रघुवंश महाकाव्य में राजधर्म

संजय कुमार

सहायक-आचार्य, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) 470003 
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रघुवंश महाकाव्य की गणना महाकवि कालिदास की अमर कृतियों में की जाती है। इस महाकाव्य को लघुत्रयी के रूप में भी आदर प्राप्त है। यहाँ कवि अपने कृति के माध्यम से समाज को उपदेशित करता है। उसका यह उपदेश सरस, मनोरम तथा आकर्षण होता है। इसलिए उसके उपदेश को कान्तासम्मित उपदेश कहा जाता है। कवि जब भी किसी विषय की स्थापना करता है तो उसमें उसका व्यापक जीवनानुभव जुड़ा रहता है। वह निपुणता और अभ्यास से जन्मजात अपनी प्रतिभा को जीवनानुभव रूप में इस भांति प्रतिपादित करता है कि वह ‘सहितस्य भावं साहित्यम्’ के रूप में परिणित हो जाता है। यही साहित्य लौकिक एवं पारलौकिक दृष्टि से हित करने वाला होता है। क्योंकि उसमें लौकिक एवं शास्त्रीय विषयों की उपस्थापना होती है। हमारे ज्ञान के दो आधार माने जाते हैं लोक और शास्त्र। लोक और शास्त्र का अध्ययन ही निपुणता की कसौटी हैं।

महाकवि कालिदास के ‘रघुवंश’ महाकाव्य में उनकी निपुणता का व्यापक रूप से परिलक्षित होती है। वे लोक एवं शास्त्र-मर्यादा का एक साथ पालन करते दिखलाई पड़ते हैं। या यह कहे कि धर्मशास्त्र की स्थापना करते हैं तो कोई अनुचित नहीं होगा। धर्म हमारे जीवन में महासमुद्र की भाँति है जिसमें सब कुछ समाहित रहता है। धर्म लोक एवं शास्त्र दोनों को एक साथ लेकर चलता है। आचरण एवं व्यवहार के साथ-साथ यह समाजशास्त्र, राजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र, दर्शन आदि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है। वस्तुतः धर्म शब्द धृ धातु से बना है जिसका अर्थ- धारण करना, पालन करना, आलम्बन देना आदि होता है। इसके अतिरिक्त यह धर्म शब्द अनेक अर्थों में अनेक परिस्थितियों के परिवर्तन चक्र में भी घूमता है। इसका चक्राकार घूमना समाज संरक्षण एवं सम्वर्धन का प्रतीक है। यही संकल्पना ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ से भी प्राप्त होती है।

‘ऋग्वेद’ में धर्म धार्मिक विधि-विधान एवं क्रिया पक्ष के रूप में सामने आया हुआ है। ‘छान्दोग्योपनिषद्’ में धर्म की व्यापकता परिलक्षित होती है। वहाँ आश्रम व्यवस्था के रूप में धर्म को अनुशासित किया गया है। ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’ का यह वाक्य ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ तो जीवन मूल्य ही बन गया है। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में धर्म को स्वधर्मे निधनं श्रेयः अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण कारक है। लेकिन पुराणों में आते-आते धर्म का स्वरूप बदल गया है। वहाँ धर्म पुण्य का वाचक हो गया है। लोक का भलिभांति सेवा करना, किसी प्राणी को दुःख न पहुँचाना पौराणिक धर्म है। इसीलिए यहाँ कहा जाता है- ‘‘परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’’। इस रूप में राजधर्म भी धर्म बन जाता है क्योंकि यहाँ भी भलीभाँति प्रजा को पालन का ही उपदेश दिया जाता है। राजा का परम कर्तव्य लोक कल्याणकारी व्यवस्थाओं का उन्नयन है। इस रूप में धर्म कर्तव्य का रूप ले लेता है। महाकाव्य काल प्रेरणा एवं सदाचरण का काल माना जाता है। यहाँ पर अनेक प्रकार से प्राचीन राजाओं के यशःख्यापन का उद्देश्य मात्र सद्प्रेरणा प्रदान करना ही था। इसी सद्प्रेरणा के रूप में कान्तासम्मित उपदेश समन्वित ‘रघुवंश’ महाकाव्य की भी गणना की जाती है। यह महाकाव्य भारतभूमि के उस राजवंश से सम्बन्धित है जो इतिहास के पोथियों में नहीं बल्कि सम्पूर्ण जन-मानस के हृदय में अंकित है। जनमानस लोक का पर्याय है। लोक से बड़ा कुछ नहीं है। जो लोक होता है वही शास्त्र बनता है। यद्यपि रघुवंश महाकाव्य केवल लोकाश्रित नहीं है। इस पर अनेक धर्मशास्त्रों, रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थों का व्यापक प्रभाव दिखलाई पड़ता है लेकिन लोक में रघुवंश के प्रति जो भावना जुड़ी है उसका स्पर्श महाकवि कालिदास अपने ‘रघुवंश महाकाव्य’ में और तुलसीदास रामचरितमानस में करते हैं। अवधि भाषा में रामचरितमानस में केवल राम के मर्यादित जीवन का ही विशेष रूप से अंकन किया गया है। लेकिन रघुवंश महाकाव्य में तो राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक कुल ओन्तीस राजाओं के राजधर्म के पुनीत आचरण से रसानुभूति करायी गयी है। महाभारत में राजा के स्वरूप के सम्बन्ध में कहा गया है-
अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः।
राजा भवति भूतानां विश्वास्यौ हिमवानिवः।।

