साहित्यिक शब्दावली के रूप में ‘प्रवृत्ति’ का विकास

- ज़िनित सबा

शोधार्थी, हिंदी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद -500046 
मेल- zinitsaba33@gmail.com
चलभाष- +91 949 226 3706 

 ‘प्रवृत्ति’ शब्द ही अपने आप में एक शोध का विषय है क्योंकि इस शब्द का विकास कैसे और किस रूप में हुआ यह जिज्ञासा का विषय है। हिंदी आलोचना की शब्दावली में ‘प्रवृत्ति’ को लेकर गहन और गंभीर विश्लेषण अत्यल्प हुआ है। अधिकांश हिंदी आलोचना की शब्दावली पश्चिम के प्रभाव में गढ़ी हुई है। जबकि भारत में इस शब्द को लेकर नाट्य शास्त्रियों (भरतमुनि) और साहित्य समीक्षकों (राजशेखर ) ने गंभीरता से विवेचन किया है। अतः हमें दोनों विचारदृष्टियों को ध्यान में रखते  हुए ‘प्रवृत्ति’ शब्द के साहित्यिक विकास को समझना होगा।
प्रवृत्ति शब्द की व्युत्पत्ति और कोशगत अर्थ
प्रवृत्ति शब्द का निर्माण संस्कृत के ‘वृत्’ धातु में ‘प्र’ उपसर्ग और ‘क्तिन्’ प्रत्यय के योग से होता है। किन्तु विभिन्न कोशों में प्रवृत्ति को भिन्न-भिन्न तरीके से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। जैसे -
मानक हिंदी कोश में प्रवृत्ति का अर्थ –
निरंतर बढ़ते रहने की क्रिया या भाव; किसी काम, विषय या बात की ओर अथवा किसी विशिष्ट दिशा में प्रवृत्त होने या बढ़ने की क्रिया या भाव ; मनुष्य के व्यक्तित्व का वह अंग जो इस बात का सूचक होता है कि वह अपने उद्देश्यों या कार्यों की सिद्धि के लिए किस प्रकार या किस रूप में सचेष्ट रहता है ; मन की वह स्थिति जिसमें वह किसी ऐसे काम या बात की ओर अग्रसर होता है जो उसे प्रिय तथा रुचिकर होती है।(टेन्डेंसी); मनुष्यों का साधारण आचरण व्यवहार या रहन-सहन। वर्णन, वृतांत ; उत्पत्ति, जन्म ; कार्य का अनुष्ठान या आरम्भ ; यज्ञ आदि धार्मिक कृत्य ; हाथी का मद।
‘हिन्दी शब्द सागर’ में प्रवृत्ति से तात्पर्य  -प्रवाह, बहाव; झुकाव, मन का किसी विषय की ओर लगाव, लगन जैसे –उसकी प्रवृत्ति व्यापार की ओर नहीं है ; वार्ता, वृतांत, हाल, बात; प्रवर्तन, काम का चलना ; सांसारिक विषयों का ग्रहण, संसार के कामों में लगाव, दुनिया के धंधे में लीन होना। निवृत्ति का उलटा ; उत्पत्ति, आरम्भ ; शब्दार्थ-बोधक शक्ति ; भाग्य किस्मत ; उज्जयिनी का एक नाम। 
डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ‘हिन्दी साहित्य कोश’ में प्रवृत्ति के सम्बन्ध में लिखते हैं –“प्रवृत्ति आचार-व्यवहार वेश आदि, रहन-सहन को प्रकट करने की पद्धति है।” 
प्रवृत्ति पर अनुसन्धान के दौरान ‘संस्कृत हिन्दी कोश’, ‘राजपाल हिन्दी कोश’, ‘समांतर कोश : हिन्दी थिसारस’, आदि कोशों की सहायता लेते हुए यह देखा गया कि इन कोशों में भी प्रवृत्ति के लिए यही अर्थों को स्वीकार किया गया है। आज प्रवृत्ति शब्द साहित्य में प्रमुख रूप से ‘ट्रेंड’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। इसलिए अंग्रेजी साहित्य की परंपरा में भी ट्रेंड शब्द की पड़ताल भी की गयी। जैसे –
‘WordMaster’ (वर्ड मास्टर) शब्दकोश के अनुसार
Trend (प्रवृत्ति) –‘A development or change in a situation or in the way in which people are behaving .’ 
डिक्शनरी. कॉम में trend का अर्थ
1. “The general course or prevailing tendency; drift: trends in the teaching of foreign languages; the trend of events.
