कविताएँ: देवेन्द्रराज सुथार

देवेन्द्रराज सुथार
किताब

लेखक उखेरता है
अच्छी और नेक बातें
और कर देता है
कागजों में दफन।

पाठक पढ़ता है
लेखक को टाइमपास,
मनोरंजन व बोरियत
कम करने हेतु।

एक किताब
हर बार मिलती है
दुनिया के हर कोने में
दुनिया को अच्छा बनाने के प्रयास में।


पेड़

पेड़ रहता है खड़ा
सर्दी में गर्मी में बरसात में
पेड़ लड़ता है भिड़ता है
आंधी और तूफान से
किसलिए?
फकत खग के नीड़ को बचाने
इंसान के लिए इनसानियत जताने
सबको अपनी जान प्यारी
सबके अपने स्वार्थ और
सबकी अपनी दुनियादारी
ऐसे में पेड़ लगता है मुझे माँ सा
जो आजकल मेरी नजरों में
सबसे बड़ा पेरोपकारी है।


सरकारी मशीन

आजकल
हो चुका हूँ
सबसे हरामखोर और
कामचोर
नहीं आती है नींद
अंधकार की गुहा में भी
रहते हैं त्रिलोचन
खुले के खुले
इन खुले लोचन में
नहीं देते हैं
रंग-बिरंगे सपने दस्तक
लगता है बह गया
स्वप्न का नीर
मैं जो बन चुका हूँ
एक चलती-फिरती
सरकारी मशीन
जो नहीं होती
ज्यादा इस्तेमाल।


बेरोजगार

आजकल
उजड़ चुका है रंग
आजकल
मर चुके हैं सपने
आजकल
वक्त दौड़ता है काटने
आजकल
बन चुका हूँ तानों का बाजार
आजकल
हो चुका हूँ जिंदा लाश
पतझड के इस बुरे वक्त में
साथ छोड़ चुके हैं पत्ते
नजर नहीं आता
दूर तलक तक
कोई मददगार
दरअसल, आजकल
बना हुआ मैं
एक डिग्रीधारी बेरोजगार।

एमए हिंदी उत्तरार्द्ध के अध्येता। स्वतंत्र टिप्पणीकार। विभिन्न समाचार-पत्रों में रचनाओं का प्रकाशन।
पता: गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर - 343025 (राजस्थान)
चलभाष: +91 810 717 7196; ईमेल: devendrakavi1@gmail.com

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