आओ हिंदी सीखें - भाग 4

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

हिंदी और उसकी प्रमुख बोलियाँ


जिस प्रकार से मनुष्यों का परिवार होता है,  उसी प्रकार भाषाओं का भी परिवार होता है। ऐसी भाषाओं का समूह,  जिनका जन्म किसी एक मूल भाषा से हुआ हो ; भाषा परिवार कहलाता है । विश्व की लगभग 3000 भाषाओं को 12 मुख्य भाषा परिवारों में विभाजित किया गया है । ये परिवार हैं -
1. भारोपीय (भारत - यूरोपीय)
2. द्रविड़ 
3.चीनी
4. सेमेटिक
5. हेमेटिक
6. आग्नेय
7. यूराल - अल्टाइक
8. बांँटू
9.अमेरिकी (रेड इंडियन)
10.  काकेशस
11. सूडानी
12. बुशमैन

हिंदी तथा उत्तर भारत की अधिकांश भाषाएँ (गुजराती, सिंधी, कश्मीरी,  उड़िया, असमिया,  उर्दू,  मराठी, पंजाबी,  बांग्ला आदि) आर्य परिवार की भाषाएँ मानी जाती हैं । इनका मूल स्रोत संस्कृत है । उत्तर भारत की अधिकांश भाषाएँ और अंग्रेजी,  जर्मनिक, फ्रांसीसी,  रूसी,  फारसी,  ग्रीक,  आदि भारोपीय भाषा परिवार की भाषाएँ  मानी जाती है ।  भारोपीय भाषा परिवार की भारतीय शाखा को,  भारतीय आर्य भाषा शाखा के नाम से अभिहित किया जाता है । इसका प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है। इसी से हिंदी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं का विकास हुआ।  वैदिक संस्कृत से आधुनिक हिंदी तक का सफर निम्न चरणों में पूर्ण हुआ -

1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 800 ई.पू.) इसमें चार वेदों की रचना हुई।
2. लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई.पू.) जिसमें रामायण, महाभारत, कालिदास का संपूर्ण साहित्य आदि  की रचना हुई। 
3. पालि और प्राकृत (500 ई.पू. से 500 ई. तक) लौकिक संस्कृत का परिवर्तित रूप था इसमें बौद्ध साहित्य की रचना हुई।
4. अपभ्रंश (500 ई. से 1000 ई. तक) प्राकृत का बदला रूप सामने आया,  जिसे अपभ्रंश नाम से जाना जाता है।  देश में उस समय अपभ्रंश के  6 रूप प्रचलित थे-
1. शौरसेनी
2. मागधी
3. अर्द्धमागधी
4. महाराष्ट्री
5.ब्राचड़
6. पैशाची

उपर्युक्त  अपभ्रंश के छह रूपों  में से शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी रूपों से हिंदी भाषा का उद्भव हुआ है। इन रूपों को पाँच उप भाषाएँ एवं अट्ठारह बोलियों में बाँटा गया है, जिसका विस्तृत वर्णन हमारा आलोच्य विषय है।

हिंदी शब्द की उत्पत्ति -
                                      व्युत्पत्ति की दृष्टि से हिंदी शब्द का विकास सिंधु (नदी का वाचक) से माना जाता है। संस्कृत की 'स' ध्वनि  फारसी में  'ह' के रूप में प्रयुक्त होती है। संस्कृत का शब्द 'सिंधु'  ईरानियों के द्वारा  'हिंदू' रूप में वितरित होता था। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार 'हिंदी' शब्द में 'ईक' प्रत्यय लगाकर 'हिंदीक' शब्द बना जिससे ग्रीक भाषा में 'हिंदीक' और 'इंदिका' तथा अंग्रेजी में 'इंडिया' शब्द बने। 'हिंदीक' शब्द कालांतर में  'क' धवनि के लुप्त हो जाने से हिंदी बना,  जिसका अर्थ था हिंद (भारत) का।

हिंदी की प्रमुख बोलियाँ -
                                  हिंदी के अंतर्गत 5 उपभाषाएँ  (पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी हिंदी, राजस्थानी हिंदी और पहाड़ी हिंदी) और इनकी 18 बोलियाँ  शामिल हैं। इन पाँच उपभाषाओं तथा इनके अंतर्गत  प्रमुख 18 बोलियों का विस्तृत वर्णन निम्नवत् है -

क‌‌ . पश्चिमी  हिंदी -
                         पश्चिमी हिंदी मध्य देश की भाषा है।  इसमें हरियाणा राज्य,  दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश,  मध्य प्रदेश के ग्वालियर, भोपाल एवं संपूर्ण बुंदेलखंड का क्षेत्र समाविष्ट है।  इसकी पाँच बोलियाँ हैं - ब्रजभाषा,  खड़ी बोली, बांगरू,  बुंदेली और कन्नौजी।

1. ब्रजभाषा -
                    'ब्रज'  शब्द संस्कृत 'व्रज'  का परिवर्तित रूप है।  ब्रज का पुराना अर्थ पशुओं का या  गोओ का समूह या चारागाह है।  पशु पालन के प्राधान्य के कारण यह क्षेत्र कदाचित ब्रज कहलाया और यहाँ  के निवासियों की बोली ब्रजभाषा कही गई। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से हुआ। इसका प्रसार निम्न देशों  में है -  उत्तर प्रदेश के मथुरा, अलीगढ़, आगरा, बुलंदशहर, एटा, मैनपुरी, बदायूँ तथा बरेली जिले ;  हरियाणा के गुरुग्राम  जिले की छोटी सी पट्टी;  राजस्थान में भरतपुर, धौलपुर,  करौली तथा जयपुर का पूर्वी भाग; मध्यप्रदेश में ग्वालियर का पश्चिमी भाग।  इसकी प्रमुख उपबोलियाँ - भरतपुरी, अंतर्वेदी, भुक्सा, डांगी, माथुरी  आदि है।  ब्रजभाषा के वर्तमान लोक साहित्य का अध्ययन डॉ. सत्येंद्र द्वारा हुआ,  जिसमें इसका  ग्रामीण रूप प्रकट होता है। लोक साहित्य के साथ इसमें शिष्ट साहित्य भी विपुल  मात्रा में मिलता है। ब्रजभाषा का साहित्य में प्रयोग 16वीं  शताब्दी के प्रारम्भ में मिलता है,  जहाँ ब्रजप्रदेश में   गौड़ीय वैष्णव, वल्लभ संप्रदाय  अथवा पुष्टिमार्ग केंद्र स्थापित हुए।  हिंदी प्रदेश और भारत के हर कोने में ब्रजभाषा में साहित्य रचना होती  रही।  सूरदास ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि थे। सूर के  अतिरिक्त तुलसीदास, नंददास, रहीम, रसखान, बिहारी, देव, कवि रत्न रत्नाकर आदि ब्रजभाषा के कवि थे।  इसको बोलने वालों की संख्या आज तीन करोड़ से अधिक है । इसका विस्तार 30,000 वर्ग मील में है।

