कविताएँ: गीता गुप्ता 'मन'

गीता गुप्ता 'मन'
चौराहा
   
अक्सर चलते चलते
चौराहों पर
ठिठकते हैं कदम...
पूछते हैं किधर है सही रास्ता
जो मंजिल तक पहुँचायेगा।
हर तरफ एक समकोण
तुम्हारे नज़रिये के झुकाव को परखता
राह बदलने को देगा नई दिशाएँ ...
हमारी एक भूल हमें
पहुँचा देगी बहुत दूर
और फिर वापस आकर खड़े होंगे
बीच चौराहे पर...
आमने-सामने की सड़कें
एक दूसरे से जुड़ती हैं और
जोड़ती हैं एक दूसरे से अनेक गलियों को...
एक पवित्र स्थान है यह चौराहा
जहाँ आपके कर्मो को
मिलता है पारितोषिक...
किसी को फूलों का हार...
किसी को दण्ड...
अक्सर दिन बहुर जाते है चौराहों के
जब आते है महानुभाव कोई
पर्व उल्लास से भर देते हैं
और सबकी ख़ुशी की गवाही देते है
सजे-धजे ये चौराहे ......
किसी नवयौवना को चुनौती देते
आते है नजर...
देते है शहर को अपनेपन की पहचान...
रात में  चाँद की रौशनी
कई नज़रों के सिक्के
चमक उठते है चौराहों की गोद में
जाने कितनी कहानियाँ समेट
चौराहे बन जाते हैं हमारी पहचान।
***


कोहरा

कोहरे की दुशाला ओढ़ प्रात
लगा रहा वसुधा का फेरा।

प्रबल हुआ है शीत कोप,
वायु में बढ़ रहा आक्रोश
दिनकर मेघों के आगोश में,
विहग दुबके है निज बसेरा।

चादर कोहरे की बढ़ रही,
आवेश में लहर चल रही
सूझता न कुछ किसी को,
मद्धिम हैं किरणें हुआ सवेरा।

अस्त-व्यस्त जन-जीवन है,
करता रवि का आवाहन है,
धुंध सी छाई है चहुँ और
रात्रि ने दिवस को ऐसे घेरा।

बलवती हुई तिमिर भाषा,
है धूप बनी जीवन आशा,
वातावरण  मलिन सा है
सख्त है हवाओं का पहरा।
***

ईमेल: geetagpt875@gmail. com
सम्प्रति: अध्यापन
पाँच साझा-संकलन प्रकाशित। समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा शताधिक बार सम्मानित।

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