चैतन्य महाप्रभु की भक्ति का बंगला साहित्य पर प्रभाव

कुमुद बाला

कुमुद बाला

चैतन्य महाप्रभु का जन्म उस समय हुआ जब समस्त देश में राजनीतिक अशांति फैली हुई थी। देश विषम परिस्तिथियों से जूझ रहा था और यह वह समय था जब कई धर्मों का समावेश हो रहा था। कुछ लोगों पर धर्म का काफी दबाव था अर्थात जबरन  धर्म थोपा जा रहा था। इनका जन्म 18 फरवरी 1486 ईसवी में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप [नादिया] नामक ग्राम में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण के घर में हुआ था। इनका जन्म संध्या काल में सिंह लग्न में चंद्रग्रहण के समय हुआ था। उस समय शुद्धि की कामना करने के लिये लोग हरिनाम जपते हुए गंगा स्नान करने जा  रहे थे। विद्वान् ब्राह्मणों ने उनकी जन्मकुंडली के ग्रहों की दशा और उपस्थित शगुन का फलादेश करते हुए यह भविष्यवाणी की कि यह बालक जीवनपर्यन्त हरिनाम का प्रचार करेगा। बाल्यावस्था में इनका नाम विश्वम्भर था, किन्तु सभी इन्हें निमाई कह कर पुकारते थे, क्योंकि ऐसा लोग कहते हैं की वे नीम के वृक्ष की छाँव तले मिले थे। गौरवर्ण का होने के कारण लोग इन्हें गौरांग, गौर हरि, गौर सुन्दर इत्यादि भी कहते थे। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र एवं माता का नाम शचि देवी था। बचपन में ही इनके पिता का देहांत हो गया था एवं जब वे पितृकृत्य करने गए तो वहाँ इनका ईश्वरपुरी से साक्षात्कार हुआ। बहुत कम आयु में ही निमाई न्याय एवं व्याकरण में पारंगत हो गए थे। वे बाल्यावस्था से ही भगवत्चिंतन में लीन रहकर श्री राम व कृष्ण का स्तुति गान करने लगे। पंद्रह साल की बाल्यावस्था में इनका विवाह लक्ष्मीप्रिया के साथ हुआ किन्तु 1505 ईसवी में सर्पदंश से पत्नी की मृत्यु हो गयी। वंश चलाने की मजबूरी के कारण इनका दूसरा विवाह नवद्वीप के राजपंडित सनातन की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ हुआ। मात्र चौबीस वर्ष की आयु में ही इन्होंने गृहस्थ धर्म का त्याग कर श्रीपाद केशव भारती से दीक्षा लेकर संन्यास ग्रहण कर लिया। भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति में उनकी तन्मयता देखकर सर्वप्रथम नित्यानंद प्रभु एवं अद्वैताचार्य महाराज इनके शिष्य बन गए। इन दोनों ने निमाई के भक्ति आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की और अपने इन दोनों शिष्यों के सहयोग से ढोलक, मृदंग, झांझ, मंजीरे इत्यादि वाद्ययंत्रों को बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गा कर हरिनाम संकीर्तन करना प्रारम्भ किया तथा 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे। हरे राम, हरे राम, राम-राम, हरे-हरे।' यह अट्ठारह शब्दीय [बत्तीस अक्षरीय] कीर्तन महामंत्र निमाई की ही देन है। इसे 'तारकब्रह्महा मन्त्र' का नाम दिया गया जिसे कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार हेतु प्रचारित किया गया और अब उन्हें चैतन्य महाप्रभु के नाम से जाना जाने लगा।

