पुस्तक समीक्षा: ‘कितने मोर्चे’ के मोर्चे

कितने मोर्चे (उपन्यास)
लेखक – वन्दना यादव
मूल्य – ₹ 350.00
पृष्ठ – 368
प्रकाशन – अनन्य प्रकाशन, दिल्ली

समीक्षक: रेनू यादव


“शहादत देश के लिए सम्मान का विषय हो सकती है पर एक पत्नी और बच्चों के लिए... बूढ़े माँ-बाप के लिए कभी उत्सव नहीं बन सकती...”। (यादव, वन्दना. कितने मोर्चे. पृष्ठ 368) यह कटु सत्य एक भुक्तभोगी की ही अभिव्यक्ति हो सकती है। एक फौज़ी के शहीद होने के पश्चात् उसके स्थान पर दूसरा फौज़ी तैनात हो जाता है किंतु परिवार के लिए दूसरा बेटा, दूसरा पति अथवा दूसरे पिता का विकल्प नहीं हो सकता और न ही उसकी भरपायी अशोक चक्र सम्मान से हो सकती है। शहीद चला जाता है लेकिन उसका परिवार हर पल शहीद होता है। इस संदर्भ में मुझे अपनी कविता ‘शहीद’ की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं –
हमसफ़र... / तुम तो शहीद कहलाओगे, / नवाजे जाओगे / वीरता के पुरस्कार से
पर मैं... /मैं क्या कहलाऊँगी / मेरा तो पूरा जीवन शहीद / हुआ है तुम पर
जीऊँगी मैं हर पर / तिल-तिलकर
सिर्फ मैं ही नहीं तुम्हारे / माता-पिता / और तुम्हारे परिवार के साथ-साथ
समस्त रिश्तेदार भी / शहीद हैं

हे शहीद! बोलो... / इस शहीद पत्नी और परिवार को / कौन सा नाम दोगे
बोलो... / कौन से रत्न से हमें नवाजोगे / और कौन सा निभाओगे हमारे / लिए कर्तव्य

कर्तव्य निभाने की जिम्मेदारी / क्या सिर्फ मेरा है?
नहीं… / मैं तो सीता भी नहीं बन सकी / कि तुम्हारे साथ जा सकूँ वन में
न ही हूँ कैकेयी या सत्यभामा / जो लड़ सकूँ तुम्हारे साथ युद्ध
नहीं है फ़ुरसत मुझे  / कि जौहर कर सकूँ
नहीं... / मैं नहीं हूँ इतनी महान / जो तुम्हारे जाने पर / न गिराऊँ एक बूँद भी आँसू
मुझे गर्व है तुम पर / पर मैं हूँ एक साधारण नारी / और मेरा जीवन भी / हुआ है शहीद...

हे शहीद... / बोलो...
अब कौन सा / वाद्ययंत्र मेरे शहीद / होने पर बजाओगे
और कौन से रत्न से / हमें नवाजोगे / या संसार के हवन-कुंड
में अब कौन सी / अग्नि जलाओगे...

ऐसी स्थिति में अनायास ही हृदय में क्यों न बदले की आग जल जाये - “इन आँसूओं को रोक लो। बहा दोगे तो अन्दर की आग भी बह जायेगी। आग जलने दो अपने अन्दर, और भड़काते रहो इसे… घाटी में जाकर हर आतंकी और उसके परिवार को जला देना इस आग में। जो हमारे फ़ौजियों को लील रहे हैं, मासूम बच्चों के सिर से उनके पिता का साया तक उठा लेते हैं... जो औरतों को विधवा कर रहे हैं... उन्हें जड़ से मिटा दो”। (पृष्ठ 366) अथवा क्यों न हृदय से यह चीत्कार उठे - “आतंकवादियों की सजा दिल दहला देने वाली हो। आतंकवादी के परिवारों को भी आतंक झेलना पड़े जिससे डर के मारे नए आतंकी पौधे जन्म ही न लें। आतंकवाद का नाम तक मिटाना होगा...” (पृष्ठ 367)

