आकाश में दरार - भाग 1 (चार अंकों में समाप्य, धारावाहिक कहानी)

प्रभु जोशी

- प्रभु जोशी

4, संवाद नगर, नवलखा, इन्दौर 452001 मध्यप्रदेश
ईमेल: prabhu.joshi@gmail.com

स्टील के उस चमकते चाकू को अपने दाहिने हाथ में लेने के बाद मैंने बहुत हौले से उसे अपने बायें हाथ की अंगुलियों पर घुमाया और पाया कि उसकी धार वाकई बहुत तेज है, जिसके चलते वह एकबारगी ही में पेट की त्वचा को पूरी चीर डालेगा। बिलकुल सीधी रेखा में। मेरे हाथों में उसे थामते ही एक अजीब-सी उत्तेजना भर आयी, जो अंगुलियों के पोरों में हस्ब-मामूल-सी सनसनी भर रही थी। यह शायद इसलिए भी था कि ऐसी हिंसा का मेरे लिए यह पहला मौका था, जबकि घर के संस्कारों ने तिलचट्टों या छिपकलियों तक को भी मारने पर मन में गहरे तक पाप-बोध भर जाने की पूरी व्यवस्था करवा दी थी।

इस समय वह मेरी आँखों के ठीक सामने बिना हिले-डुले चित्त-सा असहाय लेटा था। मैं यह सोचकर थोड़ा-सा सिहर गया कि इस निरीह को इस बात का कहाँ अहसास होगा कि किसी भी क्षण एक तीखा चाकू चलेगा और उसके पेट को ऊपर से नीचे तक खोल देगा। नतीजतन खून की धारें छूट पड़ेंगी। और मुझे उसके धड़कते दिल को देखने की एक थ्रिल महसूस होगी।

मैंने चाकू को पुख्ता एहतियात के साथ पकड़ा और उसके मोटे और चपटे पेट की चिकनी और पतली त्वचा पर उसकी तीखी नोंक को धंसाने वाला ही था कि अचानक मेरी पीठ पर किसी का हाथ आ गया।

क्षण भर के लिए मैं अकबका गया। सामने प्रकाश था। अरे ये यहाँ कैसे आ गया अभी बारह बजे के मेटिनी शो में धर्मेन्द्र की, एक नई हीरोइन राखी के साथ आयी फिल्म देख कर निकलने के बाद गुमटी पर चाय पीते हए यह तय किया गया था कि अब हम रविवार को ही मिल पायेंगे क्योंकि, उसे सेंधवा जा कर आक्ट्रॉय नाके के लफड़े में फंसे भाई को पुलिस से छुड़वाना है। फिर क्या नयी बात हो गयी? मैंने देखा उसकी आँखों में ऐसी हवाइयाँ उड़ रही थीं, जैसे वह किसी खौफनाक दृश्य को पीछे छोड़ कर दौड़ता-भागता मेरे पास आया हो।
 उसकी साँस बेतरह “फूल रही थी।

“बंद कर ये सब और चल जरा बाहर आ तो।” उसने लगभग मुझे खींचते हुए कहा। उसकी आवाज के ऊँचे स्वर और चेहरे की बदहवासी ने एकाएक वहाँ मौजूद लोगों को चैंका दिया और वे सब के सब मेरी तरफ देखने लगे।
दरअसल, बदहवासी के बीच प्रकाश बिना किसी किस्म की औपचारिकता का ध्यान रखते हुए लगभग धड़धड़ाता-सा सीधे-सीधे हमारी बायोलॉजी की उस लैब में घुस आया था, जहाँ हम सब बी.एस.सी. के प्रथम वर्ष के छात्र पहली बार मेंढक का डायसेक्शन करने जा रहे थे। क्योंकि इस सप्ताह के प्रैक्टिकल का यह आखिरी पीरियड था और साढ़े चार बजने को आये थे। मैंने हाथ का चाकू अपने डायसेक्शन-बॉक्स में जस का तस रखा। सामने की ट्रे जिसमें क्लोरोफार्म दे कर बेहोश किया गया मेंढक चित्त पड़ा हुआ था, लेब-अटैण्डेण्ट श्यामू को सौंपी, और बाद इसके अपनी रिकॉर्ड-बुक और डायसेक्शन-बॉक्स टेबिल की दराज में रख कर लैब से बाहर आ गया।

