कहानी: रास्ते

- भावना सक्सैना

मन बहुत हल्का है आज, गाड़ी को मानो पंख लग गए हों। वह हवा में उड़ रही है... सामने पूरे चांद की रोशनी से खिली सड़क बाहें फैलाए शांत मुस्कुरा रही है। सड़क के दोनों ओर बसे घरों के सामने लगी फुलवारियाँ उनींदी ही मुस्कुरा रही हैं। साफ सुथरे घास के गलीचों पर पड़ने वाली वृक्षों की छायाएँ अठखेलियाँ कर रही हैं। यह सड़क मैंने हर मौसम में देखी है, धूप में, छाँव में बारिश में। मैंने इससे बातें की है, अपने राज़ बाँटे हैं, इसके सुख-दुख सुने हैं, अपने कहे हैं। और यह गाड़ी… जीवन के जागते पहर सबसे अधिक मैंने इसमें और इससे पहले वाली गाड़ी में ही तो गुजारे हैं। कभी बगल वाली सीट पर कोई होता है, कभी पिछली सीट पर, तो कभी कोई भी नहीं। कभी सूट-बूट में टाई लगाए गंभीर भाव-भंगिमा लिए कोई शालीन गरिमापूर्ण व्यक्तित्व, तो कभी अपने रौब व दर्प में सिंझा कोई अधिकारी। कभी हँसते खिलखिलाते बच्चे और कभी कोई सौम्य मृदुभाषी अधिकारी या कर्मचारी जो पीछे बैठने की बजाय आगे वाली सीट पर बैठ कर बतियाने और इस देश के बारे में जानने को उत्सुक रहता है। कभी होता है किसी सांस्कृतिक टोली का कारवाँ तो कभी कोई धीर-गंभीर व्याख्याता। जब कोई नहीं होता तो मैं अकेला इस सड़क से बतियाता चला जाता हूँ।

दूतावास की यह गाड़ी चलाते-चलाते अब हाथ बूढ़े होने लगे हैं। हवाई अड्डे के कितने चक्कर लगाए इसका लेखा-जोखा तो नहीं रखा मैंने लेकिन यह जरूर याद आता है कि राजदूतावास में आने वाले लोगों के यहाँ आने और जाने वाले लम्हे कितने जुदा होते हैं। दूतावास में अधिकारियों और कर्मचारियों को तीन साल के लिए भेजा जाता है। पहले तीन साल का यह वक्त ज़रा लंबा खिंच जाता था। कभी-कभी अधिकारी यहाँ चार से पाँच साल तक रह जाते थे, लेकिन अब कुछ बरसों से तीन साल के मायने तीन साल ही रह गए हैं। तीन साल में अधिकारियों की बदली होती है। लगभग हर साल दो नए अधिकारी आते हैं और दो पुराने लौट जाते हैं।

दूतावास से जुड़ा है भारतीय सांस्कृतिक केंद्र जिसमें योग, कथक, नृत्य, हिंदुस्तानी संगीत, तबला और हिंदी की कक्षाएँ होती हैं। इस देश के लोगों को हिंदुस्तान या अब तो कहूँ भारत से गहरा लगाव है। भारत की भाषा-बोली, गीत-नृत्य सीखने को मेरे देश के लोग लालायित रहते हैं। रहें भी क्यों न, आत्मा का रिश्ता है भारत से हमारा। बरसों बरस तो यही नहीं जान पाए कि हमारा देश यह है या वह। संसार के नक्शे में हजारों किलोमीटर दूर बसे किसी देश के प्रति इतना मोह एक अनजान व्यक्ति को हैरत में डाल देता है लेकिन इस देश के हिंदुस्तानी समाज के लिए कोई हैरत की बात नहीं है कि हर हिंदुस्तानी मन प्राण से भारत से जुड़ा हुआ है एक ऐसी गर्भनाल से जो आज तक न कटी है और ना आगे कभी कट पाएगी। वहाँ का कतरा-कतरा आज भी सींचता है हमें। मैं भी उसी डोर से बंधा हूँ और भारत से जुड़े हर कतरे से नवजीवन पाता हूँ।

