वैज्ञानिक दृष्टिकोण और गांधी दर्शन

अंकिता मिश्रा

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सार  
           हर तरफ वैज्ञानिक दृष्टिकोण व वैज्ञानिक मनोवृत्ति के विकास को लेकर चर्चा की जा रही है। ऐसे कौन से कारण हैंजिनकी वजह से इस अवधारणा को इतनी तरजीह दी जा रही है। वजह बिल्‍कुल साफ है- तर्क  के आधार पर विवेचना और फिर परिणाम की बात करना ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अवधारणा में छिपे मूल बिंदु हैंजिनकी आवश्‍यकता आज ऐसे समाज को है जोकि विकास के पायदान पर स्‍वयं को खड़ा ही नहीं रखना चाहता है बल्कि विकास की ऐसी सीढ़ी चढ़ना चाहता है जो उसे अन्‍य समुदायदेश व समाज के समक्ष दृढ़ता से खड़ा करेगी।

हम सभी जानते हैं कि मौजूदा दौर विज्ञान और तकनीकी का है। इसके बगैर हम एक विकसित देश और सुदृढ़ समाज की कल्‍पना भी नहीं कर सकते हैं। यही वजह है कि चंहु ओर हमें यही आवाज सुनाई देती है कि हमें विज्ञान और तकनीकी के साथ कदमताल करते हुए आगे बढ़ना हैलेकिन इस बात का भी ख्‍याल करना है कि हम अपने पुराने मूल्‍यों को न खोएँ। राष्‍ट्रीय विकास के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना आज की जरूरत बन चुका है। सभी तर्कशील होकर ऐसे निर्णय की ओर बढ़ें जोकि समग्र विकास की ओर ले जाने वाला हो। गांधी भी यही कहते थे कि विज्ञान और संसाधनों का उपयोग ऐसा हो जो उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करे न कि गर्त में ले जाने वाला हो। मशीनों  का अधिक उपयोग को वह अच्छा नहीं मानते थे। आज हम देख रहे हैं कि मशीनीकरण ने बहुत सुविधाएँ अभी दी हैं लेकिन जीविका से जुड़ी अनेक समस्याएँ भी खड़ी कर दी हैं। विकास की होड़ में जिस तरह से पेड़ों और जंगलों का विनाश किया गया उसका परिणाम हम देख ही रहे हैं। गांधी जी कहते थे कि प्रकृति हमारी जरूरतों को पूरा कर सकती है लेकिन हवस को नहीं। जल संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है। जल संचय और जल के सदुप्रयोग की भावना जब तक जनमानस में नहीं उपजेगी तब तक सही समाधान नहीं होगा। इसके लिए लोगों की मनोवृत्ति में बदलाव लाना आवश्यक है। यह एक दिन में होने वाली चमत्कारिक घटना नहीं है बल्कि सतत प्रयास और समवेशी दृष्टिकोण के विकास को बढ़ावा देने की पहल को आगे लाना होगा। जब समाज इस तरह की सोच को तरजीह देने लगता है वही से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास का बीज प्रस्फुटित होता है। जब हम किसी भी घटना के पीछे के कारण और प्रभाव के बारे में सोचने लगते हैं वही से ऐसी सोच आगे बढ़ती है।