इस दहकती आग और फफकते रूदन में शहीद की पत्नी को सम्मान प्रदान किया जाता है। “ये सम्मान पाने की सज़ा है या सज़ा की शुरुआत...?” (पृष्ठ 352) लेखिका इस पूरे विवरण को अत्यंत मार्मिक ढंग से उद्धृत करती हैं कि शौर्यगाथा के सिलसिले में सैनिक की पत्नी सम्मान प्राप्त करने के लिए खुले आसमान में, बरसती फुहारों में, ठण्ड में, सिहरन में, राष्ट्रीय ध्वज के नीचे अकेली खड़ी होती है जबकि बरसती फुहारों से बचने के लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विश्व की महाशक्तियों के लिए छतरियाँ तान दी जाती हैं। (पृष्ठ 351-352) सम्मान प्राप्ति के पश्चात् शहीद की पत्नी और परिवार गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं और वहीं अगले साल किसी और शहीद की पत्नी को सम्मान प्रदान किया जाता है। ऐसा सम्मान किसी भी पत्नी को खुशी से ग्राह्य नहीं हो सकता, चाहे कितनाहुँ वीरगाथाएँ उसके पति के लिए गायी जायें। जिसका वर्णन यदि इस उपन्यास में ही ढूँढा जाय तो मिल जायेगा कि बर्फ में दबे फौज़ी रंजन की बॉडी अड़तालिस घंटे बाद ट्रेस किया गया। जिसको सलामी देने वर्दियाँ ही वर्दियाँ दिखायी दीं, जो याँत्रिक गति से एक बॉडी (जो कुछ समय पहले तक वह स्वयं एक वर्दी ही था) को सलामी देने आये हैं। ऐसा नहीं है कि उनमें भावनाएँ नहीं हैं बल्कि उनकी भावनाएँ वर्दी के फर्ज के नीचे दब गयी हैं। वे वर्षों बरस अपने परिवार से दूर रह कर यांत्रिक गति से ड्यूटी करते हुए यंत्रवत् ही बन जाते हैं। ऐसे में देश के लिए मोर्चा संभाल रहे वर्दियों की पत्नियाँ परिवार से लेकर समाज एवं राष्ट्र तक अनगिनत मोर्चे संभाल रही होती हैं, जो कि मोर्चे के अंतर्गत कभी नहीं गिना जाता। इन्हीं मोर्चों को संभालने वाली चौधरी विहार के छः मंजिले इमारतों में रहने वाली तीन सौ सत्तर परिवारों की गाथा है ‘कितने मोर्चे’।

रेनू यादव
जब पति-पत्नी साथ होते हैं तब यही मोर्चे आसान बनकर जीवन-शैली में उतर आते हैं, जबकि पति के बिना ये अनुभव किसी मोर्चे से कम नहीं होतें। प्रत्येक तीसरे साल में घर सिफ्टिंग से लेकर अकेले बच्चों के साथ-साथ ससुराल, मायका और रिश्तेदारों को संभालना तथा उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना आसान बात नहीं। जीवन के इन कठिन पगडंडियों पर खुद भी अकेलेपन की राह पर चलना, प्रेम की आस लगाये तड़पते रहना तथा अकेले होने के कारण समाज के “यंग एण्ड मॉडर्न औरत और वो भी सिंगल वुमन, आदमी उसे इज़्ज़त की नज़रों से नहीं, शिकारी की नज़रों से ताड़ते हैं” (पृष्ठ 20) जैसे कुदृष्टियों से स्वयं को बचाये रखना आखिर एक जंग ही तो है! जहाँ फौज़ी की पत्नी एक ही समय में कई भूमिकाएँ निभाने की कोशिश करती है - एक कॉन्फीडेंट वुमन, एक आदर्श एवं जिम्मेदार पत्नी, एक सक्सेसफुल सिंगल मॉम, एक आदर्श बहू आदि। उसका संघर्ष तब और बढ़ जाता है, जब वह कहती है – “मैं चाहती हूँ कि मेरे बच्चे मुझ पर फ़क्र करें। वो जब मेरे बारे में सोचे तब उन्हें प्राउड फ़ील हो। उन्हें, उनकी मम्मी इनडिपेंडेंट, कॉन्फीडेंट वुमन की तरह याद रहे, ‘बेचारी मम्मी’ नहीं बनना मुझे” (पृष्ठ 21)