अर्थात् जिसमें क्रोध का अभाव होता है, जो दुर्व्यसनों से दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा जो अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लिया है वह राजा हिमालय के समान सम्पूर्ण प्राणियों का विश्वास पात्र बन जाता है। इसीलिए राजा का स्थान सप्ताङ्गों में प्रथम है। राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र यही राजधर्म के सप्तांग कहे जाते हैं। यही राजधर्म वर्तमान राजनीति विज्ञान की आधारशिला है। सप्तांग सिद्धान्त के अनुसार राज्य की सात प्रकृतियाँ होती हैं, जो राज्य का निर्धारण करती है। सभी प्रकृतियों का अपना-अपना विशेष महत्त्व होता है। ये प्रकृतियाँ राज्य शासन के रूप में मानव शरीर के अंगों के समान जुड़ी रहती हैं और एक दूसरे की सहगामी बनती हैं। महाकवि कालिदास सुन्दर उपमा के माध्यम से महाराज दिलीप के प्रजापालन के सम्बन्ध में प्रथमतः उल्लेख करते हैं-
भीमकान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम्।
अधृष्यश्चाभिगम्यश्चयादोरत्नैरिवार्णवः।।
रेखामात्रमपि क्षुण्णादामनोर्वत्र्मनः परम्।
न व्यतीयुः प्रजास्तस्य नियन्तुर्नेमिवृत्तयः।।

अर्थात् जैसे घडि़यालों और मगरमच्छों के डर से लोग समुद्र में बैठने से डरते हैं, वैसे ही, राजा दिलीप से भी उनके सेवक डरते रहते थे क्योंकि वे न्याय में बड़े कठोर थे यानि किसी के साथ पक्षपात नहीं करते थे। किन्तु जैसे समुद्र के सुन्दर और मनोहर रत्नों को पाने के लिए लोग समुद्र में बैठ जाते हैं वैसे ही राजा दिलीप इतने दयालु, उदार और गुणशास्त्री भी थे कि उनकी कृपा पाने के लिए लोग सदा उनका मुँह जोहते थे। जैसे चतुर सारथी जब रथ चलाता है तब रथ के पहिये बालभर भी लीक से बाहर नहीं होता है वैसे ही राजा दिलीप ने ऐसे अच्छे ढंग से प्रजा की देखभाल की कि प्रजा का कोई भी व्यक्ति मनु के बताये हुए नियमों से बालभर भी बहककर नहीं चल सकता था। कहने का भाव यह है कि राजा और प्रजा सभी वर्ण और आश्रम के नियमों के अनुसार ही अपने धर्म का पालन करते थे। राजा का कर्तव्य है प्रजा का पालन और प्रजा का कर्तव्य राजाज्ञा का पालन करना। यह राजव्यवस्था राजा और प्रजा के मध्य की व्यवस्था है। जिसका समादर करना राजा और प्रजा दोनों का कर्तव्य है। प्रजातंत्र के युग में तो प्रशासक और प्रजा के आपसी सम्बन्ध की यह योग-क्षेमता और अधिक महत्त्व रखती है। कालिदास राजा को ज्ञानी भोगों के प्रति अनासक्त और कर्तव्यपालन में सदैव संलग्न रहने वाला बताया है। राजा प्रजा के पिता के समान है। राजा पिता के समान प्रजा का सम्बर्धन एवं संरक्षण प्रदान करता है। लेकिन आज दुर्भाग्य से प्रजापालन का यह मूल्य गिर चुका है। लोकतन्त्र का संवैधानिक ढांचा जर-जर हो गया है। इसका कारण है लोगों में नैतिकता का गिरना। हमारा सामाजिक परिवेश जब तक जातिवाद, क्षेत्रवाद और सम्प्रदायवाद से ऊपर नहीं उठेगा तब तक यह समस्या बढ़ती रहेगी। त्याग की पवित्र भूमि से हमारे समाज का पैर डिगना नहीं चाहिए। भौतिक पदार्थों के उपभोग में अपने स्वत्व की रक्षा करना चाहिए। लेकिन आज के प्रशासक को अपने यशः शरीर की चिन्ता नहीं जिसकी चिन्ता दिलीप को थी। वे नन्दिनी की रक्षा के लिए स्वयं के शरीर का अर्पण करना श्रेष्ठ समझते हैं। यह है प्रजापालन की उत्कट संकल्पना। जो सभी काल में पूजनीय है। कालिदास अपने इस महाकाव्य में वरतन्तु शिष्य कौत्स का वर्णन पाँचवे सर्ग से बहुत विस्तार के साथ किये हैं। कौत्स जब महाराज रघु के पास पहुँचते हैं तो रघु के पास कुछ भी शेष नहीं था। वे अपना सर्वस्व विश्वजीत यज्ञ में दान कर मृणमय पात्रों से ही अतिथियों का सत्कार कर रहे थे। ऐसे दानी राजा के पास जब कौत्स पहुँचते हैं तो रघु उनसे शिष्टाचार भेंट में ही जो कुशल-क्षेम पूछते हैं। वह राजधर्म का निदर्शन है - ‘महाराज रघु’ सर्वप्रथम ऋषि वरतन्तु की कुशलता पूछते हैं। वृक्षों एवं वन्य पशुओं के विषय में, नदियों के जल के विषय में, आश्रम के संरक्षण के विषय आदि के सम्बन्ध में पूछते हैं। जिससे राज्यव्यवस्था एवं प्रजा पालन की उनके अन्दर कितनी उत्कट अभिलाषा है यह विदित होती है। आज के प्रशासक क्यों नहीं अपने प्रजा के प्रति इतने समीप से उन्हें देखने का प्रयास करते हैं। जहाँ तक मुझे लगता है प्राचीन समय में राजाओं के अन्दर प्रजा के प्रति सेवा की भावना विद्यमान थी लेकिन आज की राजनीति व्यवसाय की तरह अपनी सुख-सुविधा के लिए बन गयी है। जिस तरह एक व्यापारी अपने व्यवसाय से अधिक से अधिक लाभार्जन प्राप्त करना चाहता है उसी प्रकार आज का राजनीतिज्ञ भी बन गया है। जो देश के लिए उचित नहीं है। राजनीति त्याग की आधार शिला पर विराजती है उसे भोग रूप में कभी भी परिणित नहीं होना चाहिए। भोगवादी राजनीति को किसी भी काल में स्वीकार नहीं किया गया है। इसलिए प्रशासक को धर्माचरण करना चाहिए। महाभारत में कहा गया है-
राजा चरति चेद् धर्मं देवत्वाय कल्पते।
स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति।।