ब्रजभाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं -
ओकारबहुला -  लेनो, देनो, झगरो, बोदो, भलो, धोटो, करेगो, बडो, बसेरो, भयो, आदि ।
व्यंजनांत के स्थान पर उकारांत -  सबु, मालु, हिंदु, सासु।
ल और ड़ के स्थान पर 'र' कर देने की प्रवृत्ति - परयो (पड़ा), झगरो (झगड़ा), पीरो (पीला), दुबलो (दुबला)
ने के स्थान पर नै, को का कूं, से का सों, पर का पै आदि।
सामान्य जानकारी के लिए ब्रज कुछ और शब्द नजीर रूप में देख सकते हैं  - तिरिया (स्त्री), लेज (रस्सी), गाम (गाँव), साआब (साहब),  निज (अनाज), उजीतो (उजाला), मौंड़ी (लड़की), खाती (बढई), आलकस (आलस्य),  तारी (चाबी), दूद (दूध), छुलका (छिलका),  ककई (कंघी), जेहरि (घड़ा),  मैंतारी (माँ), रासौ (झगड़ा), बीजना (पंखा), पुंगा (उपद्रवी),  दाँतन (दाँत) आदि देखे जा सकते हैं।

2. खड़ी बोली - 
                        इसके अनेक नाम हैं - हिंदुस्तानी, खड़ी बोली, नागरी, टकसाली हिंदी, परिनिष्ठित हिंदी, सरहिंदी और कौरवी। खड़ी बोली का सर्वप्रथम प्रयोग लल्लूलाल जी ने अपनी रचना प्रेम सागर के मुख्य पृष्ठ पर 1803 ईसवी में किया।  इसी खड़ी बोली शब्द का अर्थ 1823 ईसवी के बाद हिंदी में हुआ। जो हिंदी आज हमारी राजभाषा बनी हुई है,  वह खड़ी बोली का ही विकसित रूप है। खड़ी बोली शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है-  एक साहित्यिक हिंदी के अर्थ में और दूसरा दिल्ली- मेरठ के आसपास की लोक बोली के अर्थ में।  यहाँ दूसरा अर्थ अधिक प्रयुक्त होता रहा है,  जिसके आधार पर राहुल सांस्कृत्यायन ने इसे  कौरवी नाम से अभिहित किया।  खड़ी बोली में खड़ी शब्द का अर्थ विवादास्पद बना हुआ है।  कुछ लोग खड़ी का अर्थ शुद्ध (खरी) मानते हैं,  तो कुछ लोग खड़ी पाई के अर्थ में लेते हैं और कुछ खड़ी अर्थात् कर्कश ध्वनि के अर्थ से अभिहित करते हैं। खड़ी बोली का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश (प्राकृत) के उत्तरी रूप से हुआ है। खड़ी बोली का क्षेत्र - देहरादून का मैदानी भाग,  सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, दिल्ली का पूर्वी भाग,  बिजनौर,  रामपुर, मुरादाबाद, अंबाला और पटियाला का पूर्वी भाग आदि है।  खड़ी बोली का साहित्य भंडार विपुल है। साथ ही इसके लोक साहित्य में पवाड़ा नाटक, लोककथा,  लोकगीत आदि पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।
खड़ी बोली की प्रमुख विशेषताएँ -
दीर्घ स्वर के बाद मूल व्यंजन के स्थान पर द्वित्व व्यंजन-  बेट्टा, बाप्पू, रोट्टी, सज्जा,गड्डी, खान्ना आदि ।
महाप्राण से पूर्व अल्पप्राण का आगम -  देक्खा, भूक्खा, रक्खा।
न का ण  - अपणा, राणी,  जाणा
ल का ळ  -  काळ,अकाळ,नीळा,पीळा
आकारांत बहुल शब्द - घोड़ा
शब्द के अंत में दीर्घ स्वर शब्दों का आना-  निधी, पशू
महाप्राण को अल्पप्राण कर देना - सुराई (सुराही), दपेर (दोपहर), जीब (जीभ), पौदा (पौधा), बोज (बौझ), धंदा (धंधा), भूक (भूख),होट (होठ), मैंबी (मैं भी), नई  (नहीं),  हैं।
इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त  है।

3. बाँगरू - 
               बाँगरू का दूसरा नाम हरियाणवी है । इस भूखंड की विशेषता के कारण ही यहाँ  की बोली का नाम बाँगरू दिया गया है। बाँगर का अर्थ शुष्क और उच्च भूमि है।  करनाल, रोहतक, दिल्ली तथा हिसार इसके अंतर्गत आते हैं।  इसका पुराना नाम कुरू जांगल  है।  इस प्रदेश की भाषा खड़ी बोली (कौरवी) का रूपांतर है।  बाँगरू का विकास उत्तरी शौरसेनी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से हुआ है।  इस बोली का बाँगरू नाम डॉ ग्रियर्सन का दिया हुआ है।  उत्पत्ति की दृष्टि से हरियाणा शब्द  हरि+ याना से माना गया है । जो हरिण्यारण्य (हरावन) का विकसित रूप है । डॉ. हरदेव बाहरी ने इसकी उत्पत्ति अहीर से मानी है, जो मुख - सुख के कारण हीर उच्चरित होता है।  इसमें 'आना' शब्दांश जोड़ कर (आना स्थान सूचक है, जैसे - तेलंगाना, राजपूताना में) अरियाना निर्मित किया गया है,  जिसका अर्थ 'अहीरों का क्षेत्र'। आज भी इस प्रदेश में अहीर या जाट  सबसे अधिक हैं । जाति के आधार पर इसका एक अन्य नाम 'जाटू' भी है।  इसका विस्तार अंबाला के दक्षिण- पश्चिम का संपूर्ण भू- भाग और वर्तमान हरियाणा राज्य तथा दिल्ली के आसपास का क्षेत्र है। इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है।  साहित्यिक दृष्टि से कोई विशेष महत्त्व नहीं है।  लोक साहित्य सभी बोलियों में पाया जाता है, जो इसमें भी है । बाँगरू की ध्वनियाँ वही हैं जो कौरवी की है।

बाँगरू की प्रमुख विशेषताएँ -
अनेक स्थानों पर  'ल' का 'ळ'  -  काळा, माळा
एक व्यंजन के स्थान पर द्वित्व - बाब्बू, भीत्तर, गाडरी
न का ण - होणा
सहायक क्रिया  हूँ, है, हैं, हो के स्थान पर सूं, सै, सैं का प्रयोग।
ड़ का ड  - बड़ा, पेड़  आदि।
इसके शब्द,-भण्डार में कुछ निराले शब्द हैं,  जैसे - सौड़ (रजाई), कीड़ी (चींटी), होक्का (हुक्का), चाँदना (प्रकाश), खोसा-खासी (छीना-झपटी), धौला (श्वेत), तावड़ा (घाम, धूप), बोक (बकरा), गुट्ठा (अँगूठा), बाण (रस्सी), सीला (ठण्डा), बीर (स्त्री), दुआई (दवा) आदि।