प्रमुख शब्द- वैज्ञानिक दृष्टिकोण , विज्ञान संचार , समग्र विकास
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प्रस्तावना –
देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के विज्ञान के प्रति अगाढ़ प्रेम को तो हम सभी जानते ही हैं। 1956 में वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी को बढ़ावा के उद्देश्‍य से उन्‍होंने देशभर में कई आईआईटी और सीएसआईआर लैब खोलीं। उनका कहना था कि ये वैज्ञानिक संस्‍थान देश के लिए ‘हार्डवेयर’  हैं और लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास ‘साफ्टवेयर। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उसके महत्‍व को लेकर उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक ‘डिस्‍कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा है। इसे उन्‍होंने 1946 में अहमदनगर किले की जेल में रहते हुए लिखा। उन्‍होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कुछ इस प्रकार से व्‍यक्‍त किया है- ‘समाज का प्रत्‍येक वर्ग ज्ञानवान हो। उसमें ज्ञान-विज्ञान के आधार पर तर्क करने की शक्ति हो। कोई किसी की कही और सुनी हुई बातों पर विश्वास न करे बल्कि स्वयं के अवलोकन और विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिक ढंग से अपनी बात को रखे।’ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर उनकी इस तरह की सोच व्यक्तिगतसामाजिक और राष्ट्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि आवश्यक है। इसके बिना आधुनिकता का लिबास पहने होने के बावजूद भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता है। ये तो कुछ ही दृष्‍टांत हैं जो इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि वैज्ञानिक दृष्‍टकोण के बगैर एक राष्‍ट्र उसी तरह है जिस प्रकार से बगैर डोर की एक पतंग।

विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के द्वारा वे तमाम मुश्किलें हल की जा सकती हैं जिनसे आज हमारा देश जूझ रहा है। इनमें भ्रष्‍टाचारस्‍वास्‍थ्‍यशिक्षा और अंधविश्‍वास जैसी तमाम बुराईयां शामिल हैं। विकसित वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल करते हुए पार‍दर्शिता की भावना को साथ लिए ऐसे उपकरणों और तकनीकी का उपयोग करें । यह तभी संभव हो पाएंगा जब लोगों में शिक्षा का स्‍तर बढ़ेगा और उन तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबं‍धित उच्‍च तकनीकी सेवाएं पहुंचें। इसके साथ-साथ यह भी आवश्‍यक है कि उनमें जागरुकता का स्‍तर बढ़े। बेहतर शिक्षा ही लोगों को बेहतर भविष्‍य प्रदान कर सकती है। यह हम सभी जानते हैं। लोगों की मनोवृत्ति वैज्ञानिक होवे हर कार्य को वैज्ञानिक ढंग से करें। इसके लिए आवश्‍यक है कि उनकी सोच वैज्ञानिक हो। अशिक्षा और अंधविश्‍वास के कारण हमें लोगों में इसकी कमी दिखती है। लेकिन कहीं-कहीं तो ऐसी स्थितियां नजर आती हैंजिनकी कल्‍पना हम नहीं कर सकते हैं। लोग शिक्षित भी होते हैं और विज्ञान-तकनीकी के साथ कदमताल करने वाले भी। इसके बावजूद भी उनकी सोच वैज्ञानिक नहीं हो पाती है। यह बात तो ठीक उसी तरह से हो गई ‘दीपक तले अंधेरा। इसका उदाहरण हम इस बात से समझ सकते हैं।

