हिमालय और हडसन के बीच: एक आंतरिक भ्रमण-पथ पर

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

"आरम्भ में हम भ्रमण पर निकलते हैं स्वयं को खो देने के लिये; अंतत: हमारा भ्रमण होता है स्वयं को पाने के लिये।" - पिको अय्यर

"यथार्थ कभी अर्थपूर्ण नहीं होता जबकि कोई लेख या कथा अक्सर अर्थपूर्ण हुआ करते हैं।" - एल्डुअस हक्सले


एल्डुअस हक्सले का यह कथन इस लेख के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। जीवन से जुड़े यथार्थ के बीहड़ मे बहुत कुछ गुंथा है जिसमें फँसे-उलझे ताने-बाने अर्थ का अनर्थ भी कर सकते हैं जबकि किसी लेख या कथा में सारा दृश्य लेखक के नजरिये से होकर हमारे सम्मुख आता है और हमें घटनाक्रम स्पष्ट दिखायी देता है। मानव का वैचारिक-सांस्कृतिक-विकास एक दीर्घकालीन जटिल प्रक्रिया का निष्कर्ष है और उसपर सार्थक चर्चा अनुमानित आधार पर ही हो सकती है। इस वैचारिक विकास यात्रा में कुछ विशेष घटनाक्रम रचनाकार के नजरिये से ही हमें दीख पाते हैं जो विशेष संदर्भों में भविष्यपथ निर्धारण मे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में एक जागरूक पाठक के नाते हमें अपनी ओर से सावधानी से आगे बढ़ना होता है। वैचारिक-विकास-यात्रा के ऐसे ही एक प्रसंग की चर्चा यहाँ पर करने का प्रयास है जिसका एक छोर भारतीय भूभाग में है तो दूसरा अमेरिका के उत्तर-पूर्वी भूभाग में।

शब्दावली: भ्रमण-पथ (हाइकिंग ट्रेल्स के स्थान पर), अंदरूनी भ्रमण-पथ, निजेतर (ट्रान्सेन्डेन्टल), बॉस्टन ब्राह्मण, उभयचर, यिन-यांग द्वैत, पारिस्थितिकी (इकॉलाजी)-भौतिक एवं वैचारिक, निजेतर पर्यावरणीय चिंतन, अंधा-युग, वर्णपट मनोविज्ञान (स्पेक्ट्रम सायकोलाजी)।



एक विशिष्ट सांस्कृतिक विकास यात्रा

लगभग ढाई-तीन हजार साल पहले हिमालय व उसके निकटवर्ती भूभाग में एक दर्शन व चिन्तन पल्लवित हुआ था। पिछली कुछ सदियों में हडसन वादी  व एपलेशियन ट्रेल के  उत्तरी भूभाग में  आज के अमेरिका की पहचान पल्लवित हुई।  दोनों में भौगोलिक व ऐतिहासिक विराट दूरियों व असमानताओं के बावजूद कुछ है जो एक सूत्र से उन्हें जोड़ता है और मानव की भावी वैचारिक-विकास-यात्रा में सार्थक योगदान दे सकता है। प्रस्तुत लेख में उसी सूत्र की हलकी सी झलक देने का प्रयास है।

हिमालय और हडसन वादी
न्यूयार्क के उत्तर में स्थित हडसन वादी अपने भ्रमण पथों (हाइकिंग ट्रेल्स) के लिये मशहूर है और एक सामान्य दैनिक भ्रमण के लिये लगभग आदर्श। यह मेरा सौभाग्य था कि लगभग दस वर्षों के अंतराल में  कई बार मुझे वहाँ जाने का  अवसर मिला. बेटी के  आग्रह और निमंत्रण पर न्यू जर्सी में तीन चार महीने के प्रवास के दौरान मेरा किशोरावस्था का शौक जैसे पुनर्जीवित हो उठा और मैंने भी अवसर का भरपूर लाभ उठाया. उत्तराखंड के कुमाऊं  अंचल के अपने पद-भ्रमण के दौरान मुक्तेश्वर, बिनसर और  कौसानी के निकटवर्ती क्षेत्रों में जिस दोहरे भ्रमण का अनुभव किया था वह समय के साथ धूमिल नहीं हुआ। मुझे याद हैं वे दिन और वे बातें जो तब और बाद के वर्षों में भी मुझे आन्दोलित करती रहीं थीं [1]। पिको अय्यर का उपर्युक्त उद्धरण भ्रमण के अंतिम चरण में जिस ‘स्वयं को पाने’ का जिक्र  करता है उसमें अनायास ही अंदरूनी भ्रमण शामिल हो जाता है। ऐसे अवसरों पर अनायास ही मेरा मन अतीत की उन बातों में खो जाता जो आज से दो या तीन हजार साल पहले हमारे पूर्वजों के मन को भी आन्दोलित करती रही होंगी:
“ऐ आबे रोद गंगा वह दिन है याद तुमको उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा”।[2]