4. बुंदेली -
               बुंदेलखंड की भूमि में  बोली जाने वाली बोली को बुंदेली कहा जाता है।  इसका एक नाम बुंदेलखंडी भी है। यह नाम ग्रियर्सन द्वारा दिया गया है। भाषा की दृष्टि से बुंदेली का क्षेत्र विस्तृत है।  अतः भाषा सीमांकन की दृष्टि से बुंदेली के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के पश्चिमी भाग को छोड़कर हमीरपुर, उरई, जालौन, झाँसी का क्षेत्र सम्मिलित है।  मध्यप्रदेश में यह ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी,  छतरपुर,  पन्ना, टीकमगढ़, दमोह,  गुना, विदिशा,  सागर,  रायसेन, भोपाल का कुछ भाग,  होशंगाबाद, नृसिंहपुर, जबलपुर, बैतूल,  छिंदवाड़ा, और सिवनी के भाग शामिल है। ग्रियर्सन ने बुंदेली के अनेक क्षेत्रीय रूपों की  चर्चा की है और उनके नाम भी गिनाए हैं, जैसे - लोघाती (हमीरपुर) चरखारी (जालौन क्षेत्र की) पवारी (उत्तर - पूर्व ग्वालियर और दतिया की बोली), खटोला (पन्ना, दमोह जिले की बोली), बनाफरी (बुंदेलखंड की मुख्य बोली), कुन्द्री (हम्मीरपुर  जिले की), निभह (जालौन की), भदौरी (ग्वालियर,आगरा, मैनपुरी, इटावा की बोली), दक्षिण की मिश्रित बोलियाँ (लोधी,  छिंदवाड़ा बुंदेली,  नागपुरी हिंदी) बुंदेली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त संख्या में है।  बुंदेली में लोक साहित्य काफी है, जिसमें ईसुरी की फाग बहुत प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि हिंदी प्रदेश की प्रसिद्ध लोकगाथा  'आल्हा'  जिसे हिंदी साहित्य में स्थान मिला है; मूलत: बुंदेली की एक उपबोली बनाफरी में लिखी गई थी। बुंदेलखंड मध्यकाल में प्रसिद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक केंद्र  रहा है।  केशवदास,  बिहारी,  मतिराम,  पजनेश,  श्रीपति, रसनिधि, ठाकुर,  पद्माकर भट्ट आदि कवि यहीं के रहने वाले थे। कतिपय इन कवियों का ब्रजभाषा के साथ बुंदेली में भी समृद्ध काव्य  है।  उच्चारण की दृष्टि से ब्रजभाषा और बुंदेली में बहुत कम अंतर है।

बुंदेली की प्रमुख विशेषताएँ -
महाप्राण व्यंजनों का अल्पप्राणीकरण - दई (दही), कंदा (कंधा), सूदो (सूधो), गदा (गधा), कई (कही), चाय (चाहे), लाब (लाभ), भूँक (भूख), मौं (मुँह)
स का छ -सीढ़ी (छीड़ी)
च का स - साँचे (सांसी)
शब्द के बीच में  'र' का लोप पाया जाता है, जैसे- साए (सारे), तुमाओ (तुम्हारा), गाई (गारी),भाई (भारी) आदि।

5. कन्नौजी - 
                 फर्रूखाबाद (उत्तर-प्रदेश) जिले के  कन्नौज नगर के नाम से आधार पर ही इस क्षेत्र की बोली का नाम कन्नौजी रखा गया है। कन्नौज कान्यकुब्ज प्रदेश की राजधानी रहा है और  उसका ऐतिहासिक महत्व भी है। पुराने जनपदों में यह है पांचाल के अंतर्गत आता है। कन्नौज पर उत्तर काल में हर्ष,  ललितादित्य और नागभट्ट का अधिकार रहा है।  इसके उपरांत वहाँ गहड़वाल  राजपूतों ने राज्य किया।  सन्  1193 - 94 में जयचंद का पतन हुआ और उसके पश्चात्   कन्नौज पर मुसलमान शासकों का अधिकार हो गया। ऐतिहासिक घटनाक्रम में  कन्नौज का इतना महत्व रहा कि इस  क्षेत्र की बोली का नाम ही कन्नौजी  पड़  गया। ग्रियर्सन के अनुसार पश्चिमी हिंदी की  पाँच बोलियों में से एक  तथा धीरेंद्र वर्मा के अनुसार यह ब्रजभाषा का ही एक पूर्वी रूप  है। इसका ब्रजभाषा से इतना अधिक साम्य  है कि अनेक विद्वान इसे ब्रज का ही अंश मानते हैं।  इसका प्रयोग लोक साहित्य में हुआ है न कि अलग से इसका साहित्यिक स्वरूप हो। कनौजी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश  से हुआ है।  कन्नौजी का केंद्र कन्नौज है।  जो इस समय फर्रुखाबाद जिले के अंतर्गत आता है। विशुद्ध रूप से यह इटावा, फर्रुखाबाद और शाहजहाँपुर जिले में बोली जाती है। विस्तार की दृष्टि से कानपुर, हरदोई, पीलीभीत जिले भी इसके अंतर्गत आते हैं। इसका क्षेत्र विस्तृत नहीं है। इस क्षेत्र की कुल चौड़ाई 40 मील व लंबाई 160 मील है। इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है।  इसकी उप बोलियाँ हैं -  आदर्श कन्नौजी,  पछरुवा, बुक्सा, संडीली, इटावी,शाहजहाँपुरी और पीलीभीती।  हिंदी के प्रसिद्ध कवि  चिंतामणि, मतिराम,  भूषण, नीलकंठ इसी क्षेत्र में पैदा हुए हैं। उकारांतता (खातु, हारू, सबु) और ओकारांतता (हमारो या हमाओ)इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

ख. पूर्वी हिंदी -
                       प्राचीन काल मैं जिस क्षेत्र को उत्तर कोसल एवं दक्षिण कोसल के नाम से पुकारते थे, उसे ही अब पूर्वी हिंदी का क्षेत्र माना जाता है।  इसकी तीन प्रमुख बोलियाँ हैं  - अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी।  इसमें अवध (उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले),मध्य प्रदेश का बघेलखंड और छत्तीसगढ़ क्षेत्र शामिल है अर्थात्   कानपुर से मिर्जापुर तक (लगभग 240 किमी.)और लखीमपुर की उत्तरी सीमा से दुर्ग बस्तर की सीमा तक (लगभग 900 किमी.) के क्षेत्र में पूर्वी हिंदी बोली जाती है।  पूर्वी हिंदी का जन्म (विकास) अर्धमागधी अपभ्रंश से माना जाता है। इसके बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। समानता की दृष्टि से जितना  घनिष्ठ संबंध अवधी,  बघेली और छत्तीसगढ़ी में है, उतना  हिंदी की अन्य उपभाषाओं में नहीं है।  पूर्वी हिंदी की तीन बोलियों का सामान्य परिचय निम्नलिखित हैं -