2. Style or vogue: the new trend in women's apparel.
3. To have a general tendency, as events, conditions, etc.
4. To tend to take a particular direction; extend in some direction indicated.
5. To emerge as a popular trend; be currently popular: words that have trended this year.”
वोकाबुलरी डिक्शनरी में प्रवृत्ति को परिभाषित करने की कोशिश की गयी है, जो आधुनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण और सटीक लगता है। जैसे - ‘एक प्रवृत्ति किसी खास समय पर किसी खास बिंदु पर लोकप्रिय है। हालांकि एक प्रवृत्ति आमतौर पर फैशन या मनोरंजन में एक विशिष्ट शैली को दर्शाती है। एक प्रवृत्ति केवल फैशन, पॉप संस्कृति और मनोरंजन को नहीं दर्शाती बल्कि आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि संकेतकों पर भी निर्भर है। अतः प्रवृत्ति किसी देश की वर्तमान मनोदशा को दर्शाने वाला सबसे प्रमुख कारक है।”
इस तरह उपरोक्त अर्थों और परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि ‘प्रवृत्ति’ शब्द बहु-अर्थी शब्द है, जिसका प्रयोग विभिन्न अनुशासनों में भिन्न-भिन्न है। साथ ही इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि हिन्दी में प्रवृत्ति को लेकर कोई निश्चित परिभाषा निर्मित नहीं हो पाई है। अतः कुल मिला कर यह कह सकते हैं कि प्रवृत्ति का प्रयोग भले ही अन्य अनुशासनों में ‘विषय उपयोगी अर्थ’ को समाहित किये हुए है, किन्तु साहित्य में इसका प्रयोग बहु आयामी है। साहित्य में जिस तरह सभी अनुशासनों को समाहित करने की क्षमता रही है, उसी तरह ‘प्रवृत्ति’ भी इसी का संवाहक है। जैसे –साहित्य से राजनीति, अर्थनीति, मनोविज्ञान, समाज शास्त्र, संस्कृति, इतिहास, दर्शन आदि का गठजोड़। उसी तरह प्रवृत्ति भी कभी एक फैशन के रूप में, कभी नवीनतम रुझान, कभी आचरण, व्यवहार, कभी प्रवाह या बहाव तो कभी योग शास्त्र में प्रयुक्त प्रवृत्ति –निवृत्ति के रूप में प्रयुक्त होती है। कभी इसका रूप राजनीतिक होता है तो कभी सांस्कृतिक, कभी दार्शनिक और कभी  साहित्यिक। प्रवृत्ति किसी समय में किसी खास बिंदु पर लोक-प्रिय होती है। साहित्य की प्रवृत्तियों में उत्थान और पतन तो होता ही रहता है। कभी कोई प्रवृत्ति प्रमुख होती है तो कभी गौण। प्रवृत्ति का उत्तरोत्तर विकास होता रहता है। प्रवृत्तियाँ  कभी स्थिर नहीं रहतीं देश में चल रही गतिविधियाँ या परिस्थितियां, उन्हें निर्मित करती हैं। समय और समाज की मांग ही प्रवृत्ति को निर्धारित करती है। “विभिन्न युगों में साहित्यिक प्रवृत्तियों की शुरुआत, उनका उतार चढ़ाव उनकी सीमा का निर्धारण करती हैं परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी काल विशेष में जो प्रवृत्तियाँ  है, वे एकदम खत्म हो जाती है या उनमें एकदम परिवर्तन आ जाता है। काल विशेष में चलने वाली प्रवृत्तियाँ कमोबेश होती हुई विलुप्त होने लगती हैं  और अन्य प्रवृत्तियाँ  मुख्य रूप धारण करने लगती हैं।”
साहित्य के क्षेत्र में प्रवृत्ति की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए एक नजर प्रवृत्ति की परम्परा और विकास पर भी डालना आवश्यक है। साहित्य में प्रवृत्ति की परंपरा को तलाश करने के दौरान दो तरह की साहित्यिक परम्परा मिली। एक परंपरा भारतीय  तो दूसरी परंपरा  पश्चिम की रही।