                               अपने भ्रमण में वे नवद्वीप, शांतिपुर आदि अनेक स्थानों पर गए एवं वे अपनी भक्ति में लीन होकर जहाँ भी गए, साधारण जन-मानुष को प्रभावित करते चले गए। अपने व्यापक देशाटन एवं तीर्थाटन के फलस्वरूप इन्होंने सब  दिशाओं में सार्वजनिक भक्तिधर्म का प्रचार  और प्रसार किया।गुरु शंकराचार्य ने अपने जीवन की यात्रा दक्षिण भारत से शुरू की, यहाँ तक कि गुरु गोरखनाथ ने भी अपनी यात्रा दक्षिण भारत से शुरू की परंतु निमाई महाप्रभु ने उत्तर से दक्षिण की तरफ प्रस्थान कर समूचे जन-समूह को भाव-विभोर कर दिया। वे जहाँ भी गए, सभी उनके शिष्य बनते चले गए। श्री रामकृष्ण परमहंस की आज्ञा लेकर स्वामी विवेकानंद ने भी महाप्रभु के पदचिन्हों पर चलकर धर्म एवं हिन्दुत्व का प्रचार उत्तर से दक्षिण तक करके जन समुदाय को मन्त्र-मुग्ध कर दिया।  इसके बाद महाप्रभु  पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुँचे और मूर्ति देख इतने भाव-विभोर हो गए कि नृत्य की उत्कृष्ट उन्नत अवस्था में वे मूर्छित होकर गिर पड़े। संयोग से वहाँ उपस्थित प्रकाण्ड पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य ने उनकी निःस्वार्थ भक्ति देखकर उन्हें अपने घर ले गए। घर पर शास्त्रार्थ की चर्चा में चैतन्य महाप्रभु ने पंडित को भगवान् के षडभुजरुप का अथाह दर्शन करा दिया। पंडित सार्वभौम उनके शिष्य हो गए और उन्होंने महाप्रभु की शतश्लोकी स्तुति रची जिसे हम सभी आज 'चैतन्य शतक' के नाम से जानते हैं। ओडिशा के सूर्यवंशी सम्राट, गजपति महाराज प्रताप रूद्रदेव ने इन्हें श्री कृष्ण का अवतार माना है और अभी तक उनके वंशज उनके भक्त हैं। भक्ति के वशीभूत होकर वे नीलांचल की तरफ बढे और उसे आगे दक्षिण भारत में श्रीरंग क्षेत्र व सेतुबंध भी गए। 1515 ईसवी में विजयदशमी के दिन उन्होंने वन के रास्ते वृन्दावन की ओर प्रस्थान किया। कहते हैं कि इनके हरिराम उच्चारण से उन्मत्त होकर वन के जानवर, जैसे शेर, हाथी, बाघ इत्यादि भी नृत्य करते साथ चलने लगते थे। कार्तिक पूर्णिमा को ये वृन्दावन पहुँचे और आज भी वृन्दावन में यह दिन महाप्रभु के आगमनोत्सव के रूप में मनाया जाता है।  यहाँ वे इमलीतला एवं अक्रूरघाट पर रहे और फिर प्रयाग होते हुए काशी, हरिद्वार, श्रृंगेरी [कर्नाटक], कामकोटिपीठ [तमिलनाडु], द्वारिका, मथुरा की तरफ चले गए। कुछ दिनों तक इन जगहों पे रहकर वे जगन्नाथपुरी की तरफ प्रस्थान कर गए।

वैष्णव गीतिकाव्य - चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव के कारण बंगला साहित्य खूब पल्लवित एवं पुष्पित हुआ तथा ढाई-तीन सौ वर्षों तक इस पर वैष्णव सम्प्रदाय की अमिट छाप बनी रही। सोलहवीं शताब्दी के लगभग सभी कवियों ने वैष्णव सम्प्रदाय में रहकर ही काव्य का सृजन किया। बंगला साहित्य की यही चिरंतन धारा वैष्णव कवियों के गीतकाव्य से प्रस्फुटित हुई। मैथिल कवि विद्द्यापति की कविता की झंकार एवं मादकता से आकृष्ट होकर बंगला कवि भी वैसी ही कवितायें करने लगे। मैथिल एवं बंगला का यह मिश्रित रूप ही सोलह से अट्ठारहवीं शताब्दी तक काव्य का माध्यम बना। आगे चलकर यही भाषा ब्रजभाषा के नाम से जानी जाने लगी। रविन्द्रनाथ ठाकुर के समय 'मानसिंह ठाकुर की पदावली' की भाषा यही ब्रज भाषा है।

