मेरी प्रिय जेक्लिन: सत्येन्द्र नाथ बोस

मेहेर वान

- मेहेर वान

प्रोफ़ेसर सत्येन्द्र नाथ बोस विश्व के सबसे महान भौतिकविदों में गिने जाते हैं। उनके नाम पर खास तरह के सूक्ष्मतम कणों का नाम “बोसॉन” रखा गया और इन कणों से सम्बंधित सांख्यिकी को बोस-आइन्स्टीन सांख्यिकी कहा जाता है। कुछ समय पहले ही प्रसिद्ध हुआ “गॉड पार्टिकल” भी एक तरह का बोसॉन होता है। सत्येन्द्र नाथ बोस के सिद्धांतों का भौतिकी पर बहुत गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ा। वे सन 1894 में कलकत्ता में जन्मे थे और प्रेसिडेंसी कोलेज से पढ़ाई करते हुए, प्रफुल्ल चन्द्र रे और जगदीश चन्द्र बोस के छात्र रहे। परास्नातक की परीक्षा में सत्येन्द्र नाथ बोस के उत्तीर्ण अंकों में कलकत्ता विश्वविद्यालय में रिकॉर्ड स्थापित किया था। बाद में वे ढाका विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे।

जब उनका पहला और महत्वपूर्ण शोधपत्र प्रकाशित होने में कई कठिनाइयाँ आ रही थीं तो उन्होंने अलबर्ट आइन्स्टीन को पत्र लिखा और मदद करने का आग्रह किया। बाद में बोस और आइन्स्टीन के कुछ महत्वपूर्ण शोधपत्र प्रकाशित हुए। बोस सन 1926 में जर्मनी गए थे। उन्होंने उम्र भर में बहुत कम शोधपत्र ही प्रकाशित किये। वे शोधपत्र प्रकाशित करने में हिचकते थे और चाहते थे कि उनका सर्वोत्कृष्ट कार्य ही प्रकाशित हो। उन्हें शोधपत्रों की संख्या बढाने की हड़बड़ी नहीं थी।

सत्येन्द्र नाथ बोस के पिता रेलवे में इंजिनियर थे। बोस अपनी छह बहनों के बीच अकेले भाई थे। उनकी शादी तब हो गई थी जब वह मात्र 20 साल के थे और उस समय उनकी पत्नी उषावती घोष मात्र 11 वर्ष की थीं। उनके नौ बच्चे हुए जिनमें से दो बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए थे।

सत्येन्द्र नाथ बोस के दिशा-निर्देशन में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाली प्रोफ़ेसर पूर्णिमा सिन्हा जब 1980 की अपनी पेरिस यात्रा में सत्येन्द्र नाथ बोस की सखी जेक्लिन आइजनमेन से मिलीं। तब तक जेक्लिन आइजनमेन यूरोप के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संसथान CNRX, पेरिस में वैज्ञानिक के पद से सेवानिवृत्त हो चुकी थीं।

जेक्लिन, बोस के बारे में याद करते हुए डॉ. पूर्णिमा सिन्हा को एक पत्र में बताती हैं कि जब वह प्रोफ़ेसर बोस से मिलीं तो वह युवती थीं और उन्होंने हाल में ही प्रोफ़ेसर कोटोंन के साथ शोध करना शुरू किया था। उन्होंने सत्येन्द्र नाथ बोस के बारे में काफी सुन रखा था और वह भारत से आने वाले जीनियस से मिलने को आतुर थीं। बोस उनकी प्रयोगशाला में आये थे और वहीं उनकी मुलाकात हुई। बाद में वह लोग समय मिलने पर मिले थे। जेक्लिन आइजनमेन बताती हैं कि बोस बंगाल के बारे में काफी बातें करते थे और बांगला भाषा में विज्ञान लिखने के बारे में इच्छा जाहिर करते। उनके देशप्रेम से जेक्लिन काफी प्रभावित हुईं थी। बोस में ऐसा बहुत कुछ था जिससे प्रभावित हुआ जा सकता था। वे संगीत प्रेमी थे और उन्हें हरब्यू साहित्य में काफी रूचि थी।