इस उपन्यास से पहले भारतीय सैनिकों की बहादुरी पर अनेक कविताएँ देखने को मिलती हैं, जिनमें विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविता ‘सैनिक’, मनोज चारण कुमार की कविता ‘मैं सैनिक हूँ देश का’, पंकज गौतम की ‘सैनिक’, रेनू यादव की शहीद की पत्नी का दर्द बयाँ करती ‘शहीद’ कविता आदि का जिक्र आता है तो कहानियों में सैनिक जीवन पर आधारित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’, प्रेमचंद की नवाबराय नाम से पाँच कहानियों का संकलन ‘सोड़ो बतन’ यशवंत मांडे की ‘श्रेष्ठ सैनिक कहानियाँ’, वंदना राग की ‘शहादत और अतिक्रमण’, अल्पना मिश्र की ‘छावनी में बेघर’, बलकार सिंह गोराया की ‘सैनिक’ आदि कहानियाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। उपन्यासों में हीरा लाल नागर का ‘डेक पर अँधेरा’, विवेकी राय का ग्रामीण जीवन में सैनिकों से जुड़ा ‘मंगल भवन’, शशि पाधा की भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान पर ‘शौर्य गाथाएं’ पुस्तक देखने को मिलती हैं। इन सबके बावजूद यह कहना गलत न होगा कि साहित्य की दृष्टि से ओझल अथवा रचनाओं में छिट-पुट रूप से कहीं-कहीं दिख जाने वाले सैन्य-जीवन पर इतने विस्तृत रूप में चौधरी विहार के सपरेटेड फैमिली क्वार्टर्स को केन्द्र बनाते हुए अर्बन कल्चर का प्रतिनिधित्व करता सैनिकों के परिवारों पर लिखा गया यह पहला उपन्यास है। जिसके अंतर्गत कुसुम मुख्य नायिका होते हुए भी चौधरी विहार के प्रत्येक फ्लैट में रहने वाली फौज़ी की पत्नियाँ रीना, सीमा, मिसेज गुरंग, रजिया, श्रीला, सुरेन्द्र कौर, सुनीता, जूही, सुधा, आयशा, मिसेज़ रंधावा, सुषमा, विनीता आदि अपने आप में नायिकाएँ हैं। इनकी जिन्दगी में फर्क सिर्फ इतना है कि इनमें से किसी की जिन्दगी सशक्त है, प्रेमपूर्ण है तो किसी की जिन्दगी प्रेम के अभाव में बिखरी हुई। लेखिका इन नायिकाओं की टुकड़ों-टुकड़ों में बंटी जिन्दगी को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करती हैं।

यह ध्यातव्य है कि ये सभी नायिकाएँ कर्नल की पत्नियाँ हैं, जिन्हें जीवनयापन के लिए सरकारी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। किंतु यह भी ध्यान देने योग्य बातें हैं कि कर्नल्स के ‘फील्ड पोस्टिंग’ के पश्चात् उनकी पत्नियों को वे वी.आई.पी. सुविधाएँ नहीं प्राप्त होतीं जो उनके साथ रहने पर प्राप्त होती हैं। इसलिए पत्नियों का संघर्ष और अधिक बढ़ जाता है। सत्य तो यह है कि यह संघर्ष सिर्फ जीवन जीने का संघर्ष नहीं होता बल्कि पति की सुरक्षा के लिए सदैव मन का आशंकित होना, असामाजिक तत्वों के कारण परिवार के लिए गहरे असुरक्षा की भावना से ग्रसित होना, बढ़ते बच्चों के लिए अनुकूल समय एवं सामंजस्य के लिए तत्पर रहना आदि के साथ-साथ अपने अकेलेपन का दंश झेलते हुए भी व्यक्तिगत भावनाओं पर पूर्णतः नियंत्रण होना आदि कई ऐसे बीमारियों और घटनाओं को जन्म देते हैं जिससे सामान्य जनता अनभिज्ञ रहती है।