वह कारवाँ उतरा और बस गया इस जमीन पर; प्रकृति का बाहुल्य और कल्पनाशील जिज्ञासु तथा कृतज्ञ मन का संकल्प था कि कालान्तर में यहाँ पल्लवित हुई  एक संस्कृति जो प्रकृति के साथ समन्वय के प्रयासों को अतिरिक्त बल देती रही, साथ ही उन बातों पर भी  जो महज जिन्दगी जी लेने की भावना से जरा हटकर थी और आज से तीन हजार साल पहले के उस काल में भी गहन मानवीय अनुभूति के स्वर झंकृत करने में सक्षम थीं। कई  अवसरों पर यही अनुभव काव्यमय भाषा में उद्भाषित होते गये। पुराणों व उपनिषदों में चित्रित वे अनुभव आज भी यहाँ की धरोहर हैं फिर चाहे वह नासदीय सूत्र में चित्रित सृष्टि के आरम्भ का सहज यथार्थपरक चित्रण हो या मन की विभिन्न स्थितियों का सहज आकलन जो विभिन्न उपनिषदों में स्पष्ट दिखायी देता है।

जीवन और विचारों की विविधता के प्रति  एक सहज स्वीकारी भाव, चिन्तन के स्तर पर ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ व ‘या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते’ जैसे उदात्त विचारों की स्वीकारोक्ति इस सभ्यता को एक पहचान देने में सफल हो सकी जिसे  आज भी हम स्पष्ट देख सकते हैं। साथ ही यह भी स्वीकारना आवश्यक होगा कि वैचारिक स्तर पर प्रदर्शित यह स्वीकारोक्ति सदा हमारे आचरण में नहीं परिलक्षित हो पायी और कथनी तथा करनी के बीच एक अंतर भी दीखता रहा जो आज भी दीख जाता है। अक्सर हम चीजों को श्वेत-श्याम के सरलीकृत प्रारूपों से देखते आये हैं जबकि सच तो यह है कि जीवन में श्वेत और श्याम के मध्य अनगिनत रंग उभरते हैं जो जीवन-यथार्थ को अधिक वास्तविकता से चित्रित कर सकते है्ं। सब मिलाकर इतना तो कह सकते हैं कि इस भूभाग में सर्व-स्वीकारी भाव तथा वैविध्य की वैचारिक स्वीकृति आंशिक रूप में फलीभूत हो सकी।

इस सबके बावजूद इतिहास की एक झलक काफी है यह समझने के लिये कि अपेक्षाकृत माहौल यहाँ वैविध्य की स्वीकृति का बना रहा। सभी जगह प्रताड़ित व ठुकरायी गयी जातियाँ इस धरती पर बेखौफ रह सकीं। कुछ अपवाद स्वरूप स्थितियों को छोड़ इस माहौल की विशेषता थी कि बाह्य जगत के साथ अंदरूनी जगत को साधने की दिशा में भी प्रयास होते रहे। ऐसा नहीं कि सब कुछ कल्पित  आदर्श के अनुरूप था जैसा कुछ लोग अक्सर सोचते व चर्चित करते रहे हैं। सांस्कृतिक विकास स्वयं एक जटिल प्रक्रिया का निष्कर्ष है जो विविधता को आत्मसात करने की प्रक्रिया में और भी जटिल तथा अस्पष्ट हो सकता है और ऐसा हुआ भी है।

जीवन व विचारों की विविधता के लिये एक स्वीकारी भाव भले ही ठोस यथार्थ के धरातल पर कुछ लड़खड़ाया जरूर पर अन्य सांस्कृतिक धाराओं की तुलना में कुछ तो विशेष नजर आता है और इतिहास पर नजर डालें तो साफ दिखायी देता है कि यह सर्व-स्वीकारी भाव इस भूभाग में उपजी संस्कृति की शक्ति का आधार बना और कुछ हद तक उसकी कमजोरी का भी। संसार में पूरे इतिहास पर नजर डालें तो साफ दिखायी देता है मानव की पाशविक प्रवृत्तियों का नग्न प्रदर्शन – जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात, युद्धों का अनवरत क्रम, दासता की बेड़ियाँ, उपनिवेशवाद का लम्बा अंतराल और देश की सीमाओं के अंदर भी अपने ही लोगों पर दमन व शोषण का कभी न थमने वाला चक्र। पर साथ ही एक हल्की सी किरण भी यह आभास देती कि इस उन्माद के इतर भी कुछ है जो इन सबका स्वस्थ विकल्प बन सकता है और जिस पर हर एक को विचार करने की जरूरत है। यह भी कि यह प्रकाश-किरण हर देश-काल में मनीषियों, विचारकों के मन में विद्यमान थी और समय-समय पर उनकी वाणी से प्रस्फुटित होती रही थी।

मानव का उभयचर अस्तित्व
मानव के अस्तित्व का अविभाज्य अंग है उसका उभयाचरण। एल्डुअस हक्सले मानव के  उभयचरीय अस्तित्व का जिक्र करते हैं जो मानव की दो अलग प्रवृत्तियों से जुड़े द्वैत का आधार है: पहला - अन्य जीवों की ही तरह अपने जीवन की सुरक्षा व भोजन के लिये संघर्षरत रहना जिसे हम उसका स्वायत्त अस्तित्व कह  सकते हैं और दूसरा मात्र निजी संदर्भों से हटकर शेष जगत के लिये विचारशील जीवन।  इसे मानव के समष्टिपरक अस्तित्व की संज्ञा दी जा सकती है। ये दोनों बातें हर व्यक्ति में विद्यमान जरूर हैं पर समान रूप से नहीं। यह भी कहना होगा कि मुख्यत: स्वायत्त रूप ही प्रभावी रहा करता है अधिकतर लोगों में।