मेरे दादा भारत से, नहीं हिंदुस्तान से आए थे। बात 1873 की है, तब वहाँ आज की तरह सुविधाएँ नहीं थी उन्हें पानी के जहाज में ठूँस कर लाया गया था। हाँ भेड़ बकरियों की तरह ठूस कर ही तो, मुझे याद है जब हम छोटे-छोटे थे तब माँ-पिताजी के धान के खेतों में जाने के बाद दादाजी हमें गोद में बिठाकर कहानियाँ सुनाते थे। हिंदुस्तान की - जो सोने की चिड़िया था और जिसके पंख अंग्रेजों ने लूट लिए थे और पंख ही नहीं नोचे थे उसके कलेजे के टुकड़ों को 5 साल के एग्रीमेंट पर गिरमिट काटने भेज दिया था।

दादाजी बताते थे किस तरह वह मेला देखने जा रहे थे और रास्ते में ही एक आदमी उन्हें फुसला कर एक डिपो में ले गया। जैसा वह बताकर ले गया था वहाँ वैसा कुछ भी नहीं था। लेकिन एक बार डिपो में जाने के बाद वे निकल नहीं पाए और पानी के जहाज में चढ़ा दिए गए। हिलते हुए जहाज से तीन माह की लंबी यात्रा के बाद इस ठोस धरती पर पाँव रखने का सुख बड़ा क्षणिक था। वह यातना का अंत नहीं शुरुआत थी। यहाँ उन्होंने जंगल काटे, जंगली कीड़ों का सामना किया, जला देने वाली धूप में दिन भर मेहनत की औऱ इस देश को बनाया। मुझे वह सब सुनकर बहुत गुस्सा आता था और दिल चाहता था उन सभी मंझाओं को इकट्ठा कर खूब पिटाई करूँ।
दादा जब हिंदुस्तान को याद करते तो बहुत रोते थे। वे अपने गाँव के बारे में बताते। आज भी मेरा पूरा परिवार हिंदुस्तान से बहुत प्रेम करता है और यही कारण है कि जब भारतीय राजदूतावास में मुझे ड्राइवर की नौकरी मिली तो सब बहुत खुश हुए। ऐसे लगा कि कहीं अपने पूर्वजों की सेवा का अवसर मिला है। शायद इसे ही संयोग कहते हैं जो हमें कहीं से कहीं पहुंचाते हैं।

मैं तो कुश्ती में अपना सिक्का जमा रहा था फुटबॉल खेलता था। राष्ट्रीय चैंपियन बनने के बहुत नजदीक था लेकिन फुटबॉल के ही एक मैच में पीठ में लगी चोट के कारण डॉक्टर ने खेल पर रोक लगा दी। कुश्ती और फुटबॉल दोनों बंद हो गए और तभी दूतावास का विज्ञापन निकला था मैंने बहुत खुशी-खुशी आवेदन किया और चयन भी आसानी से हो गया तभी से मेरी यात्रा शुरू हुई इस सड़क पर। इस गाड़ी से और इस रास्ते से दोस्ती की शुरुआत हुई। ये सड़क है पारामारिबो से ज़ान्दरेइ हवाई अड्डे की। सप्ताह में एक बार डिप्लोमैटिक मेल के लिए और जब भी किसी ने आना हो तो मैं इस सड़क पर होता हूँ।