भारतीय परंपरा में प्रवृत्ति की शुरुआत काव्यशास्त्र और नाटक पर बात करते हुए प्रारंभ होती है। भरत मुनि प्रवृत्ति के सम्बन्ध में नाट्य शास्त्र में लिखते हैं- “पृथिव्यां नाना देशवेशभाषाचारवार्ता ख्यापयतीति प्रवृत्तिः। अर्थात् पृथ्वी के विभिन्न देशों के वेश, भाषा तथा व्यवहार की बातों को जो प्रकट करे, वह प्रवृत्ति है।”  इसलिए उन्होंने नाट्य प्रयोग में चार प्रवृत्तियों को स्वीकार किया है- आवन्ती, दाक्षिणात्य, पांचाल मध्यमा  और औड्र-मागधी। ये विभाजन उन्होंने प्रदेशों की विशेषताओं के आधार पर किया था। अतः एक तरह से प्रवृत्ति से उनका आशय देश की सांस्कृतिक परंपरा से रहा, जिसको उन्होंने नाटक के सन्दर्भ में स्पष्ट करने का प्रयास किया। इनके बाद राजशेखर ने भी प्रवृत्ति को अपने आधार पर विश्लेषित किया। “राजशेखर के अनुसार रंगमंच पर अभिनीत नाटक में ‘वेश विन्यास क्रम’ को ‘प्रवृत्ति’ कहते हैं।”  यहीं से प्रवृत्ति का प्रयोग साहित्य में होने लगा। किन्तु इससे यह आशय न लगाया जाए कि काव्यशास्त्र तक ही प्रवृत्ति का प्रयोग और अर्थ सीमित रहा। दूसरी ओर पश्चिम की परंपरा में ट्रेंड शब्द भारतीय परंपरा से भिन्न अर्थ को लेकर उपस्थित होता है।
 अंग्रेजी में ट्रेंड के समानार्थी शब्द  tendency, movement, aptitude आदि हैं।  पश्चिम में प्रवृत्ति शब्द जो trend का पर्याय माना जाता है इसका प्रयोग सर्वप्रथम मिडिल इंग्लिश में 1590 में trendan के रूप में हुआ। ‘ट्रेंड’ शब्द की उत्पत्ति ‘germanic’ भाषा से मानी जाती है, जिसका सम्बन्ध trundle से रहा। मिडिल इंग्लिश में ट्रेंड से पूर्व ‘trendan’ शब्द प्रचलित था। जिसका अर्थ ‘किसी विशेष दिशा में चलना या झुकना रहा (नदी और तट का प्रयोग )। ओल्ड इंग्लिश में भी यही trendan रूप ही प्रचलित रहा जिसका अर्थ ‘turn round, revolve, roll’ (लुढ़कना, घूमना) रहा। प्रोटो-जर्मनिक में trend के लिए ‘trandijan’ शब्द प्रचलित रहा जिसका अर्थ (round lump, ball ) के रूप में रहा, जिसका अर्थ भी ‘घूमना’ था। swedish में trend के लिए trind शब्द प्रचलित रहा जिसका अर्थ भी ‘घूमना’ ही है। डच में trend के लिए trindel शब्द प्रचलित था, जिसका अर्थ परिधि (circumference) रहा। अतः यह स्पष्ट है कि प्रारंभिक दौर में ट्रेंड का अर्थ जहाँ घूमने  के अर्थ तक सीमित रहा वहीं 16वीं शताब्दी के अंत तक ‘एक विशिष्ट दिशा में परिवर्तन’ होने के रूप में स्वीकार किया गया। 19वीं सदी तक आते-आते ट्रेंड का अर्थ ‘सामान्य दिशा में विकसित’ होना हो गया। 1950 के बाद इसके अर्थ में फिर से परिवर्तन आया। ट्रेंड का अर्थ –‘लोकप्रिय फैशन या संस्कृति’ के रूप में 1950 के बाद स्वीकार किया जाने लगा, जो आज तक प्रचलित है।
इन दोनों परम्पराओं के विकास क्रम को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि भारतीय परम्परा में प्रवृत्ति शब्द का प्रयोग तीसरी शताब्दी से होता रहा है क्योंकि इसका प्रयोग सर्वप्रथम भरत मुनि ने अपने ‘नाट्य शास्त्र’ में किया। जबकि ट्रेंड शब्द का प्रचलन अंग्रेजी में आधुनिक युग की देन है। किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय परंपरा में प्रवृत्ति शब्द का अर्थ जो तीसरी शताब्दी या काव्यशास्त्र में प्रयुक्त होता था उसमें परिवर्तन आया है।
प्रवृत्ति, वृत्ति और विशेषता का अंतः सम्बन्ध
प्रवृत्ति पर शोध करते हुए यह भी पाया गया कि प्रवृत्ति में वृत्ति शब्द भी आ जाता है। इसलिए कुछ विद्वानों का आशय वृत्ति को प्रवृत्ति समझना भी रहा है।