जिस प्रकार फणीश्वर नाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ पूरे गाँव का प्रतिनिधित्व करता है तथा सूक्ष्मता से वहाँ की आंचलिक समस्याओं का वर्णन किया गया है उसी प्रकार यह उपन्यास शहर का प्रतिनिधित्व करता है तथा बहुत ही सूक्ष्मता से शहरीकरण की साज-सज्जा, बिल्डिंग की बनावट, वहाँ के रहन-रहन एवं संघर्षों का वर्णन दिखायी देता है। घर की प्रकृत्ति, कंदील और लैम्प का स्वर्गनुमा आकर्षण के साथ साथ सड़कों के मुड़ने का तरीका, गाडी खड़ी करने के लिए गैराज की हालत और उसपर अनधिकृत तरिके से अधिकार जमाना, इमारतों पर चिपके कैटर पिलर की तरह बदरंग पाइप और उनमें से हो रहे बदबूदार रिसाव, लिफ्ट की जर्जर अवस्था, सीढ़ियों पर थूके गए पान और गुटखे का ब्रांड साथ ही सूखे-गीले होने से उनके समय की पहचान आदि जैसे विस्तृत वर्णन से लेखिका की पैनी एवं सूक्ष्मतम् दृष्टि का बोध होता है कि उनकी नज़रों से कोई भी स्थिति-परिस्थिति आसानी से ओझल नहीं होती। इसलिए इस उपन्यास में लेखिका कभी-कभी स्वयं कुसुम बन सारी परिस्थितियों का गहन निर्वाहन करती हैं तो कभी कभी अन्या की भाँति घटनाओं का विवरण भी देती हुई दृष्टिगत होती हैं। कदाचित् यही कारण है पाठक का पाठ से जुड़ने में अवरोध पैदा हो जाता है किंतु इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि यह किसी एक व्यक्ति या एक परिवार अथवा एक घटना का वर्णन न होकर पूरे चौधरी विहार का वर्णन है जिसमें अनेक व्यक्ति, परिवार, उनकी परंपरा और उनकी संस्कृति तथा उनसे जुड़ी घटनाओं का वर्णन है। इसीलिए लेखिका ने बड़ी ही समझदारी के साथ उन घटनाओं, स्थानों एवं भावनाओं को अलग अलग नाम दिया है। अतः उपन्यास पढ़ते समय पाठक के लिए उपन्यास के साथ-साथ उन सभी नाम को केन्द्र में रखना महत्वपूर्ण हो जाता है, जो अलग अलग कहानियों को बुनते हुए एक उपन्यास की भूमिका तैयार करती हैं। दूसरी बात यह भी दिखायी देती है कि जब मुख्य नायिका कुसुम की दृष्टि से अन्य नायिकाओं जैसे रज़िया, शीबा, श्रीला आदि के तकलीफों को दर्शाया जाता है तब उन नायिकाओं की भावनाओं के साथ आसानी से तादात्मय स्थापित नहीं हो पाता क्योंकि कुसुम की भूमिका सूचनात्मक अथवा समस्या के समाधानकर्ता के रूप में होती है। लेकिन जब कुसुम रीना, सीमा और तत्काल शहीद हुए फौज़ी की पत्नी अथवा अशोक चक्र सम्मान प्राप्त करने वाली पत्नी से जुड़ती हैं तब संवेदनाओं का संबोध्य समस्त उपन्यास पर भारी पड़ जाता है अर्थात् उपन्यास का पहले और आखिरी के कुछ हिस्से अपनी मार्मिक जीवंत चित्रण से पाठक को झकझोर कर रख देते हैं और यही इस उपन्यास की सफलता है।