अक्सर ऐसा होता है जब मैं आने वालों को हवाई अड्डे से लेकर लौट रहा हूँ तो गाड़ी में खुशी में हल्की मुस्कान होती है, उन्हें देश और दूतावास के बारे में जानने की उत्कंठा होती है और जब किसी को वापसी के लिए हवाई अड्डे छोड़ने जा रहा हूँ तो वह उदास होता है। उसकी उदासी और उसके कार्यकाल में बने भावनात्मक संबंध मुझे भी उदास कर जाते हैं, कभी कम तो कभी बहुत ज्यादा... लेकिन आज का दिन बिल्कुल अलग है। आज मैं जाने वाले को विदा करके भी बहुत खुश हूँ उसका जो स्थान है वह वापस जा रहा है झूठ और महत्वाकांक्षाओं के जाल से मुक्त होकर अपने देश अपने परिवार के पास लौट रहा है।

मुझे याद है जब मैं पहली बार उन्हें हवाई अड्डे से लेकर लौटा था, युवा पति-पत्नी एक पाँच साल की बेटी और तीन साल का छोटा सा प्यारा सा बेटा। उनकी बीच की एक फ्लाइट छूट गई थी तो वे बेहद उद्विग्न थे। पहली बार देश से बाहर निकले थे। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों की चकाचौंध से कुछ सहमे, कुछ प्रफुल्लित आपस में व स्वागत करने आए अधिकारी से बातें करते रहे थे। उन्हें भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से भेजा गया था। सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से भेजे जाने वाले शिक्षकों को परिवार को अपने साथ लाने का खर्च नहीं मिलता था इसलिए वे अपने खर्च से आए थे, और यही कारण था कि पहुँचने से पहले ही हुए नुकसान से बहुत उद्विग्न थे। स्वागत-अधिकारी धैर्य से सारे रास्ते उन्हें यही समझाते रहे थे कि सब सकुशल पहुंच गए इसलिए उन्हें ईश्वर का धन्यवाद देना चाहिए। धन उतना महत्वपूर्ण नहीं है।

आने वाले दंपति में पत्नी संगीत की शिक्षिका थी और पति एक उभरता हुआ संगीतकार, इस विदेशी तैनाती से बहुत सी उम्मीदें लेकर घर से निकले थे। हर हाल में इस देश में अपना मुकाम बनाना और शायद यहाँ बस जाना लक्ष्य बनाकर आए थे। दो साल की नियुक्ति के पहले कुछ महीने नए माहौल को देखने समझने में गुज़र गए। जिस समय वे वहाँ पहुंचे, वहाँ तैनात राजदूत कुछ सख़्त थे, वह नियम के खिलाफ कुछ भी करने की अनुमति नहीं देते थे। दूतावास में तैनात अधिकारियों व कर्मचारियों को स्थानीय रोज़गार ग्रहण करने की अनुमति नहीं थी। यही नियम सांस्कृतिक केंद्र में नियुक्त शिक्षकों पर भी लागू होता था। कुछ योजनाएं उन्होंने बनाई थी जो इस नियम पालन के कारण पूरी नहीं हो पा रही थीं।

उभरते संगीतकार व गायक का निजी प्रस्तुति कर कुछ धन अर्जित करने का स्वप्न भंग होता प्रतीत हो रहा था लेकिन वह अपनी कला को प्रदर्शित करने के हर अवसर को बखूबी संभालता था। मेरी ही तरह मेरे सभी स्थानीय बंधु भारत से आए सभी शिक्षकों को बहुत आदर-सम्मान देते हैं। अधिक समर्थ व शौकीन अपने घरों पर जन्मदिन व अन्य उत्सवों में शिक्षकों को आमंत्रित करते हैं। अदा और तपन भी इन उत्सवों का आनंद लेने लगे, उत्सवों में संगीत व नृत्य आम बात है तो वह ऐसा कोई अवसर हाथ से न जाने देते जहाँ तपन को अपना गीत सुनाने का अवसर मिल सके। बहुत से उत्सव देर रात्रि तक चलते और उनमें बच्चों को लाने की अनुमति नहीं होती तो वे बच्चों को किसी स्थानीय मित्र के घर छोड़कर देर रात तक उत्सवों का आनंद लेते।

