कविताएँ: नीरव

- राजेश दीक्षित 'नीरव'

कुलपति: रेनेसां विश्वविद्यालय, इंदौर
कविताओं की एक पुस्तक 'मुझे ईर्ष्या है समुद्र से ' प्रकाशित, नियमित ब्लॉग लेखन, आकाशवाणी इंदौर से रचनाओं का सतत प्रसारण, वर्ल्ड डिग्निटी यूनिवर्सिटी की एजुकेशन टीम का सदस्य
डॉ धर्मवीर भारती के साहित्य पर एम.फिल. एवं पी-एच.  डी.
चलभाष: +91 982 603 1284


1. आसान नहीं है

आसान नहीं है
एक स्वतंत्र स्त्री के साथ रहना
उसकी चाल-ढाल
उसके विचार-आचार
क्रियाकलाप और
मानसिक दृढ़ता को सहना
उसकी बातें, रंग-ढंग
तुम्हे रास नहीं आयेंगे
बल्कि
करेंगे चोट तुम्हारे पुरुष पर
तुम्हें नुकसान पहुचायेंगे

तुम्हे तलाश है जिस आदिम स्त्री की
वैसे स्त्रियोचित गुण उसमे
यदा-कदा ही नजर आयेंगे
ज्यादातर तो
एक लड़ाका किंवा विजेता के
हावभाव और लक्षण ही
दिखेंगे, तुम्हें उकसायेंगे

एक आजाद औरत
तुम्हे हीनता से भर देगी
तुम्हारे परंपरागत विश्वासों को
ध्वस्त कर देगी
वो कुछ भी तुम्हें
पुरुष होने भर से नही लेने देगी
तुम्हारे भीतर एक
शाश्वत योद्धा भाव भर देगी
उसके साथ
तुम्हें कुछ भी न मिलेगा बिना संघर्ष के
वो प्राकृतिक संघर्ष के बुनियादी सिद्धांतों को
एक नया अवतार, नया स्वर देगी

वह तुम्हारी  कोमलता को गहेगी
किन्तु अपनी इच्छा से
कठोरता का भी वह पूर्ण सम्मान करेगी
वो चाहेगी तुम्हें मन -प्राण से
तुम्हारी खातिर कोई भी बलिदान खुशी-खुशी देगी
बस चोट न पहुँचे
उसके स्वाभिमान पर
वो जीवन भर
हर दुख-तकलीफ सह लेगी
उफ़ न करेगी किसी परेशानी में
अगर तुम किसी संघर्ष में रत होगे
वो रक्षा-कवच बन तुम्हे गह लेगी
उसके साथ रहते तुम कोई जंग लड़ो
वो महानायक बना तुम्हें
जीत-हार से ऊपर कर देगी

स्वतंत्र स्त्री के साथ जीने के लिए
तुम्हें प्यार करना होगा
नहीं आता तो सीखना होगा
और यह भी कि
हमेशा प्यार करना ही काफी नहीं होता
मुक्त रखना भी सीखना होगा

आसान नहीं है
किसी स्त्री के साथ जीवन
तुम्हे स्वतंत्र स्त्री के साथ पुरुष बनकर नहीं
इंसान बनकर जीना होगा
उसे फ़क़त औरत की बजाय
माँ, प्रेयसी,पत्नी ,बहन,भाभी,बुआ,मौसी
गालिबन हर किरदार में देखना होगा
देखना होगा कि हर किरदार
वह अलग खूबी से निभाती है
उसे दोस्त का दर्जा देकर देखो
देखो ! वो तुम्हें भी अपना हमराज बनाती है

स्वतंत्र औरत
रोशन ख्याल  होती है
कम मुहब्बत में चला लेगी काम
मगर, एहतराम
वह बराबरी से चाहती है


2. राक्षस 
(काश! यह केवल कार्पोरेट कथा होती )