अर्थात् राजा यदि धर्म के अनुसार आचरण करता है तो देवता बन जाता है और यदि वह अधर्म का आचरण करता है तो नरकगामी हो जाता है। राजा का प्रजा पालन ही सनातन धर्म है। प्रजा पालन के अतिरिक्त उसका कोई सनातन धर्म नहीं है। राजा के प्रजापालन के सम्बन्ध में कालिदास लिखते हैं-
निगृह्य शोकं स्वयमेव धीमान्वर्णां श्रमावेक्षणजागरुकः।
स भ्रातृसाधारणभोगमृद्धं राज्यं रजोरिक्तमनाः शशास।।

अर्थात् वर्णाश्रम-धर्म के रक्षक बुद्धिमान राम संसार के सुखों का मोह छोड़कर और शोक रोककर भाइयों के साथ अपने भरे-पूरे राज्य का शासन करने लग गये। राम उस समय राजमर्यादा से भयभीत होकर सीता का परित्याग कर चुके थे। वे अपना दूसरा विवाह भी नहीं कर करते हैं। उनके मन में त्याग की उत्कट भावना थी जिसके बल पर वे दत्तचित्र होकर प्रजा का पालन करते थे। राजा के लिए भोग-विलास किसी प्रकार से उचित नहीं है। कालिदास ने अग्निवर्ण के भोग-विलास में संलिप्त रहने का परिणाम भी दिखलाया है। वह अग्निवर्ण सभी राजनीतिक दायित्त्वों से मुक्त होकर केवल स्त्री प्रसंग में संलग्न रहता था, फलतः यक्ष्मा रोग सी पीडि़त हो गया और असामयिक मृत्यु को प्राप्त हो गया। राजा ही राज्य की एकता, अखण्डता एवं सम्प्रभुतों का प्रतीक होता है। उसके अनाचार और कदाचार का प्रभाव प्रजा पर भी पड़ता है। महाकवि दण्डी अनन्तवर्मा के रूप में यथा राजा तथा प्रजा का बहुत ही स्वभाविक वर्णन किया है। रावण, कंस, शिशुपाल इत्यादि सभी अपने व्यसन के कारण ही समाप्त हो गये।

राजा जब अपने कर्तव्य को प्रजा पालन के रूप में सबसे ऊपर रखता है तो उस प्रजा पालक राज्य की प्रशंसा लोक में होती है। मैं यहाँ थोड़ा ग्रामीण जीवन की ओर भी दृष्टिपात करना चाहता हूँ। ग्रामीण जीवन लोक जीवन का सुन्दर निदर्शन होता है। वहाँ भी राजधर्म के विषयों की चर्चा होती है। लोगों में राजा के गुणों की प्रशंसा होती है। यह प्रशंसा केवल प्रशंसनीय ही नहीं होती बल्कि इसके द्वारा सही अर्थ में राजधर्म की व्यावहारिकता झलकती है। किसी राजा की कीर्ति का यह दृश्य निश्चित रूप से लोक कल्याणकारी होता है। जब उसकी प्रशंसा जन-सामान्य में होने लगे। महाराज रघु के सम्बन्ध में कालिदास लिखते हैं कि वे प्रजा को बहुत प्यारे थे-
इक्षुच्छायानिषादिन्यस्तस्यगोप्तुर्गुणोदयम्।
आकुमारकथोद्धातंशालिगोप्यो जगुर्यशः।।

अर्थात् धान के खेतों की रखवाली करने वाली किसानों की स्त्रियाँ भी ईख की छाया में बैठकर प्रजापालक राजा रघु की बचपन से तबतक के गुण कथाओं की गीत बना बनाकर गाती रहती थी। नगर बंधुओं की यह गीत सामान्य गीत नहीं है यह तो उनके हृदय का उद्गार है। जो अपने राजा के गुणों से सहज ही उत्पन्न हो गया है। रघुवंश महाकाव्य का राजधर्म की दृष्टि से बारहवाँ सर्ग भी महत्त्वपूर्ण है। वहाँ राजधर्म के त्याग की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। यहाँ राम के जीवनदर्शों का कवि के द्वारा सुन्दर मूल्यांकन किया गया है-
पित्रा दत्तां रुदन्रामः प्राङ्महीं प्रत्यपद्यत।
पश्चाद्वनाय गच्छेति तदाज्ञां मुदितोऽग्रहीत्।।