आईआईटी दिल्‍ली के गेट के बाहर शनिदेव का मंदिर है। इस संस्‍थान में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का अनुपम संयोजन हमें यहां देखने को मिलता है लेकिन ऐसी स्थिति निराशाजनक है कि संस्‍थान की परीक्षाओं में उत्‍तीर्ण होने के लिए यहां पढ़ने वाले छात्र परीक्षा देने से पूर्व शनिदेव की मूर्ति पर तिल और तेल चढ़ाना नहीं भूलते हैं। पूजा-अर्चना करना अलग बात हैलेकिन अंधविश्‍वासी होकर मान्‍यताओं को कंधे पर ढोना यह दर्शाता है कि दिखावे में तो हम इक्‍कीसवीं सदी में जीना चाहते हैंलेकिन असल में हम अंदर से अट्ठारहवीं सदी में ही जी रहे होते हैं। हम सभी जानते हैं कि सही ढंग से अध्‍ययन करने पर ही हम परीक्षा में उत्‍तीर्ण हो सकते हैंफिर भी हम दकियानूसी क्रिया-कलापों को अंजाम देने में लगे रहते हैं। समाचार पत्रों और चैनलों पर ऐसे समाचारों और कार्यक्रमों की भरमार रहती है। उदाहरण के लिए देश के एक प्रतिष्ठित अखबार ‘हिंदुस्‍तान’ के कानपुर संस्‍करण में इस बात का जिक्र एक संत के उद्बोधन से किया गया कि बार-बार ‘ओम् नम: शिवाय’ का जप करने से कर्ज से मुक्ति मिलेगी। भला ऐसा कही हो सकता है। यदि ऐसा हो जाय तो नामी उद्योगपति विजय माल्‍या को तो तुरंत ही अपने ऊपर लदे कर्ज के बोझ से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसी भ्रामकअवैज्ञानिक और तर्कहीन जानकारियां यदि समाचार पत्र परोसेंगे तो वह समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। समाचार चैनलों पर भी सुबह-सुबह राशिग्रह और नक्षत्रों के नाम पर शुभ-अशुभहानि-लाभक्‍या करेंक्‍या न करें जैसी बातें प्रोफेशनल ज्‍योतिशास्‍त्री लेकर आ जाते हैं और लोगों को अपनी लुभावनी बातों में फंसाते हैं। शक्ति यंत्र खरीदिए इससे घर की सारी परेशानी दूर हो जाएंगी। भला ऐसा करने से सारी मुश्किलों का हल मिल जाता तो ये युक्तियाँ सबसे पहले उन लोगों को अपनानी चाहिए जिनका जीवन संकट में है। इस तरह के कृत्‍य और घटनाएँ बताती हैं कि समाज आज भी दूसरों द्वारा बताई गईं  बातोंअतार्किक और अवैज्ञानिक ढर्रे चलने वाले क्रिया-कलापों में ही संलिप्‍त है। उसके अंदर सोच तो हैलेकिन उसे वैज्ञानिक जामा पहनाने की जरूरत है। तभी उसकी दृष्टि बदलेगी। यदि हम चाहते हैं कि बच्‍चे भी वैज्ञानिक ढंग से चीजों को देखें और समझें तो इसके लिए आवश्‍यक है कि उन्‍हें घर में और बाहर ऐसा माहौल मिले जोकि उन्‍हें तार्किक आधार पर विश्‍लेषण करनेचीजों को जाँचने और समझने की क्षमता प्रदान करे। इसके लिए माता-पितापरिवार के अन्‍य सदस्‍यों और स्‍कूल के शिक्षकों को विशेष ध्‍यान देना होगा। अब इससे ज्‍यादा जरूरी यह है कि माता-पिता और शिक्षकों में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो और वे इस भावना और सोच को बेहतर तरीके से भावी पीढ़ी तक पहुंचा सकें। माता-पिता और शिक्षकों में वैज्ञानिक सोच और मनोवृत्ति विकसित करने और इसको बढ़ावा देने में संचार माध्‍यम अपनी भूमिका निभा सकते हैं। तरह-तरह के कार्यक्रम व जानकारियां संचार माध्‍यमों द्वारा प्रकाशित और प्रसारित की जा रही हैं जोकि लोगों में वैज्ञानिक सोच और वैज्ञानिक मनोवृत्ति को बढ़ावा देने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बच्‍चों की सोच वैज्ञानिक हो और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हो। इससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण यह है कि परिवार और शिक्षक उन्‍हें इस ओर अग्रसर करने के लिए आगे आएँ। यह हमें स्‍वयं तय करना होगा कि हम विज्ञान के रास्‍ते पर चलकर किधर जाना चाहते हैं। विज्ञान को चमत्‍कार समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। विज्ञान जीवन और समाज से जुड़ा हुआ सबसे बुनियादी विचार है। समाज जितना विज्ञान मुखी होगावैज्ञानिक तकनीकी उतनी ही सामाजिक रूप से उपयोगी होगी। मानव सभ्‍यता की देन विज्ञान ही है। वैज्ञानिक सोच को विकसित करना एक दिन का काम नहीं है बल्कि सतत प्रक्रिया है जिसकी शुरुआत शिशु के गर्भ में आने से ही शुरू हो जाती है।