                                 श्री चैतन्य महाप्रभु के ऊपर भी अनेकों साहित्य की रचनाएँ लिखीं गयीं। भक्ति भावना के अत्यधिक प्रबल होने के कारण लोग उन्हें साक्षात् श्री कृष्ण मान बैठे। यद्द्यपि बंगाल में वे चौबीस वर्ष ही रहे किन्तु भक्ति भावना में उन्होंने लोगों को ऐसे सराबोर किया कि वह काल भक्तिकाल का स्वर्णयुग कहलाया। वह ऐसा काल था जब राजनीतिक उलट-पुलट के बीच ही तुलसीदास, कबीरदास, मीराँ बाई जैसे भक्तों का धरती पर आगमन हुआ था और इन्हीं के साथ सूरदास, रसखान जैसे कवियों की रचनाओं के कारण यह काल स्वर्णकाल कहलाता है।

                                 चैतन्य महाप्रभु के ऊपर बंगला में पर्याप्त जीवनी साहित्य की भी रचना हुई जिनमें प्रथम नाम ' गोविन्द दास कमर ' का आता है। इन्होंने  ' कछड़ा ' लिखा जिसका अर्थ है समय-समय पर लिखे गए प्रासंगिक विवरण जिसमें महाप्रभु के जीवन की घटनाओं का एक प्रत्यक्षदर्शी द्वारा किया गया वर्णन है, यह सामग्री बंगला साहित्य में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इनके अतिरिक्त नरहरि सरकार, वंशीनन्दन चट्ट, वासुदेव घोष, गोविन्द, श्यामघन, परमानंद गुप्त आदि भी महाप्रभु की जीवनी के लेखकों में से हैं। अन्य उल्लेखनीय रचनाकारों में से प्रमुख हैं - मुरारी गुप्त, वासुदेव दत्त, मुकुंददत्त, गोविंदाचार्य, रामानंद वसु, और माधवाचार्य इत्यादि। इस चैतन्य युग के तीन श्रेष्ठ कवियों - वृन्दावनदास, बलरामदास और ज्ञानदास के अलावा नयनानंद मिश्र, शिवानंद चक्रवर्ती, बाहुनन्द चक्रवर्ती, उद्धवदास, देवकीनंदन, अनंतराम, चैतन्यदास भी प्रमुख हैं।

                        वैष्णव कवियों को 'पदकर्ता' या 'महाजन' के नाम से जाना जाता था। सोलहवीं शताब्दी के प्रथम भाग के पदकर्ताओं में कृष्णलीला का वर्णन मुरारिगुप्त, लोचनदास, ज्ञानदास इत्यादि के द्वारा अविस्मरणीय, अतुलनीय एवं अद्भुत है। लोचनदास ने 'नचारी' अर्थात हलकी बंगला कविता में विशेष प्रवीणता दिखलाई है। वात्सल्यरस के वर्णन में बलरामदास का नाम सर्वोपरि है। श्री चैतन्य के अनुगृहीत भक्त रघुनाथ पंडित माधवाचार्य ने श्रीमद्भागवत का आलम्बन लेकर 'कृष्ण प्रेम तरंगिणी' नामक काव्य की रचना की, जो वर्णनात्मक शैली में है। माधवाचार्य के शिष्य कृष्णदास ने 'श्री कृष्ण मंगल काव्य' की रचना की,जो उत्कृष्ट ग्रंथों में से एक है।