मैं तुलनात्मक संदर्भ में हिमालय व हडसन वादी के भ्रमण पथों की बात कर रहा  था और दोनों ही संदर्भों में बात थी दोहरे भ्रमण की – बाहरी व अंदरूनी पथों पर – लगभग साथ-साथ। राबर्ट पीरसिग की अत्यंत रोचक पुस्तक ‘जेन एण्ड आर्ट आव मोटरसायकिल मेन्टेनेन्स’ [3] में ऐसे ही दोहरे भ्रमण का विशद वर्णन है जहाँ जीवन व उसकी गुणवत्ता से जुड़े सवालों पर दार्शनिक विवेचन व मोटर सायकिल के रखरखाव से जुड़े यथार्थपरक दैनिक जीवन के मसले लगभग साथ चलते हैं। और सच देखा जाय तो किसी भी विचारशील व्यक्ति के जीवन में ऐसे पल आते ही रहते हैं जीवन से जुड़े द्वैत को संतुलित करने के प्रयासों के साथ।

हिमालय और हडसन वादी के भ्रमण के दौरान मुझे कुछ रोचक एवं आकर्षक सूत्र नजर  आये जो दोनों स्थानों की विराट दूरियों व असमानताओं के बावजूद उन्हें एक बारीक सूत्र से जोड़ते  नजर आते हैं।

अमेरिकी ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट
यूरोप से चला एक कारवाँ हडसन के किनारे व निकटवर्ती भूभाग में उतरा था करीब पाँच शताब्दी पहले। यह लगभग वही समय था जब यूरोपीय उपनिवेशवाद समुद्री अभियानों के जरिये अपने पाँव पसारने का प्रयास कर रहा था। उद्देश्य वही था जो  आमतौर पर मानव इतिहास का अभिन्न अंग रहा है शक्ति प्रदर्शन, युद्ध, उपनिवेशवाद व शोषण। पर दीर्घ अंतराल में उसके इतर भी बहुत कुछ था और है जो भविष्य के लिये दिशा-निर्धारण में सहायक हो सका। गंगा के किनारे जो कारवाँ उतरा था तीन-चार हजार साल पहले और हडसन के निकटवर्ती क्षेत्र में जो उतरा था महज चार या पाँच सदी पहले – दोनों में देश-काल के विराट अंतर के बावजूद कुछ है जो सारगर्भित है बशर्ते उसे समझा व परखा जाय और उससे भविष्यपथ निर्धारण में संभावित मदद ली जाय।

अमेरिकन ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट नाम से एक छोटा पर महत्वपूर्ण प्रयास उपजा और पनपा था उन्नीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों में [4]। इसकी खासियत यह थी कि कुछ विचारकों ने एक सर्वथा विभिन्न देश-काल में वैचारिक स्तर पर किये जाते रहे प्रयासों को समझा और सारी विषमताओं के बावजूद उन्हें स्वीकार करने में वे झिझके नहीं। इसमे मुख्य व आरंभिक भूमिका थी राल्फ वाडो एमर्सन की, अन्य विचारक जो इस प्रयास में भागीदार थे उनमें हैनरी डेविड थरॉ, मैलविल, मारग्रेट फुलर, ह्यूथौर्न प्रमुख थे। डेल रीप ने  अपनी पुस्तक [5] में कहा है: ‘एमर्सन के आरंभिक वर्षों से ही अमेरिका में भारतीय चिन्तन के प्रति खास लगाव रहा है’। यह बात खास महत्व की है कि देश व काल में  एकदम असम्पृक्त व अलग-थलग लोगों के बीच निजेतर संदर्भों से जुड़े मसलों पर एक गहन समझ व स्वीकृति का भाव दिखायी देता है जो संभवत: इतिहास में कम ही संभव हुआ है।

स्वयं  एमर्सन का कथन ध्यान में रखने योग्य है कि कैसे भारतीय चिंतन में निजेतर संदर्भों की यह झलक सदियों तक भारत के निकट सम्पर्क में रहते अंग्रेजों को नजर नहीं आ सकी। पर इन्हीं के वंशज जो न्यू इंगलैन्ड क्षेत्र में बसे जिन्होंने नवोदित राष्ट्र की आधारशिला रखने में मुख्य भूमिका निभाई, भारत के निकट सम्पर्क की अनुपस्थिति में भी उस सूत्र को पहचान सके [6]। अमेरिका के महत्वपूर्ण संस्थानों  और संस्कृति के विकास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट भी इन्ही के प्रयासों से पल्लवित हुआ। संभवत: कुछ इन्हीं कारणों से इस क्षेत्र के संभ्रांत व उच्च वर्ग के लोग बॉस्टन बाह्मण कहलाने लगे।