सन 1980 में जेक्लिन आइजनमेन ने प्रो. पूर्णिमा सिन्हा को प्रोफ़ेसर सत्येन्द्र नाथ बोस की लिखावट में लिखे यह यह दो पत्र सोंपे थे। वे दोनों पत्र यहाँ प्रस्तुत हैं- 

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Unter der Eichen 88
Bei Ehlert
Berlin Dahlem, 1926

मेरी प्रिय जेक्लिन,

तुम्हारे त्वरित उत्तर से मुझे बहुत ख़ुशी मिली, लेकिन इसके साथ उदासी की भावना भी मिश्रित है। यह मुझे महसूस कराता है, कि पिछले प्रवास के दौरान मैं तुमसे कितना कम मिल पाया, यद्यपि मैं इसी के लिए ही गया था, जैसे कि मैं यह सोचता हूँ, कि चार महीनों बाद यह (मिलने की इच्छा) कैसे अप्राप्य उत्कंठा बन जायेगी, मैं बहुत ही अत्यधिक बेसहारा और अभागा महसूस कर रहा हूँ। हालांकि तुम मेरे द्वारा यह बातें लिखने को बेवकूफी समझोगी, और मैं खुद भी यह नहीं जानता कि ऐसा क्या है जो मुझे यह सब लिखने को बाध्य कर रहा है।

मैं जिस दिन से यहाँ आया हूँ तब से एक नए कमरे में ही हूँ, यह बहुत ही अच्छा और आरामदायक है, और मैं सच में अपनी बालकनी के प्यार में पड़ गया हूँ, दरवाजा पूरी रात खुला रहता है, और अब यहाँ काफी ठण्ड हो रही है। मेरे दोस्त यहाँ पास में ही रहते हैं, यहाँ से पांच मिनट की पैदल दूरी पर प्रयोगशाला की इमारत है, जहां मैं लगभग रोज़ जाता हूँ। जो सामान (मेरी किताबें इत्यादि) मैंने यहाँ छोड़ा था वह अभी आया है, और अब उन्हें व्यवस्थित करने का सबसे बड़ा काम बाकी है, (विशेष रूप से मैं यह नहीं जानता कि अपनी किताबें कहा रखूं) यह मेरे लिए सबसे बड़ा काम होता है।

मुझे तुमसे यह सुनकर चिंता हो गई थी कि तुम्हें बहुत अधिक खांसी आने वाली है, और क्या तुम जानती हो, मैं खुद को थोड़ा सा दोषी महसूस करता हूँ, और हालाँकि यह सोचता हूँ कि जब भी तुम्हारी तबियत ठीक न हो तब मैं (तुम्हारी) प्रयोगशाला आ जाऊं, और ऐसा सोचकर और ज्यादा दोषी महसूस करता हूँ। मेरे लिए तुम जल्दी से ठीक हो जाओ। 

यहाँ बर्लिन में भौतिकी की चीज़ें जिस तरह से आगे बढ़ रही हैं, उससे सभी लोग (सभी भौतिकविद) बहुत ही अधिक उत्साहित हैं। सबसे पहले 28 तारीख को हाईजेनबर्ग ने अपने सिद्धांतों के बारे में भाषण दिया, इसके बाद अंतिम वार्तालाप में स्पिन करते हुए इलेक्ट्रान की हालिया परिकल्पना पर एक लम्बा भाषण था (शायद तुमने इसके बारे में सुना हो)। सभी लोग अत्यधिक व्यग्र हैं और तब बहुत जल्दी ही श्रोडिन्गर के शोध-पत्रों के ऊपर एक वार्तालाप होगा। इस बारे में आइन्स्टीन काफी उत्साहित प्रतीत होते हैं; एक दिन वार्तालाप के बाद वापस आते हुए जिस ट्रेन के डिब्बे में हम थे उसी डिब्बे में उन्हें चढ़ते हुए देखा, और इसके बाद वह बहुत ही उत्सुकता से उन्हीं सब बातों के बारे में बातें करने लगे जो हमने पहले से सुनीं थीं। उन्होंने यह स्वीकार किया यह एक बड़ी बात है कि बहुत सारी बातों को शामिल करते हुए जो कि इन (क्वांटम भौतिकी के) नए सिद्धांतों की सम्बंधित हैं और उनके ज़रिये व्याख्यायित होती हैं, लेकिन वह इस सब में तार्किकता की कमी के कारण बहुत ही परेशान थे। हम सब शांत थे लेकिन वह हमारी रूचि के बारे में एकदम नहीं सोचते हुए पूरे समय लगातार बातें करते रहे, आश्चर्य की बात है कि उन्होंने (ट्रेन में) अन्य सवारियों के दिमाग की शांति के बारे में भी नहीं सोचा। 