क्या है वैज्ञानिक दृष्टिकोण-
  • "वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी व्‍यक्ति के तर्कशील सोचविश्‍लेषणात्‍मक अभिव्‍यक्तिक्रमबद्ध और सुव्‍यवस्थित तरीकोंउपयुक्‍त आचार-व्‍यवहार और उत्‍कृष्‍ट कार्यपद्धति तथा विवेकशील निर्णय लेने की क्षमता को प्रतिबिम्बित करता है। यह किसी व्‍यक्ति के आमूलचूल व्‍यक्तित्‍व उसके व्‍यवहार और तार्किकता पूर्ण कार्य पद्धति को दर्शाता है।"[1] उदाहरण के तौर पर हम देखेंगे कि मौजूदा दौर में ज्‍यादातर लोगों को इस बात की जानकारी है कि जन्‍म कुंडली हमारे जीवन को इस तरह से प्रभावित नहीं करती हैजैसा कि हम सोचते हैं। हम सभी ने अपने आस-पास कई बार यह कहते हुए सुना होगा कि लड़का या लड़की मंगली है। इसलिए ऐसी वर या वधु चाहिए जोकि मंगली हो। अमंगली से शादी करना अशुभ होता है। जबकि ऐसा सोचना गलत है। इस तरह की कई बातें हमारे समाज में हमें अक्‍सर सुनने को मिलती हैं। जिनका वास्‍तविकता से कोई संबंध नहीं हैं। इस बात को बहुत से लोग जानते हैंफिर भी लड़के या लड़की की शादी करने से पहले इस तरह की बातें अवश्‍य सोचेंगे। इस तरह की सोच हमें बताती है कि व्‍यक्ति को जानकारी तो हैलेकिन उसमें वैज्ञानिक सोच यानि वैज्ञानिक मनोवृत्ति का अभाव है। इसलिए यह आवश्‍यक नहीं है कि जिसे विज्ञान की जानकारी हो उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी हो। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि ऐसा भी हो सकता है कि जिसे विज्ञान की जानकारी न हो लेकिन उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो । यदि ऐसा हो कि संबंधित को वैज्ञानिक जानकारी भी हो और उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी हो। इससे प्रभावशीलता और भी बढ़ जाती है। दोनों ही स्थितियां एक दूसरे की पूरक हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण व मनोवृत्ति को विकसित करने के लिए कुछ आवश्‍यक तत्‍व भी हैं जिन पर हमें ध्‍यान देना होगा।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए आवश्‍यक है कि व्‍यक्ति के अंदर प्रश्‍न पूछने की इच्‍छा, हर एक जानकारी और स्थिति के बारे में गहराई से जानने की इच्‍छा व प्रवृत्ति होना आवश्‍यक है। यह तभी संभव है जब व्‍यक्ति में जिज्ञासात्‍मक प्रवृत्ति हो।
  • दूसरा महत्‍वपूर्ण आवश्‍यक तत्‍व है जानकारी को एकत्र करना। जब व्‍यक्ति के अंदर किसी चीज को लेकर जिज्ञासा उत्‍पन्‍न होती है तो उसकी शांति के लिए आवश्‍यक जानकारी जुटाना। संबंधित घटना या वस्‍तु के बारे में विधिवत् जानकारी प्राप्‍त करके जिज्ञासा को शां‍त किया जा सकता है। व्‍यक्ति को जानकारी के लिए किताबें, पत्र-पत्रिकाएं पढ़नी पड़ेंगी। संचार माध्‍यमों द्वारा प्रकाशित व प्रसारित सामग्री भी इसके लिए महत्‍वपूर्ण साबित हो सकती है।
  • वैज्ञानिक जानकारी से संबंधित अगला आवश्‍यक चरण है विश्‍लेषण करने की क्षमता। प्राप्‍त जानकारी को पढ़कर और समझकर विश्‍लेषणात्‍मक तरीके से जानकर ही उचित निर्णय पर पहुंचा जा सकता है।
  • प्राप्‍त वैज्ञानिक जानकारी का विश्‍लेषणात्‍मक अध्‍ययन करने के पश्‍चात उसका प्रायोगिक सत्‍यापन भी आवश्‍यक है। जानकारी को दैनिक जीवन से संबंधित घटनाओं से जोड़कर व समझकर आजमाया जा सकता है।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अंतिम चरण है किसी ठोस निर्णय पर पहुंचना। जिज्ञासा उत्‍पन्‍न होने पर जानकारी को प्राप्‍त करना, प्राप्‍त जानकारी का विश्‍लेषण करने के पश्‍चात उसका प्रायोगिक सत्‍यापन करना। इतना सब कुछ करने के बाद की स्थिति आती है किसी ठोस निष्‍कर्ष पर पहुंचना। प्रयोगों और प्रमाणिकता के आधार पर ठोस निर्णय पर पहुंचा जा सकता है।