यिन-यांग द्वैत
भारतीय चिन्तन में निहित निजेतर संदर्भ एक सर्वथा अप्रत्याशित स्थान पर पल्लवित हो गया यह बात समझने के लिये मैं चीनी चिन्ंतन में बहुचर्चित यिन-यांग द्वैत का जिक्र करना चाहूंगा। आमतौर पर द्वैत दो विरोधी प्रवृत्तियों को साथ लेकर चलने से उत्पन्न स्थिति को इंगित करता है। यिन-यांग द्वैत भी कुछ वैसा ही है पर चीन में इसका जिक्र अलग व आकर्षक तरीके से किया गया है। मोटे तौर पर यांग पुरुष प्रवृत्ति है और यिन नारी प्रवृत्ति, एक प्रकाश का द्योतक है तो दूसरा अंधकार का। पर सही बात यह समझने की है कि दो विरोधी प्रवृत्तियों को दर्शाते हुए भी उनके मध्य एक विशेष प्रकार का गतिज संतुलन रहता है जो एक के बाद एक प्रभावी होता रहता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक  का बीज दूसरे में निहित रहता  है। जब यिन  बढ़ता है तब यिन में निहित यांग बीजरूप छुपा होते भी महत्वपूर्ण है जो समय  आने पर प्रकट हो जाता है और धीरे धीरे प्रभावी होता जाता है। कुछ भारतीय चिन्तन में निहित द्वैत की तरह मुख्य बात दो विरोधी प्रवृत्तियों के बीच संतुलन की नहीं  अपितु दो पूरक प्रवृत्तियों के बीच समन्वय पर आ जाती है। इस तरह पूर्वी चिन्तन में पूरकत्व विरोध की जगह स्थापित हो जाता है। अगर गौर से देखें तो सारी मानव प्रवृत्तियों के विकास में मूलभूत समानता है भले ही किसी समय विशेष में दो स्थानों पर विकसित संस्कृतियों में अंतर दीखता हो। यह भी जानने योग्य है कि मानव के वैचारिक विकास में कितना अंतर वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से हुआ होगा  और कितना ऐतिहासिक संदर्भों से।

हिमालयी और हडसन-एपलेशियन ट्रेल्स
हडसन वादी में न्यूयार्क के उत्तर में बियर पर्वत के पास से होकर गुजरती एपलेशियन ट्रेल से होकर भ्रमण के दौरान मेरा मन अनायास  जा पहुँचता है ट्रेल के उत्तरी छोर  के निकट। एपलेशियन ट्रेल लगभग 3,200 किलोमीटर  लम्बी है जिसका एक छोर जार्जिया राज्य में है तो दूसरा सुदूर उत्तर में न्यू इंग्लैन्ड क्षेत्र के मेन नामक प्रदेश तक। यह वही जगह है जहाँ आज की अमेरिकी संस्कृति का आधारभूत ढाँचा पल्लवित हुआ और उसने अपनी कई खामियों के बावजूद वैचारिक स्तर पर एक प्रतिबद्धता प्रदर्शित की जो लगभग तीन हजार सालों के इतिहास में संभवत: कुछ ही बार हुआ है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका एक महाशक्ति के रूप में स्थापित हो गया। इसके पहले की चार सदियों का इतिहास मुख्यत: यूरोपीय उपनिवेशवाद का इतिहास रहा था और उसी तर्ज पर चलते यह संभव था कि यह नयी महाशक्ति  पहले की उपनिवेशवादी परम्परा का पालन कर अपने उपनिवेश स्थापित करे  और उनसे उसी तरह व्यवहार करे जैसा ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों ने किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और जो हुआ उसके निर्धारण में एपलेशियन ट्रेल के उत्तरी छोर में स्थित इस अमेरिकी भूभाग का बड़ा योगदान था। ऐसा नहीं कि यहाँ पर सब कुछ आदर्श था क्योंकि आज के अमेरिका का जन्म उन्हीं प्रवृत्तियों व प्रभावों पर आधारित था जो उपनिवेशवादी परम्परा का भी आधार रहीं थीं। यह सही है कि मानव प्रवृत्ति में बहुत कुछ  आधारभूत समानता दिखती है और जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात मानव की इस पाशविक प्रवृत्ति को साफ उजागर करती है। हाँ कुछ अपवाद प्रयत्न करने पर ढूढे जा सकते है जिनमें एक मेरे स्मृति पटल  पर उभर आता है।

एक अभिनव प्रयोग
इस संदर्भ में सम्राट अशोक का जिक्र समीचीन होगा जिसने ई. पू. 268-232 के दीर्घ अंतराल में लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया और अन्य सम्राटों की तरह अपने साम्राज्य का विस्तार भी किया। लेकिन कलिंग युद्ध की त्रासदी ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और उसके उपरान्त अशोक ने बल प्रयोग द्वारा  साम्राज्य विस्तार को तिलांजलि दे दी। सम्राट अशोक गौतम बुद्ध के विचारों से प्रभावित थे और उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर बुद्ध का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास भी किया [7]। यह बहुत कुछ सम्राट अशोक के  प्रयत्नों का ही प्रतिफल था कि आने वाले समय में दक्षिण-पूर्वी व पूर्वी एशिया के बड़े भूभाग में भारत की ओर से सैनिक अभियानों के स्थान पर वैचारिक-सांस्कृतिक अभियान देखने को मिले।