अर्थात् राम को जब दशरथ राजगद्दी दे रहे थे उस समय राम ने उसे आँखों में आँसू भरकर स्वीकार किया था और जब उनसे कहा गया कि वन चले जाओ तब राम ने इस आज्ञा को हँसते-हँसते सिर-माथे चढ़ा लिया। आज यह भाव पुत्र के रूप में किसी भी राजनेता में दिखलाई नहीं पड़ता। भारत अनेक क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय पार्टियों का देश है। यहाँ पार्टियाँ किन्हीं विशेष लोगों के संगठनात्मक प्रतिभा की उपज हैं। लेकिन आज उन्हें संसद में पहुँचने के योग्य भी नहीं समझा जाता है। आज उनकी प्रतिभा और योग्यता देश के किसी काम की नहीं रह गयी है। उन्हें वानप्रस्त दे दिया गया। वैसे यह चलन कोई नई नहीं हैं कंस, औरंगजेब के रूप में इतिहास भी साक्षी है। लेकिन वे बहुत दिन तक नहीं रह सके। अपने पूर्वजों को सहजने की हमारी परम्परा रही है। उनका जीवनानुभव हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। राम अपने पिता के जीवनादर्शों पर चलने वाले थे। वनवास से लौटने के बाद जब राम राज गद्दी पर बैठते हैं तो प्रजा सुखी होकर उन्हें पिता और पुत्र दोनों रूप में देखती हैं-
तेनार्थवाँल्लोभपराङ्मुखेन तेन ध्नताविघ्नभयं क्रियावान्।
तेनास लोकः पितृमान्विनेत्रा तेनैव शोकापनुदेन पुत्रो।।

अर्थात् राम निर्लोभ थे इसीलिए उन्होंने प्रजा पर कभी कोई कर नहीं लगाया। फल यह हुआ कि थोड़े ही दिनों में प्रजा धनी हो गई। वे कही भी विघ्न आने हीं नहीं देते थे, इसलिए सब लोग प्रसन्नता से अपनी यज्ञ आदि क्रियाएँ करने में लगे थे। वे सबको ठीक मार्ग पर चलाते थे इसलिए सब उन्हें पिता के समान मानते थे और विपत्ति पड़ने पर वे सबकी सहायता करते थे इसलिए वे प्रजा के पुत्र भी थे। राजा को पिता और पुत्र दोनों रूप में देखना राजधर्म उच्चतम आदर्श है। इस आदर्श प्राप्त करने वाला कोई विरला ही होता है।

राजधर्म में मन्त्री का भी महत्त्वपूर्ण स्थाना होता है। मन्त्री ही सभी राज नियमों को अनुशासित करता है। वह राजा को उचित परामर्श देता है। प्राचीन काल में राजा अपनी सहायता के लिए अनेक मंत्रियों की नियुक्ति करता था। मनुस्मृति के अनुसार मन्त्रियों की संख्या आठ। महाभारत में उच्चस्तरीय आठ मंत्री बताये गये हैं। यहाँ मंत्रिपरिषद् के गठन के लिए कुछ विशेष नियम बनाये गये थे। महाभारत में चारों वर्णों का मंत्रिपरिषद् में प्रतिनिधित्त्व अनिवार्य था-
चतुरो ब्राह्मणान वैद्यान् प्रगल्भात् स्नातकान् शुचीन्।
क्षत्रिमांश्च तथा चाष्टौ बलिनः शस्त्रपाणिनः।।
वैश्यान् वित्तेन संपन्नान् एकविंशाते संख्यया।
त्रींशशूद्रान विनीतांश्च, शुचीन कर्मणि पूर्वके।।
अष्टाभिमश्च गुणैर्युक्तं सूतं पौराणिकं तथा।।

अर्थात् चारों वर्णों में से विद्वान् और कुशल एवं पवित्र आचरण वाले स्नातकों को मन्त्री बनाना चाहिए। जिनमें ब्राह्मण चार, क्षत्रिय आठ, वैश्य इक्कीस, शूद्र तीस और सूत एक। सूत का कार्य तत्कालीन इतिहास लेखन का कार्य होता था। आज भी मन्त्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। यद्यपि यहाँ का राष्ट्रपति सर्वेसर्वा होता है। किन्तु प्रधानमंत्री एवं अन्य मन्त्रियों में ही सत्ता की बागडोर होती है। अमेरिका आदि देशों में राष्ट्रपति ही सर्वनियन्ता है। अन्य मन्त्री उसकी सहायता करते है। रघुवंश महाकाव्य में भी मन्त्री के सम्बन्ध में कहा गया है-
नयविद्भिर्भवे राज्ञि सदच्चोपदर्शितम्।
पूर्व एवाभवत्पक्षस्तस्मिन्नाभवदुत्तरः।।