“देख तू बिल्कुल घबराना मत यार।” उसने मुझे किसी अप्रत्याशित सूचना से पैदा होने वाले झटके को झेल सकने के लिए तैयार करने के इरादे से कहा फिर मेरे कंधे को अपनी बाँह से घेरते हुए आगे बोला, “दरअसल, ऐसा है कि यार तेरे पिताजी बीमार हैं और उन्हें गाँव से ट्रैक्टर में डाल कर जिला-अस्पताल में लाया गया है। साथ में तेरी माँ भी है। हालत थोड़ी गंभीर जरूर है, लेकिन मैंने उन्हें भर्ती करवा दिया है।” बाद इसके थोड़ा रूक कर कहने लगा-” हुआ ये कि मैं अस्पताल में अपनी माँई की बीमारी का सर्टिफिकेट बनवाने गया था तो वहाँ मुझे तुम्हारी माँ दिखी। वे जाने कैसे पहचान गयीं और बोली, “कंई तम परकास भइया हो? परभू का गोंई? जराक मदद करई दो तो इणके डाक्तर साब भरती करी ले-- फिर कहा कि मैं तुमको खबर भी कर दूँ।”

सुनते ही लगा, जैसे मेरी टांगों की नब्जों में बहता खून एकाएक जम गया है और वहाँ पिण्डलियों पर बर्फ के चाकू से ढेरों ठण्डी लकीरें खींच दी गयी हैं। लगने लगा अब मुझ से एक कदम भी नहीं चला जा सकेगा। ये कतई समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि पिताजी को गाँव से सौ किलोमीटर दूर के जिला अस्पताल में इलाज के लिए लाना पड़ा है? क्षण भर में आँखों के नीचे पिता जी की लहीम-शहीम सी लहूलुहान देह घूम गयी, जिसे जगह-जगह चाकुओं से गोद दिया गया है। मुझे सहसा एक महीने पहले डाक से आया हरिगुरू से लिखवा कर भिजवाया गया, माँ का वह खत भी याद हो आया, जिसमें उसने ताऊजी द्वारा पटवारी को पटा कर कुँए वाले खेत पर जबरन अपना नामान्तरण करा लिये जाने की बात लिखी थी, और यह भी लिखा था कि कुँए में पानी की आवक बढ़ाने के लिए वह उसे गहरा करवा रही थी तो ताऊजी ने इस पर रापटरौल्या मचा कर काम रूकवा दिया है। तो मैंने उसे लिखा भी था कि कोई बात नहीं, फिलहाल वह अपनी तरफ से कुछ भी न कहें। मैं पढ़ाई पूरी कर के लौटूंगा और हम अपनी एक-एक इंच जमीन वापस ले लेंगे।

बहरहाल, इस समय तो मेरे भीतर अविलम्ब सिर्फ पिताजी को देखने की बेसब्री भर चुकी थी और मैंने इसी कोशिश में प्रकाश की खड़खड़िया हरक्यूलिस साइकिल चलाने के लिए आगे बढ़कर, जैसे ही हेण्डिल पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, उसने तत्परता से कहा, “नहीं यार, तू साइकिल नहीं चला पायेगा। बस तू तो फटाकदनी से पीछे केरियर पर बैठ जा। मैं तुझे लेकर चलता हूँ।” मैंने कहा कि कुछ देर के लिए मैं अपने किसी क्लासमेट की साइकिल मांग लेता हूँ तो उसने डपट दिया। “ये सब मांगने-धूंगने का पचड़ा छोड़ यार और मैं कह रहा हूँ, तू चुपचाप बस केरियर पर लद जा।”