कुछ इसी तरह का हलका सा आभास आज दिखायी देता है अमेरिकी लोकतंत्र के उदभव व विकास में और साथ ही ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट के विकास में। दो विभिन्न देश-काल में हुई घटनाओं में साम्य मात्र संयोग भी हो सकता है और यह भी संभव है कि यह मात्र संयोग न हो। मेरा मानना है कि यह मात्र संयोग नहीं था और सारी मानवीय कमजोरियों, विड़म्बनाओं और अनिश्चितताओं के बावजूद यह वैचारिक विकास यात्रा का एक अनिवार्य चरण था। पहले यिन-यांग द्वैत का जिक्र किया गया है जिसके आधार पर विपरीत प्रवृत्तियों के बीच संतुलन संभव हो सकता है। दो अलग-थलग देशों में अलग समय अक्ष पर उद्भाषित वैचारिक परिपक्वता सांस्कृतिक विकास यात्रा का अनिवार्य निष्कर्ष भी  हो सकता है। अमेरिकी गृह युद्ध का ही जिक्र करें जो चार वर्षों के दीर्घ अंतराल में लड़ा गया लगभग उन्हीं दशकों में और भीषण त्रासदी भी लाया। इस युद्ध का अनिवार्य निष्कर्ष था दासता का अंत भले ही एक बड़े भूभाग में उसे जमीनी हकीकत में बदलने में समय लगा। केवल  आदर्शों की रक्षा के लड़ा गया युद्ध नहीं था यह; मसले कई और भी थे पर दास-प्रथा के खिलाफ़ यह आवाज उन्हीं के बीच उठी थी जिनके पूर्वजों ने इसकी स्थापना में योगदान किया था। इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए आधुनिक समय में सम्राट अशोक जैसे अभिनव प्रयोग दोहराये जाने की संभावना यदि कहीं है तो वह अमेरिका में ही है. यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि आज के अमेरिकी राष्ट्र में विश्व को शांतिपूर्ण मार्ग पर ले जाने की प्रतिबद्धता है तो अपनी बात मनवाने के लिये बल-प्रयोग पर आग्रह भी है।

यिन-यांग द्वैत के अनुसार विरोधी प्रवृत्ति का बीज दोनों में निहित रहता है और समय आने पर प्रभावी हो सकता है। दास  प्रथा का  आरंभ और अंत दोनों यिन-यांग के द्वैत को साफ उजागर करते हैं।

निजेतरता का स्वरूप 
इसी श्रंखला में अमेरिकी ट्रांसेन्डेन्टल मूवमेन्ट का जिक्र पुन: किया जा सकता है। ट्रान्सेन्डेन्टल के कई हिन्दी समानार्थक शब्द हैं जिनमें निजेतरता सबसे सटीक लगता है। विकसित मस्तिष्क व चिन्तन-शक्ति का अनिवार्य निष्कर्ष किसी विचारशील व्यक्ति को निज से परे जाने को बाध्य कर सकता है जिसमें जीवन व उसकी समस्याओं को दूसरे के नजरिये से देखना आवश्यक प्रतीत होने लगता है। भारतीय चिन्तन में जिन बातों ने एमर्सन को अत्यधिक प्रभावित किया उनमें उपनिषदों एवं भगवद्गीता में वर्णित अन्य बातों के साथ उनमें निहित निजेतर संदर्भ मुख्य हैं। यह प्रभाव एमर्सन के चिन्तन और लेखन पर स्पष्ट दीख पड़ता है:
Far or forgot to me is near; Shadow and sunlight are the same; The vanished gods to me appear; And one to me are shame and fame.

यह ईशोपनिषद की निम्न पंक्तियों के कितना निकट है
गतिशील है वह और नहीं भी
दूर भी है  पास भी
अंदर ही है यह सब
और साथ ही बाहर भी।

महाभारत में जो युद्ध लड़ा गया था वह एक त्रासदी से कम नहीं था। महाभारत में वर्णित युद्ध का महत्व इसलिये भी है कि वैसे युद्ध अनवरत लड़े जाते रहे हैं और लड़े जाते रहेंगे – बाहर भी और अंदर भी। उस त्रासदी का स्वरूप जीवन से जुड़े द्वैत को उजागर करता है क्योंकि हर एक के अंदर विरोधी प्रवृत्तियों के मध्य संग्राम अनवरत चलता रहता है और महाभारत के हर पात्र का कुछ अंश हरएक में विद्यमान है अंतर उनके सापेक्षिक परिमाण का है। अधिकतर यह युद्ध निर्णायक नहीं हो पाता और बात एक प्रकार के संतुलन पर आकर टिक जाती है।

महाभारत युद्ध के अंत में गांधारी कृष्ण से कहती हैं कि वे चाहते तो रोक सकते थे उस त्रासदी को और वे कृष्ण को शाप देती हैं कि वे भी मारे जायेंगे साधारण लोगों की तरह। इसका मार्मिक वर्णन यहाँ  पर धर्मवीर भारती कृत अंधायुग [8] से लेते हैं जहाँ गांधारी के शाप के बाद कृष्ण कहते हैं:
अठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूँ करोड़ों बार
जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ
कोई और नहीं मैं ही था
गिरता था जो घायल होकर रणभूमि में।
अश्वत्थामा के अंगों से
रक्त, पीप, स्वेद बनकर बहूंगा
मैं ही युग-युगांतर तक
जीवन हूँ मैं तो
मृत्यु भी मैं ही हूँ माँ
शाप यह तुम्हारा स्वीकार है।
(धर्मवीर भारती, अंधायुग)

