सारिका भूषण की कविताएँ

नमक

तुम
नमक हो
मेरी ज़िंदगी में
तुम्हारा
नमकीन होना
मुझे अब बहुत अच्छा लगता है
तुम्हारी मिठास के लिए
मैं तरसा करती थी
तब शायद
अहसास नहीं था
मीठे पलों के छलावे का
भ्रमित हो चुकी थी
इस अंधी दुनिया में
क्योंकि
तब पता नहीं था कि
मिठास के बग़ैर भी
जीवित रहा जा सकता है
पर
नमक के बिना नहीं!
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कोयल

एक कोयल
मेरे अंदर भी है
जो अकसर कूका करती है
मन की डालियों पर
चहका करती है
प्रेम की गलियारों पर
और
तब प्रतिध्वनित है
दसों दिशाएँ
खुल जाते हैं
कलुषित कपाट
बहने लगती है
मधुर बयार।

हाँ
एक कोयल मेरे अंदर भी है
जो
विरह गीत भी गाया करती है
बदलते हैं मौसम
बदलते हैं रिश्ते
बदलता है प्यार
और
तब सिसकती है धरा
प्रकृति करती है प्रहार
कुछ सीखाने के लिए
कुछ समझाने के लिए
एक संतुलन
बनाने के लिए
अपनी कोयल और उसकी कूक में।
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प्रेम

नज़रें मिलते ही
धड़कनों का बढ़ जाना
और
आखों का भर आना
यही अहसास दिलाता है
शायद
यही 'प्रेम' है।
अनकहा, अनछुआ
सच्चा प्रेम!
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दाग

मुस्काता चाँद
जो गगन में
मुस्काती कलियाँ
जो उपवन में
इठलाता यौवन
जो जीवन में
सभी में तो दाग है
छिपा दर्द जो दामन में ।


परीक्षा
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मैंने भी दी है
परीक्षा
कोरे कागजों पर
अश्रुओं की स्याही से
पर
अफसोस!
हर किसी के समझ से परे हैं
दिल की गहराइयों से
निकले शब्द हैं
उन शब्दों के समूह से
बनी हैं पंक्ति
जिनमें मेरे 'मैं' की
है अभिव्यक्ति।

हाँ!
मैंने भी दी है
परीक्षा
जीवन के हर मोड़ पर
रिश्तों के हर जोड़ पर
कोरे कागजों पर बिखर कर
उकेरी है मैंने भावनाओं के रंग
अंकित किया है
अपने खालीपन को
उन गड्ढों को
जहाँ मैं लड़खड़ा
जाया करती थी।

सच!
भरा है यह जीवन
अनगिनत परीक्षाओं से
जिसका न कभी
हल निकलता है
न कभी होती है खत्म
बस
इक इंतज़ार रहता है
आसान होगी इसबार
होने वाली परीक्षा
न भय होगा
न प्रलय होगा
एक सहारा होगा
एक सुकून होगा
एक साथ होगा
तुम्हारी सांसों का!
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हवा का झोंका

तुम्हारा अचानक आना
और
अचानक ही चले जाना
ऐसा लगा
एक
हवा का झोंका
बस गुजर गया
झर गए हरसिंगार के फूल
फैल गई खुशबू
और
मैं थम गई
मखमली दूबों की चादर पर
बोझिल होती पलकों के तले
मैं बुत बन गई
ख्वाबों का एक रेशमी दुपट्टा
इस हवा के झोंके से
उड़ आया था
संग उड़ आए थे
मेरी झिलमिल खुशियाँ
मैं खुश थी
बहुत खुश
इतनी कि
एक विनती है
तुम दुबारा न आना
मुझे पसंद है
हवा का यही नर्म झोंका
कोई आंधी नहीं ...
कोई बवंडर नहीं ...
इसलिए
तुम वापस न आना
मैं जी लूंगी
इस अहसास के साथ
जो दे कर गुजर गया
हवा का झोंका ।
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जीत की खुशी

हे प्रिय!
एक स्त्री का मन
अपने प्रेमी के चेहरे पर
तमाम मुश्किलों से लड़कर
हमेशा जीत की खुशी के रंग
देखना चाहा है
मगर
तुम तो ठहरे
आदत से मजबूर
तुमने
बलात, हठात
कोमल हृदय को वश में करने में ही
अपनी जीत माना है
और इस छलावे को ही
जीत की खुशी!

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अशोक नगर, रांची - 834002

1 comment :

  1. दिल को छू लेने वाली कविताएँ

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