डॉ. मनोज पटैरिया और डॉ. संजीव भानावत द्वारा संपादित पुस्‍तक ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संचार माध्‍यम’ में विज्ञान संचार को प्रो. ए एल भाटिया ने कुछ इस तरह से वर्णित किया है।[2] "वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी व्‍यक्ति विशेष का हो सकता है और पूर्ण समुदाय का भी। यह समग्र हो सकता है। जब व्‍यक्ति विशेष की बात करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि उस व्‍यक्ति के अंदर जो समाया हुआ है और समग्रता का अर्थ किसी विशिष्‍ट विषय से अलग हटकर भी अन्‍य विषयों को समाहित कर लेना। वैज्ञानिक सोच वाले व्‍यक्ति जो बहुत अच्‍छे वैज्ञानिक सिद्ध हुए हैं और जिन्‍होंने समाज की नींव रखी है उनमें विज्ञान के साथ-साथ संगीतसाहित्‍य,  कलाअर्थशास्‍त्रभूगोलराजनीतिशास्‍त्रसमाजशास्‍त्र में भी अभिरुचि व प्रसिद्धि प्राप्‍त की। वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही वास्‍तव में सभ्‍यता का आधार रहा है। सभ्‍यताओं में जिस प्रकार से परिवर्तन होते रहे हैं उनके पीछे उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक सोच रही है। इटली के प्रसिद्ध लिओ नार्द द विंसी ने इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पूरे तकनीकी समाज को बदल डाला।"

ऐसे कई उदाहरण हैं जो इस तरफ इशारा करते हैं कि अधिक विश्‍वास और अंधविश्‍वास दोनों ही खतरनाक होते  हैं। हमें यथार्थ के प्रति आशावादी होना चाहिए। लाहौर की सेंट्रल जेल में रहते हुए देशप्रमी और युवाओं में एक नई स्‍फूर्ति भरने वाले क्रांतिकारी नेता भगत सिंह ने नास्तिकता के ऊपर एक लंबा लेख भी लिखा था जोकि  27  सितंबर 1931 को लाहौर के अखबार ‘द पीपल’  में प्रकाशित भी हुआ। मैं ईश्‍वर के अस्तित्‍व को नकार कर आस्‍थावादी लोगों आहत करने की कोई मंशा नहीं रखता हूँलेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि सच क्‍या है। ईश्‍वर में मनुष्‍य को सांत्‍वना देने वाला आधार मिल जाता है। सिर्फ ईश्‍वर को मानने या न मानने से बात नहीं बनेगी। जो व्‍यक्ति अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्‍त रू‍ढि़गत विश्‍वासों को चुनौती देनी होगी। उनकी यह सोच कहीं न कहीं वैज्ञानिक मनोवृत्ति से ही अभिप्रेरित नजर आती है। उन्‍हें अपनी मौत का कोई भय नहीं था। वे इस जन्‍म और मरण के बंधन से भी मुक्‍त थे। कर्म करने से ही बात बनती है। पनर्जन्‍म जैसी कोई चीज नहीं होती है। वे फाँसी के फंदे पर चढ़ने के लिए जाएंगे तो यह सोचकर नहीं कि उनका अगला जन्‍म बेहतर होगाबल्कि यह सोचकर ही उन्‍होंने अपनी  देश और भूमि के लड़ाई में जान न्‍यौछावर की है जोकि उनके लिए गर्व की बात है। ऐसे अनेक वाकये और घटनाएँ हैं जिन्‍हें हमें स्‍वयं खोजना होगा जोकि हमें तार्किक सोच के लिए प्रेरित करती हैं।