‘प्रवृत्ति’ शब्द को सामान्यतया उसका संधि विच्छेद करके देखा जाता है और उसी से उसके अर्थ को स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है। जैसे – प्र+वृत्ति, ‘प्र’ का अर्थ अलग, भिन्न या पृथक् है। ‘वृत्ति’ का अर्थ है- मनःस्थिति या चित्तवृत्ति। अर्थात् प्रवृत्ति का अर्थ पृथक् मनःस्थिति या चित्तवृत्ति होता है। किन्तु यहाँ प्रवृत्ति सिर्फ चित्तवृत्तियों का पुंज नहीं है। प्रवृत्ति को चित्तवृत्ति मानकर उसे एक तरह से परिभाषित करना उसके अर्थ को एक पक्षीय बनाता है। इसलिए वृत्ति और प्रवृत्ति के भेद को स्पष्ट करना यहाँ आवश्यक जान पड़ता है।  “वृति और प्रवृत्ति में यह अंतर है कि वृत्ति का मुख्य सम्बन्ध आंतर व्यापारों से और प्रवृत्ति का बाह्य व्यापारों से होता है। वृत्ति तो केवल शब्दों के द्वारा काम करती है, पर प्रवृत्ति आचार-व्यवहार के माध्यम से व्यक्त होती है। इसलिए वृत्ति तो काव्य, नाटक आदि सभी प्रकार की साहित्यिक कृतियों में होती है, परन्तु प्रवृत्ति केवल अभिनय या नाटक में होती है।”  किन्तु वर्तमान के सन्दर्भ में प्रवृत्ति केवल नाटक तक सीमित न होकर साहित्य की सभी विधाओं में प्रचलित है और सबसे प्रमुख बात तो यह रही कि ‘प्रवृत्ति’ शब्द का अब ‘अर्थ-विस्तार’ हो गया। अब प्रवृत्ति कहने पर एक समय में प्रचलित किसी शैली या विषय पर रुझान से है।
साथ ही यह भी पाया गया कि कुछ विद्वान ‘प्रवृत्ति’ का अर्थ गुण ही समझते हैं और कुछ लोग ‘विशेषता’ को प्रवृत्ति का पर्याय मानते हैं किन्तु ‘प्रवृत्ति’ इसका दूसरा पड़ाव है। साहित्य में अचानक किसी गतिविधि, घटना, शैली पर रुझान जिसकी दिशा में परिवर्तन हो उसे हम ‘प्रवृत्ति’ कहते हैं। जो किसी एक समय में लोकप्रिय होती है। उदाहरण के लिए -कोई रचनाकार कोई रचना लिख रहा है जिसमें नए प्रयोग हो अर्थात् परंपरागत ढर्रे से भिन्न हो और अपनी नयी पहचान रखती हो, उसे हम विशेषता कह सकते हैं। साहित्य में प्रयुक्त यही नवीनतम प्रयोग जब सभी के लिए रुझान उत्पन्न करता है, तब यह प्रवृत्ति का रूप लेता है।
एक तरह से प्रवृत्ति को सामूहिक चिंतन धारा  का विकास कह सकते हैं। कोई रचनाकार जब किसी कालखंड में एक ऐसी रचना लिखता है जो अपने तरह की अकेली रचना हो और उस तरह की रचना उस काल खंड में नहीं लिखी गयी हो तो उस एक रचना /शैली को प्रवृत्ति नहीं कह सकते। जैसे आदिकाल में एक रचनाकार भक्ति पर रचना लिखता है और वह आदिकाल की  एक मात्र रचना है। उसे उस काल खंड की प्रवृत्ति नहीं कह सकते हैं। प्रवृत्ति उसे ही कह सकते हैं जिसे उस समय की जनता के द्वारा समझा, सराहा और अपनाया गया हो अर्थात् जिस रचना की प्रसिद्धि हो। इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रन्थ का काल विभाजन ‘प्रवृत्ति’ के आधार पर किया परन्तु प्रश्न यह खड़ा होता है क्या यह (वीर गाथात्मकता) ही उस काल खंड की एक मात्र प्रवृत्ति थी ? ऐसा नहीं है, वीर गाथात्मकता उस समय की विशेष प्रवृत्ति थी जिसके आधार पर उन्होंने काल विभाजन किया। उस समय चारण कविताओं की प्रवृत्ति भी थी। इन सारी विशेषताओं ने प्रवृत्ति का रूप इसलिए लिया क्योंकि उस समय के रचनाकारों और लोगों ने इसे स्वीकार किया और अपनी रचनाओं में स्थान दिया। कहने का तात्पर्य है कि कोई भी साहित्यिक गतिविधि प्रवृत्ति का रूप तभी लेती है जब वह सामान्य से भिन्न हो और उस युग की प्रमुख विशेषताओं में से एक हो।
प्रवृत्ति शब्द का विभिन्न ज्ञानानुशासनों में व्यवहार 
