कहानी: मोची

मनमोहन भाटिया
- मनमोहन भाटिया

सुबह से हो रही बरसात अब थम चुकी थी। सुबह ऑफिस आते समय कपड़े गीले हो गए थे जो दोपहर तक सूख गए थे। जूतों में पानी भर गया था और कीचड़ में दो तीन बार पैर पड़ने के कारण बदरंग हो गए थे। गीले जूते ऑफिस में ब्लोअर के आगे रख कर सुखा लिये लेकिन बदरंग जूते अटपटे लगने लगे। लंच समय ऑफिस के नीचे आया। सामने वाले ऑफिस की बिल्डिंग के कोने में एक मोची का ठिया है। थोड़ी-थोड़ी धूप निकलने लगी तो सोचा कि जूतों की शक्ल अच्छी करवा ली जाए। मोची के ठीये पर बहुत भीड़ थी। महिलाओं की अच्छी खासी भीड़ थी जिनकी चप्पल, सैंडल टूट गई थी और उनको जुड़वाने के लिए महिलाएं बतिया रही थी। भीड़ को देख कर वापस होने ही वाला था कि आवाज आई। "बाबूजी रुको, जल्दी कर दूंगा।" देखा कि मोची के समीप एक वृद्ध आदमी बैठ कर चप्पलें ठीक करने लगा। वह बूढ़ा मोची का पिता था। अब दो मोची होने पर काम फटाफट होने लगा। एक सैंडल ठीक करने के पश्चात उसने मुझे आवाज दी। "बाबू आइए अब आपके जूते ठीक कर देता हूँ।"
पिता मोची मेरे जूते पालिश करने लगा। "बाबू इतने खराब जूते तो कभी नही होते थे तुम्हारे।"
इतना सुन कर एक दम झटका लगा औऱ पिता मोची को ध्यान से देखने लगा।

"नत्थू! तुम?"
"हाँ बाबू, मैं नत्थू।"
"नत्थू तुम दिल्ली से मुम्बई कब आये।"
"दस साल हो गए हैं। यह मेरा बेटा है। मुम्बई आया और मुझे भी बुला लिया। अब उम्र हो गई है, अकेला रहने से अच्छा है कि बच्चों के संग रहा जाए।"
"हाँ यह तो ठीक है।"
"बाबू तुम भी मुम्बई आ गए।"
"नही मैं तो दिल्ली में ही हूँ। अभी मुम्बई ट्रांसफर हुआ है। फिर दिल्ली चले जाएंगे।"
"बाबू अभी उसी मकान में रहते हो।"
"नही। मकान बदल लिया है।"
"जूता तो एकदम बेकार हो गया है। कभी भी इसका तला निकल सकता है। अभी ठीक कर देता हूँ। नया ले लो।"
"इतनी बरसात में नया भी बराबर हो जाएगा। इसलिए पुराना पहन कर ऑफिस आया हूँ।"
"इसी सोच ने सबको लाइन लगा कर यहाँ खड़ा किया हुआ है। बरसात में पुराने जूते, चप्पल पहन कर निकलते हो और वो जवाब दे जाते हैं।"

मैं मुस्कुरा दिया और बचपन की बातें याद आ गई। घर की गली के नुक्कड़ पर नत्थू मोची का ठिया था। घर का हर सदस्य नत्थू मोची से हर रविवार जूते पालिश करवाता था। नत्थू खुद सुबह घर आकर जूते, चप्पल और सैंडल ले जाता था और थोड़ी देर बाद पालिश और मरम्मत करके वापिस दे जाता था। घर के हर सदस्य का नाम नत्थू को मालूम था। अपने ठीये की दीवार पर नत्थू मोची लिखवा रखा था। जब भी वो मिट जाता तब हमसे ही ड्राइंग के रंग और ब्रश ले जाता औऱ खुद दीवार पर रंग बिरंगा नत्थू मोची लिखता। मुझे बहुत गुस्सा आता था क्योंकि ब्रश दीवार पर चला कर खराब कर देता था और रंग भी वापिस नही करता था। बच्चे से बड़े हो गए। शादी हो गई फिर मेरे साथ पत्नी और बच्चों के जूते, चप्पल, सैंडल भी नत्थू मोची ने ठीक किए। फिर एक दिन नत्थू मोची अपने ठीये से चला गया और उसकी जगह कोई औऱ मोची बैठने लगा। पूछने पर पता चला कि उसने ठिया बेच दिया है। इस बात को आज लगभग पंद्रह साल हो गए। घर पर जब भी जूते, चप्पल, सैंडल खराब होते तब नत्थू मोची का जिक्र आ ही जाता था कि मोची जबरदस्त था। टूटे फूटे जूतों को एकदम नया बना देता था। ऐसा मोची फिर नही मिला।

आज पंद्रह वर्ष बाद एक झटके में नत्थू मोची ने मुझे पहचान लिया हालांकि मैंने उसे तब पहचाना जब उसने मुझे बाबू कहा। बाबू मेरा घर का नाम है और नाम भी नही भूला।

"बाबू अब देखो जूता।"
"अरे नत्थू तुमने तो एकदम नया कर दिया। चलो नए जूते के पैसे बचे।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "लेकिन तुमको यहाँ कभी देखा नही।"
"अब बुड्ढा हो गया हूँ। तबियत भी ठीक नहीं रहती है। कभी-कभी आता हूँ जब तबियत ठीक होती है।"

घर पहुँच कर पत्नी ने चमकते हुए जूते देखे तो पूछ ही लिया। "बरसातों में नए जूते क्यों लिए?"
"जूता भी पुराना है और मोची भी पुराना मिल गया जिसने जूता नया कर दिया।"
पत्नी के मुख से स्वयं ही उसका नाम निकल पड़ा, "कौन? नत्थू?"
"हाँ, ऑफिस के सामने उसके लड़के का ठिया है। कभी-कभी आता है।"
पत्नी मुस्कुरा दी और अगले दिन एक बैग में अपनी तीन जोड़ी सैंडल ठीक करने के लिए रख कर मुझे पकड़ा दी।

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