चूँकि यह उपन्यास फौज़ियों के आधी आबादी पर आधारित है तो उनमें पारिवारिक एवं सामाजिक संघर्ष के साथ-साथ टुकड़ो टूकड़ों में बँटे प्रेम की चाहत लिए मानवजनित इच्छाएँ, अपेक्षाएँ, भावनाएँ, संवेदनाएँ, कमजोरियों के साथ साथ सशक्त पहलू भी दिखायी देता है। पति के गुल्सैल एवं आक्रामक स्वभाव से चुप्पी साधती ‘मिसेज़ सांगवान’, ‘रज़िया’ का अपने पति कर्नल ख़ान के प्रेम के लिए तड़पना और उनकी बेवफाई से तंग आ जाना, वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द एवं सामंजस्य न होने के कारण ‘श्रीला’ का निरंतर बीमार रहना, ‘शीबा’ के पति का किसी और औरत के साथ संबंध, ‘आयशा’ के पति का पत्नी-सुख न देना आदि दर्शाते हैं कि दूरियों और बेवफाई के कारण पत्नियों का जीवन मानसिक तनाव में गुजरता है। जिनमें से रज़िया और शीबा का टूट जाना, मिसेज़ सांगवान का आत्महत्या कर लेना आदि उनकी कहानी को ट्रेडजी पर खत्म होने के लिए विवश कर देती है। तो शहीद की पत्नी और पावरफुल मदर ‘रीना’, पति का साथ पाकर ‘कुसुम’, गाँव की रूढ़ीवादी परंपराओं से मुक्त ‘सुषमा’ और पति की बेवफाई झेलती ‘आयशा’ सशक्त स्त्रियाँ हैं। आयशा जैसी पत्नियाँ “इमोशंस तो उसके साथ जुड़े नहीं है इसीलिए अब वह मुझे तकलीफ़ नहीं दे सकता” कहकर स्त्री-सशक्तीकरण को एक नया आयाम प्रदान करती हैं। साथ ही प्रेम को महत्त्व दिए बिना वैवाहिक बंधन को आवश्यक इकाई बनाने वाले पतियों की सज़ा के लिए बिना हथकड़ी पहनाएँ और जेल में क़ैद किए बगैर जीवन भर की सज़ा तय करती है – “अगर वो मुझे तलाक दे देता है तो मुझे तो मुक्ति मिलेगी ही, वो भी तो आज़ाद हो जाएगा पर अगर उसे यह मंजूर नहीं है तो ठीक है, मैं तो आज़ाद नहीं हो सकूँगी पर वो ख़ुद भी तो क़ैद में रहेगा”। (पृष्ठ 245)

सच तो यह है कि इस उपन्यास को किसी एक विचारधारा के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता और न ही किसी एक कसौटी पर कसा जा सकता है, बल्कि जीवन एवं समाज के कई मोर्चे, जैसे कि प्रेम, बेवफाई, हत्या, आधुनिकतावादी कल्चर से लैस बच्चों का ‘स्लीप ओवर्स’, उनका माँ-बाप से छुपकर लांग ड्राइव पर निकलना, लिव-इन-रिलेशन, अंतर्जातीय एवं अंतरवर्गीय विवाह, फौज़ियों के बच्चों के लिए आरक्षण, घरों में कामवालियों की समस्या तथा उनकी आपसी समस्याएँ, वर्ग आधारित मानसिकता, सरकारी कामकाज एवं सुविधाओं पर सवाल, स्त्री-विमर्श, जाति-विमर्श तथा फौज़ियों का अपना एक अलग विमर्श जिसे सेना-विमर्श अथवा फौज़-विमर्श अथवा डिफेंस-विमर्श कहा जा सकता है, अनुशासन के पर्याय फौज़ी तथा अपनी सुविधानुसार अनुशासन का पालन करने वाले सिविलियन्स की विचारधाराओं में अंतर्विरोध, कर्नल-ब्रिगेडियर के ग्रुप्स और स्टेट्स में अंतर आदि सब एक साथ देखा जा सकता है। इन सबको एक ही चीज़ बाँधती है - अर्बन कल्चर। अतः सरकारी सुविधाओं-असुविधाओं के साथ अर्बन कल्चर को समझना है तो यह उपन्यास पढ़ना उपयुक्त होगा। इस उपन्यास की खास विशेषता है कि विभिन्न समस्याओं के साथ-साथ फौज़ियों एवं उनके परिवारों से जुड़े सैनिक-विमर्श का एक विस्तृत कैनवस तैयार करता है। इस उपन्यास में तीन सौ सत्तर फौज़ियों के परिवारों पर कम से कम सत्तर कहानियाँ तो हो ही सकती हैं, साथ ही इसमें कर्नल पद पर सेवारत् सैनिकों से जुड़ा यह सिर्फ एक पक्ष है, जबकि सैनिकों के निचले रैंक से लेकर ऊपरी रैंक तक के परिवारों की अलग अलग समस्याओं पर एक सीरीज़ तैयार करने की संभावनाएँ दिखायी देती हैं।


रिसर्च / फेकल्टी असोसिएट, हिन्दी विभाग, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा – 201 312 (उ.प्र.); चलभाष - +91 981 070 3368; ईमेल- renuyadav0584@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।