यह बात हम सभी जानते हैं। पाषाण युग से व्‍यक्ति ने नव पाषाण युग में कदम रखा। इसकी प्रगति का आधार भी विज्ञान ही रहा। पत्‍थर की रगड़ से आग की उत्‍पत्ति हो या फिर पहिए का आविष्‍कार। इन सभी के पीछे विज्ञान ही रहा है। आदि मानव द्वारा पत्‍थरों को रगड़कर उपयोगी औजार बनाना भी विज्ञान की ही परिणति है। पत्‍थर की रगड़ से निकली चिंगारी ने आग को जन्‍म दिया। यह घटना भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सीधा संबंध रखती है। किसी ने इस बात पर गौर तो किया होगा कि दो पत्‍थरों को रगड़ने से एक चिंगारी उत्‍पन्‍न होती है जोकि प्रकाश में बदल सकती है। चिंगारी से उत्‍पन्‍न आग का उपयोग आदि मानव ने भोजन को पकाने में किया। यह घटना कोई आम घटना नहीं थी बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित थी। यदि हम अपने आस-पास के सामाजिक जीवन पर नजर डालेंगे तो इस तरह के तमाम उदाहरण हमें मिल जाएंगे जोकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जुडे़ हुए हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इसका वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक संबं‍ध-
यदि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इसके उपादानों व महत्‍व के बारे में बात करते हैं तो हमें सबसे पहले यह भी जानना होगा कि समाज में व्‍याप्‍त ऐसी कौन सी बुराईयां हैं जिनके निवारण के लिए इसका होना महत्‍वपूर्ण है। परंपरा और संस्‍कृति का सहारा लेकर समाज में ऐसे लोग भी सक्रिय है जोकि रूढि़यों को बढ़ावा दे रहे हैं। धर्म की आड़ में धर्मान्‍धता की झकड़ा जड़ों को फैलाने का भी काम कर रहे हैं। अंधविश्‍वास और जादू-टोना भी इसका प्रमुख हिस्‍सा है। पाखंड और कुरीतियों को यदि हमें समाज से जड़ से उखाड़ फेंकना है तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही सबसे सशक्‍त और कारगर युक्ति है जोकि इस कार्य को करने के लिए कारगर है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने में अंधविश्‍वास आड़े आता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण व वैज्ञानिक मनोवृत्ति मस्तिष्‍क की एक प्रवृत्ति है- खुला तार्किक मस्तिष्‍कप्रश्‍न करने वालाजिज्ञासु और आलोचनात्‍मक मस्तिष्‍क – बीते हुए कल के बजाय आने वाले कल का मस्तिष्‍कअवरोधों का विरोध करने वाला और परिवर्तन के लिए लचीला मस्तिष्‍क। ऐसी स्थितियां निर्मित होने पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए माहौल बनता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को व्‍यापकता प्रदान करने में अंधविश्‍वास बाधक बनता है। बार-बार हम अंधविश्‍वास की बात करते हैंइसलिए इसको जानना भी जरूरी है। अंधविश्‍वास आखिर है क्‍याइसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्‍या हैइस पर भी हमें बात करना आवश्‍यक है। किस प्रकार से यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। गार्गी प्रकाशन की ओर से प्रकाशित पुस्‍तक ‘विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया’ में वाई. नायडुम्‍मा ने विज्ञान और अंधविश्‍वास एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संबंधित मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर विस्‍तृत चर्चा की है।
  • अलौकिकता के प्रति विश्‍वास [3]
  • अज्ञात के लिए अतार्किक भय
  • रहस्‍यमय और गलत रास्‍ते पर आधारित रिवाज या विश्‍वास
  • अज्ञात मत को लेकर भय या अतार्किक विस्‍मय
  • बिना किसी आधार के भय और अज्ञानता पर आधारित विश्‍वास या राय
  • रॉबर्ट ग्रीन इंगरसोल[4] ने अंधविश्‍वास को कुछ इस तरह से परिभाषित किया है-
  • सबूत के बावजूद या सबूत के बिना ही विश्‍वास करना
  • एक रहस्‍य को दूसरे रहस्‍य के सहारे सही ठहराना
  • इस बात पर यकीन करना कि दुनिया दैवयोग या सनक से संचालित होती हैं
  • कार्य और कारण के बीच सच्‍चे संबंध की अवहेलना करना
  • यह मानना कि विचार, इरादे और मंसूबे प्रकृति से ऊपर हैं और प्रकृति से पहले विद्यमान रहे हैं
  • यह मानना कि मस्तिष्‍क ने पदार्थ की रचना की और वही उसे संचालित करता है
  • बल को पदार्थ से अलग या पदार्थ को बल से अलग मानना
  • चमत्‍कार, जादू-मंतर और सम्‍मोहन में, सपने और भविष्‍यवाणी में विश्‍वास करना
  • अलौकिक चीजों में विश्‍वास करना
  • अंधविश्‍वास की बुनियाद अज्ञान है, इसका ऊपरी ढांचा श्रद्धा-भक्ति है और इसका गुम्‍मद झूठी आशा है
  • अंधविश्‍वास अज्ञान की संतान और विपत्ति की जननी है
  • अमूमन हर व्‍यक्ति के दिमाग में अंधविश्‍वास की थोड़ी-बहुत धुंध पायी जाती है
यदि हमें समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है तो समाज से अंधविश्‍वास को उखाड़ फेंकना होगा। अंधविश्‍वास क्‍यों पनपता है। इसके पीछे भी मनोविज्ञान काम करता है। इसको लेकर जहोदा ने अपनी पुस्‍तक ‘अंधविश्‍वास और मनोविज्ञान’ में लिखा है कि अंधविश्‍वास सोचने का तरीका है- हमारी मानसिक बनावट का अभिन्‍न अंग है और विशेष परिस्थितियों की सतह पर आ जाता है। अंधविश्‍वास हमारी भावात्‍मक प्रवृत्ति पर पनपता है।