1. अवधी - 
                  अवधी शब्द का अर्थ है अवध की भाषा। अवध नाम का सूबा भारतवर्ष के मध्य कालीन शासन में प्रसिद्ध था।  इसके पूर्व के इतिहास में यही प्रदेश कोसल के नाम से विख्यात था। इसका नाम अयोध्या के आधार पर किया गया है। अयोध्या के लिए अवध शब्द का प्रयोग साहित्य में भी मिलता है, बस इसी आधार पर इस क्षेत्र की बोली का नाम अवधी  रखा गया है। इसका विकास अर्धमागधी अपभ्रंश से माना जाता है। अवधी बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है।  इसकी मुख्य उपबोलियाँ है - बैसवाड़ी,  कोसली, मिर्जापुरी,  बनौधी ।  इसका एक अन्य नाम पूरबी  भी है।  यह उत्तर प्रदेश के लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, बाराबंकी,  गौंडा, बहराइच, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फैजाबाद, लखीमपुर खीरी जिलों में बोली जाती है।  इसके अतिरिक्त गंगा पार दक्षिण में फतेहपुर, प्रयाग, मिर्जापुर (उत्तर और पश्चिम भाग), जौनपुर क्षेत्र में भी यह बोली जाती है।  मिश्रित रूप से मुजफ्फरपुर जिले में इसका प्रसार है।   अवधि में साहित्य तथा लोक साहित्य दोनों ही पर्याप्त मात्रा में है।  इसके प्रसिद्ध कवि मुल्ला दाऊद, कुतुबन, जायसी, तुलसीदास, उसमान, सबल सिंह चौहान, मंझन, स्वामी अग्ररदास,  जानकी शरण, महाराज रघुराज सिंह, माधवानंद, पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र, रमई काका, बलभद्र प्रसाद दीक्षित, दयाशंकर दीक्षित  'देहाती', वंशीधर शुक्ल, शिवदुलारे त्रिपाठी, रमाकांत श्रीवास्तव, आदि  है।

अवधी की प्रमुख विशेषताएँ हैं -
'ह' का आगम -  रईस (रहीस) इच्छा (हिच्छा)
'र' का आगम - पसंद (परसंद),  वियोग (विरोग)
ऐ, औ का अई
महाप्राणीकरण प्रवृत्ति - पुनः (फुन), पेड़ (फेड)
व का ब - विद्यार्थी, विद्यालय (बिद्यार्थी, बिद्यालय)

2. बघेली - 
                बघेलखंड क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली बघेली कहलाती है। बघेलखंड का नामकरण बघेले राजपूतों के आधार पर पड़ा। 12 वीं शती  में बयाघ्र देव ने बघेल राज की नींव डाली।  इससे पूर्व इस प्रदेश पर वाकाटक और कलचुरी राजवंशों का अधिकार रहा है। रीवाँ बघेल राजाओं की राजधानी रही है, इसलिए बघेली का एक अन्य नाम रीवाँई (रीमाई) भी प्रचलित है। यह अवधि और छत्तीसगढ़ी के मध्य क्षेत्र में बोली जाती है।  बघेली का उद्भव  अर्द्धमागधी अपभ्रंश के ही एक क्षेत्रीय रूप से हुआ है।  यद्यपि लोकमत इसे  अलग बोली मानता है, किंतु भाषा वैज्ञानिक स्तर पर यह अवधी  की ही उपबोली  प्रतीत होती है जिसे हम दक्षिणी अवधी कह सकते हैं।  विशुद्ध बघेली रीवाँ, शहडोल, सतना और सीधी जिलों में बोली जाती है।  मिश्रित रूप में यह जबलपुर (कटनी तहसील) और बाँदा जिले के कुछ भाग में बोली जाती है।  मांडला की जनजातियाँ जिस  बोली का प्रयोग करती है,  उसमें बघेली, मराठी और बुंदेली का सम्मिश्रण है।  बघेली की कुछ उपबोलियों  की भी चर्चा की जाती है, जिनमें-1.तिरहारी  (फतेहपुर,बाँदा और  हमीरपुर के यमुना तट क्षेत्र की बोली) 2. गहोरा (बाँदा के पूर्वी भाग) 3. जुहार (बाँदा जिले की केन और नगेन नदियों के बीच के क्षेत्र की बोली) 4. गोंडवानी (मण्डला और रीवाँ के गोड़ों की बोली) प्रमुख है। बघेली का लोक साहित्य ही प्रसिद्ध है, न कि शिष्ट साहित्य।

बघेली की प्रमुख विशेषताएँ  हैं -
सर्वनामों में मुझे के स्थान पर म्वां, मोही तथा तुझे के स्थान फर त्वां, तो ही
विशेषण में हा प्रत्यय (नीकहा)
अन्य -घोड़ा का घ्वाड़, मोर का म्वार, पेट का प्याट, देत का द्यात आदि।

3. छत्तीसगढ़ी - 
                  छत्तीसगढ़ जनपद में बोली जाने वाली बोली छत्तीसगढ़ी कहलाती है।  यह मध्य प्रदेश से अलग हुए वर्तमान छत्तीसगढ़ प्रांत के सरगुजा, रायगढ़, बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव और बस्तर जिलों में बोली जाती है। छत्तीसगढ़ के बाहर यह मिश्रित रूपों में मंडला, भंडारा, बालाघाट, संबलपुर  और छोटा नागपुर में बोली जाती है। छत्तीसगढ़ नामकरण का अस्तित्व एवं प्रचार सन्  1493 ई. के बाद ही मिलता है।  इससे पूर्व इस  क्षेत्र का कोसल, दक्षिण कोसल तथा महाकोसल नाम प्रचलित रहा। इसका विकास अर्धमागधी के दक्षिणी रूप से हुआ है।  उसके बोलने वालों की  काफी बड़ी तादाद  है।  इसका लोक साहित्य रूप मिलता है। छत्तीसगढ़ी की मुख्य बोलियाँ -सरगुजिया,  सदरी, बैगानी, बिंझवाली आदि हैं।  यह बोली अवधी से अधिक साम्य  रखती है।  उड़िया तथा मराठी की सीमा पर छत्तीसगढ़ी में  'ऋ' का उच्चारण  'रु' किया जाता है।

छत्तीसगढ़ी की प्रमुख विशेषताएँ हैं -
कुछेक शब्दों में महाप्राणीकरण -इलाका (इलाखा)
अघोषीकरण - बंदगी (बंदकी), शराब (शराप), खराब (खराप)
स का छ तथा छ का स - सीता (छीता), सेना (छेना) आदि।

ग. बिहारी हिंदी - 
                             भोजपुरी, मगही और मैथिली इन तीन बोलियों के समूह  को डॉ.ग्रियर्सन ने  बिहारी नाम दिया था।  इसका जन्म मागधी अपभ्रंश से हुआ। साहित्य रचना की दृष्टि से इनमें  मैथिली प्रमुख है। भोजपुरी और मगही में लोक साहित्य ही अधिक मिलता है।  इसकी  तीनों बोलियों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है -

