोना सा रंग।

"सलाम बेटा सलाम। अल्ला तोहैं बड़ी बरक्कत दें। खूब तरक्की करो बेटवा। सलाम-"- और उनका गला भर आया। कितनी सारी बातें बिजली की तरह उनके मन में एक साथ कौंध उठीं। तब तक लोग नाच चालू करने के लिए शोर करने लगे। नाचनेवाले लड़के ने हुंकारा भरा, उसके चेहरे पर एक मुस्कान खिंची और उसके कपड़ों में बंधी घंटियाँ खनखना उठीं।

मैंने दोनों को गौर से देखा। असलियत समझते मुझे देर न लगी। कुंती और कर्ण की बात मेरे मन में आयी पर मोहित के मन का हाहाकार देख उन्हें अकेले छोड़ दिया।

देखते देखते वे मुड़े और चुपचाप मुग्ध भाव से नाच देखने बैठ गये। लोगों ने देखा, वे बार बार अपनी आँखें पोंछ रहे थे। "अरे कुछु नाहीं। मसाल क धुआं परपरात बा", पूछने पर वे बोले थे।

कई दिनों बाद उनसे जब फिर बात हुई तो उस दिन की याद करके, उनकी आवाज काँप रही थी। कुछ देर रुक कर उन्होंने मुझसे कहा, "अब हमै कौनौ चीज के जरूरत नाही बा। सलीमा हमें आज तक नाहीं भूली। हम आपन बेटवा का देखि लीन। अब बड़ी शांति बा मन माँ। अल्लाह का फजल है बेटा, नाहीं तौ हम तो आस छोड़ि देहे रहे, आपन बेटवा का का मुँह देखै का। बस एक कमी रही बेटवा। अरे हम अपने बेटवा का अँकवारी म नाही लई पाये। एक दाईं ओका करेजवा से लगाई लेइत त हमार जियरा जुड़ाई जात।"।

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