अनेक अनुशासनों में ‘प्रवृत्ति’ शब्द के  प्रयोग ने अनुसंधानकर्ताओं के सामने एक नयी चुनौती पैदा की है। अलग-अलग विद्वानों का प्रवृत्ति को लेकर अलग-अलग परंपराओं की विकास यात्रा को दिखाना इस कार्य को और पेचीदा बनाता है। ज्ञान के अनेक अनुशासनों जैसे मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाज शास्त्र, योगशास्त्र, कला, गणित तथा साहित्य में प्रयुक्त ‘प्रवृत्ति’ अनेक अर्थों को साथ लिए चलती है।
मनोविज्ञान में ‘प्रवृत्ति’ शब्द से तात्पर्य आचरण तथा स्वभाव से है। क्योंकि उसमें जन्मजात प्रवृत्तियों को महत्त्व दिया गया है। मनोविज्ञान में प्रवृत्ति को आधार बना कर मूल प्रवृत्यात्मक सिद्धांत का निर्माण किया जाता है। इसके प्रतिपादक मैक्डूगल हैं। “उनके अनुसार सभी प्राणियों में जन्मजात प्रवृत्तियां पाई जाती हैं जिन्हें प्रेरक कहा गया है। यही मूल प्रवृत्तियां प्राणी के व्यवहार को प्रभावित एवं संचालित करती हैं। उनके अनुसार मूल प्रवृत्तियों के तीन प्रमुख तत्व हैं –सामान्य उत्तेजना, क्रिया, लक्ष्य निर्देशन।”   फ्रायड ने मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के मुख्य आधार ‘मूल आधार’ से जोड़ा है,  जिसे उन्होंने जन्मजात माना है। “प्रत्येक मनुष्य में जन्मजात दो विरोधी मूल प्रवृत्तियां रहती हैं –(क) जन्म की मूल प्रवृत्ति (ख) मृत्यु की मूल प्रवृत्ति। ...फ्रायड के विचारानुसार, ये दोनों ‘मूल प्रवृत्तियां’ साथ-साथ रहती हैं तथा मनुष्य की सभी प्रकार की क्रियाओं-सृजनात्मक अथवा विध्वंसात्मक की प्रेरणा शक्ति के रूप में कार्य करती हैं।” 
समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र तथा योगशास्त्र में “प्रवृत्ति का अर्थ है –काम में लगना, निवृत्ति का अर्थ है काम से हटना। बहुधा प्रवृत्ति शब्द का प्रयोग सांसारिकता के चक्र में फँसना और निवृत्ति का अर्थ संसार से मुँह मोड़कर परलोक के चिंतन में मग्न रहना लगाया गया है। प्रवृत्ति का अर्थ संसार के झंझटों में फंसना और निवृत्ति का अर्थ संसार के झंझटों से दूर हटकर ज्ञान और वैराग्य की बातों को सोचना लगाया जाता है।”  ‘मानक हिन्दी कोश’ में भी इसका सन्दर्भ देते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि -दार्शनिक और धार्मिक क्षेत्र में प्रवृत्ति को जीवन-यापन का वह प्रकार माना जाता है जिसमें मनुष्य घर-गृहस्थी सांसारिक कार्यों, सुख-भोगों आदि में प्रवृत्त रहता है। निवृत्ति का विपर्याय।
‘हिंदी शब्दसागर’ के अनुसार -न्यायशास्त्र में एक यत्न विशेष के लिए प्रवृत्ति शब्द प्रचलित है। इसमें वाणी, बुद्धि और शरीर से कार्य के आरंभ को ही प्रवृत्ति कहते हैं। राग द्वेष भले बुरे कामों में प्रवृत्त करते हैं। इष्टसाधनता ज्ञान प्रवृत्ति का और द्विष्टसाधनता ज्ञान निवृत्ति का कारण होता है।
गणित में भी ‘प्रवृत्ति’ शब्द ‘गुणक’ या ‘गुणक अंक’ के लिए प्रयुक्त होता है।  तथा कला के क्षेत्र में प्रवृत्ति से तात्पर्य ‘प्रचलन’ और ‘फैशन’ से है।
इस तरह यह स्पष्ट होता है कि ‘प्रवृत्ति’ बहुअर्थी शब्द है, जिसका प्रयोग विभिन्न अनुशासनों में बहुलता से होता रहा है।  साहित्य के क्षेत्र में भी प्रवृत्ति शब्द व्यापकता को लिए  हुए है। साहित्य की विशेषता यही है कि वह प्रायः सभी ज्ञान के अनुशासनों के शब्द को अपने में समाहित किये हुए है। इसलिए ज्ञान के अन्य अनुशासनों के शब्दों का अर्थ साहित्य में आना स्वाभाविक है।
प्रवृत्ति और हिंदी साहित्येतिहास ग्रन्थ