जीवन से जुड़ा द्वैत एक यथार्थ है तो यह सर्वकालिकता और निजेतरता भी वास्तविक है भले ही उसकी उपस्थिति सदैव नहीं प्रतीत हो पाती। पर यह आशा की एक किरण सहायक हो सकती है दीर्घकालिक सांस्कृतिक भविष्यपथ निर्धारण में। वैचारिक स्तर पर निजेतरता की स्वीकृति भी महत्व रखती है क्योंकि यह सही दिशा में पहला कदम माना जा सकता है। बहुलतावादी द्दष्टि की स्वीकृति इसी का अगला चरण होगा। विश्व के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र दोनों की बहुलतावादी पहचान अपनी कमियों के बावजूद कुछ सकारात्मक संकेत देते हैं।

यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि अंधायुग के लेखन व मंचन का समय दूसरे विश्वयुद्ध के कुछ समय बाद का है। कुछ ही दशकों के अंदर दो विश्वयुद्धों की त्रासदी का काल अंधायुग नहीं तो और क्या है? भारत का विभाजन भी एक विराट त्रासदी से कम नहीं था। हर देश-काल में मानवीय  कमजोरियों, स्वार्थी प्रवृत्तियों एवं लालसाओं का नग्न प्रदर्शन इस तरह की विस्फोटक परिस्थिति उत्पन्न कर सकता है। भारती के ही शब्दों में:
पथ-भ्रष्ट, आत्महारा, विगलित
अपने अंतर की अंध गुफाओं के वासी
यह कथा उन्हीं अंधों की है
यह कथा ज्योति की है अंधों के माध्यम से।

अंध गुफाओं के वासी वाली बात केवल महाभारत या युद्ध के संदर्भ में ही सार्थक नहीं अपितु जीवन के कई
पहलुओं के लिये भी सटीक और सार्थक है। मनोवैज्ञानिक संदर्भ में इसकी सार्थकता की चर्चा आगे करेंगे।

निजेतरता की ज्योति
यह ठीक है कि विश्व का घटनाचक्र सामान्यतया दार्शनिकों, मनीषियों और संवेदनशील लोगों द्वारा निर्धारित नहीं होता। उसके निर्धारण में राजनीति, बलप्रयोग, निहित स्वार्थ, मानवीय कमजोरियों का नग्न प्रदर्शन– इन सब का मिला-जुला प्रभाव रहा करता है। साथ ही यह भी सच है कि इस मानवीय प्रवृत्ति के बावजूद ढाई हजार साल पहले सम्राट अशोक और बीसवीं सदी में अमेरिका के उद्भव में कुछ खास दिखायी देता है जिनमें उदात्त मानवीय मूल्यों को पूरी तरह नकारा नहीं गया। ऐसा नहीं कि आज की महाशक्ति का आचरण आदर्श प्रस्तुत कर पाया हो पर तुलनात्मक द्दष्टि से देखें तो अपेक्षाकृत कुछ संतुलन व समझदारी का भाव नजर आता है। अगर ब्रिटेन या जर्मनी  या फ़िर जापान महाशक्ति बन उभरते तब हालात बदतर हो सकते थे और हमारी आजादी भी सौ साल आगे खिसक सकती थी। जैसा पहले  भी वर्णन किया जा चुका है यथार्थ के बीहड़ में रास्ता बनाने हेतु कुछ अर्थपूर्ण खोजना और उसे आकार देना होता है और वैसा ही एक छोटा सा प्रयास यहाँ पर किया जा रहा है। माना कि दार्शनिक और विचारक नहीं तय करते राष्ट्रों के भविष्यपथ, पर दीर्घकाल में उसे अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित जरूर करते हैं।

अमेरिका में दास-प्रथा का अंत और ‘ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट’ का विकास लगभग एक ही काल में हुआ था और सारी कमियों के बावजूद इन ट्रान्सेन्डेन्टल विचारों का प्रभाव कुछ न कुछ तो रहा ही है नवोदित राष्ट्र के नीति-निर्धारण में।

 यह अमेरिकी मूवमेन्ट ढाई-तीन हजार साल पहले भारतीय ‘ट्रान्सेन्डेन्टल चिन्तन’ से प्रभावित था. थरॉ ने भी यह बात अपने लेखन में प्रदर्शित की है। न्यू इंग्लैन्ड में वालडेन नामक जलाशय के निकट उनके जीवन का महत्वपूर्ण समय बीता और अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने व मनवाने के उनके  प्रयास सत्याग्रही प्रयास माने जा सकते हैं और यह भी कि महात्मा गांधी स्वयं थरॉ के इन प्रयासों से प्रभावित थे। इस तरह हम देखते हैं कि हिमालय से हडसन-एपलेशियन के बीच एक संपर्क-सूत्र ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट में उजागर होता है तो वापस हडसन-एपलेशियन से हिमालय के बीच दूसरा संपर्क-सूत्र भी दीख पड़ता है गांधी पर थरॉ के प्रभाव में। थरॉ के ही शब्दों में [9]:
 “The pure water of the Walden is mingled with the sacred water of Ganges.”   
  वालडेन का शुद्ध जल और गंगा का पवित्र जल मिलकर एक हो जाते हैं। 

