कबीर की कविता में आत्मकथनात्मक प्रवृत्ति: एक विश्लेषण

- धर्मवीर

शोधार्थी, हिंदी विभाग, कर्नाटक केंद्रीय विश्वविद्यालय, कलबुरगी, कर्नाटक
चलभाष: +91 833 290 7096

      हिंदी साहित्याकाश की भक्तिधारा के दैदीम्यान नक्षत्र कबीरदास संत संप्रदाय के प्रवर्तक थे| अद्भुत प्रतिभाशाली और समाज सुधारक कबीर हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार – “कबीर की उक्तियों में कहीं-कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी, इसमें संदेह नहीं।” शुक्ल जी ने कबीर की प्रतिभा को पहचाना परंतु हिंदी साहित्य में सूर, तुलसी और जायसी के समकक्ष दर्जा नहीं दे पायें। कबीर के व्यक्तित्व को देखते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं कि “हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।” सही मायने में कबीर को साहित्य में प्रतिष्ठित करने का श्रेय हजारीप्रसाद द्विवेदी को जाता है। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। कबीर के साहित्य में आम जनता को स्थान मिला। इसलिए आज भी लोगों के मुख पर कबीर के पद आते रहते हैं। कबीर ने आम जनता की समस्याओं को जनभाषा के माध्यम से उजागर किया। कबीर ने समानतापरक मानवीय मूल्यों की स्थापना पर जोर दिया और वर्ण, धर्म, जाति आदि के आधार पर भेद करने को अस्वीकार किया।

भक्तिकालीन कवियों ने अपने काव्य में आत्मकथनात्मक शैली का विशेष रूप से प्रयोग किया। कबीर के काव्य में आत्मकथनात्मक शैली मुख्यतः दिखायी देती है। कबीर ने तत्कालीन समाज की विषम परिस्थितियों को आत्मसात कर प्रस्तुत किया।
“कबीर निज कर प्रेम का, मारग अगम-अगाध।
सीस उतारि पगतलि धरै, तब निकटि प्रेम का स्वाद।|”

कबीर प्रेम को सर्वोपरि मानते हुए कहते हैं कि यह प्रेम किसी खेत में नहीं उपजता और न ही किसी हाट बाजार में मिलता है। फिर भी कोई जो इसे चाहेगा, पा सकता है। वह कोई भी हो ,चाहे राजा हो, चाहे रंक। ईश्वर का प्रेम बड़ी अद्भूत चीज है। उस चीज को प्राप्त करने के लिए साधना बड़ी होनी चाहिए।

“मेरा तेरा मनुआ कैसे एक होईरे?
मैं कहता हौं आँखिन देखी,
तू कहता कागज की लेखी।”

कबीर के काव्य का आधार स्वानुभूति का यथार्थ है। कवि के रूप में कबीर जीवन के अत्यंत निकट है। सहजता उनकी रचनाओं में बड़ी शोभा और कला की सबसे बड़ी विशेषता है।

“हम वासी उस देश के जहाँ बारहमास विलास।
प्रेम झरै विकसै कँवल, तेजपूंज परकास।|”

कबीर अपने स्वप्न लोक ‘अमरपुर’ का विशद चित्रण करते हैं। उस देश का सब-कुछ विचित्र है। वह देश जहाँ बारह महीने वसंत है। जहाँ प्रेम का झरना अनवरत झरता रहता है। जहाँ अनंत ज्योतिपूंज से अमृत बरसता रहता है। जहाँ जाति-कुल-वर्ण का विशेषतत्व नहीं है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कबीर के इस स्वप्न लोक को ‘सब पाया है’ का देश कहा है।

“हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या।
 रहें आजाद या जग से, हमन को दुनिया से यारी क्या।|”

कबीर मनुष्य-प्रेम पर बल देते हैं। वह मानवता, भाईचारे आदि की महत्ता को प्रस्तुत किया है। वे स्वयं से प्रेम करने का संकेत देते हैं।

“पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चक्की भली, जो पीस खाय संसार।|”
 
“ना जानै तेरा साहब कैसा है
मुल्ला होकर बाँग जो दैवे।
क्या तेरा साहब बहरा है?”

कबीर तत्कालीन समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, बाह्य-आडंबरों और रूढ़ियों का प्रखर विरोध किया है।

“हरि जननी मैं बालक तेरा।
काहे न औगुण बक सहु तेरा।|

कबीर ने स्वयं को परमात्मा का बालक मानकर साधना की है। वे परमात्मा को प्राप्त करने के लिए कभी बालक, कभी बहुरिया और कभी प्रिया के रूप में नजर आते हैं।
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाही।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही।|”

कबीर कहते हैं कि जब मैं अपने अहंकार में डूबा था तब प्रभु को न देख  पाया था। लेकिन जब गुरु के ज्ञान रूपी दीपक ने अंतर्मन को प्रकाशित किया। जिससे अज्ञानता का अंधकार दूर हो गया और प्रभु के प्रेम को पा लिया।

“कबीर, कब से भये बैरागी
तुम्हारी सूरति कहाँ को लागी|”

कवि स्वयं के बैरागी होने का कारण और समय बताते हुए, अपनी मति किस प्रकार प्रभु से लगी, उसे प्रस्तुत किया है। कबीर कहते हैं कि मैं अनादिकाल से बैरागी हूँ। मेरा प्रभु के प्रति प्रेम सदा से रहा है। वे कहते हैं कि हमारा जन्म काशी में हुआ और गुरु रामानंद ने परमात्मा का मार्ग दिखाया। वे अपना उद्देश्य प्रेमभाव को जागृत कर भाई-चारे को बढ़ावा देना मानते है। वे बताते हैं कि लोग आपसी प्रेम को समझकर सहज-सहज मिलते गए, जिससे भक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस कविता को भक्ति आंदोलन का घोषणा-पत्र कहा जा सकता है। “दुखिया सब संसार है खावे और सोवे।
दु:खिया दास कबीर है जागै और रोवे।|”

कबीर समाज की विषमताओं से चिंतित रहते हैं। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते है जहाँ सभी प्रसन्न रहें। जहाँ कोई दरिद्र, अज्ञानी और दु:खी न हो। अतः कबीर के काव्य में अंधविश्वास, पाखण्ड, बाह्य-आडम्बरों, मूर्तिपूजा आदि के प्रति विद्रोह के प्रखर स्वर देखने को मिलते है। भक्तिकाव्य में आत्मकथनात्मक प्रवृत्ति प्रमुख रूप से देखने को मिलती है। भक्तिकालीन कवियों ने आत्मकथनों के द्वारा ही समाज की विषमताओं को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया।

संदर्भ-सूची
1. हिंदी साहित्य का इतिहास – आ. रामचंद्र शुक्ल
2. कबीर - हजारीप्रसाद द्विवेदी

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