बहुत से नए मित्र बन गए थे लेकिन तपन का स्वप्न पूरा नहीं हो पा रहा था जिसके कारण वह चिड़चिड़ाने लगा था, आखिर घर रहकर बच्चों की देखभाल करने का सोचकर तो वह नहीं आया था, वह भी घर-बाहर संभालती झुंझलाने लगी थी। उनकी यह झुंझलाहट पार्टियों में भी दिखाई पड़ने लगी थी, पहले जहाँ हर पार्टी में वे अपनी मोहब्बत के किस्से सुनाते नहीं थकते थे, एक ऐसी मोहब्बत की कहानी जिसमें दोनों ने परिवारों से लड़कर और अंततः उन्हें मना कर एक दूसरे का साथ पाया था। और जब विदेश की इस नौकरी के लिए अदा का चयन हुआ उन दोनों के परिवार कितना खुश थे। कभी उनकी बातें सुनकर क्यों लगता था कि उन दोनों के लिए सिवाय एक दूसरे के कोई और था ही नहीं लेकिन धीरे-धीरे इस मोहब्बत पर उदासी के बादल छाने लगे थे। बच्चे भी रोज़-रोज़ अकेले छोड़े जाने से चिड़चिड़े रहने लगे थे। अदा निराश रहने लगी थी लेकिन तभी राजदूत महोदय की बदली हो गई।

नए राजदूत कुछ नरम दिल थे, उन्हें गीत संगीत में भी रुचि थी। अदा उनकी पुत्री की उम्र की थी और शायद इसीलिए राजदूत व उनकी पत्नी को उससे विशेष स्नेह हो गया। जब उसने अपनी परेशानी उनसे बाँटी तो वह उससे सहानुभूति रखने लगे। कईं उत्सवों और महफिलों में उपस्थित रहने के कारण अदा और तपन के कई मित्र बन गए थे। उन्हीं में से एक ने, सुझाव दिया कि तपन स्थानीय रेडियो स्टेशन में अर्जी दे सकता है। अदा ने राजदूत महोदय से इसका जिक्र किया, उन्होंने पुनः अदा को नियम याद दिलाया लेकिन फिर न जाने क्या हुआ कुछ समय बाद तपन नाम बदलकर रेडियो में गाना गाने लगा। शायद यह सहानुभूति का परिणाम था, लेकिन अदा और तपन के लिए विष बन गया।

तपन के गीत स्थानीय लोगों को पसंद आने लगे। उसका अहं बढ़ने लगा और सफलता दिमाग पर चढ़ने लगी। वह भूल गया कि स्थानीय लोगों में उसका जो सम्मान है उसके भारतीय सांस्कृतिक केंद्र व राजदूतावास से जुड़ा होने की कारण ही है। वह भूल गया उसके इस देश में होने का कारण अदा है। अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते वह अदा की बिल्कुल अनदेखी करने लगा। जहाँ पहले वे दोनों हर कार्यक्रम में एक साथ जाया करते थे अब बड़े होते बच्चों का हवाला देकर तपन अदा को घर छोड़ कर देर रात तक कार्यक्रमों में रहने लगा बहुत बार वह रात को घर वापस नहीं भी आता। पहले वे दोनों एक साथ सिर्फ वाइन पीते थे लेकिन अब तपन हर प्रकार की शराब का आनंद लेने लगा। उसे इतना अधिक पीने की आदत नहीं थी इसलिए बहुत बार बीमार रहने लगा। जब भी कोई उसे यह समझाने का प्रयत्न करता कि वह अदा और बच्चों का ख्याल करें तो वह उसे अपनी सफलता की राह का दुश्मन समझने लगता और उस से दूरी बना लेता।