                           श्री चैतन्य महाप्रभु के अलौकिक जीवन तथा उनकी धार्मिक उपलब्धियों का उनके शिष्यों एवं कवियों ने बहुत ही सुन्दर रूप में वर्णनात्मक प्रस्तुतिकरण  किया है। कविराज कृष्णदास का ' चैतन्यामृत ' केवल उनकी जीवनी ही नहीं अपितु उच्चकोटि  दार्शनिक ग्रन्थ के रूप में भी बंगला साहित्य का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ स्वीकार किया गया है। गोविन्ददास के 'कछड़ा ' में महाप्रभु के दक्षिण भ्रमण का चित्रण है। सोलहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अनेक छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखीं गयीं, जिनमें प्रमुख है ' दुर्लभ संसार ', इस उत्कृष्ट रचना में अनेक नवीनताएँ दृष्टिगत होती हैं। अट्ठारहवीं शताब्दी में महाप्रभु के जीवन पर  पुरुषोत्तम सिद्धान्त वागीश द्वारा रचित 'चैतन्य -चंद्रोदय -कौमुदी ' बहुत लोकप्रिय ग्रन्थ है। इस बात से सभी सहमत हैं कि महाप्रभु ने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा है क्योंकि इसका कहीं प्रमाण नहीं मिलता है। लेकिन उन्होंने आठ पद्यावली  की रचना की है जो गौड़िया वैष्णव शैली में लिखा गया है। एक बार उन्होंने अपने चुने हुए छः शिष्यों से जो वृन्दावन में रहते थे, कहा था कि वे सभी भक्ति काव्य को इस तरह लिखे कि उनकी शैली और ग्रन्थ लोगों के लिए उदहारण बन जाए। वे छः शिष्य थे --रूपा गोस्वामी, सनातन गोस्वामी,, गोपालभट्ट गोस्वामी, रघुनाथभट्ट गोस्वामी, रघुनाथदास गोस्वामी एवं जीवा गोस्वामी। इन छः शिष्यों ने लेखनी को गौड़िया वैष्णव शैली के अनुरूप लिखकर इस शैली को भी चैतन्य महाप्रभु की तरह अमर बना दिया। अट्ठारहवीं शताब्दी में इनके शिष्य कलाचंद विद्यालंकार ने भी ग्राम-ग्राम घूमकर प्रवचन देना शुरू किया और वे सबसे पहले बंगाल में प्रचार करने लगे। उन्होंने श्रीकृष्ण संकीर्तन के साथ-साथ ' पंक्ति भोजन ' की पद्दति की शुरू की। इनकेसाथ गीताश्री छवि बंद्योपाध्याय एवं राधारानी देवी का नाम भी सामने आता है जिन्होंने दलित समाज को भी अपने साथ जोड़ा, जो उस काल के लिए नयी पहल थी। उन्होंने  संगीत कीर्तन को नयी दिशा दी साथ ही निमाई के आदर्शों को अलग रूप में प्रस्तुत किया। आज भी यह संप्रदाय चर्चित है और कालाचंदी संप्रदाय के नाम से  जाना जाता है जिसका एकमात्र ध्येय है जाति -पांति से अलग हटकर एक नए समाज की स्थापना कर श्रीकृष्ण के गुणों एवं निमाई की भक्ति का प्रचार-प्रसार करना। सन्देश --

1. श्रीकृष्ण हीअमोघ  सत्य हैं।
2. श्रीकृष्ण ही अनंत दिव्य पुंज हैं।
3. रासमहासमुद्र के प्रणेता श्रीकृष्ण हैं।
4. जीवात्मा श्रीकृष्ण से निकलती एवं उन्हीं में समा जाती है।
5. धरा पर जन्म लेने के कारण जीव  धरात्मिक होती है मगर एक डोरी से वह श्रीकृष्ण के साथ बंधी होती है।
6. श्रीकृष्ण से अलग जीवात्मा की कोई गति नहीं है।
7. आत्मा, परमात्मा और यह जगत, ये तीन अलग तथ्य  हैं।
8. दृढ एवंअमोघ भक्ति ही जीव का लक्ष्य है।
9. जीव का लक्ष्य है श्रीकृष्ण से निर्मल प्रेम।
10. श्रीकृष्ण का प्रेमाशीर्वाद ही सफल तीर्थ है।

  श्री चैतन्य महाप्रभु की जीवनी किसी चमत्कार से कम नहीं है क्योंकि अपने जीवन में ही वे श्री कृष्ण के अवतार के रूप में पूज्य हो गए थे और समूचे भारत वर्ष में भक्ति का ऐसा डंका बजा, जिसने महाप्रभु को अमर बना  दिया। यह सत्य है कि जो फ़रिश्ते होते हैं, वे अल्पायु होते हैं। महाप्रभु ने भी जगन्नाथपुरी में स्वर्गद्वार के समीप पंद्रह सौ तैंतीस ईसवी में स्वयं को दिव्य पुंज में सैंतालीस वर्ष की अवस्था में ही लीन कर लिया। 

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।