अर्थात् नीति जानने वाले मन्त्रियों ने यद्यपि रघु की सरल और कुटिल दोनों प्रकार की नीतियों से राज्य चलाने की विधियाँ सिखायी थी, किन्तु उस धर्मात्मा राजा ने सीधी नीति को अपनायी, टेढ़ी नीति को छोड़ दिये। राम जब वनवास से लौटते हैं तो गुरु वशिष्ट को प्रणाम करने के उपरान्त वे सर्वप्रथम बढ़ी हुई मूछ और दाढ़ी वाले मन्त्रियों से मिले। उनके राज्याभिषेक के समय भी वृद्ध मन्त्रिगण साथ थे। ‘रघुवंश’ महाकाव्य में अनेक स्थलों पर मन्त्रियों के कर्तव्य बोध को कालिदास ने दिखलाया है। रघुवंश के अन्तिम राजा अग्निवर्ण तो मन्त्रियों के ही ऊपर राज्य का सम्पूर्ण दायित्व प्रदान कर दिया था। वे स्वयं को भोग-विलास से अलग नहीं कर पाते थे। मन्त्रियों के आग्रह पर कभी-कभी प्रजा को दर्शन देते थे। अग्निवर्ण अपनी कुप्रवृत्ति के कारण अस्वस्थ हो गया और धीरे-धीरे एक दिन इस धराधाम को छोड़कर चल वसा। उसके गमन के बाद मन्त्रियों ने बहुत ही सूझ-बूझ के साथ राजा की पटरानी को सिंहासन पर बैठा दिया-
तैः कृतप्रकृतिमुख्यसंग्रहैराशु तस्य सहधर्मचारिणी।
साधु दृष्टशुभगर्भलक्षणां प्रत्यपद्यत नराधिपश्रियम्।।

अर्थात् मन्त्रियों ने शीघ्र ही प्रजा के नेताओं को इकट्ठा किया और उनकी सम्मति से राजा की उन पटरानी को सिंहासन पर बैठा दिया जिनमें गर्भ के शुभ चिह्न दिखाई दे रहे थे। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि मन्त्रियों ने प्रजा के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करके ही महारानी के राजगद्दी प्रदान किये। हमारा राजा कौन होगा इस विषय में प्रजा का मत महत्त्व रखता था। महाभारत काल में भी प्रजा के मत का महत्त्व था। इस प्रकार लोकतन्त्र का वीज बहुत प्राचीन समय से ही भारत भूमि पर अंकुरित हुआ जो अब विशाल वटवृक्ष का रूप धारण कर दुनिया में लोकतान्त्रिक देश के रूप में प्रसिद्ध हो गया है। यह लोकतन्त्र देश का प्राण है। इस लिए इसकी पवित्रता पर कभी आंच नहीं आने देना चाहिए।

राजधर्म के रूप में दुर्ग का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। महाभारत में दुर्ग के सम्बन्ध में कहा गया है-
धन्वदुर्ग महीदुर्गं गिरिदुर्गं तथैव च।
मनुष्यदुर्गम् अब्दुर्गं वनदुर्गं च तानिषट्।।

अर्थात् दुर्ग छह प्रकार के होते हैं- धन्वदुर्ग, महीदुर्ग, गिरिदुर्ग, मनुष्य दुर्ग, अब्दुर्ग और वनदुर्ग। धन्वदुर्ग चारों ओर रेत या रेगिस्तान के बीच में निर्मित किया जाता है। महीदुर्ग वह दुर्ग है जो समतल भूमि के अन्दर बना हुआ किला या तहखाना के रूप का दुर्ग होता है। गिरि दुर्ग छोटे या बड़े पर्वत पर बनाया जाता है। मनुष्य दुर्ग सैनिकों से निर्मित किया जाता है। अब्दुर्ग उसे कहते हैं जिसका निर्माण पानी के बीच में हुआ रहता है तथा वनदुर्ग जंगलों के मध्य में स्थित रहता है। मनुस्मृति में भी छह तरह के दुर्ग बतलाये गये हैं-
धन्वदुर्गे महीदुर्गमब्दुर्गं वाक्र्षमेव वा।
नृदुर्गे गिरिदुर्गे वा समाश्रित्य वसेत्पुरम्।।

अर्थात् राजा धन्वदुर्ग महीदुर्ग, जलदुर्गं, मनुष्ययदुर्गं अथवा गिरिदुर्ग का आश्रय कर राजधानी में निवास करें। यह दुर्ग राजधानी का पर्याय है। शत्रुध्न ने लवणासुर को मारने के उपरान्त मथुरा नामक नगर बसाया था-
उपकूलं स कालिन्द्याः पुरीं पौरुषभूषणः।
निर्ममे निर्ममऽर्थेषु मधुरां मधुराकृतिः।।
या सौराज्यप्रकाशभिर्बभौपौरविभूतिभिः।
स्वर्गाभिष्यन्दवमनंकृत्वेवोपनिवेशिता।।

अर्थात् पराक्रमी, संयमी और सुन्दर शत्रुध्न ने यमुना के किनारे मथुरा नाम की बढि़या नगर (राजधानी) बनाया। अच्छे राजा पा लेने से उस राजधानी के लोग ऐसे धनी और सुखी हो गये मानो स्वर्ग में जनसंख्या बढ़ जाने के कारण वहाँ के कुछ लोग या आकर बस गये हों। इस प्रकार दुर्ग रूप में राजधानी का वर्णन रघुवंश महाकाव्य में मिलता है।

रघुवंश महाकाव्य राजधर्म का भलिभांति विश्लेषण करता है। राजा मन्त्री, दुर्ग के साथ-साथ यहाँ कोश के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला गया है। वस्तुतः राज्य की सम्पूर्ण व्यवस्थाओं का नियामक कोश ही होता है। इसी कोश से प्रजा का योग-क्षेम किया जाता है। कोश धन का पयार्य है। किसी भी राष्ट्र की नींव धन पर ही केन्द्रित होती है। धन ही सभी व्यवस्थाओं का मूल है। रघुवंश महाकाव्य में कोश का उस स्थल पर वर्णन मिलता है जब गुरुदक्षिणा के लिए परतन्तु शिष्य कौत्स का आगमन होता है। उस समय रघु विश्वजित यज्ञ में सबकुछ दान कर चुके थे। कोष भी रिक्त हो गया था। इसलिए उन्होंने कोश संचय के लिए कुबेर पर आक्रमण करने की योजना बनायी परन्तु आक्रमण से पूर्व ही उनका कोश स्वर्ण मुद्राओं से भर गया-
प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै सविस्मयाः कोशगृहे नियुक्ताः।
हिरण्मयीं कोषगृहस्य मध्ये वृष्टिं शशंसु पतितं नभस्तः।।
तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं लब्धं कुबेरादभियास्यमानात्।
दिदेश कौत्साय समस्तमेव पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम्।।