अदा का कार्यकाल समाप्त होने को था। शायद उस कार्यकाल के समाप्त होने पर भी वह लोग वापस अपने देश लौट जाते तो उनके लिए अच्छा रहता लेकिन अदा ने सोचा कि वह यह सब संभाल लेगी , उसने सोचा था कि वह अपनी प्रेम से तपन को समझा लेगी यही सोचते हुए उसने एक वर्ष के लिए अपना कार्यकाल बढ़ाने की अर्जी दे दी और उसे मंजूरी के लिए भारत भेज दिया गया। अक्सर सभी शिक्षकों का कार्यकाल दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष कर दिया जाता था और इसीलिए अदा का कार्यकाल बढ़ने में भी कोई समस्या नहीं हुई।

इसके बाद जो समस्याएं आरंभ हुईं उनके बारे में अदा ने कभी सोचा भी नहीं था। शायद कभी नाराज़गी में उसने तपन को यह जाहिर कर दिया होगा कि उनके उस देश में होने का कारण वही है और यह तपन के पौरुष को ठेस पहुंचा गया था। उसने मन बना लिया कि वह अदा को अपने दम पर उस देश में रहकर दिखाएगा। औऱ इसके लिए जो राह उसने चुनी वह किसी ने सोची न थी। अदा ने तो बिलकुल ही नहीं। रेडियो स्टेशन मालिक की युवा पुत्री अक्सर रेडियो स्टेशन आया करती थी। अति महत्वाकांक्षा ने तपन को एक गलत राह भी दिखा दी थी। धीमे-धीमे होती अफवाहें अदा तक पहुँची।

तपन ने उसे समझाने का प्रयास किया कि जैसा अदा सोच रही है ऐसा है नहीं, मन्नत उसकी कामयाबी की सीढ़ी है मंजिल नहीं। मंजिल तो उन दोनों का साथ है जिसे वे पा चुके हैं। अदा मान गई थी।

प्रेम का सबसे जरूरी सहारा विश्वास तो होता है लेकिन वही प्रेम का वैरी भी बन जाता है। जब कोई दूसरे के प्रेम को झूठे विश्वास दिलाकर छलता है, प्रेम उसी दिन खोखला हो जाता है। तपन का आडंबर और अदा का आँख मूँद विश्वास करना इस खोखले प्रेम को सहारा देते रहे।

अगले बरस दोनों ने मिलकर राजदूत को एक बड़े संगीत प्रतियोगिता महोत्सव के लिए राजी कर लिया। इस संगीत प्रतियोगिता व महोत्सव का आयोजक राजदूतावास था लेकिन सभी जानते थे कि उसका वास्तविक निर्देशन कौन कर रहा है। जब-जब जहाँ-जहाँ से संभव हुआ अदा और तपन ने मिलकर खूब लाभ उठाया, लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जो गलत होता हुआ देखकर चुप न रह सके। एक ओर जहाँ इस महोत्सव के लिए भारत सरकार की ओर से पूर्णतः अनुदान मिला था, वहीं तपन और अदा ने स्थानीय लोगों से खूब चंदा भी इकट्ठा किया था। नृत्य-संगीत के प्रेमी स्थानीय लोगों के लिए संस्कृति के नाम पर कुछ डॉलर चंदे में देना कोई बड़ी बात न थी लेकिन तपन और अदा बूंद-बूंद से लबालब भर चुके सागर में डुबकी लगाने लगे थे।

बहुत बार ऐसा होता है कमी इंसान को जोड़े रखती है किंतु अधिकता दरारें उत्पन्न कर देती है। एकत्र हुई राशि से तपन अपना एक स्टूडियो निर्मित करना चाहता था जबकि अदा बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहती थी। इस मुद्दे पर उनके बीच की खाई इतनी बढ़ती गई थी कि अंततः राजदूत को तपन को बुलाकर समझाना पड़ा था और इसी मुलाकात में तपन ने अदा से अलग होने की इच्छा व्यक्त कर दी थी। मन्नत में उसे जो राह दिखाई दी थी वह उसे विदेश में बसने के लिए अधिक स्थाई दिख रही थी। वह उस पर चलना चाहता था, पिता समान राजदूत ने उसे बहुत समझाया लेकिन उस पर कोई प्रभाव न हुआ। अंततः दोनों के बीच फासले इतने अधिक बढ़ गए कि कई बार तपन काम के सिलसिले में दूसरे शहर जाने का कह कर जाता और कई-कई दिन वापस ना आता।