पूर्वोक्त आलोचना से यह तो ज्ञात होता है कि ‘प्रवृत्ति’ शब्द का प्रयोग साहित्य में कब से हुआ। किन्तु प्रवृत्ति की आवश्यकता कब पड़ी ? यह आज भी जिज्ञासा का विषय है। किन्तु इतना अवश्य स्पष्ट हो गया है कि साहित्य के अध्ययन के दौरान ही ‘प्रवृत्ति’ जैसी अवधारणा सामने आई होगी, जो अपने नए अर्थ के साथ उपस्थित है। कभी-कभी यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि प्रवृत्ति का जो रूप साहित्य में अभी हमारे समक्ष है, वह तो आधुनिक युग की उपज है, तो ऐसी में कौन सी परिस्थितियों के कारण प्रवृत्ति के अर्थ में परिवर्तन हुआ होगा और कैसे ? इस सम्बन्ध में कोई साक्ष्य तो नहीं मिलता है किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि आधुनिक युग में मनोवैज्ञानिक सिद्धांत ने साहित्य को प्रवृत्ति और निवृत्ति के कठघरे से आजाद करते हुए प्रवृत्ति को एक नए अर्थ के साथ परिचित करवाया। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि मनोविज्ञान ने स्वभाव, आंतरिक मनोवृत्ति, आचरण आदि शब्दों से प्रवृत्ति को जोड़ा। जिसका प्रभाव समाज पर तो पड़ा ही लेकिन इसका प्रतिफलित रूप साहित्य में भी दृष्टिगोचर हुआ।     गणपति चन्द्र गुप्त इस बात की पुष्टि न सही किन्तु यह संकेत अवश्य करते हैं कि  –“साहित्य में  समय-समय पर विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियों का उत्थान-पतन होता रहता है जिनके विकास की व्याख्या सांस्कृतिक एवं मनोवैज्ञानिक आधार पर की जा सकती है।” 
बहरहाल इन सब प्रश्नों से इतर भी मन में यह प्रश्न बरबस बना रहता है कि  ‘प्रवृत्ति’ की अवधारणा साहित्यिक आलोचना का परिणाम है या रचनाओं के मूल्यांकन  का ?  किन्तु हिन्दी साहित्य के इतिहासों के अध्ययन के दौरान यह अवश्य लगने लगा कि प्रवृत्ति शब्द का आधुनिक प्रयोग हिन्दी साहित्य के इतिहास को समझने के दौरान ही उत्पन्न हुआ था। हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने के दौरान इस अवधारणा को अधिक स्पष्टता ग्रियर्सन के  इतिहास ग्रन्थ ‘द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ़ हिन्दुस्तान’ से मिली। क्योंकि उन्होंने हिन्दी साहित्य के काल-विभाजन के साथ समय-समय पर उठने वाली प्रवृत्तियों का भी हवाला दिया। डॉ. शिव कुमार शर्मा ‘हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ’ पुस्तक में लिखते हैं –‘उसने (ग्रियर्सन) अपने ग्रन्थ में काल-विभाजन के साथ समय-समय पर उठी हुई प्रवृत्तियों का भी दिग्दर्शन करा दिया है। अतः ग्रियर्सन का प्रयास अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित व वैज्ञानिक है।’  साथ ही उनके द्वारा दिया गया –‘चारण काल’ और ‘रीति काव्य’ उनके प्रवृत्यात्मक नामकरण का ही उदाहरण है। किन्तु यह भी स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि उन्होंने सिर्फ प्रवृत्तियों के आधार पर काल विभाजन नहीं किया था बल्कि उनके साहित्य के इतिहास में काल-विभाजन के अनेक आधार थे। किन्तु इससे यह इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने ‘प्रवृत्ति’ को सही मायने में साहित्य के इतिहास को जानने के सन्दर्भ में प्रयुक्त किया था।   