1. मैथिली - 
               मैथिली बिहार के एक क्षेत्र की बोली है जो गंगा के उत्तरी भाग में स्थित है और जिसे मिथिला के नाम से जाना जाता है। भाषा  के लिए मैथिली शब्द का प्रथम बार प्रयोग सन् 1801 ई. में संस्कृत और प्राकृत भाषा संबंधी निबंधों में कोलब्रुक ने किया था।  इसके उपरांत  हार्नले,केलॉग और ग्रियर्सन ने मैथिली का अध्ययन भाषा के रूप में प्रस्तुत किया।  मैथिली की उत्पत्ति मागधी अपभ्रंश के  केंद्रीय रूप से हुई है। जिसमें तीन लिपियों का प्रयोग मिलता है - मैथिली (बँगला से मिलती - जुलती), कैथी तथा देवनागरी । इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है।  यह दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मुंगेर और भागलपुर जिला में विशुद्ध  रूप से बोली जाती है। मिश्रित रूप में यह नेपाल की तराई,  चंपारण तथा संथाल परगना के कुछ भागों में बोली जाती है। इसकी प्रमुख उपबोलियाँ सात हैं-
1. आदर्श मैथिली (उत्तरी दरभंगा)
2. दक्षिणी मैथिली (दक्षिणी दरभंगा, पूर्वी मुजफ्फरपुर, उत्तरी मुंगेर, उत्तरी भागलपुर, पश्चिमी पूर्णिया)
3. पूर्वी मैथिली (पूर्वी  पूर्णिया, मालदा, दीनापुर)
4. छिकाछिकी (दक्षिणी भागलपुर, उत्तरी संथाल)
5. जोलही मैथिली (उत्तरी दरभंगा के मुसलमानों की बोली)
6. केंद्रीय जनसाधारण मैथिली (मधुबनी डिविजन के निम्न वर्ग की बोली)
7. पश्चिमी मैथिली (पश्चिमी मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण)

लोक साहित्य की दृष्टि से मैथिली बहुत संपन्न है, साथ ही इसमें साहित्य रचना अत्यंत प्राचीन काल से होती चली आ रही है। हिंदी साहित्य को विद्यापति जैसे प्रसिद्ध रससिद्ध कवि देने का श्रेय मैथिली को ही है। इसके अतिरिक्त गोविंददास, रणजीत, वंशीमणि झा,  हरिमोहन झा, संत रामदास आदि भी इसके श्रेष्ठ साहित्यकार हैं।

मैथिली की प्रमुख विशेषताएँ हैं -
संज्ञा के तीन रूपों का प्रयोग -  घोरा, घोरवा, घोरउआ
ड़ के स्थान पर 'र' -  घोड़ा (घोरा), सड़क (सरक)
श,ष,स,का संयुक्त होने पर  'ह' में प्रयोग - मास्टर - महटर, पुष्प - पुहुप
ज का च - मेज -मेच, कमीज - कमीच आदि।

2. मगही - 
            संस्कृत में  मगध के विकसित शब्द के आधार पर इसका नाम आधारित है। सन् 959 से 972 के मध्य पुष्पदंत ने णायकुमार चरिउ  में  मगध के लिए मगह शब्द का प्रयोग किया था।  मगध प्रांत में बोली जाने वाली भाषा के आधार पर इसका क्षेत्रीय नाम पड़ा।  प्राचीन मगध प्रदेश में वर्तमान पटना जिला तथा गया के उत्तरी भाग का अर्द्धांश ही सम्मिलित था। जरासंध और भगवान बुद्ध का संबंध अनेक वर्षों तक इस भूभाग से रहा है। आधुनिक मगही का क्षेत्र उतना ही नहीं है,  जितना प्राचीन मगध का भूखंड था। इसके अंतर्गत पटना, गया, हजारीबाग जिलों के अतिरिक्त मुंगेर और भागलपुर में भी इस बोली का प्रसार है। अनुमानित तौर पर आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच मगही का जन्म हुआ होगा। इसका विकास मागधी अपभ्रंश से हुआ है। इसका लोक साहित्य ही प्रचलित है न कि साहित्य। लिखने के लिए कैथी लिपि का प्रयोग होता है । इसकी प्रमुख बोलियाँ  - पूर्वी - टलहा, जंगली  आदि हैं। व के स्थान पर ब का प्रयोग - पावल (पाबल), आव (आब), ल के स्थान पर र् का प्रयोग- मछली (मछरी), फल (फर), तलवार (तरवार), महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति - पेड़ (फेड़), पुनः (फुनः) आदि इसकी विशेषताएँ हैं। वर्तमान में इस पर हिंदी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

3. भोजपुरी - 
                 महात्मा बुद्ध के समय में षोडश जनपदों में से एक था मल्ल। इसी जनपद में राजा भोज के वंशजों ने आकर अपना नया  राज्य स्थापित किया और अपनी राजधानी का नाम भोजपुर रखा था। यह भोजपुर वर्तमान में बिहार के शाहाबाद जिले में एक गाँव  है। इसी भोजपुर गाँव के आधार पर इस क्षेत्र की बोली का नाम भोजपुरी पड़ा।  भाषा के अर्थ में भोजपुरी शब्द का प्रयोग 1868 ई. में जॉन बीक्स  ने अपने एक लेख 'भोजपुरी पर संक्षिप्त टिप्पणी' में किया था। भोजपुरी की उत्पत्ति मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से मानी  जाती है। यह बनारस (अशतः), जौनपुर (अशतः), मिर्जापुर (अशतः), गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, बस्ती, शाहबाद, चंपारण, सारन,पलामू (कुछ भाग) जिलों जो उत्तर प्रदेश एवं बिहार के हैं, में  बोली जाती है। भारत से बाहर मॉरिशस आदि देशों में भी भोजपुरी बोलने वालों की बड़ी तादाद है।  हिंदी की बोलियों में यह सबसे बड़ी बोली है, जिसका व्यवहार विदेशों में भी होता है। इसके बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है । आज हिंदी फिल्मों में कॉमेडियन पात्रों की भाषा भोजपुरी है। इसकीचार प्रधान उपबोलियाँ हैं - 1. उत्तरी भोजपुरी 2. दक्षिणी भोजपुरी 4. पश्चिमी भोजपुरी 4. नागपुरिया और बनारसी, छपरहिया,बंगरही आदि क्षेत्रीय बोलियाँ हैं। इसका साहित्य एवं लोक साहित्य काफी मात्रा में उपलब्ध है। भोजपुरी के रचनाकारों में कबीर दास, चरणदास, धरमदास, विसराम,धरणीदास, शिवनारायण,  बाबू रामकृष्ण वर्मा, रघुवीर नारायण, भिखारी ठाकुर, राहुल सांस्कृत्यायन, चंचरीक, रविदत्त शुक्ल आदि हैं और इस प्रांत से संबंध रखने वाले जयशंकर प्रसाद,  प्रेमचंद, निराला, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि हैं।