क्या कहते हैं गांधी –
गांधी हमारे लिए कोई नाम नहीं है बल्कि एक विचारधारा है। मौजूदा दौर में हर के समस्या के विकल्प के रूप में गांधी और उनकी विचारधारा को आगे लाने और अपनाने की बात की जा रही हैचाहे बात संसाधनों के उपयोगप्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन की बात हो तो सबसे पहले गांधी की ही बात होती है। किस प्रकार से सीमित साधनों का उपयोग करके स्वस्थ एवं शिक्षित समाज का निर्माण कैसे किया जा सकता है। ये उनसे सीखा जा सकता है । गांधी जी 3 H की बात शिक्षा के लिए करते हैं । इसके पीछे की मंसा यही है कि बच्चे केवल हमारा आज नहीं हैं बल्कि कल का भविष्य हैं। उनका सर्वांगीण विकास अभिभावकों एवं शिक्षिकों के हाथों में है। समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इससे जुड़ी भावना को आगे ले जाना है तो उनकी इन बातों पर गौर करना होगा।

H- HEAD- शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मानसिक विकास और सोच को बढ़ावा दे। बच्चे के अंदर तार्किक एवं विश्लेषण की क्षमता पनपे। यही दृष्टि वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देगी।
H- HEART- इतना ही नहीं शिक्षा ऐसी भी होनी चाहिए जो हमें आस-पास के वातावरण को जोड़े। मन से लगाव हो। जो भी काम मिले उसे केवल दिमाग ही नहीं दिल से जोड़कर करना चाहिए। ऐसी शिक्षा ही हमें समग्र विकास की ओर ले जाएगी।