उनके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने साहित्य-इतिहास ग्रन्थ में काल-विभाजन का आधार ‘प्रवृत्ति’ को ही चुनते हैं। उनके द्वारा दिया गया वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल तथा गद्यकाल प्रवृत्ति का ही परिचायक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने विशेष प्रवृत्तियों में से किसी एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति को आधार बना कर ही काल खंड का नामकरण किया है। साथ ही उन्होंने सिर्फ काल खण्डों का नामकरण प्रवृत्ति के आधार पर नहीं किया बल्कि उनका पूरा का पूरा इतिहास ग्रन्थ ‘प्रवृत्ति की विकास धारा’ का मूल्यांकन करता है। उनका इस तरह का विभाजन काल खंड को प्रवृत्ति के आधार पर समझने के लिए विशेष सहायक है। ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में रामचंद्र शुक्ल जी लिखते हैं –‘प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है।’ फिर उनका यह कहना कि इन्हीं चित्तवृत्ति के भिन्न होने से साहित्य के सृजन में विशेष परिवर्तन आता है। यह स्पष्ट करता है कि साहित्य में प्रवृत्ति का विशेष योगदान है। क्योंकि साहित्य में प्रयुक्त यही भिन्न चित्तवृत्तियाँ लोगों की रुचि का जब हिस्सा बनती हैं और जब उसकी प्रचुरता बढ़ती है, तभी यह प्रवृत्ति का रूप लेती है। अतः रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्यिक प्रवृत्तियों के निर्धारण में युगीन परिस्थितियों को महत्त्वपूर्ण  माना है। इन्हीं की परंपरा को इतिहासकार गणपति चन्द्र गुप्त ने आगे बढ़ाया है। किन्तु गणपति जी, आचार्य शुक्ल की किसी खास प्रवृत्ति पर किसी काल खंड के नामकरण करने के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था किसी भी युग की कुछ प्रमुख प्रवृत्तियों में से किसी एक को आधार बना कर उसका नामकरण करने पर उस काल की अन्य प्रवृत्तियाँ उपेक्षित रह जाती हैं। उनके अनुसार हमें ऐसी पद्धति का अनुसरण करना चाहिए जिसमें तत्कालीन समस्त प्रवृत्तियाँ सहज रूप से समाविष्ट हो सके। क्योंकि एक ही युग में विभिन्न प्रकार की कृतियाँ लोक-रुचियों की संतुष्टि के लिए समानांतर रूप से निरंतर चलती रहती हैं जैसे श्रृंगार, भक्ति, वीररस, नीति आदि।
इतिहासकार गणपति चन्द्र गुप्त प्रवृत्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी रखते हैं कि साहित्य के बाहरी ढांचे को रूपात्मक लक्षणों के आधार पर भले ही क्यों न समझा जा सकता हो लेकिन साहित्य की अन्तर्निहित चेतना को प्रवृत्ति के आधार पर ही समझा जा सकता है। साथ ही उनका यह कहना “सोरोकिन जैसे शोधकर्त्ताओं ने वर्ग-विशेष की सूक्ष्म चेतना के आधार पर उसकी सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के विकास को स्पष्ट किया है, वैसे ही साहित्यिक प्रवृत्तियों के विकास की भी व्याख्या की जा सकती है ”  प्रवृत्ति को लेकर पाठक को एक नयी दृष्टि देने का कार्य करता है।
इतिहासकार गणपति चन्द्र गुप्त की विशेषता यह रही कि आप प्रवृत्ति की विकास यात्रा को स्पष्ट करने के लिए पश्चिमी शोधों का सहारा लेते हैं।  आप चाहते तो काव्यशास्त्रीय चिंतन से प्रवृत्ति को देखने का प्रयास कर सकते थे। किन्तु उनका पश्चिम की ओर मुड़ना समय की आवश्यकता और उसकी गतिशीलता को पहचानने का ही परिणाम रहा है। उनका यह कार्य प्रवृत्ति के लिए सेतु का कार्य करता है। जैसे -“आधुनिक युग के अनेक समाजशास्त्रियों विशेषतः ओस्वाल्ड स्पेंगलर, ए.जे.ट्वायनबी, पी. सोरोकिन प्रभृति ने विश्व-सभ्यता के इतिहास का अध्ययन करते हुए प्रतिपादित किया है कि प्रत्येक जाति (या राष्ट्र) के सामाजिक एवं सांस्कृतिक आदर्शों, प्रेरणाओं एवं प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति उसके साहित्य में होती है; अतः किसी संस्कृति का अध्ययन उसके साहित्य के आधार पर किया जा सकता है।...साहित्य की प्रवृत्तियों के मूल में उससे सम्बंधित संस्कृति की प्रवृत्तियाँ रहती हैं; अतः उसके उद्भव विकास को सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है।”  अतः प्रवृत्ति के अध्ययन के लिए गणपतिचन्द्र गुप्त का ‘हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ अत्यधिक आवश्यक जान पड़ता है। 