भोजपुरी की  प्रमुख विशेषताएँ हैं -
स्वर मध्य 'र' का लोप - धरि (धइ), लरिका (लइका ), करि (कइ)
ड स्वतंत्र ध्वनि - कडना (कंगन), अडिया (अंगिया) आदि।
न्द,न्ध के स्थान पर न्न,न्ह का प्रयोग - सुन्नर (सुंदर), चान्न (चाँद),सेनूर (सिंदूर),कान्ह (कंधा), आन्हर (अंधा),अन्हार (अंधकार) आदि।
श,स का ह - राहते (रास्ते), अहटमी (अष्टमी), माहटर (मास्टर), निहचै (निश्चय)आदि।
म्ह का म - ब्रह्म (बरम)
म्म का म्ह - खम्भ (खम्हा)
न का ल - नोट (लोट), नंबर (लंबर), नोटिस (लोटिस) आदि।

घ. राजस्थानी हिंदी - 
                            राजस्थान की बोलियों का समूह, हिंदी भाषी प्रदेश की सीमा पर अवस्थित है।  राजस्थानी बोलियाँ मौलिक दृष्टि से पश्चिमी हिंदी  (खड़ी बोली, ब्रज भाषा, कन्नौजी, बाँगरू, बुंदेली) से बहुत भिन्न नहीं है। राजस्थानी का प्रसार वर्तमान राजस्थान राज्य के अतिरिक्त मध्य प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्रों के कुछ भागों तक है। अपभ्रंश के तीन रूपों -  नागर, उपनागर और ब्राचड़  का उल्लेख किया जाता है, उनमें सबसे प्रमुख नागर थी। नागर अपभ्रंश का आधार शौरसेनी प्राकृत है। इसी नागर  अथवा शौरसेनी अपभ्रंश से राजस्थानी विकसित हुई हैं। साहित्य में इसे ही डिंगल के नाम से जानते हैं। राजस्थानी राजस्थान की भाषा और हिंदी की उपभाषा है।  वक्ताओं की दृष्टि से भारतीय भाषाओं एवं बोलियों में राजस्थानी का 7वाँ एवं  विश्व भाषाओं में 24 वाँ स्थान है। इसके बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। इसका क्षेत्रफल  लगभग डेढ़ लाख वर्ग मील में है।  तुलनात्मक आधार पर यह बंगाल, पंजाब, हरियाणा आदि भारतीय राज्यों तथा आयरलैंड, रूमानिया, ग्रीस, इंग्लैंड, नार्वे, फिनलैंड, जापान आदि देशों के क्षेत्रफल से अधिक है। 1961 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार राजस्थानी की 73 बोलियाँ मानी गई है। डॉ. ग्रियर्सन,  डॉ भोलानाथ तिवारी, डॉ.मोतीलाल मेनारिया, डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. टेसीटरी, डॉ. हीरालाल माहेश्वरी आदि भाषा  शास्त्रियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से इसका वर्गीकरण किया है। इन सभी विद्वानों के वर्गीकरण में डॉ. भोलानाथ तिवारी का वर्गीकरण सुस्पष्ट एवं ग्रहणीय है,  जिन्होंने राजस्थानी भाषा को चार भागों में विभक्त किया है -  1. पश्चिमी राजस्थानी 2.पूर्वी राजस्थानी 3. दक्षिणी राजस्थानी तथा 4 उत्तरी राजस्थानी

पश्चिमी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोलियाँ  4 है,-  मारवाड़ी, मेवाड़ी,बागड़ी, शेखावाटी,।
पूर्वी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोलियाँ है - ढूंढ़ाड़ी (जयपुरी), हाडौती,मेवाती,अहीरवाटी।
 दक्षिणी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोलियाँ हैं - मालवी (इस वर्ग की यह  एकमात्र बोली है)  इसकी  उपबोलियाँ हैं - सोड़वाड़ी, रांगड़ी,पाठवी,रतलामी आदि।
उत्तरी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोलियाँ  है - इस वर्ग की कोई स्वतंत्र बोलियाँ नहीं दिशा के आधार पर  इसमें  मेवाती और अहीरवाटी को सम्मिलित किया जा सकता है।

राजस्थानी की प्रमुख वर्गीकृत बोलियों का संक्षिप्त परिचय दृष्टव्य है -

1. मारवाड़ी - 
                 मारवाड़ी राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली है।  इसका परिनिष्ठित रूप जोधपुर के आसपास बोला जाता है।  मिश्रित रूप में यह पूर्व में अजमेर, किशनगढ़, मेवाड़ तक;  दक्षिण में सिरोही, रानीवाड़ा तक; पश्चिम में जैसलमेर शाहगढ़ तक ; उत्तर में बीकानेर, गंगानगर तक तथा जयपुर के उत्तरी भाग में पिलानी तक बोली जाती है।  मरुभूमि, मरुदेस,मारुदेस और मरवण इस क्षेत्र के पुराने नाम हैं जिसके कारण इसको 'मरुभाषा' के नाम से भी जाना जाता है।  इसके बोलने वालों की संख्या राजस्थान में सर्वाधिक है।  राजस्थानी का बहुत अधिक साहित्य इसी बोली में प्राप्त है।  साहित्यिक मारवाड़ी को डिंगल कहा जाता है। यही राजस्थानी की प्रतिनिधि और आदर्श बोली है। ढढकी, थली,  देवतावाड़ी, बीकानेरी, बागड़ी, शेखावाटी, मेवाड़ी,  खैराड़ी, सिरोही,  गोंडवाड़ी,  नागौरी आदि मारवाड़ी की प्रमुख  उल्लेखनीय उपबोलियाँ हैं। मारवाड़ी में साहित्य तथा लोक साहित्य दोनों  पर्याप्त मात्रा में है।  हिंदी साहित्य की आदिकालीन वीरगाथिक रचनाएँ इसी बोली में लिखी हैं।  इसके प्रमुख रचनाकार हैं- चंदवरदाई, मीराँबाई, सूर्यमल्ल मिसण, कवि कल्लोल। ढोला मारू रा दूहा इसी भाषा में सुरक्षित है, जो कि प्रेमाख्यानक परंपरा की प्रसिद्ध रचना है।

मारवाड़ी की प्रमुख विशेषताएँ -
महाप्राण ध्वनियाँ अल्पप्राणित रहती हैं -रैणों (रहणों), हात (हाथ), भूक (भूख)
च,छ,को 'स' उच्चारण - चक्की- सक्की, छाछ -सास
ल के स्थान पर  ळ का प्रयोग - बाल -बाळ, जल - जळ, काल -काळ
दो विशिष्ट ध्वनियाँ (ध् और स्) मिलती हैं - धावो,जास्यो आदि ।