अर्थात् प्रातः तड़के जैसे ही रघु आक्रमण के लिए चलने को हुए वैसे ही राजकोश के रक्षकों ने आकर यह अचरज भरा समाचार दिया कि कोश में बहुत देर तक सोने की वर्षा होती रही है। यानि रघु महाराज के चढ़ाई की बात कान में पड़ते ही कुबेर ने रातों रात सोने की वर्षा कर दी थी। वह सोने का ढेर ऐसा दमक रहा था जैसे वज्र से सुमेरु पर्वत का टुकड़ा काटकर गिराया गया हो। रघु ने कौत्स से कहा कि यह सम्पूर्ण धन (सोना) आप ले जाइए। लेकिन वे केवल दक्षिणा स्वरूप चौदह कारण स्वर्ण मुद्राओं को ले गये। कालिदास के द्वारा यहाँ रघु के कोश संचय के विषय में कुबेर के धन वर्षा के विषय में चर्चा की गयी हैं। रघु इत्यादि राजाओं के द्वारा शत्रु विजय से ही धन संचय का भी वर्णन रघुवंश महाकाव्य में किया गया है।

राज्य का जनपद भी राजनीति का मुख्य विषय होता है। प्रभुसत्ता, जनसंख्या तथा निश्चित भूभाग को राजनीति शास्त्र का प्रमुख घटक माना जाता है। रघुवंश महाकाव्य में अनेक राज्यों का वर्णन किया गया है। राज्य एक निश्चित भूभाग पर वसा क्षेत्र कहलाता है। राजा का प्रमुख कार्य होता है राज्य में शान्ति की स्थापना करना। राजा रघु भी सर्वप्रथम अपने राज्य में शान्ति एवं सुव्यवस्था के बाद ही उन्होंने दिग्विजय की योजना बनायी-

लब्धप्रशमनस्वस्थमथैनं समुपस्थिता।
पार्थिवश्रीद्वितीयेव शरत्पङ्कजलक्षणा।।

अर्थात् जब रघु ने अपने राज्य में शान्ति स्थापित कर ली और उनका चित्त ठिकाने हुआ तभी दूसरी राज्य लक्ष्मी के समान वह शरद ऋतु आ गई जिसमें चारों ओर सुन्दर कमल खिल उठे थे। रघु अपने दिग्विजय के क्रम में पूर्वी राज्यों को जीतते हुए समुद्र के किनारे तक पहुँच गये थे। वे सुह्य देश, बंगाल, गंगासागरद्विप, उड़ीसा, कालिङ्ग, महेन्द्र, पाण्ड्य, असम, कामरुप, आदि देशों को जीतते हुए राजा रघु अपनी राजधानी अयोध्या लौटे। इस तरह उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम के राज्यों को वे अपने अधीन कर लिए। इसी दिग्विजय यात्रा के उपरान्त रघु ने विश्वजित यज्ञ करके अपना सर्वस्वदान कर दिया। इनके दान-महात्म्य के सम्बन्ध में कालिदास कहते हैं-
स विश्वजितमाजह्ने यज्ञं सर्वस्वदक्षिणम्।
आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचामिव।।

अर्थात् दिग्विजय से लौटकर रघु ने विश्वजित यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सम्पूर्ण सम्पत्ति दक्षिणा में दे डाली। जैसे बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर पृथ्वी पर आकर बरसते हैं वैसे ही महात्मा लोग भी दान करने के लिए ही धन इकट्ठा किया करते हैं। यज्ञ समाप्त होने के उपरान्त राजा रघु ने युद्ध बन्दियों को अपने देश जाने की अनुमति प्रदान की-
सत्त्रान्ते सचिवसखः पुरास्क्रियाभिर्गुर्वोभिः शमितपराजयव्यलीकान्।
काकुत्स्थच्चिवर विरहोत्सुकावरोधाना जन्यान्स्वपुनिवृत्तयेऽनुमेने।।

अर्थात् यज्ञ समाप्त हो जाने पर रघु ने और उनके मंत्रियों ने हारे हुए, राजाओं का बड़ा सत्कार किया और उनके मन में हारने की लाज को दूर कर दिया। फिर अपनी रानियों से बहुत दिनों से बिछुड़े हुए उन सभी राजाओं को उन्होंने अपने देश जाने की आज्ञा प्रदान की। आज भी युद्ध बन्दियों को युद्ध समाप्त होने पर दोनों देशों के आपसी समझौते के तहत उन्हें मुक्त कर दिया जाता है। ‘ऐतरेय-ब्राह्मण’ में भी आया है कि विजयी राजा पराजित राजा के प्रति दयाभाव प्रदर्शित करते हैं।