इन तीन महीनों में मैंने बहुत कठिन मेहनत करने का ईमानदार प्रण लिया है, लेकिन इसकी शुरुआत करना बहुत अधिक कठिन है, खास तौर पर जब तुमने इसकी आदत छोड़ दी हो। यद्यपि यहाँ पर कुछ और करने के लिए बहुत कम ही है।

मुझे प्रसन्नता है कि तुम्हें बुद्ध का जीवनी पसंद आयी। मैंने शुरूआती कुछ पन्नों पर ही नज़र डाली थी, और मैं थोड़ा हिचक रहा था कि तुम पता नहीं इसे पसंद करोगी या नहीं। यह बहुत ही दुःख की बात है कि आस-पास उनके सिद्धांतों के अलावा कितने मिथक इकट्ठे हो गए हैं। वह विश्व इतिहास की एक महान और उत्कृष्ट इंसान हैं और जिन्हें मैं सबसे अधिक पसंद करता हूँ। मुझे यह जानकार आश्चर्य हुआ था कि तुम उनकी जीवनी पढना चाह रही थी मगर तुमने मुझसे इसके बारे में पहले कभी ज़िक्र नहीं किया।

वास्तव में तुम्हें दो किताबें (जो मुझे बहुत ही प्यारी हैं) और भेंट करना कोई महान बात नहीं है और क्या मेरा (तुम पर) इतना भी अधिकार नहीं है कि मैं खुद मेरी सबसे पसंदीदा किताबें तुम्हें पढने के लिए कहूँ? मैं नहीं जानता कि वह तुम्हारे पास कब तक पहुँचेंगीं। मैंने ठीक अभी “प्राउस्ट” को पढ़कर ख़त्म किया है। मैं सच में बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ, लेकिन अभी बहुत देर हो चुकी है और यह कागज़ भी पूरा ख़त्म हो गया है, अगले ख़त में और बातें लिखूंगा।

मेरे शुभकामनायें प्रियतमा 
तुम्हारा 
बोस  


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सन 1943 में अपने माँ-पिता की मृत्यु के बाद से जेक्लिन दुखी रहती थीं। सन 1951 में अचानक वह फिर बोस से मिलीं। इसके बाद बोस ने उनके यह पत्र लिखा था-   

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8 South Audley Street 
Yurin Services Club 
London
22 June, 1951
प्रिय जैकलिन,

तमाम वर्षों के बाद तुम्हें देखना और तुम्हारी मधुर आवाज़ को सुनना और तुम्हारे पास होना एक सूफी एहसास जैसा था। इससे मेरा खून बढ़ गया है और मैं अपने इस सौभाग्य के लिए अत्यंत गहराई तक आभारी हूँ।

सालों-साल गुज़र गए तुम्हारे बारे में कोई खबर नहीं मिली, और मैंने जिंदगी में कभी तुमसे मिलने के बारे में सोचना बंद कर दिया था। एक बेवकूफी भरा डर यह भी था कि समय के साथ बदलाव वाले दयाहीन नियम के कारण उस वास्तविकता की चोट के ठीक होने की इच्छा करना भी निराशाजनक होता है, जिस वास्तविकता को हमने स्मृतियों में कल्पनाओं के मकड़जाल में लपेटकर संजोया है। तुम्हें पहली नज़र में देखते ही कैसे सारे डर पिघलकर भाग गए।

मैं अभी लन्दन में हूँ और यहाँ पर एक हफ्ते और रुकूंगा, इसके बाद मैं कलकत्ता जाऊँगा।

आशा करता हूँ कि अब तुम मुझे पुनः पत्र लिखोगी
तुम्हारा सप्रेम,
बोस
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