लेकिन यह तो सैद्धांतिक बातें हैं और वे भी कुछ विचारकों द्वारा प्रतिपादित और समर्थित। दीर्घ समयान्तराल में इनका कुछ प्रभाव नीतिगत दिशा निर्धारण में संभावित है पर इस से अधिक कहना अर्थपूर्ण नहीं होगा।
हम भविष्यपथ निर्धारण का जिक्र कर रहे थे एक ऐसा संभावित पथ जिसे लेना और उसपर चलना सभी के हित में हो। यह आसान नहीं है क्योंकि व्यक्तिगत और दलगत स्वार्थ निर्णयात्मक दौरों में अक्सर हावी हो जाते हैं और एक समन्वयात्मक व स्थायी समाधान तलाशना कठिन हो जाता है। इसके बावजूद निजेतर मंतव्यों की मशाल जलती रहनी चाहिये ताकि अवसर आने पर वे प्रभावी हो सके। मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी इन धारणाओं की जरूरत महसूस होने लगी है जो वैचारिक विकास यात्रा के स्वरूप  को कुछ हद तक प्रभावित कर सकते हैं।

वर्णपट मनोविज्ञान (स्पेक्ट्रम साइकोलाजी)
अब तक चर्चित बातों को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जाँचने की जरूरत है। जैसा हमने कहा मानव का अन्य जीवों की तरह स्वायत्त भौतिक अस्तित्व उसके जीवन की प्रथम आधारभूत सच्चाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता। मानव मन की बात करें तो उसमें  दो विशेष स्तर आसानी से नजर आ जाते हैं, पहला स्तर वह है जिसमें जीव की अपनी जरूरतें जैसे भोजन व सुरक्षा जैसे मसले आ जाते हैं। एक शिशु उस आरम्भिक अवस्था में पूरी तरह अपनी जरूरतों पर ही केन्द्रित रहता है और उसका मन भी इसी दिशा में सक्रिय रहता है मन के इस स्तर को ईगो-स्तर कह सकते हैं। मन का दूसरा प्रमुख स्तर वह है जो उसके निकट परिवेश से उसको जोड़ने से संबंध रखता है जिसमें परिवार  के सदस्य मुख्य हैं पर धीरे-धीरे यह दायरा विस्तृत होता है और पास-पड़ोस भी शामिल हो जाता है। मन के इस स्तर को जैव-सामाजिक स्तर कहा जाता है।

किशोरावस्था तक मन के ये दो स्तर ही मुख्यत: प्रभावी रहा करते हैं पर उम्र के साथ क्रमश: एक और स्तर अपनी उपस्थिति महसूस कराने लगता है। यह वह स्तर है जिसमें द्वैत संबंधी बातें अपना प्रभाव छोड़ती हैं जैसे जीवन-मृत्यु, खुशी-गम, सफ़लता-असफलता, दोस्ती-दुश्मनी  आदि। इसे अस्तित्ववादी स्तर कहा जा सकता है।
केन विलबर [10, 11] का मानना है कि ये तीन स्तर हमारी मनोदशा को प्रभावित करते रहे हैं और उस प्रभाव की दशा और दिशा इन तीनों स्तरों की बनावट व बुनावट पर निर्भर करेगी जो हरएक के लिये विशेष होती है और किसी एक व्यक्ति के लिये भी समय के साथ बदल सकती है. विलबर का कहना है कि इन द्वंद्वों से कमोबेश हर एक को जूझना होता है और इनसे निजात पाने का कोई आसान तरीका नहीं है. अगर कोई आंशिक निदान है भी तो वही जिसका जिक्र हमेशा से मनीषियों, विचारशील लोगों ने किया है निज से इतर जाकर सोचने का। यानि मन के वर्णपटीय विस्तार में एक और स्तर विद्यमान है जिसे विलबर निजेतर स्तर (ट्रान्सपर्सनल लेवल) की संज्ञा देते हैं। जीवन की विड़म्बनाओं व द्वंद्वों का कुछ भी निदान अगर संभव है तो यही कि निजेतर संदर्भों को प्रभावी किया जाय। यह कोई नयी खोज नहीं है और जैसा पहले कहा जा चुका है सदियों से सभी परम्पराओं में मनीषियों ने इस पर विशेष बल दिया है।

आदर्श और यथार्थ
यह निजेतरता को महत्व देने की बात एक आदर्श प्रस्तुत करती है जो अधिकतर स्थितियों में यथार्थ से दूर है। प्रश्न उठता है कि दोनों के बीच की खाई क्या कम होगी? मेरा मत है कि यह संभव है पर संभावना को वास्तविकता में बदलने के लिये शक्तिशाली को विवेकशील भी होना होगा यानि सम्राट अशोक की सी निजेतर सोच को लेकर चलना होगा। यदि एक महाशक्ति विवेकशील रवैया अपनाती है तब भी इस में कठिनाई हो सकती है। कोई महाशक्ति भी अकेले यह निर्णय लेने की स्थिति में नहीं क्योंकि हर देश उसकी बात सुनने को तैयार हो, जरूरी नहीं। जरूरत  इस बात की है कि अन्य देश भी इसमें आकर जुड़ें और इसे एक आन्दोलन का रूप देने का प्रयास करें।