2. ढूंढ़ाड़ी -
                 ढूंढ़ाड़ी  पूर्वी  राजस्थानी की प्रधान बोली है। इसका दूसरा नाम जयपुरी है। इसका नया नाम जयपुरी जयपुर के आधार पर यूरोपियनों द्वारा दिया गया है।  इसका ढूंढ़ाड़ी नाम इसलिए पड़ा कि प्राचीन समय में जयपुर को ढूंढ़ाड़  प्रांत के नाम से जाना जाता था। इसके अन्य नाम झाड़साई तथा माई कुई  है । शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से विकसित इस बोली में केवल लोक साहित्य है। इसमें साहित्य भी लिखा गया है, विशेष रूप से दादूपंथी साहित्य।  इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है।  इसकी प्रमुख उपबोलियाँ हैं - तोरावाटी, काठैड़ा, हाडौती, किशनगढ़ी, राजावाटी, अजमेरी,  चौरासी, नागरचाल।  इन  हाडौती का साहित्यिक महत्व है,  जिसका लोकसाहित्य समृद्ध है।  इसका क्षेत्र कोटा,  बूंदी से लगाकर ग्वालियर तक व्याप्त है। संपूर्ण ढूंढ़ाड़ी जयपुर, किशनगढ़, टोंक, लावा एवं अजमेर, मेरवाड़ा के पूर्वी अंचलों में बोली जाती है।

ढूंढ़ाड़ी  की प्रमुख विशेषताएँ  हैं -
क्रिया रूप हूं, हो के स्थान पर छूं, छो का प्रयोग
भविष्य के दो रूप स और ल् - होस्यू, होस्याँ, होऊलाँ,होला आदि
अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति - आधो - आदो, जीभ - जीव
ह ध्वनि का लोप - सहाय - साय, शहर - सैर
अ,आ और इ,उ आपस में परिवर्तित हो जाते हैं - पंडित - पंडत, मानुस - मिनख, दिन - दन आदि हैं।

3. मेवाड़ी - 
                मेवाड़ प्रदेश (उदयपुर, चितौड़गढ़ जिलों में) में बोली जाने वाली बोली का नाम मेवाड़ी पड़ा।  वर्तमान में उदयपुर,  चितौड़गढ़ तथा उसके आसपास के क्षेत्र में बोली जाने वाली मेवाड़ी मारवाड़ी के बाद राजस्थानी की एक महत्वपूर्ण बोली है।  मेवाड़ी और मारवाड़ी का लोक साहित्य और साहित्य काफी  समृद्ध मात्रा में व्याप्त है।  इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है। महाराणा कुंभा के नाटकों  की भाषा मेवाड़ी बोली ही है।

4. मेवाती - 
             पूर्वोत्तर राजस्थान में इसका क्षेत्र अलवर, गुरुग्राम, भरतपुर तथा आसपास है। मेव जाति की अधिकता के कारण इस अंचल का नाम मेवात एवं यहाँ की बोली का नाम मेवाती पड़ा।  इसकी सीमा हरियाणा के जिला गुरुग्राम की झिरका, फिरोजपुर तहसीलें तथा बल्लभगढ़ एवं पलवल के पश्चिमी भागों, उत्तर प्रदेश के कोसी,  छाता तथा मथुरा के पश्चिमी अंचलों एवं राजस्थान के जिला अलवर की  किशनगढ़, तिजारा, रामगढ़, गोविंदगढ़, लक्ष्मणगढ़ तहसीलों, जिला भरतपुर की कामा, डीग तथा नगर तहसीलों  के पश्चिमोत्तर तक विस्तृत है। इसकी एक मिश्रित बोली अहीरवाटी है। इसकी प्रमुख उपबोलियाँ हैं -  राठी, गुजरी, नहेर,कठर, परिनिष्ठित मेवाती,  महेड़ा मेवाती आदि।  इसका क्षेत्रफल बहुत बड़ा है और बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है। इसका लोक साहित्य समृद्ध है।  लोक कवियों में लालदास, चरणदास, दयाबाई, सहजोबाई,  डूंगरसिंह, भीक, शके  प्रमुख हैं।

5. मालवी - 
                उज्जैन के आसपास का क्षेत्र मालवा के नाम से जाना जाता है।  इस क्षेत्र की बोली का नाम मालवी है। शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से विकसित इस बोली में कुछ साहित्य तथा पर्याप्त लोक साहित्य है।  इसके पश्चिम में प्रतापगढ़, रतलाम, दक्षिण-पश्चिम इंदौर,  दक्षिण-पूर्व में भोपाल और होशंगाबाद का पश्चिमी भाग, उत्तर- पूर्व में गुना, उत्तर- पश्चिम में नीमच तथा उत्तर में ग्वालियर, कोटा, झालावाड़, टौंक तथा चित्तौड़गढ़ के कुछ भाग सम्मिलित हैं।  शुद्ध मालवी का क्षेत्र देवास, इंदौर और उज्जैन है। इसकी प्रमुख उपबोलियों में निमाड़ी, रतलामी, सोधवाड़ी,रांगड़ी, पाटवी आदि है।  इसके बोलने वाले राजस्थान और मध्य प्रदेश के रहवासी  हैं।

मालवी की प्रमुख विशेषताएँ -
ऐ का ए में तथा औ का ओ में परिवर्तन -चैन - चेन, सौ -सो, और - ओर, पैसा - पेसा आदि।
ह के स्थान पर य या व का प्रयोग - मोहन - मोयन, लुहार - लुवार,महीना - मईना, साहब - साब आदि।
न का ण में परिवर्तन - अपनो - अपणो, कहानी - कैंणी आदि।

6. अहीरवाटी - 
                   मेवाती बोली में इसका प्रयोग यह कहकर बताया कि यह मेवाती की एक मिश्रित बोली है।  वस्तुतः अहीरवाटी बाँगरू एवं मेवाती के मध्य संधि स्थल की बोली कही जा सकती है।  इसका क्षेत्र विस्तार राजस्थान में जिला अलवर की तहसील बहरोड, मुंडावर,बानसूर तथा किशनगढ़ का पश्चिमी भाग,जिला जयपुर की तहसील कोटपूतली का उत्तरी भाग तथा दिल्ली का दक्षिणी भाग,  हरियाणा में जिला गुरुग्राम, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ की तहसील नारनौल तक विस्तृत है। बहरोड़ तहसील की उप तहसील नीमराणा के राजा चंद्रभान सिंह चौहान के दरबारी कवि जोधराज ने हमीर रासो काव्य की रचना की, जो रीतिकालीन कवि थे, इस क्षेत्र के उल्लेखनीय कवि हैं। इस क्षेत्र में अनेक लोक मंचीय कवि हुए जिन्होंने इस बोली को गौरव प्रदान किया। जिनमें प्रमुख नाम हैं कवि शंकरराव, प्रसिद्ध ख्याल गायक अलीबक्श खां  (मुंडावर) पंडित रामानंद,जीवनानंद (ढुंढ़ाडिया) आदि।  ऐतिहासिक दृष्टि से इस क्षेत्र का नाम राठ एवं यहाँ की बोली को राठी भी कहा जाता है। प्राचीन काल में काल से आभीर (अहीर) जाति की एक लंबी पट्टी का क्षेत्र में आबाद होने से यह क्षेत्र अहीरवाल, हीरवाल  कहा जाने लगा है।  वर्तमान में सहायक क्रिया के  सूँ,साँ,सै से का प्रयोग इसकी प्रमुख विशेषता है।