राजधर्म में सैन्य शक्ति का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है क्योंकि सभी प्रकार के दण्ड व्यवस्थाओं का अनुशासन सैन्यबल के द्वारा ही स्थापित किया जाता है। महाराज रघु के पास छः प्रकार की सेनाएँ थी-
स गुप्तमूल प्रयन्तः शुद्धपाष्र्णिरयान्वितः।
षड्विधं बलमादय प्रतस्थे दिग्जिगीषया।।

अर्थात् सौभाग्य से रघु ने पहले राजधानी और सीमा के गढ़ों की रक्षा का प्रबन्ध किया फिर शुभ मुहुर्त में घुड़सवार, हाथी, रथ, पैदल, गुप्तचर और शत्रु के मार्ग को जानने वाले इन छह प्रकार की सेनाओं को लेकर विजय के लिए प्रस्थान किया। वर्तमान समय के अनुसार ये सभी सेनाएँ थल सेना के अन्तर्गत आती है। आज थल सेना के अतिरिक्त जल एवं वायु सेना भी देश के अनुशासन को स्थापित करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। कारगिल युद्ध में भारतीय सेनाओं को वायु सेना के द्वारा ही सफलता मिली थी। 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय वायु सेना का प्रदर्शन सराहनीय था। दण्ड के सम्बन्ध में कालिदास मनुमहाराज के मत का उल्लेख करते हुए कहते हें-
नृपस्य वर्णाश्रमपालनं यत्स एव धर्मो मनुना प्रणीतः।

अर्थात् मनु ने कहा है राजाओं का धर्म वर्णों और आश्रमों की रक्षा करना है। इसलिए राम ने प्रजापालन को ही अपना कर्तव्य समझा-
निगृह्य शोकं स्वयमेव धीमान्वर्णाश्रमावेक्षणजागरूकः
स भ्रातृसाधारणभोगमृद्धं राज्यं रजोरिक्तमनाः शशास।।

अर्थात् वर्णाश्रम धर्म के रक्षक बुद्धिमान राम संसार के सुखों का मोह छोड़कर और शोक रोककर भाइयों के साथ अपने भरे-पूरे राज्य का शासन करने लगे। इस प्रकार राम धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे। दिलीप के सम्बन्ध में कालिदास ने कहा है कि राजा दिलीप से उनके सेवक डरते रहते थे क्योंकि वे न्याय के बड़े कठोर थे। राजा का परम कर्तव्य होता है राज्य में दण्डव्यवस्था को न्यायपूर्वक स्थापित करना। न्याय में अपने एवं पराया का भेद न करना ही सही अर्थ में न्याय है।

रघुवंश महाकाव्य में सुग्रीव, विभीषण एवं राम में गहरी मित्रता का संकेत किया गया है। मित्र के सुख-दुःख में सदैव साथ रहना मित्रता की परख होती है। राज्य के सात अंगों में एक अंग मित्र है। राजा को राज्य के अन्दर मित्रों की आवश्यकता होती है। विपत्ति या उत्सव आदि में भी मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता होती है। राजा को विभिन्न राष्ट्रों से मित्रता स्थापित करनी चाहिए, जिससे शत्रु राजा द्वारा आक्रमण होने पर उसका उचित प्रतिकार किया जा सके। आजकल भी एक देश दूसरे देश से मित्रता के आधार पर अनेक प्रस्तावों पर हस्ताक्षर कर मित्र धर्म का निर्वाह करते हैं। आज की मित्रता सैन्य शक्ति तथा व्यापार आदि को मजबूती प्रदान करती है। आजकल भारत के मित्र राष्ट्रों ने रुस, इजरायल, अमेरिका, नेपाल और कनाडा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। रुस भारत का सबसे पुराना एवं विश्वसनीय मित्र राष्ट्र है। भारत-पाक युद्ध में वह भारत की हर प्रकार से सहायता के लिए तत्पर था। इजरायल से भी भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं। इजराइल कारगिल युद्ध में भारत के साथ अच्छे मित्र की भांति खड़ा था। भारत का इस समय अमेरिका से एक मित्र राष्ट्र के रूप में सम्बन्ध स्थापित हो गया है। आज दुनिया में सबसे ताकतवर देश अमेरिका को ही माना जाता है। नेपाल भारत का अभिन्न मित्र राष्ट्र है यद्यपि चीन भी उसे अपने पक्ष में करना चाहता है लेकिन नेपाल बिना शर्त सदैव भारत के साथ रहता है। कनाडा भारत का सच्चा मित्र राष्ट्र है। यहाँ भारतीय मूल के बहुत से लोग निवास करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन एवं वर्तमान दोनों समय में मित्र राष्ट्र की राजधर्म में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

सप्तांगों के अतिरिक्त राजधर्म में षाड्गुण्य (संधि, विग्रह, आसन, यान, संश्रय, द्वैधीभाव) दूत, गुप्चतर-शक्ति आदि विषयों पर भी रघुवंश महाकाव्य में गहन मीमांसा की गयी है। यहाँ मीमांसा शब्द का प्रयोग इसलिए किया जा रहा है क्योंकि इनका प्रयोग यहाँ महतदृष्टि के साथ किया गया है। राम अपने दूत के माध्यम से ही राज्य की वस्तुस्थिति को समझते थे। जब उन्होंने दूत से पूछा कि कहो भद्र हमारे विषय में प्रजा क्या कहती है, तो दूत ने राम से बहुत स्पष्ट सत्य वचन में उत्तर दिया-
निर्बन्धपृष्टः स जगाद् सर्वं स्तुवन्ति पौराश्चरितं त्वदीयम्।
अन्यत्र रक्षोभवनोषितायाः परिग्रहान्मानवदेव देव्याः।।