H-HAND- यहाँ Hand से आशय शारीरिक कार्य कुशलता से है। जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इन्हीं बिन्दुओं ध्यान में रखते हुए शिक्षा की रणनीति तय की जाए तो अवश्य ही एक तार्किक रूप से विकसित समाज के निर्माण में हम सहभागी बन सकेंगे।

निष्कर्ष-
उपरोक्त बातों से एक ही आशय निकालकर सामने आता है कि सभी को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा जोकि भावी पीढ़ी के बेहतर कल का परिचायक बने। इसमें वैज्ञानिक सोचस्वावलंबनबौद्धिक एवं शारीरिक कुशलता भी शामिल है। इसकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी।

संदर्भ ग्रंथ सूची –
1.     पटैरियाडॉ. मनोजभानावतडॉ. संजीव (संपादक) (2006). वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संचार माध्‍यम. जयपुरजनसंचार केंद्रराजस्‍थान विश्‍वविद्यालय नई दिल्‍ली : राष्‍ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (पृष्‍ठ-iv)
2.     पटैरियाडॉ. मनोजभानावतडॉ. संजीव (संपादक) (2006). वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संचार माध्‍यम. जयपुरजनसंचार केंद्रराजस्‍थान विश्‍वविद्यालय नई दिल्‍लीराष्‍ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (पृष्‍ठ-6)
3.     पोसवालदिनेश (अनुवादक) (2012). विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया. सहारनपुर: गार्गी प्रकाशन (पृष्‍ठ-37)
4.     पोसवालदिनेश (अनुवादक) (2012). विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया. सहारनपुर: गार्गी प्रकाशन (पृष्‍ठ-6)
5.     पोसवालदिनेश (अनुवादक) (2012). विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया. सहारनपुर: गार्गी प्रकाशन (पृष्‍ठ-75)
6.     नेहरूपंडित जवाहर लाल. रामचंद्र टंडन (संपादक) (2015). हिंदुस्‍तान की कहानी.नई दिल्‍ली: सस्‍ता साहित्‍य मंडल(पृष्‍ठ-595)
7.     राजिभवालेअनिल (1997)वैज्ञानिक –तकनीकी क्रांति और उत्‍तर- औद्योगिक समाज.दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय: हिंदी माध्‍यम कार्यालय निदेशालय (पृष्‍ठ-161)
8.     चौधरीरामदास (2013).विज्ञान का क्रमिक विकास-: वैश्विक परिप्रेक्ष्‍य में .नई दिल्‍ली: नेशनल बुक ट्रस्‍टइंडिया(पृष्‍ठ-29)
9.     पोसवालदिनेश (अनुवादक) (2012). विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया. सहारनपुर: गार्गी प्रकाशन (पृष्‍ठ-48)
10. जैननिर्मला (संपादनक,अनुवादक) (1996) नेहरूजवाहरलाल. भारत की खोज (संक्षिप्‍त संस्‍करण). नई दिल्‍ली: राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (पृष्‍ठ-53)
11. जैननिर्मला (संपादनक,अनुवादक) (1996) नेहरूजवाहरलाल. भारत की खोज (संक्षिप्‍त संस्‍करण). नई दिल्‍ली: राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (पृष्‍ठ-151)
12. साधनाअमृत ‘आप्‍प दीपो भव!’: कानपुरहिंदुस्‍तान (पृष्‍ठ-11)
13. चक्रवर्तीतापोश (संपादक) (2012). दैवी चमत्‍कारों का पर्दाफाश. नई दिल्‍ली: भारत ज्ञान-विज्ञान समिति (पृष्‍ठ-66)
http://www.arvindguptatoys.com/arvindgupta/cmss-11.pdf18/05/2016  सुई के बारे में सही जानकारी - लोक स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा माला के तहत शहीद अस्‍पतालदल्‍लीराजहरा दुर्गमप्र की ओर से प्रकाशित (सुई के बारे में स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका ‘स्‍वास्‍थ्‍य संगवारी’ के एक अंग पर आधारित ) अगस्‍त 1991कुल पृष्‍ठ 12मूल्‍य 2 रुपएद्वैमासिक

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