7. बाँगड़ी -
              राजस्थान के डूँगरपुर और बाँसवाड़ा जिला के क्षेत्र को बाँगड़ कहते हैं। यहाँ की बोली जाने वाली बोली बागड़ी कहलाती है।  इसका स्वतंत्र रूप स्वीकृत नहीं है।  यह मालवी  की संबद्ध बोली मानी गई है। इसकी एक उपबोली  भीली  भी प्रमुख है। इसका लोक साहित्य रूप ही स्वीकृत है। इसके बोलने वालों की संख्या भी अधिक नहीं है।

ङ पहाड़ी हिंदी -
                       हिमालय के पहाड़ी प्रदेश शिमला से नेपाल तक बोली जाने वाली भाषा को तीन भागों में बाँटा गया है - 1. पूर्वी पहाड़ी  2. मध्य पहाड़ी, तथा 3.पश्चिमी पहाड़ी । इनकी भी अनेक बोलियाँ  हैं,  मध्य पहाड़ी -  इसकी दो शाखाएँ  हैं कुमाऊँनी और गढ़वाली। पूर्वी पहाड़ी -  यह नेपाल तथा काठमांडू घाटी की बोली है।  इसमें साहित्य में मिलता है। यह नेपाल की राजभाषा भी है।  पश्चिमी पहाड़ी - शिमला के निकटवर्ती भागों में बोली जाती है। पहाड़ी हिंदी का विकास मध्य देशीय शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। खस जाति की अधिकता के कारण इस प्रदेश को खसीर  प्रदेश के नाम से जानते हैं।  पहाड़ी हिंदी की प्रमुख बोलियों का संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है -

1. गढ़वाली - 
                यह गढ़ो  का प्रदेश होने के कारण ही  गढ़वाल कहलाता है।  इसी क्षेत्र की बोली गढ़वाली है।  इस क्षेत्र के अन्य नाम उत्तराखंड और केदारखंड भी हैं। पौराणिक काल से ही यह क्षेत्र ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहा है । 15वीं शती के लगभग इस प्रदेश पर पँवार वंश के आधिपत्य के आधार पर गढ़वाल में वीर लोकगीतों का नाम पवाड़ो  रखा गया। इसके अंतर्गत गढ़वाल,  टिहरी, चमोली और उत्तरकाशी  (दक्षिण भाग) के जिले सम्मिलित हैं। इसकी अनेक उपबोलियाँ हैं। ग्रियर्सन के  अनुसार इसकी 378 बोलियाँ है, जिनमें प्रमुख हैं - 1. श्रीनगरिया 2.राठी 3. बघानी 4.माँझ 5.कुमैया 6. नागपुरिया तथा 7. टिहरी ।

इसमें टिहरी गढ़वाल की बोली आदर्श बोली है।  इसके बोलने वालों की संख्या पर्याप्त है। ल और ळ के स्थान पर ड  का प्रयोग काळो -काड़ो, कलेजा - कड़ेजो; स्वरों को अनुनासिक कर देना -छायाँ,दैंत, पैंसा,प्यांर,सांत आदि इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

2. कुमाऊँनी- 
                 कुमाऊँनी का प्रमुख क्षेत्र कुमाऊँ  (उत्तराखंड) है।  कुमाऊँ का पूरा नाम कूर्मांचल था। इसी आधार पर इस क्षेत्र की बोली का नाम कुमाऊँनी पड़ा है।  भाषा की दृष्टि से इसके भीतर सारा अल्मोड़ा, नैनीताल और  पिथौरागढ़ के  जिले सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरकाशी और चमोली में भी बिखरे रूप में बोली जाती है।  इसकी उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी है। कुमाऊँनी की स्थानीय उपबोलियों में खसपचिया,  कुमैया, फल्दकोटिया,  पछाई, मंगौला, दानपुरिया,सिराली,  जोहारी,  राठी, बघानी सालानी, टिहरी और भोटिया प्रमुख है। अल्मोड़ा के आसपास की बोली आदर्श कुमाऊँनी है,  जो सारे क्षेत्र में समझी जाती है। ण शब्द के अंत में प्रयुक्त नहीं होता, अल्पप्राणीकरण प्रवृत्ति की अधिकता - पढ़ो - पड़ो, सूखी - सूकै, श उच्चरित होती है -अशु - अश्रु, आरशी - आरसी आदि इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

उपर्युक्त हिंदी की पाँच उपभाषाएँ हैं -
1.पश्चिमी हिंदी
2.पूर्वी हिंदी
3.राजस्थानी हिंदी
4.पहाड़ी हिंदी
5.बिहारी हिंदी
और इसके अंतर्गत 18 बोलियाँ हैं -
1.ब्रजभाषा
2. कन्नौजी
3.बुंदेली
4.बाँगरू
5.खड़ी बोली
6.अवधी
7.बघेली
8.छत्तीसगढ़ी
9.मैथिली
10.मगही
11.भोजपुरी
12.मेवाती
13. मालवी
14.मारवाड़ी
15 ढुंढा़ड़ी
16.गढ़वाली
17.कुमाऊँनी
18.नेपाली
व अनेक उपबोलियों  का संक्षिप्त एवं सारगर्भित विवेचन किया गया है।

इस विवेचन में बोली का सामान्य परिचय क्षेत्र उसकी बोलियाँ और उसका उद्भव विकास तथा उसकी प्रमुख विशेषताओं को रखा गया है । वर्तमान में हिंदी का राजभाषा रूप,पश्चिमी हिंदी की खड़ी बोली का विकसित रूप है। जिसको 14 सितंबर,1949 को भारत की संविधान सभा ने स्वीकार किया।  संविधान के भाग -17 तथा अनुच्छेद 343(1)  के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी (खड़ी बोली) और लिपि देवनागरी होगी। अंकों मे अंतरराष्ट्रीय अंकों का  प्रयोग किया जाएगा।  आज हिंदी राजभाषा तो है परंतु राष्ट्रभाषा नहीं क्योंकि भारतीय संविधान की 12 अनुसूचियों  में आठवीं अनुसूची  (जो भाषाओं की है) के अनुच्छेद 344 (1) और 351 में प्रारंभ में 14 भाषाएँ थी।  (असमिया,बंगला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी,  मलयालम, मराठी,  उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल,तेलगु और  उर्दू) बाद में  सिंधी को 1961 में जोड़ा गया और यह संख्या 15 हो गई थी।  1992 में संविधान संशोधन द्वारा इस सूची में तीन अन्य भाषाएँ -
मणिपुरी,  नेपाली और कोंकणी को सम्मिलित कर लिया गया। इस प्रकार अब आठवीं अनुसूची में राष्ट्रीय भाषाओं की संख्या 18 हो गई।  2003 में संविधान संशोधन के पश्चात् चार अन्य बोलियों को भी इस अनुसूची में शामिल किया गया -  डोगरी,  संथाली, मैथिली और बोड़ो। इस तरह से संविधान की अष्टम अनुसूची में वर्तमान में 22 राष्ट्रीय भाषाओं को मान्यता प्राप्त है।

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