सूरीनाम में बहुत से लोग जंगलों में मौज मस्ती करने जाते हैं, नाचना-गाना, शराब पीना और पत्थरों से आते काले पानी के झरने में पड़े रहकर दिन गुजारना इन लोगों के साथ जाने लगा और ऐसे ही घने जंगल के भीतर एक पिकनिक के दौरान तपन को किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया जिसका परिणाम यह हुआ कि उसकी संपूर्ण त्वचा फफोलों से भर गई। बहुत भयंकर कष्टकारी पीड़ा थी, नाराजगी में भी अदा उसे उस हाल में नहीं छोड़ सकी थी। उसने जी जान से उसकी सेवा की। दूतावास में होने के कारण बेहतर से बेहतर इलाज उसे मिला और अंततः लगभग 3 माह के बाद तपन पुनः स्वस्थ हो सका। इसी कारण से उसकी रेडियो की नौकरी भी छूट गई थी और संभवतः घर में बंद रहते हुए आत्मावलोकन का अवसर भी मिला था अपनी सभी गलतियां मानते हुए उसने अदा से क्षमा याचना की थी और सहज स्वभाव निश्छल अदा ने उसे माफ कर दिया था। स्त्री किसी काल किसी देश की हो अपने बच्चों के लिए परिवार को जोड़े रखने में ही विश्वास रखती है। अदा ने भी यही किया था। शायद दोनों ही अपनी-अपनी भूल समझ चुके थे किंतु समय का जो पानी एक बार एक स्थान से गुजर जाता है वहाँ दोबारा नहीं लौटता इसी प्रकार जिंदगी के क्षण भी दोबारा नहीं लौटते। वे दोनों साथ थे पर बीच में एक बहुत बड़ी खाई थी जिसे वे भर नहीं पा रहे थे।

अदा की नियुक्ति की अवधि समाप्ति की ओर थी, राजदूत ने उसे बुलाकर पूछा था कि क्या वह सेवावधि में पुनः विस्तार की इच्छुक है और अदा ने बड़ी शालीनता से कहा था – सर अब बिखरे हुए संबंधों को बटोरना चाहती हूँ, मुझे जाने दीजिए…

नम आँखों से उसे सभी से शुभकामनाएँ मिली थी, और सारे सामान के साथ उनसे उन्हें आँचल में सहेज लिया था।

भारत लौटने की सभी तैयारियाँ हो चुकी थी, कि अचानक तपन पर फिर वहीं रह जाने की ज़िद सवार हो गई। अदा उसे नज़रअंदाज कर तैयारियाँ करती रही थी। उसने सोचा था कि वह उसे वापस ले जाएगी और अपने देश पहुँच सब ठीक हो जाएगा, वे भूल जाएँगे कि यहाँ उनके बीच क्या हुआ था। लेकिन तपन को मन्नत के ख्वाब पुनः खींच ले गए थे और वापसी के दिन वह गायब हो गया था। फ्लाइट का समय हो गया था। सभी सूटकेस व बैग गाड़ी में रखे जा चुके थे। बच्चे सहमे हुए एक ओर बैठे थे।