कितना मासूम होगा वह शख्स
बसती हो जिसकी जान एक तोते में
बलिष्ठ होगा हाड़- माँस में मगर
दिल होगा उसका मक्खन- सा
फिर क्यूँ कहलाया होगा वह राक्षस ?
कहीं ऐसा तो नहीं कि
उसका तोता भा गया हो
किसी नकचढ़े, जिद्दी राजकुमार को
राजा ने कहा हो मंत्री को ,और
मंत्री ने दिखाने को वफ़ादारी अपनी
पिटवा दी है  डोंडी तोते को लाकर देने की
तोते का मालिक/प्रेमी बचाने को जान तोते की
भाग गया हो सुदूर जंगलों में
तभी से कहलाने लगा हो जंगली ,और
जंगल में रहते आदमी को प्रचारित
करना होता है आसान कि वह है राक्षस
......
तोड़ दो गर्दन तोते की
तो मर जाएगा राक्षस
कहानियों में दादी -नानी बताती थीं
मर जाता था राक्षस मरोड़ते ही
गर्दन तोते की तत्क्षण
और अंत में राजकुमार राजकुमारी से
कर लेता था ब्याह, जीती जो जाती थी
उस कहानी में न जाने क्यूँ मजा नहीं आता था
सब क्षेपित कल्पनाओं के बावजूद
एक भोला सा राक्षस सपनों में आता था
बोलता कुछ न था, बस टुकुर -टुकुर देखता जाता था
नींद उचट जाती थी मेरी, रोना आता था
...........
आज भी जब किसी राक्षस की
मौत की खबर देखता -सुनता हूँ
तो सोचता हूँ अक्सर खामखयाली में
क्या सचमुच वह रहा होगा राक्षस
या एक तोते की खातिर उसे घोषित
कर दिया होगा व्यवस्था के राजकुमारों ने
या उनके वफादारों किंवा दलालों ने
............
तब के मुकाबले आज तो कितना सरल है
किसी प्यार करने वाले को राक्षस बनाना
तब के मुकाबले कितना कठिन है आज
किसी तोते में अपनी जान बसाना
कितना आसान है आज तब के मुकाबिल

जंगलियों को जंगल से मार भागना


3. पराली

आग
लगी हुई है खेतों में
इन दिनों

फसल देने के बाद
हर बार
जलन-तपन  भी करनी पड़ती है
सहन
..............
मुझे खेतों में अपनी मुहब्बत दीखती है


4. ये लेखक के निजी विचार हैं

विरोध करना लोकतंत्रीय मूल्य है
प्रतिरोध होना चाहिए प्रजातंत्र में
दूसरे पक्ष को भी मौका देना चाहिए
यह सब कहने को अच्छा है
लेकिन यदि कोई सच में ऐसा करता है
तो ये उसका निजी कृत्य है
अपने कृत्य के लिए वह स्वयं ज़िम्मेदार है
ये उसका निजी विचार है

शासन सर्वोच्च है, सत्ता नियामक
राजा कभी मरता नहीं, डरता तो बिलकुल नहीं
राजतन्त्र नहीं है, राजा तो है
ये बातें प्रासंगिक नहीं
किन्तु कोई इसको नकारता है
तो यह उसका निजी विचार है

प्रत्येक फरमान में जनता की भलाई है
न सोचो यह तो नादिरशाही है
राजधानी नहीं अब तो दरबार बदलता है
फैसलों को तुगलकी कहने की मनाही है
लेकिन फिर भी कोई ऐसा करता है
तो यह उसका निजी विचार है

बिकता नहीं कोई अब समन्वय होता है
सब ठीक हो तो आपस में विलय होता है
राष्ट्रहित में कड़े फैसले लिए जाते जाते है
देश के लिए महागठबंधन होता है
परदे के आगे देखो, पीछे देखना मना है
मूक सहमति या वाचाल प्रतिस्पर्धा
सच को समझो भले, उसे कहना मना है
फिर भी अगर कोई ऐसा करता है
तो यह उसका निजी विचार है

कुछ शब्द कोश से बहिष्कृत हैं
क्यूँकि  तंत्र के वे आड़े आते है
कुछ के अर्थ का हुआ विस्तार है
गोकि वे सत्ता को भाते-सुहाते है
ये नए शब्दकोश सहज उपलब्ध हो जाते हैं
फिर भी कोई  भाषा की अस्मिता को रोये
ये देश को नहीं अंगीकार है

निज लाभ-हानि का वह स्वयं ज़िम्मेदार है
ये उसका निजी विचार है।

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