काव्य: व्यग्र पाण्डे

- विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' (व्यग्र पाण्डे)

माँ...

वादा करके
आया था संसार में
जो जीव
परमात्मा से
ये सोचकर
हर पल करूँगा
स्मरण तेरा
रोया भी बिछुड़ने पर
पर जब आँख खोली
तो पाया उसने
माँ की शक्ल में
परमात्मा को
मुस्कुराते हुए
वो विस्मित सा
आश्चर्यचकित
लिपट गया
उसके आँचल से
कभी माँ को देखता
कभी उसे करके स्मरण
मुस्कराता
पर ये संसार
समझ ना पाता
उसकी इस ऊहापोह को
माँ से मिलने के बाद
भूल गया
उससे बिछुड़ने का गम
रटने लगा वह केवल
अब  माँ...  माँ...  माँ...
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 ऐ जिंदगी!

तू कितने रंग दिखलायेगी
ऐ जिंदगी!
तेरे इन रंगो से मैं
अब डरने लगा हूँ

तू कभी प्यारी थी
न्यारी थी
तेरी मेरे प्रति
खुद्दारी थी
नित बदलते रूप से
अब डरने लगा हूँ

तू बदलने लगी
मौसम की तरह
तेरी हर करवट
लगे गम की तरह
हर आहट से मैं
अब डरने लगा हूँ

हुआ है तेरा स्नेह
कोसों दूर जबसे
खुशियों की बस्ती
बस गयी दूर मुझसे
तनिक मुस्कान से तेरी
अब डरने लगा हूँ

मित्र सब दूर हुए
छोटे सब हुजूर हुए
देख तेरा मज़ाक
चेहरे सब बेनूर हुये
बेरुख़ी तेरी से मैं
अब डरने लगा हूँ

तू कभी हसीन थी
लगती आज कमीन है
जमते जहाँ थे पैर मेरे
फिसलन भरी जमीन है
तेरे झकझोरने से मैं
अब डरने लगा हूँ
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पतंगें उड़ रही हैं

पतंगें उड़ रही हैं बैठ डोरी आगे बढ़ रही हैं
लाल पीली हरी अनेक रंगों की
उड़ रही आकाश में चाहत उमंगों की
नई मंजिल गढ़ रही हैं
पतंगें उड़ रही हैं

बच्चों का उल्लास देखो
और उनका प्रयास देखो
कोई नीची कोई ऊँची
हर पल ऊपर चढ़ रही हैं
पतंगें उड़ रही हैं

रुक जाती हवा जब जब
दम घुटती उनकी तब तब
देखकर ऐसी दशा को
सबकी धड़कन बढ़ रही है
पतंगें उड़ रही हैं

शून्य भरे आकाश में
बसा ली है जिसने बस्ती
तन-तनकर जता रही है हक़परस्ती
इस अति उत्साह में
अपनों से ही लड़ रही है
पतंगें उड़ रही हैं

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