तपन का फोन स्विच ऑफ था। सभी परिचितों को फोन किया जा चुका था, वह कहीं नहीं था। अदा उसके बगैर वहाँ से हिलने को तैयार नहीं थी। तभी राजदूत की गाड़ी पहुँची। उन्हें देखते ही अदा फूट-फूटकर रो पड़ी थी। उसे आशंका थी कि तपन के साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो। बहुत समझाने पर भारी मन से वह रवानगी के लिए मान गई क्योंकि रह जाने का कोई रास्ता न था। सर ने विश्वास दिलाया था कि वह जल्दी से जल्दी तपन को खोजकर उसे डी-पोर्ट कर देंगे। अदा के वापस लौट जाने पर तपन का वहाँ रह जाना नियमानुसार अपराध था।
अंततः उसे लौटना पड़ा था। वह कितनी हताश और टूटी हुई थी यह सब जानते थे, लेकिन सब विवश थे। केंद्र की एक शिक्षिका ने प्रस्ताव दिया था, सर अगर इनके टिकट आगे की तारीख पर बढा दिए जाएँ तो यह मेरे साथ रह सकती हैं, लेकिन अनुभवी राजदूत ने इसकी स्वीकृति नहीं दी थी। शायद वह चीजों को बेहतर समझते थे।
कई सप्ताह तपन छिपा रहा था, लेकिन फिर उसे समझ आ गया था कि उस स्थिति में उसकी वहाँ उपस्थिति गैर-कानूनी है। वह न खुलकर बाहर आ सकता है न कहीं नौकरी कर सकता है। एक बंधुआ कि तरह बिना कागज़ात कितने दिन छिपा रहता। दूतावास में आकर समर्पण किया और वापस भेजे जाने का आग्रह किया।
आज उसी तपन को मैं उसके परिवार के पास वापस जाने को एयरपोर्ट छोड़ कर आया हूँ। दुआ करता हूँ अपने बच्चों के साथ खुश रहे।

सच है इंसान को कई अवसर मिलते हैं बेहतर बनने के लिए और कई अवसर बना-बनाया बिगाड़ने के लिए भी। साँप-सीढ़ी के खेल में साँप के मुख में पहुँचकर नीचे उतर जाने के बाद जैसे आगे बढ़ने का पुनः अवसर होता है, ठीक वैसे ही जीवन में भी यह याद रखना आवश्यक है कि समस्या कितनी ही विकराल क्यों न हो वह अंत नहीं होता। साँप के मुख का अंतहीन गर्त गर लील भी जाए तो पहला अवसर मिलते ही दौड़कर आगे लटक रही सीढ़ी का जो सिरा हाथ में आ पाए उसको पकड़कर बढ़ जाना चाहिए। चलते रहना ही जीवन है और रास्ते हमारे दोस्त। रास्तों से दोस्ती हो तो जिंदगी मुस्कुराती रहती है। मेरे पुरखों ने इस बियाबान के रास्तों से दोस्ती कर इस देश को बसाया न होता तो जाने उनका और उनकी पीढ़ियों का जीवन कैसा होता।

4 comments :

  1. ओह, अद्भुत! इक छोटी सी कहानीऔर कितना कुछ अपने भीतर लिए हुए ! और कितनी ख़ूबसूरत बात पर आकर बात रुकी...
    रास्तों से दोस्ती हो तो ज़िन्दगी मुस्कुराती रहती है।
    सदा मुस्कुराती रहो भावना ।

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  2. ओह, अद्भुत! इक छोटी सी कहानीऔर कितना कुछ अपने भीतर लिए हुए ! और कितनी ख़ूबसूरत बात पर आकर बात रुकी...
    रास्तों से दोस्ती हो तो ज़िन्दगी मुस्कुराती रहती है।
    सदा मुस्कुराती रहो भावना ।

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  3. बेहद ख़ूबसूरत कहानी।मन के भीतर कुछ छोड़ गई । खूब लिखो

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  4. प्रिय भावना , रास्ते कहानी अच्छी लगी । जीवन जीने की सकारात्मक दृष्टि देती । साँप - सीढ़ी के खेल का सुन्दर उदाहरण दिया । बधाई लो ।

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