निजेतरता एवं पर्यावरणीय दर्शन
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ट्रान्सेन्डेन्टल मूवमेन्ट और वर्णपट मनोविज्ञान का ट्रान्सपर्सनल स्तर एक दूसरे को स्पर्श करते हैं। हिंदी में दोनों के लिये निजेतर का प्रयोग पूरी तरह उस संदर्भ को उजागर करता है जो हमारा अभीष्ट है। अब बात करते हैं एक और वैचारिक आयाम - पर्यावरणीय चिन्तन - की। आरंभ में पर्यावरणीय चिंतन मुख्यत: हमारे भौतिक परिवेश से ही संबंध रखता था क्योंकि पर्यावरण में हो रहे प्रदूषण ने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया था। लेकिन कुछ विचारकों ने इसे अपेक्षाकृत व्यापकतर संदर्भ में लेने का प्रयास किया और गहन पर्यावरणीय चिन्तन तथा निजेतर पर्यावरणीय चिन्तन की बात की जिसमें मात्र भौतिक पर्यावरण व उसके प्रदूषण पर ही फोकस नहीं था अपितु उसके इतर जाकर सोचने व कार्य करने पर आग्रह था. इस विषय की अधिक विस्तृत चर्चा यहाँ पर संभव नहीं पर इतना तो कह सकते हैं कि निजेतर पर्यावरणीय चिन्तन एक नवीन पर्यावरणीय दर्शन (इको फिलासफी) [12, 13] को इंगित करता है जिसे एक आन्दोलन का रूप देना सभी के हित में होगा।

महात्मा गांधी के पर्यावरण संबंधी विचार कुछ इसी दिशा में इंगित करते रहे हैं। हमारा पर्यावरण मात्र भौतिक परिवेश न होकर एक सामाजिक-वैचारिक परिवेश भी है और उसमें हो रहा प्रदूषण भी बड़ी समस्याऐं पैदा कर सकता है और आज ऐसा हो भी रहा है। आज जब मीडिया की पहुँच इतनी गहन हो चुकी है कि दो घंटों के अंदर मोबाइल ऐप के प्रयोग से सच्ची या झूठी बातें फैलाकर एक अवांछनीय जुनून पैदा किया जा सकता है कथित वैचारिक प्रदूषण वाली बात और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है  और उनका समाधान खोजना भी उतना ही जरूरी हो जाता है। मनोविज्ञान में निजेतर संदर्भ दूसरे लोगों तक जाने की बात करता है पर गांधी चिन्तन में केवल मानव ही नहीं सम्पूर्ण जीव-जगत व पर्यावरण भी शामिल हो जाता है।

अहिंसा के व्यापकतर संदर्भ प्रकृति के प्रति भी हिंसा को नहीं स्वीकारते. गहन पर्या-चिंतन व गांधी-दर्शन निजेतरता के ही आयाम हैं और स्पेक्ट्रम साइकोलाजी के ट्रान्सपर्सनल क्षेत्र को समृद्ध किये बिना पूरी तरह समझ में नहीं आ सकते। इस दिशा में आगे बढ़ने क‍ा मार्ग आसान नहीं पर यदि लोग इसकी महत्ता स्वीकारने लगें और शक्ति संपन्न राष्ट्र विवेकशील रुख अपना सकें, आंशिक रूप से भी तब थोड़ी बहुत आशा की जा सकती है अन्यथा नहीं। सम्राट अशोक और आज अमेरिकी राष्ट्र का जिक्र केवल इसी संभावना के संदर्भ में किया गया है।


संदर्भ

1. चन्द्र मोह‍न भंडारी, भारतीय जनमानस में हिमालय: संदर्भ नये-पुराने, सेतु पत्रिका, फरवरी 2019
2. मुहम्मद इकबाल रचित, साप्ताहिक इत्तेहाद, लाहौर 1904
3. राबर्ट पीरसिग, Zen and the Art of Motorcycle Maintenance,  A Bantam New Age Book, 1981
4. Lawrence Buell (ed), The American Transcendentalists, New York, The Modern Library, 2006
5. Dale Riepe, The Indian influence in American philosophy: Emerson to Moore, Philosophy East and West, 17:  ¼ (1967) 125-137
6.  चन्द्रमोहन भंडारी, Transcending Barriers: Connecting the Trails, Setu (English), Feb 2018
7. A L Basham, The Wonder that was India, Sidgwick and Jackson, 1954
8. धर्मवीर भारती, अंधा युग (नाटक), लेखन 1954, प्रथम मंचन 1962, किताबघर प्रकाशन, 2005
9. Henry David Thoreau, Walden, Castle Books, Edison, NJ, USA
10. Ken Wilber, The Spectrum of Consciousness, M B Publishers Pvt Ltd,
      a. Delhi (2002), Published by arrangements with Theosophical Pub House, USA
      b. (1977)
11. Ken Wilber, ‘Up from Eden: Transpersonal view of human evolution’,
      a. Quest Books, 1996
12. Arne Naess, ‘The shallo and the deep: Long-range ecology movement’,
      a. Inquiry 16:95-100 (1973)
13. चन्द्र मोहन भंडारी, Deep transpersonal ecology: Gandhian Connection,
      a. Mainstream Weekly, October 2009

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