अर्थात् पहले तो भद्र चुप रहा पर जब राम बार-बार उससे पूछने लगे तब वह बोला नरश्रेष्ठ! जनता आपकी सब बातों की प्रशंसा करती है, किन्तु आपने राक्षस के घर में रहने वाली देवी सीता को फिर से ग्रहण कर लिया है, उसे लोग अच्छा नहीं समझते हैं। यहाँ इस तथ्य का उजागर यद्यपि दूत के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन यह कार्य गुप्तचर का है। गुप्तचर ही इस प्रकार का समाचार राजा को प्रदान करता है।

राम के द्वारा न्याय का एक और रूप यहाँ देखने को मिलता है। उन्होंने भरत को सिन्धु देश का राज्य प्रदान कर दिया। लेकिन भरत तक्ष और पुष्कल नाम से अपने योग्य पुत्रों तक्ष (तक्षशीला) और पुष्कल (पेशावर) राजधानियों का राजा बनाकर स्वयं राम के पास लौट आये। राम की आज्ञा से लक्ष्मण ने अङ्गद और चन्द्रकेतु नाम के अपने दोनों पुत्रों को कारापथ का राजा बना दिया। यह कारापथ वर्तमान समय में महराजगंज। राम अपने पुत्र कुश को कुशावती (कुशीनगर) का राज्य दे दिया तथा लव को शरावती (श्रावस्ती) का राजा बना दिया। उन्होंने शत्रुध्न को पहले ही मथुरा का राजा बना दिया था। इस प्रकार राम अपने जीवन काल में ही अपने भाईयों एवं पुत्रों में राज्य का विभाजन कर दिया था। लेकिन सातों रघुवंशीय पुत्र अपने सबसे बड़े भाई कुश को अपना मुखिया बना लिया क्योंकि भ्रातृप्रेम तो उनके कुल का धर्म था। इस प्रकार वे आपस में प्रेमपूर्वक अपने-अपने सीमा का कभी अतिक्रमण नहीं किये। राम के द्वारा यह विभाजन कही न कही सत्ता को लेकर संघर्ष की सूचना देता है। लेकिन पुत्रों का मानस इतना मजबूत था कि आपस में कभी भी सीमाओं का विवाद नहीं हुआ। महाभारत काल में पाण्डवों को शान्ति के उद्देश्य से इन्द्रप्रस्थ देने के बाद भी सीमा का विवाद नहीं सुलझा और अन्ततः देश को युद्ध की विभीषिका में झुलसना पड़ा। वर्तमान सम्बन्ध में भारत और पाकिस्तान सीमा का बंटवारा भी शांति के उद्देश्य से किया गया था लेकिन सीमाओं का विवाद आज तक नहीं सुलझ पाया। दोनों देशों में आपसी टकराव सदैव बना रहता है, जो उचित नहीं है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि महाकवि कालिदास द्वारा प्रणीत रघुवंश महाकाव्य में लोकोपकारी राजधर्म का उपदेश दिया गया है। जो सभी काल में सभी लोग के लिए हित चिन्तन का नियामक है। यहाँ राजा सत्ता को भोग के लिए नहीं बल्कि प्रजा के योग-क्षेम के संरक्षक के रूप में चित्रित किया गया है तथा यह बताया गया है कि राज्य के सप्तांग, षडशक्तियाँ इत्यादि सभी प्रजा पालन का ही निर्देश करती है।

सन्दर्भ –
1.       मनुस्मृति, 8/15
2.       तैत्तिरीयपनिषद्, 1/11
3.       श्रीमद्भगवद्गीता, 3/35
4.       महाभारत, शान्तिपर्व, 21/169
5.       रघुवंश, 1/16-17
6.       वही, 1/23
7.       वही, 1/24
8.       वही, 2/53
9.       वही, 5/4-10
10.   महाभारत, उद्योगपर्व, 130/12
11.   वही, शान्तिपर्व, 57/42
12.   रघुवंश, 14/35
13.   वही, 4/20
14.   वही, 12/7
15.   वही, 14/23
16.   मनुस्मृति, 8/15
17.   तैत्तिरीयपनिषद्, 1/11
18.   श्रीमद्भगवद्गीता, 3/35
19.   महाभारत, शान्तिपर्व, 21/169
20.   रघुवंश, 1/16-17
21.   वही, 1/23
22.   वही, 1/24
23.   वही, 2/53
24.   वही, 5/4-10
25.   महाभारत, उद्योगपर्व, 130/12
26.   वही, शान्तिपर्व, 57/42
27.   रघुवंश, 14/35
28.   वही, 4/20
29.   वही, 12/7
30.   वही, 14/23
31.   मनुस्मृति, 7/54
32.   महाभारत, शान्तिपर्व, 85/7-9
33.   रघुवंश, 4/10
34.   वही, 13/71
35.   वही, 14/10
36.   वही, 19/4
37.   वही, 19/7
38.   वही, 19/55
39.   महाभारत, शान्तिपर्व, 86/5
40.   मनुस्मृति, 7/70
41.   रघुवंश, 15/28-29
42.   वही, 5/29-30
43.   वही, 4/14
44.   वही, 4/35
45.   वही, 4/36
46.   वही, 4/36
47.   वही, 4/38
48.   वही, 4/38
49.   वही, 4/43
50.   वही, 4/49
51.   वही, 4/61
52.   वही, 4/84
53.   वही, 4/85



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