गणपति चन्द्र गुप्त जी के शोधार्थी शिव कुमार शर्मा ने भी इन्हीं प्रवृत्तियों के आधार पर ‘हिन्दी साहित्य : युग और प्रवृत्तियाँ ’ नाम से पुस्तक की रचना की है। इसी पुस्तक की भूमिका में गणपति जी इस पुस्तक के सम्बन्ध में लिखते हैं-“प्रत्येक काल की बाह्य परिस्थितियाँ, उनकी आन्तरिक प्रेरणाओं, उसकी महत्त्वपूर्ण  रचनाओं एवं उनकी सूक्ष्म प्रवृत्तियों का स्पष्ट विवेचन इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है।”  अतः इस पुस्तक की विशेषता यह रही कि हिन्दी साहित्य के विकासात्मक और प्रवृत्यात्मक दोनों रूपों को दिखाते हुए प्रतिनिधि लेखकों की समस्याओं को आलोचनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
इसी की कड़ी में ‘हिन्दी साहित्य का प्रवृत्तिपरक इतिहास’ की भी रचना 1994 में  होती है जिसके लेखक डॉ. सभापति मिश्र हैं। इसमें भी प्रवृत्ति के स्वरूप को साहित्य के प्रारंभिक रूप से लेकर आधुनिक गद्य विधाओं तक दिखाया गया है। ऐसे में साहित्य में प्रवृत्ति के विकास को समझने के लिए कुछ इतिहास की पुस्तकों को देखना अनिवार्य हो जाता है। प्रवृत्ति को समझने में सचमुच हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों का महत्त्वपूर्ण  योगदान है। 
निष्कर्ष के रूप से कह सकते हैं कि साहित्य के क्षेत्र में प्रवृत्ति ही ऐसी चीज है जो किसी काल खंड की विशेषताओं को अपने में समाहित किये हुए होती हैं। यह प्रवृत्तियाँ  समाज और इतिहास से निरपेक्ष नहीं होती हैं। इसलिए समाज और इतिहास में घटित घटना व्यापार के साथ साहित्य का अभिन्न सम्बन्ध होता है। इस रूप में देखा जाये तो कविता से इतर उपन्यास आधुनिक समाज, इतिहास और लोक को अपने भीतर व्यापकता से समाहित किये हुए हैं। लोक और समाज की बदलती हुई तस्वीर और उसका मिज़ाज ही दूसरे रूप में प्रवृत्ति है।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
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8. हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति संस्करण, 2015
9. हिंदी साहित्य का इतिहास, सं.- डॉ. नगेन्द्र, डॉ. हरदयाल, मयूर पेपरबैक्स, नई दिल्ली, छियालीसवां पुनर्मुद्रण संस्करण -2014
10. हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास (प्रथम खंड), गणपति चन्द्र गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, आठवां संशोधित संस्करण, 2007
11. हिंदी साहित्य का प्रवृत्तिपरक इतिहास, डॉ. सभापति मिश्र, विनय प्रकाशन, कानपुर, प्र.सं.-1994
12. हिंदी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ, डॉ. शिव कुमार शर्मा, अशोक प्रकाशन, नई दिल्ली, बीसवां संस्करण -2012
13. http://www.dictionary.com/browse/trend?s=t
14. https://www.vocabulary.com/dictionary/trend
15. www.Vle.du.ac.in/mod/book/view.phd?id=ggoo&chapterid=16146 

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