और, अब हम कॉलेज परिसर से निकल कर सर्राटे से साइकिल से अस्पताल रोड की ओर जा रहे थे।
प्रकाश तेजी से अपनी खटारा साइकिल के पैडिल मारे जा रहा था और पीछे केरियर पर बैठा हुआ मैं न जाने कितनी-कितनी आशंकाओं-कुशंकाओं के बीच डूबने-उतराने लगा था। मेरी आँखों के नीचे सहसा दो वर्ष पहले का, मन में रह-रह कर टीस मारते रहने वाला वह दृश्य घूम गया, जब मुझे शहर में पढ़ाये जाने के लिए घर में बात उठी थी। तब पिताजी के सबसे बड़े वाले भाई, जिन्हें घर में लगभग धर्मराज का-सा ओहदा और आदर प्राप्त था, ने ठेठ मालवी में धुर्रे बिखेरती, कलेजा-फोड़ गालियों का ऊँची आवाज में धारावाहिक प्रयोग करते हुए फैसला सुनाया था कि ये बात तो तू कान खोल के सुन ले आनन्दी, छोरे को बायर भणाने की जुगत में जमीण बेचणे की बात कर रिया है, पण ये समझ लेणा कि बंटवारा तो एक बिस्वा जमीन का भी नीं होणे दूंवा। ....जा तेरे से बणे वो करी ले... जमीन बाप दादाओं के समय से शामलात खाते की है और इसी खाते में रहेगी और यदि किसी ने भी बंटवारे की बात की तो खून से कपाल भेरू हुइ जायगा, समझे! याद कर जरा पाँच साल पहले जब तेरी, छोरी धापूड़ी के ब्याव की बखत पाँच बीघे बेंची थी और फिर दायजी के नुक्ते में दो बीघे। अब तो अंगुल भर नहीं बेचेंगे। बाद इसके उन्होंने पिताजी को हड़काते हुए कहा था, “आनन्दीलाल, तू बता तेरी बईरां ने अपने पेट से ऐसी कौन सी ऋषि-संतान पैदा कर दी है, जिसके दिमाग के लिए यहाँ का इस्कूल छोटा पड़ गया है? और जिस्के वास्तू तू छोरे को भणने के लिए सौ कोस दूर जिले भेज रिया है? वां पढ़ के वो कोई अहलकार नंई हो जायगा, समझे! पोपसिंह पटेल के लौण्डे को देखा नंई क्या? वहाँ सेरगाम जा के वो आक्खा लम्पट और लबार हो गया और लौटा तो जेब में धर रखा था, हेमा मालनी का फोटू और कंधे पे था, ट्रांजिस्टर! हाँ ऊ ने पैजामा छोड़ के पतलून पेन्ह के खडे खडे बेसरमी से मूतना जरूर सीख लिया पण बता तू कि वो खाकी पतलून पहना बेज-बिल्ला वाला कोतवाल हो गया क्या?” बाद इसके अपने फेफड़े में ढेर सारी सांसें खींच कर और अधिक पिन्नाटे के साथ बोले थे- “अरे ओ घुन्ने मिथारे औन्दाड़े “आनन्दी! अक्कल से काम ले रे, अक्कल से... और अपनी इस घाघरा-पल्टण के केणे में आ के घर बाळ के तीरथ करने की सिड़ल्ई मत कर। जादे-से-जादे येई होगा नी कि तेरा ये सपूत चार अच्छर कम सीखेगा, लेकिन, घर की खेती-बाड़ी देखेगा तो भी इस्की जिनगी चैन से कट जायगी। अरे मालक के तो पाँव का भी खेत में खाद लगता है, रे, समझे! टिल्लू पम्प लगा के पीवत की खेती करेगा तो उसको पिराणे से बैलों के पोंद गोदणे की जरूरत नी पड़ेगी। बीघे भर में भी क्विंटलों से मेक्सिकन गेहूँ उतरेगा। समझा के नी?”

[अगले अंक में जारी]

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